हाशिमपुरा : तीन दशक बाद भी नहीं बदली पुलिस मानसिकता

हाशिमपुरा की घटना को 33 साल पुरे हो चुके हैं। आज भी हाशिमपुरा के मजलुमों को सामाजिक, राजनैतिक न्याय दिलाने में भारतीय समाज नाकाम रहा है। हाशिमपुरा कि तरह हाल ही का दिल्ली दंगा, इससे पहले मुंबई में आगरीपाडा, माहिम पुलिस थाने कि घटनाओं ने लोकतंत्र पर सवाल खडा किया है।

गुजरात में बेस्ट बेकरी तथा अन्य घटनाओं ने धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के भविष्य के सामने कई चुनौतीयां पैदा कि हैं। इन घटनाओं का अध्ययन करनवाले कुछ अभ्यासकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं से दंगो में पुलिस, राज्य और नेताओं कि मानसिकता तथा वर्तन को समझने का हम प्रयास कर रहे हैं।

22 मई 1987 को हाशिमपुरा में हुए हत्याकांड ने मुसलमानों के प्रति भारतीय लोकतंत्र और पुलिसीया नजरिए को उजागर किया है। इस हत्याकांड पर कई रिपोर्ट आए, कई लोगों ने इस खबर के पिछे का सच जानने कि कोशिश की। सच्चाई को अलग-अलग नजरीए से पेश किया गया। इस घटना कि भर्त्सना हुई, लोकतंत्र के समर्थकों और धर्मनिरपेक्ष विचारधारा के पक्षधर विचारकों ने इस घटना को लेकर भारतीय लोकतंत्र के भविष्य के प्रति अपनी चिंता को जाहीर किया।

तब से अब तक हालात और पुलिसिया मानसिकता को बदलने कि योजनाओं पर बहस हो रही हैं। मगर एक हकिकत आज भी हाशिमपुरा के बाद हर-बार दंगों में पुलिसिया बर्बरता के रुप में काला सच बन कर सामने आता है। भोपाल (कथित सिमी सदस्यों का एन्काऊंटर) से लेकर मुंबई और गुजरात दंगो तक सभी घटनाओं में पुलिस मुसलमानों के साथ दुश्मनों सा बर्ताव करती रही है।

गुजरात दंगों पर तिस्ता सेटलवाड, अजीज बरनी, राना अय्यूब जैसे कई धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के समर्थकों ने अलग रिपोर्ट बनाई है, किताबें लिखी हैं। आशुतोष वार्ष्णेय ने दंगो के सामाजिक मानसशास्त्र को समझने के लिए लिखी किताब ‘हिन्दू मुस्लिम रिश्ते’ भी हमें इस प्रश्न को समझने के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती है।

हाशिमपुरा नरसंहार के वक्त विभुती नारायण राय गाजियाबाद जिले के पुलिस एसपी थे, उन्होंने अपनी किताब ‘सांप्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस’ में इस घटना का अनुभव कथन किया है, साथ ही भारतीय पुलिस और अल्पसंख्यक समुदाय के रिश्तों पर रौशनी डालने  कि कोशिश की है।

इस गंभीर बहस तथा कुछ प्रयासों के बावजूद आज तक सत्ता और पुलिस कि मानसिकता में कोई बदलाव नहीं आ सका। हम इन सभी विचारकों कि भूमिका को उन घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में समझने कि कोशिश करेंगे जिसका उन्होंने अध्ययन किया है –

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हाशिपुरा विभती नारायण राय

इस अमानवीय घटना का अनुभव कथन करते हुए विभूती नारायण राय लिखते हैं – 1987 में मेरठ में भयानक दंगे हुए जो रुक-रुककर चलते रहे। इन दंगो के पीछे, पिछले कुछ दिनों से मेरठ में व्याप्त सांप्रदायिक तनाव और छिटपुट हिंसक घटनाएं थीं।

दिनांक 17 मई, 1987 से बडे पैमाने पर हिंसा कि घटनाएं भडक उठी। हिंसा कितने बडे पैमाने पर घटित हो रही थी, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि इसे दबाने के लिए बाहर से 50 से अधिक राजपत्रित पुलिस अधिकारी और मैजिस्ट्रेटों के अतिरिक्त पी.ए.सी. सेना तथा अर्ध-सैनिक बलों की 70 से अधिक कंपनियां उपद्रवग्रस्त क्षेत्र में झोंक दी गयी थीं। इतने बडे बंदोबस्त के बावजूद दंगो पर कई महीनों तक काबू पाया नही जा सका।

इस दंगे से निपटनेवाले पुलिस कर्मी किस तरह से उपरोक्त पुर्वाग्रहों से ग्रस्त थे इसका उदाहरण हाशिमपुरा की घटना में मिलता है। दंगा शुरु होने के पांच दिन बाद अर्थात 22 मई को दिन में सेना, पी.ए.सी. और पुलिस ने हाशिमपुरा मोहल्ले में तलाशियां लीं।

हाशिमपुरा मेरठ शहर के मध्य में बसा एक मुस्लिम बहुल इलाका है, जिसमें काफी बडी संख्या में हाथकरघों पर काम करनेवाले बुनकर रहते हैं। इनमें भी एक अच्छी संख्या रोजगार कि तलाश में आए बिहारी बुनकरों कि है।

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तलाशी के दौरान मुसलमानों को उनको घरों से निकालकर बाहर बैठा दिया गया और फिर उनमें से छांट-छांटकर नौजवानों को एक किनारे इकठ्ठा किया गया। इन नौजवानों को पी.ए.सी. के एक ट्रक में हाशिमपुरा से सीधे गाजियाबाद की तरफ ले जाया गया।

मेरठ गाजियाबाद के लगभग मध्य में स्थित मुरादनगर कस्बे कि शुरुआत के पहले पडनेवाली गंगनहर पर मुख्य सडक से हटकर नहर की पट्टी पर कुछ किलोमीटर अंदर ले जाकर पी.ए.सी. जवानों ने ट्रक में चढे हुए लोगों को निचे उतरने का हुक्म दिया।

कुछ के नीचे उतरते ही उन्होंने उन्हें अपनी थ्री नॉट थ्री रायफलों से भूनकर नहर में फेंकना शुरु कर दिया। संभवतः गोलियों कि आवाज सुनकर गांववाले इकठ्ठे होने लगे थे या फिर बचे हुए लोगों ने आसन्न मृत्यू से डरकर ट्रक से उतरने से इनकार कर दिया, इसलिए उन जीवित लोगों को लेकर यह ट्रक फिर गाजियाबाद की ओर भागा।

गाजियाबाद जाने का कारण संभवतः यह था कि पी.ए.सी. की जिस टुकडी ने यह दुष्कृत्य किया था, वह इकतालिसवीं बटालियन की थी और उसका मुख्यालय गाजियाबाद में था, इसलिए वहां पहुंचकर वे ज्यादा सुरक्षित महसूस कर सकते थे। इकतालिसवीं बटालियन का मुख्यालय गाजियाबाद-दिल्ली सीमा पर राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है।

ट्रक इस मुख्यालय से लगभग आधा किलोमीटर पहले कच्चे मार्ग पर उतर गया और मुख्य रास्ते से थोडी दूर स्थित एक नहर पर जाकर रुका। वहां शेष बचे लोगों को घसीटकर ट्रक से उतारा गया और उन्हें गोली मारकर नहर में फेंक दिया गया। वहां थोडी दूर रुकने के बाद ट्रक उसके सवार मेरठ चले गए, जहाँ उस समय वे ड्यूटी पर थे।

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मुंबई फसाद : अजीज बरनी

अजीज बरनी, जो कि एक विख्यात पत्रकार हैं, मुंबई दंगो पर अपनी राय जाहीर करते हुए लिखते हैं – मुंबई दंगो में ज्यादातर पुलिस दोषी है, श्री कृष्णा कमीशन ने पुलिस थानों के कई अफसरों की पहचान की है जिन्होंने न केवल अपने कर्तव्यों से आँख मूंद ली थी बल्कि लूट मार एवं आगजनी कि घटनाओं में सम्मिलीत पाए गए थे। कमीशन ने इनके विरुद्ध कठोर कार्यवाही की सिफारीश की है।

कमीशन ने कुलाबा के एस.आई. वसंत मधुकर मोरे और उनके अन्य साथीयों को दोषी ठहराते हुए कहा है कि, इन्होंने एक उग्र भीड को खुली छूट दी थी। जिसके कारण अब्दुल रज्जाक उर्फ अब्बा कालशेकर की हत्या कर दी गई। इसी तरह आगरीपाडा के अशोक नायक और उनके साथीयों को बाहरी दंगो में भाग लेने के लिए गिरफ्तार किया गया।

भायकला के सिनियर पी.आई. बाहुले, एस.आई. राम देसाई का व्यवहार भी सांप्रदायिक था। माहिम पुलिस स्टेशन का कॉन्स्टेबल संजय लक्ष्मण गावडे खुले आम हाथ में नंगी तलवार लिए हिंसा में शामिल था। एल.टी. मार्ग पुलिस स्टेशन में बाबू अब्दुल शेख को पुलिस हिरासत में दंगाईयों ने मार डाला। रफी अहमद किदवई मार्ग पुलिस स्टेशन के एन. के. कापसे ने हिलाल मसजिद पर बिना उकसावे के फायरींग कर दी जिससे 7 मुसलमानों कि मृत्यु हो गई।

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गुजरात फसाद

डी पार्थसारथी और रावेना रॉबिन्सन कहते हैं – यह कहना काफी नहीं होगा कि गुजरात कि मशनरी धाराशायी हो जाने के कारण इतने बडे पैमाने पर हिंसा घटित हुई जो अन्यथा सम्भव न थी। दूसरे शब्दों में कहा जाए कि पुलिस और अधिकारियों ने पक्षपातपूर्ण ढंग से कार्य किया।

देश के विभिन्न भागों की हिंसा के संदर्भ में पुलिस, राज्य पदाधिकारीयों और यहां तक कि अर्द्धसैनिक बलों की भूमिका के संबंध में दशकों से ऐसा समझा जाता रहा था। 1984 में दिल्ली में सिखों के विरुद्ध हुए सुनियोजित जनसंहार ने हमें भविष्य में होनेवाली ऐसी संभावनाओं के प्रति काफी सतर्क कर दिया था। राज्य के ऐसे कुकृत्यों के वैधीकरण की प्रवृत्ती पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

दिसम्बर 2002 के चुनावों के नतीजे इसकी एक अभिव्यक्ती थी। इस प्रकरण में राज्य और सरकारी दल के पदाधिकारीयों द्वारा मुस्लिम समुदाय के विरुद्ध किए गए इन हमलों का खुलमखुल्ला औचित्य प्रतिपादित किया गया तथा नागरिकों के जान-माल की रक्षा संबंधी संवैधानिक दायित्व को तिलांजली दी गई।

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फासिवाद और देश का भविष्य

तिस्ता सेटलवाड बदलते सामाजिक मानसिकता और फासीवादी गुट बढती शक्ती को लेकर अपनी चिंता प्रस्तुत करती हैं। उनका कहना है – 1992 और 2002 के दंगे जानबुझकर करवाए गए और उसके समर्थन के लिए यह ‘जैसे को तैसा जवाब’, ‘हिंसा का उत्तर हिंसा से’ या फिर ‘किसने मारा पहला पत्थर?’ जैसे तर्क प्रस्तुत किए गए।

इसके बाद फिर तीन मुहीमों कि शुरुआत हुई, जिसकी घोषणा है ‘लव्ह जिहाद’, ‘घर वापसी’और ‘गो संरक्षण’ फासिवादी गुटों कि यह घोषणाएं है और औरतें तथा लडकियां इनका लक्ष्य हैं। जो औरतें या लडकियां अपने प्रियकर, पती का चुनाव अपनी मर्जी से करना चाहती हैं, उन्हे यह आजादी मंजूर नहीं हैं।

फसाद और पुलिस तथा राज्य कि मानसिकता में बदलाव के लिए कोशिशे सामाजिक स्तर से शुरु करनी होंगी। देश के दो बडे समुदायों में संवाद के बिना इस तसवीर को बदलना संभव नहीं हो सकता। विसंवाद ने ही इन दो समुदायों को एक दूसरे के सामने प्रतिद्वंद्वी के रुप में लाकर खडा किया है।

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समारोप

विविध संस्था तथा सरकारी रिपोर्ट को माने तो हाशिमपुरा हो या तीन महीनों पहले तक का दिल्ली दंगा हर एक घटना पुलिस कि भूमिका संदिग्ध पायी गई हैं। अभी हाल ही कि याने 23 मार्च एक घटना का आखीर में उल्लेख करना जरुरी होता हैं, जो अभी प्रकाश में आई हैं। मध्यप्रदेश के बैतुल में इस्लामफोबिया से ग्रस्त एक घटना में पुलिस नें एक दाढीवाले दीपक बुंदेले नामक एक व्यक्ति को इसलिए पिट दिया कि वह मुस्लिम जैसा दिखता हैं।

संयोगवश पीडित व्यक्ति एक वकिल निकला। जब मामला तूल पकडता दिखा तो पुलिस नें उस व्य़क्ति पर मामले को रफा-दफा करने के लिए दबाव बनाना शुरु किया हैं। दूसरी ओर कोरोना संकट के बाद कुछ उपद्रवी तत्त्वो ने फेक न्यूज को आधार बनाकर मुसलमानों के खिलाफ जहर उगलने का काम किया, जिसके परिणाम स्वरूप शहर, कस्बों तथा छोटे-छोटे गाँवों मे मुस्लिम समुदाय के प्रति नफरत और भेदभाव का वातावरण तैयार किया गया हैं।

सीएए और एनआरसी के खिलाफ हर समुदाय के लोग सरकार के विरोध में उतरे थे। इस विरोध के चलते सरकार कि देश-विदेश में कडी आलोचना कि गई। बहरहाल कोरोना संकट ने इस आंदोलन को कुछ देर के लिए स्थगित किया हैं। ऐसे समय में पुलिस, केंद्र कि सरकार बदले कि भावना मे सीएए विरोधीओं पर सख्त धारा लगाकर गिरफ्तार कर रही हैं। मानवी अधिकार कार्यकर्ताओं कि धरपकड कर रही हैं।

लॉकडाऊन में युवाओं तथा युवतीयों को जेलों मे बंद कर रही हैं। यह सरासर संविधानिक अधिकारों का उल्लंघन हैं। सरकार ने सोंचा कि विरोध के लिए कोई बाहर नही आयेंगा। इस तरह व्यक्तिगत अधिकारों का हनन करना ठीक नही होंगा। ऐसे कारनामों पर देश-विदेश में हमारी प्रतिमा मलीन हो रही हैं। संयुक्त राष्ट्र, खाडी देश तथा अमरिकन एजन्सिया  हम पर हंस रही हैं। परंतु सरकार को इसकी कोई चिंता नजर नही आती।

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