दकन की शिक्षा नीति का नायक था महेमूद गवान

सल्तनत काल में भारत के शिक्षा क्षेत्र में काफी परिवर्तन हुए। कुतबुद्दीन ऐबक और मुहंमद तुग़लक का दौर भारत में मुस्लिम शिक्षा प्रणाली के प्रचार का दौर माना जाता है। तुग़लक के बाद दकन में बहमनी सल्तनत (Bahmani kingdom) की बुनियाद रखी गयी। इसने दकन …

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कुतूबशाही और आदिलशाही में मर्सिए का चलन

रबला के शहिदों की याद में मर्सिए (शोक गीत) लिखने का रिवाज सदियों से चला आ रहा है। मध्यकालीन भारत में लिखे कई मर्सिए आज भी मौजूद हैं। मध्यकाल से ही दकनी जुबान और अदब का मर्सिए एक अहम हिस्सा हैं। दकनी के साथ

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आज के मोहर्रम पर हिन्दू संस्कृति का प्रभाव

हैदराबाद मध्यकाल से ही दक्षिण भारत का एक अहम शहर है। दकन के हर छोटे बडे शहर पर हैदराबादी संस्कृति का प्रभाव आज भी कायम है। शहर हैदराबाद चौदहवीं सदी से शिया संस्कृति का आश्रयस्थान माना जाता है। इसी वजह से यहां का मोहर्रम

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भारतीय भाषाओं में कुऱआन के अनुवाद का रोचक इतिहास

भारत में इस्लाम के आगमन के साथ ही कुऱआन के भाषांतर का इतिहास शुरु होता है। इस ग्रंथ का पहला अनुवाद दसवीं सदी के आखिर का गुजराती (उर्दू) है, जिसकी भाषा मसनवी यूसुफ ए जुलैखासे भी पुरानी है।

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निज़ाम हुकूमत में कैसे मनाया जाता था रमज़ान?





दिल्ली, अलीगढ़, लखनऊ, आगरा के साथ दकन में हैदराबाद के रमज़ान को भी ऐतिहासिक महत्त्व है। कुतुबशाही के दौर से इस शहर में रमज़ान कि विशेष संस्कृति के प्रमाण मिलते हैं। औरंगजेब के निधन बाद निज़ाम मीर कमरुद्दीन खान ने औरंगाबाद में

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डॉ. मुहंमद इकबाल का ‘नजरिया ए गौतम बुद्ध’

डॉ. इकबाल कि कविताओं में भारतीय इतिहास, संस्कृति, समाज और परिवर्तन कि बहस की गई है। भारत के इतिहास कि चर्चा करते हुए इकबाल गौतम बुद्ध, महावीर जैन, चार्वाक और नानक जिक्र करते हैं। इकबाल को विशेषतः गौतम बुद्ध के फलसफे

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जब ग़ालिब ने कार्ल मार्क्स को वेदान्त पढने कि दी सलाह

र्दू में कई शायर मजदूरों के हक के लिए अपनी कलम उठाते रहे हैं। मिर्जा ग़ालिब उर्दू शायरी के बाबा आदम माने जाते हैं, उन्हीं से यह सिलसिला आम हुआ। ग़ालिब ने हुकूमत के खिलाफ मजदूरों के हक में आवाज उठाई। उनकी इसी शायरी

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समाज में समता स्थापित करने बना था ‘अलीगढ कॉलेज’

र सय्यद अहमद खान ने 1875 में मोहम्मेडन अँग्लो ओरिएंटल कॉलेजकि स्थापना की थी। जो आगे चलकर 1920 में अलीगढ मुस्लिम युनिव्हर्सिटीबनी।

मुसलमानों के लिए स्वतंत्र रूप से कॉलेज स्थापन करने के बाद सय्यद अहमद पर हिंदू और

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बाल्कन युद्ध से आहत मुहंमद अली जौहर खुदकुशी करने वाले थें

कॉम्रेडनामी अखबार से अपनी सियासी जिंदगी कि शुरुआत करनेवाले मुहंमद अली जौहर खिलाफत आंदोलन के प्रणेता के रुप में जाने जाते हैं। अलीगढ विश्वविद्यालय का विस्तार और जामिया मिल्लिया इस्लामिया कि स्थापना उनके जिन्दगी के चंद अहम कारनामें हैं। हमदर्द

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ख्वाजा शम्सुद्दीन गाजी – दकन के चिश्ती सुफी संत

कन में इस्लामी समतावादी विचारधारा का प्रसार करने के लिए 11वी सदी के शुरुआत से ही कुछ सुफी संत यहां आ रहे थे। तेरहवीं सदी तक दकन के लगभग हर बडे शहर में सुफी अध्यत्मिक आंदोलन पहुंच चुका था। खुलताबाद के सुफी अध्यात्म केंद्र

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