दकनी सभ्यता में बसी हैं कुतुबशाही सुलतानों कि शायरी

कुली कुतुबशाह एक प्रसिद्ध दकनी शायर था। उसे उर्दू कविताओ का आद्यकवि माना जाता हैं। उसने कविताओ को फारसी से छुडाकर हिन्दवी और दकनी जुबान में ढाला। जिसे बाद में वली औरंगाबादी ने देशभर में  ले जाने का काम किया।

कहा जाता हैं कि उससे पहले दकन में जो भी रचनाए  कि जाती थी वह फारसी में थी। कविताओ को फारसी के पल्लू से अलग करने का श्रेय कुली कुतबशाह को जाता हैं। आज हम  सुप्रसिद्ध इतिहासकार मुमताज जहाँ बेगम के इस आलेख से कुतबशाही शायरी से रुबरू होते हैं। 

हमनी राजवंश (Bahmani Sultanate) के बिखराव के बाद जो पांच सल्तनते कायम हुई, उनमें से एक गोलकुण्डा की कुतुबशाही सल्तनत (Qutubshahii Sultanate) भी हैं। सल्तनत ए बिजापूरके स्थापना के 18 साल बाद इस राजवंश की स्थापना हुई। कुतुबशाही सुलतान भी आदिलशाही सुलतानों की तरह ज्ञान व कुशलता की कद्रदानी किया करते थें। इस राजवंश के कुछ सदस्य शायरी किया करते थे।

जमशेद कुली कुतुबशाह

जमशेद कुली ने (Jamshed Quli) अपने बाप सुलतान कुली कुतुबशाह जो गोलकुण्डा सल्तनत का संस्थापक था, कत्ल कर दिया और अपने भाई मलिक कुतबुद्दीन जो राजगद्दी का असल उत्तराधिकारी था, अंधा करके राज्य की बागडौर अपने हाथ में ले ली।

यह बदनाम बहोत था, उसी वजह से इतिहासकारों ने इसकी साहित्यिक रचनाओं को नजरअंदाज कर दिया है। जमशेद कुली को शेर व शायरी से खास दिलचस्पी थी, खुद शायर था। गोलकुण्डा के पुरानी पाण्डुलिपीयों में इसका फारसी कलाम दिखाई देता है। उसने 7 साल सत्ता संभाली। उसके बाद जमशेद की 1550 में मृत्यू हो गई।

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मुहंमद कुली कुतुबशाह

सुलतान इब्राहिम कुली कुतुबशाह (Quli Qutubshah) के बेटे मुहंमद कुली कुतुबशाह 1580 में तख्तनशीन हुए। इनके हुकूमत का दौर खास तौरपर तरक्की व इल्म व फन की लिहाज से मशहूर है।

सुलतान को लालित्य लेखन का भरपूर शौक था। इनकी शायरी का शौक और इन्होने बनायी हुई इमारतें इसका सबूत हैं। मुहंमद कुली कुतुबशाह एक अच्छे शायर और विद्वान व्यक्ती थे, उर्दू मेंमानीऔर फारसीकुतुबशाहतखल्लुस था।

वह निहायत फय्याज और विद्वानों के सरपरस्त कहलाते थे। सुलतान का कुल्लियात (समग्र काव्य) सन 1616 में प्रकाशित किया गया। तकरीबन हर तंत्र में इन्होने काव्य रचना की है, इनका कविताएं निहायत ही सादगी से भरी हुई हैं।

अपने खयालात निहायत रवानी और खुबी के साथ अदा किया है, गजल में आशिकाना और सुफियाना रंग झलकता है, कुदरत निगारी और वाकियातनविसी (प्रसंग कथन) पर प्रभुता हासिल थी।

कुली कुतुबशाह कि कविताएं हिन्दुस्थानी प्रवृत्ती की हैं। इनकी कविताओं में फारसी के साथ हिंदी शब्दों की मिलावट नजर आती है, और फारसी बरखिलाफ हिंदी तरीके को इस्तेमाल किया हुआ है। मुहंमद कुली उर्दू जबान के आद्यकवीयों में से एक माने जाते हैं।

कसिदा

मोहम्मद नां तूं थे बस्ता मोहम्मद का ऐ बन सारां       

सो तुबां सुं सहाता है, जन्नत निम्न ए चमन सारा

दसे फानूस के दरमियाने थे जूं जो देवा का    

सोतियों दस्तादू अलां में थे मेवीयां का बदन सारा

गझल

मुझ इश्क के गदांकूं औरंग शाही देता                     

सब आशिकां मुंज अंगे हैं, तुफ्ले जूं दबिस्तां

रोजी हुआ कुतुबशह तुझ इश्क का प्याला     

भर ले हैं हर तरफ तून जमशौख के खमस्तां

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सुलतान मुहंमद कुतुबशाह

सुलतान मुहंमद कुतुबशाह यह सुलतान कुली कुतुबशाह के भतिजे और दामाद थे। अपने चचा की तरह मुहंमद कुतुबशाह भी शायर था और इसके नामसे एक दिवान भी मौजूद है। शेर शायरी में खास प्रभुत्व था।जिलुल्लाहतखल्लुस था।

एक समय था जब विद्वानों कि कदरदानी इनका पेशा बन गया था। इसका कलाम भी अपने चचा की तरह सादगी से भरा हुआ था। 15 साल सत्ताधिश रहने के बाद इसका निधन हुआ।

उसकी एक कविता –

चले चंदनी में लटक पियो हमारा               

ओनैन अक्स दिपे चंद्र थे अपारा

बसे जिस हया में प्रित हम सजन के             

बन इसकी परद कुच नहीं इस प्यारा

जिन्हे साईं के इश्क का मद पिया है             

नकर से अदसे होर मस्ती अवतारा

अब्दुल्लाह कुतुबशाह

मुहंमद कुतुबशाह का बेटा अब्दुल्लाह कुतुबशाह अपने बाप के बाद तख्तनशीन हुआ। इसने तकरीबन 50 साल हुक्मरानी की। कुतुबशाही राज में इसीने सबसे ज्यादा काल तक हुक्मरानी की। इसीके जमाने में औरंगजेब ने दकन कि तरफ साम्राज्यविस्तार के लिए ध्यान देना शुरु कर दिया था।

युद्ध का वातावरण होने के बावजूद, राज्य में ज्ञान परंपरा विकसित होने की सरगर्मीयां शुरु रही। यह खुद भी विद्वान और शायर थे, ‘अब्दुल्लाहइनका तखल्लुस था।

अब्दुल्लाह के नाम से एक दिवान भी मशहूर है, इनके कलाम में लफ्जी शान व शौकत, जुबान की सादगी दिखाई देती हैं। इनके काल में मर्सिया लिखने का रिवाज चलता रहा। उर्दू जुबान कि तरक्की के लिए यह दौर मशहूर हैं।

इतिहासकार निजामुद्दीन अहमद ने सुलतान का चरित्र फारसी मेंहदिकतुस्सलातीनके नामसे लिखी है। जिससे उस जमाने के इतिहास पर रौशनी पडती है। सन 1672 में उसका मृत्यू हुआ।

उसकी एक कविता

तुज बहिश्ती हुर को देखा है जिन               

जम हराम उसपर है दोजख का आजाब

शाह अब्दुल्लाह नबी सदके तुजे                             

खुब रोयां मैं क्या है इन्तेखाब

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अबुल हसन तानाशाह

अबुल हसन तानाशाह (Abul Hasan Tanashah) यह अब्दुल्लाह कुतुबशाह का दामाद और गोलकुण्डा का आखरी बादशाह था। इसने तकरीबन 15 साल राज किया। इसकी हुकूमत का सारा दौर औरंगजेब के साथ लडाई में चला गया। इसलिए इसे कोई खास काम करने का मौका नहीं मिला।

अबुल हसन तानाशाह शायर था, मगर इसका कोई कलाम आज मौजूद नहीं है। अलग-अलग किताबों में इसकी कविताओं के टुकडे नजर आते हैं। उसने उर्दू भाषा में भी कई कविताएं लिखी हैं। सुफी चिंतन (फिक्र) का होने के कारण इसकी विचारों पर तसव्वुफ का रंग दिखता है।

इसकी एक कविता इतिहास में विख्यात है

किस दर कहूं जाउं कहां मुझ दिल पे फिल बिछराहट है

एक बात के होंगे, सजनीया जी ही बाराबाट है

सल्तनत एक गोलकुण्डा आखिर तक इल्म व अदब का प्रमुख केंद्र रहा हैं। औरंगजेब (Aurangzeb) ने इस सल्तनत का खात्मा किया, और अबुल हसन तानाशाह को अपनी बाकीया जिंदगी उसी की कैद में गुजारनी पडी।

जाते जाते :

* मौसिखी और अदब कि गहरी समझ रखने वाले आदिलशाही शासक

* मुग़लों कि सत्ता को चुनौती देनेवाला शेरशाह सूरी

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