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देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री के ‘रूमानियत का बादशाह’

देव आनंद फिल्म इंडस्ट्री के ‘रूमानियत का बादशाह’
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फिल्म गाईड में वहिदा रहमान के साथ देव आनंद


दाबहार अभिनेता देव आनंद की चर्चा फिल्म गाईड और सुरैय्या के प्रेम प्रकरणो से आगे अभी तक नही बढ़ पायी हैं। जब भी उनका जिक्र आता हैं, तो हर कोई ये दो कहानीयां दोहराता हैं। गाईड की चर्चा आम और खास भी हैं। खुद देव साहब को भी बार बार गाईड के बारे में बताने में मजा आता था।

उनके कई इंटरव्यू मैंने देखे और पढ़े हैं, जिसमें वह इस फिल्म की चर्चा करते नही थकते। मुझे याद हैं, बीसएक साल पहले गाईड को डीडी पर दिखाया गया था, फिल्म शुरु होने से पहले देव साहब का छोटासा इंटरव्यू भी दूरदर्शन ने दिखाया था। खैर उस समय उम्र के हिसाब से फिल्म कोई खास नही लगी। पर जैसे जैसे उसे बार बार देखा, मुझे भी रोझी और राजू से प्यार हुआ।

आज हम गाईड और सुरैय्या दोनो की बात नही करते, बल्कि इसके अलावा उनकी जो दिगर फिल्मे था, जिसमें उनका किरदार और पहचान एक स्टारडम के रूप में स्थापित हुई थी। उनके बारे में एक जमाने में कहा जाता था, गर उन्होंने फिल्मों में एक्टिंग करनी शुरु की तो उसी दिन उनका फिल्मी करियर चौपट हो जाएगा

मशहूर मराठी सिनेपत्रकार इसाक मुजावर ने देव आनंद पर एक जीवनी लिखी हैं, जो 1977 में छपी थी।उसमें उन्होंने देव आनंद के बारे में कई आश्चर्यजनक खुलासे किये हैं। उनका मानना था, देव एक्टिंग के लिए पहचाने नही जाते, बल्कि उनका स्टारडम ही उनकी पहचान हैं, जिसमे उन्हें एक्टिग करने की कोई जरुरत नही हैं। बस कॅमरे के सामने थोडासा टहल भी जाए तो उनकी एक्टिंग मुकम्मल होती हैं। 

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तीस रुपये लेकर बंबई में

देव साहब का पूरा नाम धर्मदेव आनंद था। 23 सितम्बर 1923 को उनका जन्म पंजाब के गुरुदासपूर में हुआ था। इनके पिता पिशोरीमल आनंद एक वकिल थे। जो काँग्रेस सदस्य और स्वाधीनता सेनानी भी थे

लाहौर के सरकारी कॉलेज से उन्होंने 1942 में अंग्रेजी साहित्य में बीए ऑनर्स की डीग्री हासिल की थी। देव एम.ए. करना चाहते थे, लेकिन उन दिनों उनके पिता कि माली हालात ठिक नही थी। उन्होंने कहा, “अब नौकरी कर लो, मेरे पास तुम्हे पढ़ाने के लिए पैसे नही हैं।” 

बहरहाल उन्होंने दिल्ली में क्लर्क कि नौकरी शुरू की। पर उनका दिल यहां नही था, उन्हें तो नेवी में जाना था। उन्हें नेवी का शौक भी था, जिसके लिए वे क्लर्क बने थे। नेवी में नौकरी के लिए अर्जी भी दी। उन्हें नौकरी मिली थी। मगर पड़ताल में उनकी पिता की कारगुजारी सामने रोड़ा बन कर आ चुकी थी।

नेवी की नौकरी उन्हें नही मिली, वजह बताई गई उनके पिता ने अंग्रेज सरकार के खिलाफ बगावत की हैं, लिहाजा उन्हें यह नौकरी नही दी जाती।

लिहाजा उन्होंने अपने अभिनय के शौक को आजमाना चाहा और मुंबई पधारे। पर उन्हें काम नही मिला। कहते हैं, 1943 में जब वह सपनो कि नगरी बंबई पहुंचे तो उनके पास सिर्फ 30 रुपए थे। उन्होंने रेलवे स्टेशन के करीब एक सस्ते से होटल में कमरा लिया। उनके साथ तीन और लोग भी रहते थे जो उनकी तरह ही फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे।

उन दिनों दुसरा विश्वयुद्ध चल रहा था। ब्रिटिश सरकार ने पोस्ट में खत सेन्सॉर करने का एक महकमा शुरू किया था, उसमें देव नौकरी करने लगे। साथ ही उन्होंने अपना स्ट्रगल भी जारी रखा। 

फिल्मों के पहले सुपरस्टार और देव साहब के करीबी दोस्त दिलीप कुमार देव के बारे में दि हिन्दू में लिखते हैं, चालीस दशक के मध्य में हम तीनों यानी राज, देव व मैंने तकरीबन एक साथ फिल्मों में कदम रखा। वो भी क्या दिन थे, आज भी आंखों के सामने हैं।

काम की तलाश में बॉम्बे की लोकल में इधर-उधर फिरने के दिन। देव भी अक्सर साथ हुआ करते थे। थोड़े ही दिनों में हमारे बीच दोस्ती पनप चुकी थी। वे घर के सदस्य बराबर थे नासिर (छोटे भाई) से उनकी मुझसे भी ज्यादा बनती थी। दशक के पूरे होने तक हमने फिल्मों में मजबूत आधार हासिल कर लिया था।

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मिला पहला मौका 

उन दिनों चेतन आनंद इप्टा में कार्यरत थे। भाई के वसिले से उन्हे थिएटर मे मौका मिला। उन दिनों ख्वाजा अहमद अब्बास जुबैदा नाटक का मंचन कर रहे थे। जिसका डिरेक्शन बलराज साहनी कर रहे थे। नाटक के मुख्य पात्र के भाई को रोल उन्हें मिला।

इसाक मुजावर लिखते है, देव का औसत अभिनय देखकर साहनी ने कह डाला कि देव जिन्दगी में कभी भी हिरो नही बन सकते। मुजावर लिखते है, एक दिन झुबैदा नाटक देखने बबनराव मसुरेकर नामक शख्स आये थे। जो प्रभात फिल्म कंपनी के सर्वेसर्वा बाबूराव पै के दोस्त थे।

मसुरेकर को देव का अभिनय अच्छा लगा। उन्होंने ये बात पै के सामने रखी। अग्रह कर उन्हें झुबैदा का एक शो दिखाया। बाबूराव पै को भी देव का अभिनय पसंद आया। और इस तरह देव प्रभात फिल्म कंपनी के लिए अनुबंधित किये गए।  

1943 से 1945 पूरे दो साल संघर्ष करने के बाद उन्हें अपनी पहली फ़िल्म हम एक हैं मिली। जो प्रभात टॉकीज की निर्मिती थी। शूटिंग के वक़्त उनकी पहचान गुरु दत्त से हो गयी। जो पी. एल. संतोषी के असिस्टंट थे। 

प्रभात फिल्म पुणे कि थी, इसलिए उसकी सारी शुटिंग पुणे में ही होती थी। देव वही रहते थे। गुरु दत्त भी उनके करिबी बने। इसाक मुजावर कि माने तो उस समय देव ने गुरु दत्त से कहा था, जब कभी मैं फिल्म बनवाउंगा तो बतोर डिरेक्टर आपको ही लुंगा। 1951 में जब बाजी बनी तो उसके डिरेक्टर गुरु दत्त थे। फिल्म ने खुब चर्चा बटोरी। 

वैसे उनकी पहली फिल्म थी, 1946 में आयी हम एक हैं।’ पर उन्हे पहचान मिली जिद्दी से जो 1948 में आयी थी। जिद्दी कहानीकार इस्मत चुगताई ने लिखी थी। फिल्म चली और देव आनंद एक अभिनेता के रूप मे बंबइया इंडस्ट्री में स्थापित हो गए।

देव ने प्रभात कंपनी के लिए तीन फिल्में की थी। पर वो खास नही चली, जिससे मायूस होकर वे अपने घर गुरुदासपूर लौट जाने वाले थे। बोरिबंदर पहुंचकर उन्होंने थर्ड क्लास का तिकट निकाला और ट्रेन का इंतजार करने लगे। पर उनकी किस्मत से उस दिन रेलवे स्टेशन पर शाहिद लतीफ और उनकी बेगम इस्मत चुगताई किसी मेहमान को छोड़ने आये हुए थे।

मुजावर लिखते है, “देव को देखकर व रुक गए, क्योंकि वे इंडस्ट्री में बतौर हिरो पहचाने जाने लगे थे। उन दिनों शाहिद लतीफ जिद्दी का डिरेक्शन कर रहे थे। उसके हिरो अशोक कुमार थे। उन्हें लगा कि तीन फिल्में करने के बाद देव का इस तरह जाना गलत हैं। बहरहाल उन्होंने देव को रोक दिया।”

मुजावर आगे लिखते हैं, “देव ने भी सोंचा की इतने बुरे दिन काटे हैं, चलो और दो-तीन ही सही। शाहिद लतिफ ने अशोक कुमार को मनवाया, उन्हें सारी कहानी और अपने विचार बता दिये। दादामुनी बड़े दिल के थे, उन्होंने देव को बतौर हिरो जिद्दी के लिए हामी भर दी।” और इस तरह देव जिद्दी के हिरो बने। आगे का इतिहास आपको पता हैं। 

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दरियादिल व्यक्तित्व

देव साहब ने कुछ ही सालों मे अपनी फिल्म कपंनी नवकेतन शुरु की, जो अब तक फिल्में बनाती हैं। अपनी कंपनी के बाद उन्होंने करीबन बाहर की फिल्मे लेनी बंद कर दी। ज्वेल थीफ के बाद ही तो उन्होंने बाहर की कोई फिल्म नही की। 

अपने बैनर तले देव साहब ने कई यादगारे फिल्मे बनाई। जिसमें, बाजी, ज्वेल थीफ, हम दोनो, काला पानी, सीआईडी, अफसर, पेईंग गेस्ट, प्रेम पुजारी, हरे रामा हरे कृष्णा आदी प्रमुख थी।

व्यक्तित्व को लेकर दिलीप कुमार कहते हैं, उन हास्य-व्यंग्य के पलों को भुला नहीं सकता जब राज देव व मेरी दिलचस्प नक़ल किया करते। वो बेहद खुबसूरत पल थे, क्योंकि हम विरोध नहीं बल्कि रोचक प्रतिस्पर्धा में जी रहे थे।

देव एक स्टार के साथ जिन्दादिल इन्सान भी थे। हर वक्त खुदको काम में डुबा रखते। उनका मानना था, फिल्मे उनमे रोमान्स और जिने का जज्बा पैदा रखती हैं।

वहिदा बताती हैं, “देव में बचपना हैं, बात करने का ढंग, काम करने का ढंग बहुत अच्छा हैं, जब कोई सिन करना होता, जब वह अच्छा नही बन पा रहा, तो वे बच्चा बन जाते। उसे बार बार अपने मन माफिक रिटेक कराते।” 

उनके काम के प्रति लगन के बारे में दिलीप कुमार कहते हैं, मेरी अनुभव रहा कि देव जूनियर कलाकारों को लेकर भी बडे दरियादिल थे। आपने कभी किसी की मेहनत को नजरअंदाज नहीं कियापरफेक्ट शॉट निकलवाने के लिए टेक पर रिटेक मंजूर था।

वहिदा रहमान बताती हैं, “वे हमेशा नाम से पुकारने कहते, मैं स्वभाव से उन्हें सर कहती, तो कहते, सर-साहब बोलनेवालों के साथ मेरा काम करना मुश्कील हो जाता हैं, तूम नाम ही लिया करो, ...वो बड़े सिम्पल आदमी थे अपने बड़े होने का एहसास उन्हें नही था।”

देव साहब स्टाइल स्टेटमन के लिए भी जाने जाते है। गले में स्कार्फ, सर पर हैट, कोट और लंबे कॉलर वाला शर्ट उनकी खास पहचान थी। उन्होंने एक दौर में व्हाइट शर्ट और ब्लैक कोट को इतना पॉपुलर कर दिया था कि हर कोई उन्हें कॉपी करता। फिर एक दौर ऐसा भी आया जब देव आनंद पर पब्लिक प्लेसेस पर काला कोट पहनने पर बैन लगा दिया गया।

इस बारे में उन्होंने सहारा समय के इंटरव्यू बताया था, काला पानी के बाद ये चलन चल निकला था वह लोगों का मेरे प्रति जुनून था। जिसका मैंने भी लुत्फ उठाया। मैंने सोंचा लोगों के मजे में मेरा मजा हैं

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रूमानियत के बादशाह

देव साहब को रूमानियत का बादशाह कहा जाता था। देव बहुत सारे फिल्मों मे दिवाने प्रेमी की तरह नजर आते हैं। फिर वे गाईड का राजू हो या प्रेम पुजारी का रामदेव हो या जॉनी मेरा नाम का जॉनी।

बकौल दिलीप कुमार, फिल्म में रूमानी दृश्यों को खूबसूरती से अंजाम देने में देव साहेब सबमें अव्वल थे। जेमिनी की महान प्रस्तुति इन्सानियतमें हमें एक साथ काम करने का सुनहरा अवसर मिला। ..देव की दरियादिली का आलम देखें कि मेरी तारीखों से मेल करने वास्ते देव ने खुद की फिल्म शुटिंग स्थगित कर दी थी।

देव साहब की फॅन फॉलोइंग चार पिढीयों में थी उन्होंने शेखर कपूर के वॉक दि टॉक में बताया था, साठ के दशक के लोग मेरी फिल्में देखते थे, आज 21वी सदी के युवा भी उन्हें पसंद करते हैं, जिनका मैं बहुत शुक्रगुजार हू 

लोग उनकी फिल्मे देखने भीड लागते। ज्यादातर मध्यवर्ग के लोग उनकी फिल्मे देखने आते। इन्हीं लोगों से थियेटर फुल हो जाते थे। लोग धूप में घंटों कतार में खड़े होकर टिकट लेते थे।

अन्नू कपूर सुहाना सफर में बताते हैं, उस वक्त जमशेदपुर के एक सिनेमाघर के बाहर फिल्म के टिकट के लिए गोलियां चल गई थीं। जिसमें दो छात्रों की मौत तक हो गई। इस घटना के बाद एक सप्ताह के लिए नटराज टॉकिज बंद कर दिया गया।

देव साहब ने ना सिर्फ अपने आप को लिबरल रोमांटिक नायक के तौर पर भी स्थापित किया, बल्कि इडस्ट्री को ऐसा नायक दिया जो शालिनता के बावजूद समाज की बुराइयों के खिलाफ खड़ा होता है।

देव आनंद की एक्टिंग के बाजार में खुद को हमेशा दुसरे अभिनेताओ से अलग रखा। एक के बाद एक फिल्मे वे बनाते जाते। फिल्मे चले या न चले उन्हे कोई फरक नही पड़ता। देव आनंद को आलोचना भी कम नहीं मिली। कुछ लोगों ने सवाल भी उठाए। ये तक कहा कि अब देव आनंद को काम छोड़ देना चाहिए।

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रोमैंसिंग विद लाइफ़

यूं तो उन्हें लेकर कई किवंदतीया मशहूर हैं, लेकिन उनमें उनके फिल्मों के किरदार और विषयों पर चर्चा नही हैं। ज्यादातर चर्चाए गॉसीप पर आधारित होती हैं। अपनी बायोग्राफी रोमैंसिंग विद लाइफ़ में उन्होंने अपने मशहूर किस्सो पर खुलकर बाते की हैं।

जिसमें उन्होंने अपने दौर के कई अभिनेत्रीयो के साथ प्रेम प्रसंगो की चर्चा की हैं। सुरैय्या के बारे में खास जिक्र करते हुए उन्होंने उनसे प्रेम की बात कबुल की हैं। साथ ही उन्होंने कहा था, जो लोग सच नही बोलना चाहते, उन्हे आत्मकथा नही लिखनी चाहीए।

उन्होंने कहा, यह मेरी आत्मकथा है, मेरा जीवन भी एक बड़ी एपिक फ़िल्म की तरह रहा है, मैं 84 साल का हूँ और 62 वर्षों से सिनेमा से जुड़ा रहा हूँ, उसी की कहानी सुनाने की कोशिश की है इस किताब में। मुझे जीवन से प्यार है, अपने काम से प्यार है इसलिए मैंने किताब का नाम रखा है रोमैंसिंग विद लाइफ़।

2007 मे आयी रोमैंसिंग विद लाइफ़ने बॉलीवूड में हचलच मचा दी थी, उसमे लिखी हरएक बातों पर कई सालों तक विवाद होते रहे। बॉलीवूड में उनके कई प्रतिस्पर्धी थे बावजूद इसके उनकी हरएक से गहरी और करीबी दोस्ती रही।

देव ने रोमैंसिंग विद लाइफ़ में अपने साथी कलाकारों दिलीप कुमार और राज कपूर को भी बहुत स्थान दिया है। इसपर दिलीप साहब कहते हैं,

शुरु के जमाने से ही देव व मेरे दरम्यान एक पेशेवर तालमेल कायम रहा। पेशेगत मजबूरियों के नाम हमने दोस्ती का अदब नहीं भुलाया। हमने एक दोतरफा रिश्ता बनाया, एक शांत व अनकही संहिता को हमने निभाया। एक दूसरे की इज्जत करना हम बखूबी जानते थे।

बायोग्राफी के विमोचन के मौके पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देव आनंद की प्रशंसा की थी उन्होंने कहा, “देव साहब 84 वर्ष की उम्र में भी सिर्फ़ दिल से जवान नहीं हैं बल्कि उन्हें देखकर भी जवानी का एहसास होता है, देश के लाखों-लाख प्रशंसकों के साथ मैं भी उन्हें सुदीर्घ, स्वस्थ और रचनात्मक जीवन की शुभकामना देता हूँ

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सफल कलाकार

देव भारतीय सिनेमा के बहुत ही सफल कलाकार, निर्देशक और फ़िल्म निर्माता थे। उन्होंने कई सुपरहिट फिल्मे दी हैं करीबन 19 फिल्मे निर्देशित की और 35 प्रोड्यूस, जिसमें 18 व्यावसायिक रूप से सफल रही। उन्होंने फिल्मी लाईन में अपनी अदाकारी और फॅशन के कई किर्तीमान स्थापित किए अपनी कई फिल्मों की कहानिया उन्होंने खुद ही लिखी हैं। संगीत की उन्हे अच्छी समझ थी।

उनकी करीबन सारी फिल्मे उन्होंने ने ही लिखी थी। सारी कबानिया उनके ही दिमाग की उपज थी। हर कहानी एक अलग अंदाज में पेश करते

उनकी कोई भी फिल्म ले लो इसकी कहानी पर नजर दौडाएगे ते हरवक्त उसमें नयापन नजर आता हैं, उनके आखरी दिनों की फिल्में जिसमें, लव एट टाइम्स स्केअऱ, मिस्टर प्राईम मिनिस्टर, सेंसर, रिटर्न ऑफ ज्वैलथीफ आदी की कहानी काफी हटके हैं। ये कहने मे कोई बुराई नही की वे अपने समय से आगे सोचने की क्षमता रखते थे।

उनकी ज्यादातर फिल्मों में सामाजिक आशय या कोई संदेश होता। जानकार कहते हैं, की वे जवाहरलाल नेहरू का सोशलिजम फॉलो करते थे। एक दफा पंतप्रधान नेहरू ने उन्हें खुद मिलने बुलाया था

इस बारे में दिलीप कुमार कहते हैं, हम पंडित नेहरू से यादगार मुलाकात को नहीं भुला सकते। तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने मुझे राज व देव को मिलने बुलाया था। देश समाज व सिनेमा पर हमसे बातें हुई। तीनों ने अपने विचार रखे।

देव आनंद को भारतीय सिनेमा के योगदान के लिए 2001 में पद्म भूषण और 2002 में दादासाहेब फालके पुरस्कारों से नवाजा गया।

चार्ज शिट उनकी आखरी फिल्म थी, जो 2011 मे बनी थी। इसी साल जब वे रुटीन चेकअप के लिए लंदन गए वहीं हार्टअटैक से उनका निधन हुआ, वह दिन था, 3 दिसम्बर। मौत के समय उनकी उम्र 88 बरस थी

देव साहब के निधन पर दिलीप कुमार कहते हैं, देव के निधन ने झकझोर दिया है। लंदन से यूँ अचानक आई खबर ने दिल को गहरा सदमा दिया है। जन्मदिन पर बुलाया थासोंचा था कि देव का आना होगा। वो आएगासीने से लगाकर कहेगा लाले तू हज़ार साल जिएगा। यह मेरा सबसे गमगीन जन्मदिन होगाकहां गए देव मुझे छोडकर।

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कलीम अज़ीम

हिन्दी, उर्दू और मराठी भाषा में लिखते हैं। कई मेनस्ट्रीम वेबसाईट और पत्रिका मेंं राजनीति, राष्ट्रवाद, मुस्लिम समस्या और साहित्य पर नियमित लेखन। पत्र-पत्रिकाओ मेें मुस्लिम विषयों पर चिंतन प्रकाशित होते हैं।