वकृत्व और शाय़री का शौक रख़ती थीं हज़रत आय़शा

प्राचीन अरब साहित्य प्रगल्भ, संवेदनाक्षम और शैली कि विशेषता से अलंकारित है। इस्लाम के पूर्व अज्ञानता काल में अरब समाजजीवन पर इस साहित्य का काफी प्रभाव था। इसी साहित्य से अरबी सामजिक मानसिकता और सांस्कृतिक संरचना का भी दर्शन होता है।

पैगम्बर मुहंमद (स) कि पत्नी हजरत आय़शा (रजि) को इस साहित्य परम्परा में विशेष स्थान प्राप्त है। प्रो. सय्यद सुलैमान नदवी स्वतंत्रतापूर्वकाल के मुस्लिम परम्परा के इतिहास हैं, उनका यह लेख हजरत आय़शा साहित्य एव भाषण कौशल्य पर आधारित है।

संबोधन या भाषण देने की क्षमता अरब के लोगों के स्वतंत्र स्वभाव का प्राकृतिक जौहर है। मर्दों से आगे बढकर यह महारत औरतों में मौजूद थी। इस्लाम की प्रारंभिक सदियों में जब मुसलमानों में अरबीपन की आत्मा जिन्दा थी तो उनमें बडी-बडी जोरदार भाषण देनेवाली महिलाएँ पैदा हुई।

अहमद बीन अबी ताहिर (मृत्यु 204 हिजरी) ने ‘बलागतुन निसाअ’ के नाम से एक किताब लिखी थी जिसमें उस जमाने  की मुसलमान औरतों के भाषण संकलित किए हैं, जो ‘जमल’ के युद्ध मैदान में उन्होंने दिए थे। इब्ने अब्दे रब्बेही ने ‘इकदूल फरिद’ में उनकी एक तकरीर का उल्लेख किया है।

अहनफ बिन कैस ताबई बसरी ने संभवतः बसरा में हजरत आय़शा के भाषण सुने होंगे, कहते हैं, “मैंने हजरत अबु-बक्र, हजरत उमर, हजरत उस्मान, हजरत अली और उस समय के सभी खलिफाओं के भाषण सुने हैं, लेकिन माता आय़शा के मुँह से जो बात निकलती थी उसमें जो विशेषता और उँचाई होती थी वह किसी की बात में नहीं होती थी।”

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प्रभावशाली शैली

मेरे दृष्टिकोण में अहनफ का यह कथन अतिशयोक्ती से खाली नहीं है। इसमें बाहरी प्रभाव का भी दखल है। एक औरत का भाषण वह भी युद्ध के मैदान में विशेष प्रभावी रहा होगा। इसमें शक नहीं की वह बहुत प्रभावशाली भाषा में भाषण देती थीं। हजरत मुआविया का कथन है कि, “मैंने हजरत आय़शा से बोधगम्य भाषणकर्ता नहीं देखा।” मूसा बिन तलहा से भी रिवायत है कि, “हजरत आय़शा से अधिक बोधगम्य मैंने किसी को नहीं देखा।”

एक भाषणकर्ता के लिए अच्छी बात और सुगम भाषा के साथ आवाज में उँचाई और शान होना आवश्यक है। हजरत आय़शा कि आवाज इसी तरह कि थी। तबरी में है, “फिर हजरत आय़शा ने भाषण दिया, उनकी आवाज उँची थी। उनकी आवाज अधिकतर लोगों पर भारी पड जाती थी मानो वह एक शानवाली महिला कि थी।”

जमल के युद्ध के उल्लेख में हमने उनके कुछ भाषण प्रस्तुत किए हैं। यद्यपी अनुवाद से असली शान प्रकट नहीं हो सकती फिर भी उनसे बयान का जोश और शैली में जोर का अनुमान होगा।

शायरी

इस्लाम से पहले अरब कि बौद्धिक दुनिया जो कुछ थी वह शायरी थी। एक अरब शायर अपनी जुबान के जौहर दिखाता था, जो कहीं आग लगा देता था और कहीं अमृत बरसा देता था। यह विशेषता केवल मर्दों में ही नहीं थी, बल्कि औरतें भी इसमें सम्मिलित थीं। इस्लाम से पहले और इस्लाम के बाद 100 सालों तक जब तक मुसलमानों में अरबीपन का जौहर बचा रहा। सैंकडों औरतें शायरी में वह कमाल रखती थीं कि अब तक उनकी शायरी अरब कि शायरी की खुबसुरती हैं।

हजरत आय़शा उसी जमाने में पैदा हुई थीं, उनके पिता बुजुर्गवार अरब में शायरी के जौहरी थे। इसलिए यह कला बाप कि गोद ही में उन्होंने सीखी। उनके शिष्य कहा करते थे कि हमको आपकी शायरी पर आश्यर्य नहीं इसलिए कि आप अबू बक्र कि बेटी हैं। इमाम बुखारी ने अब्दुल मुफरद में उर्वा से रिवायत कि है कि, हजरत आय़शा को कअब बिन मलिक का पूरा कसिदा याद था। एक कसीदे में लगभग 40 शेर थे।

एक साहब ने हजरत आय़शा से पूछा, “पैगम्बर मुहंमद कभी किसी मौके पर शेर पढते थे? बोली, ‘हाँ  अब्दुल्लाह बिन रवाहा के कुछ शेर पढते थे।” जैसे –

‘जिसको सफर खर्च देकर तुमने

नहीं भेजा वह खबरें लेकर आयेगा।’

अबू कुसैर हज्ली अज्ञानता काल (जाहिलियाँ) का एक शायर है। उसने अपने सौतेले बेटे ताबत शर्रा की तारीफ में कुछ शेर कहे थे। उनमें से दो अशआर यह हैं,

‘वह अपनी माँ के पेट की सभी बीमारीयों

और दुध पिलाने वाली दाई की सभी बीमारीयों से पाक है।’

‘और जब तुम उसके चेहरे की लकीरों को देखो तो

वह बरसते बादल कि चमती हुई बिजलियों कि तरह चमकती हुई नजर आए’

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स्थलांतर का दुख

हजरत आय़शा ने यह दोनो शेर पैगम्बर के सामने पढकर पुछा ‘ऐ, अल्लाह के पैगम्बर इन दोनों शेरों के ज्यादा हकदार तो आप हैं, आप यह सुनकर खुश हुए।’

हदीस कि किताबों में हजरत आय़शा कि जुबानी बहोत से शेर रिवायत किए गए हैं, उनके भाई अब्दुर्रहमान बिन अबू बक्र का निधन वतन से बाहर हुआ था। शव मक्का लाकर दफन किया गया जब मक्का आने का मौका मिला। भाई कि कब्र पर आईं, उस समय एक अज्ञानता काल के शायर के ये शेर उनके ओठों पर थे –

‘हम लम्बे समय तक बादशाह हुजैमा के दोनों साथीयों की तरह एक साथ रहे

यहां तक कि लोग कहने लगे, अब कदापि अलग न होंगे,

जब हम अलग हो गए

तो मानों मैंने और मालिक ने एक साथ होने की दूरी के बावजूद

एक रात भी साथ व्यतीत नहीं की।’

मक्का से हिजरत करके मदिना आने वालों को मदिना की जलवायु प्रारंभ में नहीं भायी। अबु बक्र, अमीर बिन फुहैरा, हजरत बिलाल मदिना में आकर बीमार पड गए। इस अजनबी जगह और बीमारी में वतन कि याद बेचैन कर देती थी। हजरत आय़शा को जब तेज बुखार चढता तो कहती –

‘प्रत्येक व्यक्ती अपने घर-खानदान में मरता है

और मौत उसके जूते के तसमे से अधिक निकट है।’

हजरत बिलाल को जब थोडा आराम होता, तेज आवाज में यह शेर पढते –

‘काश। मालूम होता कि क्या मैं रात मक्का कि घाटी में व्यतीत करुँगा

और मेरे आस-पास इखर और जलील कि घासें होंगी।

या मजन्ना के स्त्रोंतों पर मेरा भी गुजर होगा

और क्या शामा और तुफैल की पहाडीयाँ अब मुझे कभी नजर आयेंगी?’

हजरत आमिर बिन फुहैरा से कुशल क्षेम पुछा तो उन्होंने यह शेर पढा –

‘मैंने मौत को उसका स्वाद चखने से पहले पा लिया।

नामर्द की मौत उसके ऊपर से आती है।’

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मरसिया

बद्र के युद्ध में कुरैश के बडे-बडे सरदार मारे गए थे। कुरैश के शायरों ने उनका दर्द भरा मरसिया (शोक गीत) लिखा था, कुछ शेर हजरत आय़शा के जुबानी सुरक्षित रह गए हैं। माँ आय़शा कहती हैं की मेरे पास एक काले रंग की औरत आया करती थी और अधिकतर यह शेर पढा करती थी –

‘हार वाला दिन हमारे पालनहार के आशाजनक दिनों में से था

लेकिन शुक्र है कि उसने काफिरों की आबादी से मुक्ती दी।’

हजरत सअद बिन मआज खन्दक के युद्ध में जो विरता गीत पढते थे, वह हजरत आय़शा को याद था –

‘काश कि थोडी देर में ऊँट युद्ध को पा लेता,

मौत कितनी प्यारी है जब मौत का समय आ गया।’

अनसार कि औरते शादी में यह गीत गाती थीं –

‘उसने दुल्हन को ऐसे मेढे प्रदान किये

जिनपर मीरबद की बाजार में गर्व किया जाता है

तेरा दुल्हा कुलीन लोगों में है

वह जानता है कि कल क्या होने वाला है।

जाते जाते  :  

* क्या इस्लाम सज़ा ए मौत को सहमती प्रदान करता हैं?

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