प्रगतीशील लेखक संघ की जरुरत आज क्यों हैं?

कुछ थोड़ी सी राज़ की बात आप लोगों को बताता हूं, फिर शुरू करुगा। मैं बैठा था छगन भुजबल साहब के पास में। उनसे कहा, यहां बहुत बड़े लोग बैठे हैं तो मुझे किस-किस का नाम लेना चाहिए, अगर कोई मुझे लिखकर दे देगा, …

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हिन्दी सिनेमा में विलुप्त होता मुस्लिम सामाजिक परिवेश

क्शन किंग निर्देशक रोहित शेट्टी इस बात का रोना रो रहे हैं कि सोशल और प्रिंट मीडिया में उन पर यह तोहमत लगाई जा रही है कि उनकी फिल्म ‘सूर्यवशीं’ के खलनायक मुसलमान हैं। वह इस पर जवाब में कहते हैं, “आज से पहले …

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अभिनय के साथ दिलीप कुमार की राजनीति में भी थी चमक

हिन्दी सिनेमा के लिजेंड दिलीप कुमार आज हमारे बीच नही हैं। पर उनकी यादे, उनसे जुड़ी बाते और उनकी जीवनी हम सब के लिए एक दिशादर्शक हैं। जिसकी चर्चा करना लाजमी हो जाता हैं।

40 के दशक में फ़िल्मों में आने से पहले दिलीप

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पिता के डर से दिलीप कुमार ने फिल्मों में बदला था नाम

हिन्दी सिनेमा ने यूँ तो एक से एक कई शानदार अभिनेता दिए हैं लेकिन दिलीप कुमार एक ऐसे अदाकार थे जिन की बात ही कुछ और थी। बॉलीवुड के साहिब ए आलम कहे जाने वाले दिलीप कुमार का बुधवार सुबह करीब साड़े सात बजे …

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भारतीय रंगमंच

पारसी रंगमंच के शेक्सपीयर ‘आगा हश्र काश्मीरी’

गा मुहंमद शाह हश्र काश्मीरी का नाम पारसी रंगमंच के बडे़ नाटककारों में शुमार किया जाता है। वे एक ऐसी अजीम शख्सियत हैं, जिन्होंने भारतीय रंगमंच में नाटककारों को प्रतिष्ठा दिलाने का अहमतरीन काम किया।

3 अप्रैल, 1879 को बनारस के एक मध्यवर्गीय, पारंपरिक

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महाराजा किशन प्रसाद ‘शाद’ की इस्लामी शायरी

दुनिया की तारीख में बेशुमार ऐसे बादशाह गुजरे हैं जिन्होंने अदब कि दुनिया में अपने शाहकार और यादगार छोड़े हैं। लेकिन दकन की सरजमीं पर जितने अदीबों और शायरों ने बादशाह और उमरा के तबके में जन्म लिया इसकी मिसाल दुनिया कि कोई सरजमीं

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अब भी याद करते हैं तेलंगानावासी कुली क़ुतुब शाह को!

मुहंमद कुली क़ुतुब शाह को अपने आबा व अजदाद के मुकाबले बहोत कम उम्र मिली थी। दुसरी तमाम बातों में कुदरत ने इनपर बड़ा करम किया था। मालो व दौलत, फतेह व कामरानी, अमन व इत्मिनान जितना इनको मिला था उतना किसी

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गुलाम रब्बानी ताबां जिन्होंने दंगों के विरोध में लौटाया ‘पद्मश्री’

र्दू अदब में ग़ुलाम रब्बानी ताबां का शुमार तरक्कीपसंद शायरों की फेहरिस्त में होता है। उन्होंने न सिर्फ़ शायरी की ज़मीन पर तरक्कीपसंद ख्याल और उसूलों को आम करने की कोशिश की, बल्कि इसके लिए हर मोर्चे पर ताउम्र जद्दोजहद करते रहे। तमाम

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फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ आज भी हैं अवाम के महबूब शायर

र्दू अदब में फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ का नाम एक आला दर्जे का मुकाम रखता है। वे न सिर्फ उर्दूभाषियों के पसंदीदा शायर हैं बल्कि हिंदी और पंजाबी भाषी लोग भी उन्हें उतने ही शिद्दत से पढ़ते हैं। उनकी नज्मों-गजलों के मिसरे और जबान पर

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कमलेश्वर मानते थे कि ‘साहित्य से क्रांति नहीं होती’

हुआयामी व्यक्तित्व के धनी कमलेश्वर की 27 जनवरी को 14वीं पुण्यतिथि है। 6 जनवरी, 1932 को उत्तरप्रदेश के मैनपुरी में जन्में कमलेश्वर प्रसाद सक्सेना उर्फ कमलेश्वरकी आला तालीम इलाहाबाद में हुई।

शिक्षा पूरी करने के बाद आजीविका के लिए

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