बच्चे पैदा करना मुसलमान और हिन्दू दोनों के लिए देशद्रोह !

बच्चे पैदा करना मुसलमान और हिन्दू दोनों के लिए देशद्रोह !

किताबीयत : दि पॉपुलेशन मिथ 

पनी नवीनतम पुस्तक दि पॉपुलेशन मिथ: इस्लाम, फैमिली प्लानिंग एंड पॉलिटिक्स इन इंडिया में, पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी व्यवस्थित रूप से इस मिथक को तोड़ते हैं कि मुस्लिम आबादी जल्द ही हिन्दुओं से आगे निकल जाएगी।

वह टाइम्स ऑफ इंडिया के हिमांशी धवन से बात करते हैं कि कैसे जनसांख्यिकीय विषमता के बहुसंख्यक भय का तथ्यों में कोई आधार नहीं है।

आपको इस जनसंख्या मिथक के बारे में लिखने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?

किताब दुर्घटना से आई थी। 1995 में यूएनएफपीए के देश निदेशक ने मुझे भारत में मुसलमानों के बीच परिवार नियोजन के लिए एक रणनीति पत्र लिखने के लिए कहा। उस समय मैं भी कई अन्य लोगों की तरह मानता था कि इस्लाम परिवार नियोजन के खिलाफ है और जब मुसलमान परिवार नियोजन का विरोध करते हैं, तो वे अपनी धार्मिक मान्यताओं का पालन कर रहे हैं।

मैंने यह गलत धारणा भी साझा की कि एक समुदाय के रूप में हम बहुत अधिक बच्चे पैदा करते हैं। लेकिन इस विषय का अध्ययन करना आंखें खोलने वाला था और मुझे किताब के विचार तक ले गया। मुझे इसे देखने में 20-25 साल और महामारी लगे।

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आपको तीन मिथक मिले हैं जिनका आप भंडाफोड़ करना चाहते हैं।

मैं अपनी किताब यह कहकर शुरू करता हूं, हां, मुस्लिमों की प्रजनन दर सबसे ज्यादा है और परिवार नियोजन की उनकी स्वीकृति सबसे कम 45.3 प्रतिशत है। लेकिन हिन्दुओं में परिवार नियोजन प्रथाओं की दूसरी सबसे कम स्वीकार्यता 54.4 प्रतिशत है। इसलिए, यदि बच्चे पैदा करना एक गैर-देशभक्तिपूर्ण कार्य है, तो मुसलमान और हिन्दू दोनों देशद्रोही हैं।

पहला मिथक जो मैंने प्रचलित पाया वह यह है कि इस्लाम परिवार नियोजन के खिलाफ है। वास्तव में इस्लाम परिवार नियोजन की अवधारणा का अग्रदूत (Pioneer) है। दूसरा मिथक यह है कि भारत में बहुविवाह की प्रथा प्रचलित है।

1975 में सरकार द्वारा किए गए बहुविवाह पर एकमात्र अध्ययन से पता चलता है कि भारत में सभी समुदाय बहुपत्नी हैं और मुसलमान सबसे कम बहुविवाह हैं। इस्लाम बहुविवाह की अनुमति केवल इस शर्त पर देता है कि महिला एक अनाथ है जो खुद का भरण पोषण करने में असमर्थ है और यदि आप उसे अपनी पहली पत्नी के बराबर मान सकते हैं।

लोगों ने इसे अनुमति समझा है जो कि नहीं है। एक जनसांख्यिकीय के रूप में मैं कह सकता हूं कि हमारे लिंग अनुपात को ध्यान में रखते हुए भारत में बहुविवाह का चलन करना संभव नहीं है। यदि कोई पुरुष दो बार विवाह करता है, तो किसी अन्य पुरुष को अविवाहित रहना चाहिए।

तीसरा मिथक यह है कि मुसलमानों द्वारा हिन्दू आबादी से आगे निकलने के लिए कई बच्चे पैदा करने की एक संगठित साजिश है। मैंने मुसलमानों के बीच किसी भी संगठित साजिश को नहीं देखा है, हालांकि कई दक्षिणपंथी (Right-wing) राजनेताओं ने सार्वजनिक भाषणों में कहा है कि हिन्दू पुरुषों के कई बच्चे होने चाहिए। इसलिए अगर कोई संगठित साजिश है तो वह दक्षिणपंथी हिन्दुओं की ओर से है।

मैंने लिखा है कि कैसे मुसलमानों के लिए हिन्दुओं से आगे निकलना सांख्यिकीय रूप से असंभव है। मुस्लिम जन्मदर अधिक है लेकिन हिन्दू जन्मदर भी उतनी ही है। 1951 में, हिन्दुओं की आबादी 84 प्रतिशत थी जो घटकर 79.8 प्रतिशत हो गई, जबकि इसी अवधि में मुस्लिम आबादी 9.8 प्रतिशत से बढ़कर 14.2 प्रतिशत हो गई है।

लेकिन मुसलमानों की परिवार नियोजन की स्वीकृति की दर हिन्दुओं की तुलना में अधिक और तेज है। पचास साल पहले अगर हिन्दुओं का एक बच्चा था, मुसलमानों के पास 2.1, तो यह अंतर घटकर 0.5 या आधा बच्चा रह गया है।

1951 में, हिन्दुओं की संख्या मुसलमानों से 30 करोड़ अधिक थी जो आज बढ़कर 80 करोड़ हो गई है। 80 साल में हिन्दुओं की संख्या मुसलमानों से 100 करोड़ ज्यादा हो जाएगी। मुसलमानों के लिए इस देश पर कब्ज़ा करना कैसे संभव है?

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आप कहते हैं कि धर्म जनसंख्या वृद्धि का कारक नहीं है। फिर क्या है?

साक्षरता, विशेष रूप से लड़कियों की, आय और सेवाओं का बेहतर वितरण धर्म नहीं बल्कि प्रमुख निर्धारक हैं। साक्षरता के मामले में मुसलमान कहां खड़े हैं? वे सबसे अशिक्षित हैं। मुसलमान सबसे गरीब हैं लेकिन आर्थिक मोर्चे पर उन पर दक्षिणपंथी हिन्दुओं द्वारा हमला जारी है, जो मांग करते हैं कि मुसलमानों द्वारा प्रदान की जाने वाली वस्तुओं और सेवाओं का बहिष्कार किया जाना चाहिए।

तीसरा, मुसलमानों के बीच स्वास्थ्य सेवाओं की डिलीवरी खराब है क्योंकि वे तेजी से संघटित/तंग (Ghettos) बस्तियों में रहने के लिए मजबूर हैं, जहां डॉक्टर और नर्स काम नहीं करना चाहते हैं। वे तंग बस्ती को छोटा पाकिस्तान बताते हैं। अधिकारी चाहते हैं कि मुसलमान परिवार नियोजन करें, लेकिन वे परिवार नियोजन के लिए परिस्थितियाँ बनाना पसंद नहीं करेंगे। यह पाखंड है।

क्या हम आपातकाल के बाद के पूर्वाग्रह से निपटना जारी रखते हैं?

हम आपातकाल से उबर नहीं पाए हैं और परिवार नियोजन एक वर्जित विषय बन गया है। मेरी अध्यक्षता में एक स्वास्थ्य मंत्रालय की समिति गठित की गई और हमने संसद में पूछे गए सवालों को देखकर विश्लेषण किया कि परिवार नियोजन के प्रति राजनेताओं का क्या रवैया है। जनसंख्या और परिवार नियोजन सभी संसद सवालों का मुश्किल से 0.15 प्रतिशत है।

इस्लामी देशों में, आपको क्या लगता है कि हमें अनुसरण करने के लिए सबसे अच्छा रोल मॉडल प्रदान करता है?

बांग्लादेश में हमसे ज्यादा रूढ़िवादी मुसलमान हैं और फिर भी उन्होंने परिवार नियोजन में हमें मात दी है।

हमें इंडोनेशिया को भी देखने की जरूरत है, जहां इमामों को शामिल किया गया है और हर मस्जिद का उपयोग परिवार नियोजन संचार के केंद्र के रूप में किया जाता है।

यहां तक कि ईरान, एक और रूढ़िवादी इस्लामी देश, में परिवार नियोजन के तरीकों की 74 प्रतिशत स्वीकृति है।

(यह इंटरव्यू टाइम्स ऑफ इंडिया मे छपा था, जिसका हिन्दी अनुवाद एस. आर. दारापुरी ने किया हैं।)

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कीताब का नाम : दि पॉपुलेशन मिथ: इस्लामफैमिली प्लानिंग एंड पॉलिटिक्स इन इंडिया

लेखक : एस.वाई. कुरैशी

भाषा : अंग्रेजी 

पन्ने :256

कीमत : 372 (पेपरबैक)

प्रकाशक- हार्पर कालिंग इंडिया 

ऑनलाइन : दि पॉपुलेशन मिथ

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टीम डेक्कन

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