दीप्ति मिश्र : धड़कते दिलों की रोमानी शायरा

दीप्ति मिश्र : धड़कते दिलों की रोमानी शायरा
Dipti Misra / FB

शायरी के हाल और माज़ी के पन्ने अगर पलट के देखें तो एक बात साफ़ है कि मरदाना फितरत ने अदबी लिहाज़ से शायरात की ग़ज़ल में हाज़िरी को बा-मुश्किल माना है। हालांकि कुछ ऐसी शायरात हैं, जिन्होंने अपने शानदार क़लाम से इस मरदाना फितरत को मजबूर किया है कि वे साहित्य में इन की मौजूदगी का एहतराम करें।

आज के दौर में कुछ ड्रामेबाज़ शायरों और दूसरों से ग़ज़ल कहलवा कर लाने वाली कुछ शायरात ने साहित्य की आबरू को ख़तरे में डाल दिया है। जिन शायरात ने अपने होने का एहसास करवाया है, उन की तादाद शायद एक आदमी के हाथ में जितनी उंगलियाँ होती है उन से भी ज़्यादा नहीं है।

अदब में बे-अदब होते अदीबों की गुटबाजी, बड़े-बड़े शायरों के अलग-अलग धड़े, ग़ज़ल को ऐसे माहौल में सांस लेना मुश्किल हो गया है। ऐसे में एक नाम दूसरों से अलग नज़र आता है वो नाम है शायरा दीप्ति मिश्रका।

दीप्ति को दावते-सुख़न दिया गया, बिना किसी बनावट के अपने चेहरे जैसी मासूमियत से उन्होंने ग़ज़ल पढ़ी, ग़ज़ल का लहजा बिल्कुल अलग, बहर ऐसी कि जो कभी पहले न सुनी, रदीफ़ ऐसा जिसे निभाना वाकई मुश्किल ही नहीं बेहद मुश्किल मगर दीप्ति मिश्र अपने अंदाज़ में अपनी ग़ज़ल पढ़ कर बैठ गई और सामईन के दिल में छोड़ गई अपने लहजे और कहन की गहरी छाप।

उन की उस ग़ज़ल का रदीफ़ है तो हैइतना मशहूर हुआ कि आज वो दीप्ति मिश्र का दूसरा नाम बन गया है। ग़ज़ल के बड़े बड़े समीक्षक, आलोचक इस ग़ज़ल को सुनने के बाद ये लिखने पे विवश हुए कि दीप्ति मिश्र के रूप में ग़ज़ल को एक नया लहजा मिल गया है, दीप्ति की दीप्ति अब मद्धम होने वाली नहीं है।

जिस ग़ज़ल ने दीप्ति मिश्र को अदब की दुनिया में एक पहचान दी उसके चंद अशआर मुलाहिज़ा फरमाएं

वो नहीं मेरा मगर उस से मुहब्बत है तो है

ये अगर रस्मों-रिवाजों से बगावत है तो है

जल गया परवाना ग़र तो क्या ख़ता है शम्मा की

रात भर जलना-जलाना उस की क़िस्मत है तो है

दोस्त बन कर दुश्मनों सा वो सताता है मुझे

फिर भी उस ज़ालिम पे मरना अपनी फितरत है तो है

इस ग़ज़ल ने दीप्ति मिश्र को शायरी के समन्दर में ऐसी कश्ती बना दिया जिस ने फिर न तो कभी किसी किनारे की तमन्ना की न ही किसी तूफ़ान से वो खौफ़ज़दा रही।

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कुंवर बैचेन की रहनुमाई

उत्तर प्रदेश के एक छोटे से कस्बेनुमा शहर लखीमपुर-खीरी में दीप्ति मिश्र का जन्म विष्णु स्वरुप पाण्डेय के यहाँ 15 नवम्बर 1960 को हुआ। इन के वालिद म्युन्सिपल बोर्ड में अधिकारी थे सो जहाँ जहाँ उन की मुलाज़मत रही वहीं वहीं दीप्ति जी की शुरुआती तालीम हुई।

गोरखपुर से हाई स्कूल करने के बाद दीप्ति जी ने बी.ए. बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी से किया। बचपन से ही इन्हें लिखने और अभिनय का शौक़ था और ये परवान चढ़ा ईल्म-ओ-तहज़ीब के शहर बनारस में।

दिसम्बर 1982 में दीप्ति जी उस बंधन में बंधी जिस की डोर में बंधना हर लड़की का सपना होता है, दीप्ति पाण्डेय अब दीप्ति मिश्र हो गई और वे फिर अपने शौहर के साथ ग़ाज़ियाबाद आ गई। तालीम से उन का राब्ता ख़त्म ना हुआ ग़ाज़ियाबाद में इन्होंने मेरठ यूनवर्सिटी से एम्.ए. किया और इसी दरमियान गीत और ग़ज़ल के बहुत बड़े स्तम्भ डॉ. कुंवर बेचैन से दीप्ति जी की मुलाक़ात हुई।

तुम्हे किस ने कहा था, तुम मुझे चाहो, बताओ तो

जो दम भरते हो चाहत का, तो फिर उस को निभाओ तो

मेरी चाहत भी है तुम को और अपना घर भी प्यारा है

निपट लूंगी मैं हर ग़म से, तुम अपना घर बचाओ तो

दीप्ति पहले आज़ाद नज़्में लिखती थी। इन की नज़्में पढ़ कर किसी ने कहा कि इन नज्मों में परवीन शाकिर की ख़ुश्बू आती है। अपने जज़बात, अपनी अभिव्यक्ति को बहर और छंद की बंदिश में लिखना दीप्ति जी को शुरू में ग़वारा नहीं हुआ पर कुंवर बेचैन साहब की रहनुमाई ने ग़ज़ल से दीप्ति मिश्र का त-आर्रुफ़ करवाया।

हर शायर /शायरा की ज़िन्दगी में ये वक़्त आता है कि वो जो भी कहे सब बहर में आ जाता है, दीप्ति मिश्र अब ग़ज़ल की राह पे चल पड़ी थी ये नब्बे के दशक के शुरुआती साल थे।

1997 में दीप्ति मिश्र का पहला मज़्मुआ-ए-क़लाम बर्फ़ में पलती हुई आगमंज़रे-आम पे आया, इस किताब का विमोचन साहित्यकार और उस वक़्त के कादम्बिनी के संपादक राजेन्द्र अवस्थी जी ने किया।

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मंच से किया परहेज

अक्टूबर 1995 में एक दिलचस्प बात ये हुई की दीप्ति जी ने अपनी एक ग़ज़ल कादम्बिनी में छपने के लिए भेजी, वो ग़ज़ल ये कह कर लौटा दी गई कि रचना कादम्बिनी के मेयार की नहीं है और फिर वही ग़ज़ल उन से विशेष आग्रह कर कादम्बिनी के लिए मांगी गई। उस ग़ज़ल का ये शेर बाद में बड़ा मशहूर हुआ -

उम्र के उस मोड़ पर हम को मिली आज़ादियाँ

कट चुके थे पंख जब, उड़ने का फन जाता रहा

इस के बाद दीप्ति को कवि सम्मेलनों के निमंत्रण आने लगे मगर कवि-सम्मलेन के मंचों पे होने वाले ड्रामे, कवियत्रियों के साथ बर्ताव, नामचीन कवियों की गुटबाजी ये सब देख उन्होंने मंच पे जाना छोड़ दिया। रायपुर के अपने पहले मुशायरे में उनके क़लाम पे जो सच्ची दाद उन्हें मिली उस की मुहब्बतों ने उन्हें कवियत्री से शायरा बना दिया।

वक़्त के साथ-साथ दीप्ति मिश्र शायरी की एक ख़ूबसूरत तस्वीर हो गई जिस की शायरी में मुहब्बत के रंगों के साथ औरत के वजूद की संजीदा फ़िक्र भी थी। ग़ज़ल की इस नायाब तस्वीर बनाने में एक मुसव्विर के ब्रश का भी कमाल शामिल था वो थे मारुफ़ शायर मंगल नसीम साहब।

दीप्ति की शायरी में बेबाकी, सच्चाई और साफगोई मिसरी की डली की तरह घुली रहती है, सच हमेशा कड़वा होता है पर दीप्ति अपने कहन की माला में सच के फूलों को इस तरह पिरोती है कि उस माला से सिर्फ़ मेयारी शायरी की ख़ुश्बू आती है

उन से कोई उम्मीद करें भी तो क्या भला

जिन से किसी तरह की शिकायत नहीं रही

दिल रख दिया है ताक पर हम ने संभाल कर

लो अब किसी तरह की भी दिक्क़त नहीं रही

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शायरी में दर्द

दीप्ति मिश्र दूरदर्शन और आकाशवाणी से अधिकृत अदाकारा थी सो अपने अभिनय के शौक़ के चलते 2001 में मुंबई आ गई पर शायरी उन का पहला शौक़ ही नहीं जुनून भी था। मुंबई के एक मुशायरे में उन्होंने अपनी ग़ज़ल पढ़ी तो एक साहब उन के ज़बरदस्त मुरीद हो गये, मुशायरे के बाद उन्होंने अपना कार्ड उन्हें दिया और मिलने का आग्रह किया।

जब दीप्ति ने घर जा के वो कार्ड देखा तो वो राजश्री प्रोडक्शन के राजकुमार बड़जात्या का था। बड़जात्या ने उन्हें सिर्फ़ अपने प्रोडक्शन के लिए लिखने का आग्रह किया पर दीप्ति के मन में जो परिंदा था उस ने किसी क़फ़स में रहना गवारा नहीं समझा और बड़ी शालीनता से दीप्ति ने उन का प्रस्ताव नामंजूर कर दिया। हालांकि उन के चर्चित टी.वी. सीरियल वो रहने वाली महलों कीके सभी थीम गीत दीप्ति ने लिखे।

दीप्ति अपनी शायरी में सिर्फ़ औरत होने का दर्द बयान नहीं करती बल्कि औरत और मर्द के रिश्तों की उलझी हुई कड़ियों को खूबसूरती से सुलझाती है और मर्दों से अपना मुकाबला सिर्फ़ अपने औरत होने भर के एहसास के साथ करती है।

औरत और मर्द के रिश्तों की पड़ताल दीप्ति ने बड़ी बारीकी से की है और उस पे अपनी राय भी बे-बाकी से दी जो उन के शेरों में साफ़ देखने को मिलता है।

तुम्हें किस ने कहा था, तुम मुझे चाहो, बताओ तो

जो दम भरते हो चाहत का, तो फिर उस को निभाओ तो

मेरी चाहत भी है तुम को और अपना घर भी प्यारा है

निपट लूंगी मैं हर ग़म से, तुम अपना घर बचाओ तो

दीप्ति मिश्र का दूसरा मज़्मुआ-ए-क़लाम मंज़रे-आम पे 2005 में आया जिस का नाम वही उन की ग़ज़ल का रदीफ़ जो दीप्ति का दूसरा नाम अदब की दुनिया में बन गया है तो हैइस का इजरा (विमोचन) पद्म-विभूषण जसराज ने किया और इसमें जसराज ने उन की बेहद मकबूल ग़ज़ल का मतला (वो नहीं मेरा मगर उस से मुहब्बत है तो है) गाया भी। 2008 में दीप्ति मिश्र का एक और मज़्मुआ उर्दू में आया बात दिल की कह तो दे।

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बेहतरीन अदाकारा भी

ख़ुदा की मेहरबानी दीप्ति साहिबा पे कुछ ज़्यादा ही हुई है वे शायरा के साथ-साथ बेहतरीन अदाकारा भी है। इन्होंने बहुत से टेलीविजन धारावाहिकों में अभिनय किया है, जिस में प्रमुख है जहाँ पे बसेरा हो, कुंती, उर्मिला, क़दम, हक़ीक़त, कुमकुम, घर एक मंदिर और शगुन। बहुत से धारावाहिकों के थीम गीत भी दीप्ति ने लिखे हैं।

बहुत फ़र्क़ है, फिर भी है एक जैसी

हमारी कहानी, तुम्हारी कहानी

तेरे पास ऐ ज़िन्दगी अपना क्या है

जो है सांस आनी वही सांस जानी

तनु वेड्स मनुएक्सचेंज ऑफर और साथी-कंधाती (भोजपुरी) फिल्मों में भी दीप्ति मिश्र ने अपने अभिनय का लोहा मनवाया है।

फ़िल्म पत्थर बेज़ुबान’ के तमाम गीत दीप्ति मिश्र ने लिखे हैंजिस मे कैलाश खेररूपकुमार राठोड़श्रेया घोषाल और एक ठुमरी शोमा घोष ने गाई है। दीप्ति मिश्र की ग़ज़लों का एक एल्बम हसरतें’ भी आ चुका है जिसे ग़ुलाम अली और कविता कृष्णा मूर्ति ने अपनी आवाज़ से सजाया है।

दीप्ति ने जीवन के ऐसे पहलुओं को शायरी बनाया है जिस के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। उनके शेर अपना ज़ाविया और तेवर भी अलग रखते हैं। दीप्ति मिश्र की शायरी रूह और जिस्म के फासले को अपने ही अन्दाज़ से परिभाषित करती है।

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author

मोईन नईम

लेखक सामाजिक विषयों के अध्ययता और जलगांव स्थित डॉ. उल्हास पाटील लॉ कॉलेज में अध्यापक हैं।