अभिनय के साथ दिलीप कुमार की राजनीति में भी थी चमक

अभिनय के साथ दिलीप कुमार की राजनीति में भी थी चमक
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हिन्दी सिनेमा के लिजेंड दिलीप कुमार आज हमारे बीच नही हैं। पर उनकी यादे, उनसे जुड़ी बाते और उनकी जीवनी हम सब के लिए एक दिशादर्शक हैं। जिसकी चर्चा करना लाजमी हो जाता हैं।

40 के दशक में फ़िल्मों में आने से पहले दिलीप कुमार पैसा कमाने का ज़रिया ढूँढ रहे थे। एक बार वो घर पर झगड़ा कर बॉम्बे से भाग कर पुणे चले गए और ब्रिटिश आर्मी कैंटिन में काम करने लगे। 

कैंटिन में उन के बनाये सैंडविच काफ़ी मशहूर थे। ये आज़ादी से पहले का दौर था और देश में अंग्रेज़ों का राज था। उन्होंने पुणे में एक दिन स्पीच दे डाली कि आज़ादी के लिए भारत की लड़ाई एकदम जायज़ है और ब्रितानी शासक ग़लत हैं। 

अपनी क़िताब ‘दिलीप कुमार - द सब्सटांस एंड द शैडो’ में दिलीप कुमार लिखते हैं, “फिर क्या था, ब्रिटेन विरोधी भाषण के लिए मुझे येरवड़ा जेल भेज दिया गया जहाँ कई सत्याग्रही बंद थे। तब सत्याग्रहियों को गांधीवाले कहा जाता था। दूसरे क़ैदियों के समर्थन में मैं भी भूख हड़ताल पर बैठ गया। सुबह मेरे पहचान के एक मेजर आये तो मैं जेल से छूटा। मैं भी गांधीवाला बन गया था।”

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राजनीति से गहरा जुड़ाव

पंडित जवाहरलाल नेहरू को अपना आदर्श मानने वाले दिलीप कुमार राज्यसभा सदस्य भी रहे। नेहरू के प्रति वे हमेशा वफादार रहे और जब भी नेहरू ने उन्हें प्रचार करने के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने कभी ना नहीं कहा। 

इस तरह नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर सोनिया गांधी सहित कई समाजवादी नेताओं ने दिलीप कुमार की पॉपुलरटी को अपने-अपने हिसाब से राजनतीकि तौर पर कैश कराया है। 

नेहरू जिस दौर में 1947 से लेकर 1964 तक भारत के प्रधानमंत्री रहे, उस दौरान दिलीप कुमार ने अपनी फिल्मों में धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे नेहरूवादी विचारों को खूब जगह दी। उन की फिल्म चाहे 1957 में आई ‘नया दौर’, 1961 में आई ‘गंगा जमुना’ हो या फिर 1964 में आई ‘लीडर’ नेहरूवादी विचारों पर ही आधारित थीं।

वरिष्ठ पत्रकार रशिद किडवाई की लिखी दिलीप कुमार की आत्मकथा में इस बात का जिक्र किया गया है कि 1959 में ‘पैगाम’ फिल्म की शूटिंग के दौरान प्रधानमंत्री नेहरू सेट पर पहुंचे थे तो वहां पर मौजूद सभी को लगा कि वे सबसे पहले फिल्म की हीरोइन वैजयंती माला से मिलेंगे।

लेकिन उन्होंने आगे बढ़कर लाइन में सबसे आखिर में खड़े फिल्म के हीरो दिलीप कुमार के कंधे पर अपना हाथ रखा। “यूसुफ, मुझे पता चला कि तुम यहां हो और मैंने आने का फैसला कर लिया।” यही से नेहरू और दिलीप कुमार के बीच दोस्ती गहरी हो गई। 

दिलीप कुमार के बोलने के अंदाज का पूरा देश ही कायल था। इस मुलाकात के एक साल बाद उन को नेहरू को एक दूसरे की जरूरत पड़ी। सेंसर बोर्ड में दिलीप कुमार की फिल्म गंगा जमुना में ‘हो राम’ शब्द के चलते सेंसर बोर्ड पास नहीं कर रहा था।

ऐसे में पंडित नेहरू के दखल देने के बाद न सिर्फ ‘गंगा जमुना’ पास कर दी गई बल्कि दिलीप कुमार की बाकी फिल्मों को भी सेंसर बोर्ड से हरी झंडी मिली। 

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भाईचारा था राजनीति का लक्ष्य

नेहरू ने दिलीप कुमार को साठ के दशक में युवक कांग्रेस के एक सम्मेलन में भाषण देने के लिए बुलाया था और कहा था कि हमारे संगठन में भी ऐसे बहुत कम लोग हैं जो आप जैसी कुशलता से अपनी बात कह सकते हैं। उत्तर मुंबई से वी.के. कृष्ण मेनन के लिए नेहरू के कहने पर दिलीप कुमार ने चुनाव अभियान भी में हिस्सा लिया था और उनको जिताने में मदद की थी। 

दिलीप कुमार ने फिल्मों में आने के 18 साल बाद जाकर पहली बार सार्वजनिक तौर पर मेनन का चुनाव प्रचार कर खुद को राजनीति से जोड़ा था और फिर तो जैसे यह सिलसिला बिना रुके चलता ही रहा। 1979 में वे मुंबई के शेरिफ बने और 2000 से 2006 के बीच राज्य सभा सदस्य भी रहे। 

भले ही राजनीति क्षेत्र से उन का नाता सिनेमा के हितों तक सीमित रहा, लेकिन दिलीप कुमार की राजनीति का लक्ष्य भाईचारे और सामाजिक सद्भाव के लिए काम करना और संविधान के सेक्युलर ढांचे की रक्षा करना मात्र रहा।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद दिलीप कुमार भारतीय राजनीति में और भी संभल कर चलने लगे और अपने आप को केवल चुनिंदा-प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार तक सीमित कर लिया। इसी दौरान उन्होंने कहीं कांग्रेसी और कहीं समाजवादी प्रत्याशियों को जिताने के बयान जारी किए थे। 

1996 के आम चुनाव में दिलीप कुमार ने अलवर (राजस्थान) में कांग्रेस प्रत्याशी दुरु मियां के लिए प्रचार किया था तो अलीगढ़ में समाजवादी उम्मीदवार सत्यपाल मलिक को जिताने की अपील की थी। 

दिलीप कुमार ने घोषणा की थी कि उन्होंने राजनीति में प्रवेश नहीं किया है, वे सिर्फ देश की एकता और अखंडता में विश्वास करने वाले उम्मीदवारों के लिए बोलेंगे। अगस्त 1997 में उन्होंने लखनऊ में ऑल इंडिया मुस्लिम ओबीसी कॉन्फ्रेंस में मुसलमानों से आह्वान किया था कि वे अपने अधिकारों के लिए लड़ें। यह पहला मौका था जब वे मुस्लिम समुदाय के समर्थन में खुलकर सामने आए थे।

कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी ने संभालने के बाद दिलीप कुमार ने 1998 के लोकसभा चुनाव में दक्षिणी दिल्ली सीट पर डॉ. मनमोहन सिंह के लिए प्रचार किया था। इसके बाद 1999 में उन्होंने दिल्ली के अलावा महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश के मुस्लिम बहुल इलाकों में भी चुनाव प्रचार किया। 

उन्होंने 1999 में गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली में जा कर कैप्टन सतीष शर्मा और अमेठी में सोनिया गांधी के लिए चुनाव प्रचार किया था।

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और कारगिल युद्ध रुका

यह दिलचस्प वाकिया मई 1999 का ही है। उस समय कारगिल संघर्ष को शुरू हुए बस कुछ ही दिन हुए थे। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ के कार्यकाल में पाकिस्तान के विदेश मंत्री रहे खुर्शीद कसूरी की किताब ‘Neither a hawk nor a dove’ में इस का जिक्र मिलता हैं। 

इस किताब में लिखा है कि संघर्ष के दौरान जब लिजेंड्री एक्टर दिलीप कुमार ने पाकिस्तान के पीएम नवाज शरीफ से बात की तो हर कोई चौंक गया था। कसूरी ने अपनी इस किताब में कारगिल की जंग के समय नवाज शरीफ के प्रिंसिपल सेक्रेटरी रहे सईद मेहदी के हवाले से इस किस्से को बयां किया है। 

कसूरी लिखते है, संघर्ष के दौरान उस समय के तत्कालीन भारतीय पीएम अटल बिहारी वाजपेयी ने नवाज से शिकायत की थी कि उन्होंने भारत की पीठ में छुरा भोंक कर अच्छा नहीं किया है। सईद महदी ने उन्हें बताया कि मई 1999 में जब कारगिल की जंग शुरू हुई तो एक दिन वह पीएम शरीफ के साथ बैठे थे कि अचानक फोन की घंटी बजी। 

शरीफ के एडीसी ने उन्हें बताया कि पीएम वाजपेयी उन से तुरंत बात करना चाहते हैं। बातचीत के दौरान वाजपेयी ने शरीफ से शिकायत की कि लाहौर में उन्हें बुलाने के बाद शरीफ ने उन्हें इतना बड़ा धोखा दिया। वाजपेयी की बात सुन कर शरीफ हैरान थे। 

उन्हें यकीन नहीं हो रहा था कि वाजपेयी उन से क्या कह रहे हैं? कसूरी की इस किताब में जो दावा किया गया है उस के मुताबिक शरीफ को इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि वाजपेयी उन से क्या कह रहे हैं। उन्होंने उस समय वाजपेयी से वादा किया कि तत्कालीन पाक आर्मी चीफ जनरल परवेज मुशर्रफ के साथ बात कर के वह उन्हें दोबारा कॉल करेंगे। 

उन की बात खत्म होती इस से पहले वाजपेयी ने शरीफ से कहा कि वह चाहते हैं कि वह एक और शख्स से बात करें। कसूरी के मुताबिक यह शख्स कोई और नहीं बल्कि दिलीप कुमार थे। 

दिलीप कुमार ने फोन पर उन से कहा, “मियां साहब, हम ने आप से यह उम्मीद नहीं की थी। आप तो हमेशा भारत और पाकिस्तान के बीच दोस्ती की बात करते आए हैं।” 

कसूरी की किताब के मुताबिक दिलीप कुमार ने शरीफ से कहा कि इस तनाव की वजह से भारत में रहने वाले मुसलमान खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। वे अपने घरों को छोड़ने में कई तरह के डर और मुश्किलों को महसूस कर रहे हैं। ऐसे में यह शरीफ की जिम्मेदारी है कि वो हालातों पर काबू पाए।

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दोस्त और आलोचक

वाजपेयी से जुड़ा एक और किस्सा। पक्का कांग्रेसी होने के बावजूद कट्टर हिन्दुत्व समर्थक बाल ठाकरे से भी दिलीप कुमार की घनिष्ठता रही। दोनों एक-दूसरे को तब से जानते थे जब ठाकरे अखबारों में मारक कार्टून बनाया करते थे। और दोनों को एक दूसरे की कला पसंद आया करती थी। 

दिलीप साहब का ठाकरे के निवास मातोश्री में आना-जाना लगा रहता था। हालांकि, बाद में उन्होंने सार्वजनिक रूप से दिलीप कुमार की आलोचना भी की थी। 1998-99 में एक बार बहुत तल्खी के सिवाय दोनों के ताल्लुकात हमेशा बहुत अच्छे रहे।

दिलीप साहब जो कि विभाजन पूर्व पेशावर के रहने वाले थे। जो अब पाकिस्तान का हिस्सा बन गया हैं। वहां की सरकार ने 1997 में दिलीप कुमार को ‘निशान-ए-इम्तियाज से नवाजने का फैसला किया। तो ठाकरे इस के खिलाफ खड़े हुए। जिसके बाद भारत में खासी राजनीति हुई। 

उस दौरान महाराष्ट्र सरकार का हिस्सा रही शिवसेना ने दिलीप कुमार को मिले इस सम्मान को ले कर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। विवाद इतना बढ़ गया कि शिवसेना ने पाकिस्तानी सम्मान स्वीकार करने पर उन की देशभक्ति पर सवाल खड़ा कर दिया था। 

दिलीप कुमार को सब से ज्यादा चोट इस बात से पहुंची कि तीन दशक पुराने उन के दोस्त ने उन की निष्ठा और देशभक्ति पर सवाल उठाए। इस बारे में उन्होंने अपनी आत्मकथा में गहरा दु:ख प्रकट करते हुए लिखा था। 

इस विवाद से मीडिया के एक सेक्शन को मौका मिल गया कि वे दिलीप कुमार को निशाना बनाए। अब दिवंगत हो चुके एक फिल्म पत्रकार मोहन दीप ने लिखा था- “ठीक है लेकिन मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि दिलीप कुमार को क्यों ‘निशान-ए-इम्तियाज़’ दिया जा रहा है? मैं कभी समझ भी नहीं पाउंगा, क्योंकि ये अवार्ड पाकिस्तान को दी गई सेवाओं के लिए है, जिस के बारे में हम कुछ नहीं जानते। महज दिलीप कुमार ही इस बारे में हमें कुछ बता सकते हैं।”

दिलीप कुमार ने उस वक्त के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से इस बारे में सलाह मांगी कि उन्हें ये अवार्ड लेना चाहिए या नहीं ? इस पर वाजपेयी ने कहा था, “बिल्कुल लेना चाहिए, क्योंकि वे कलाकार हैं। कलाकार राजनीतिक और भौगोलिक सीमाओं से परे होता है।”

उन्होंने आगे कहा, “एक कलाकार राजनीतिक और भौगोलिक सीमाओं में नहीं बंधा होता। आप को यह पुरस्कार मानवीय कार्यों के लिए दिया जा रहा है और भारत-पाकिस्तान के बीच के रिश्तों को सुधारने में आप के द्वारा दिए गए योगदान से सभी परिचित हैं।” 

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सक्रिय राजनीति से दूर 

शरद पवार से भी दिलीप कुमार की अच्छी मित्रता थी। महाराष्ट्र के कद्दावर नेता और एनसीपी सुप्रीमो शरद पवार को दिलीप साहब उन के यूथ कांग्रेस के दिनों से जानते थे। नेहरू से निकटता के चलते वे वकील, ट्रेड यूनियन लीडर तथा कांग्रेसी नेता रजनी पटेल के दोस्त बने थे और उन्हीं की मार्फत शरद पवार से उन की दोस्ती हुई थी। 

ऐसे में दिलीप कुमार ने शरद पवार का प्रचार भी किया और इस से यह दोस्ती और गहरी हो गई। जो राजनीति, सार्वजनिक जीवन के अलावा दिलीप कुमार के निजी जीवन में भी बहुत काम आई। 

सक्रिय राजनीति से वे हमेशा दूर रहे, उस की आग में अपनी उंगलियां नहीं जलाईं, लेकिन देश के अहम सक्रिय राजनेताओं के करीबी हमेशा बने रहे और वो अपनी पॉपुलरटी के जरिए राजनीतिक दलों को सियासी लाभ भी दिलाते रहे। 

इस तरह से नेहरू से लेकर सोनिया और अटल बिहारी वाजपेयी तक ने दिलीप कुमार को अपने-अपने तरीके से इस्तेमाल किया और सियासी लाभ उठाया। 

उन्होंने अपने जीवन में कई उतार चढाव देखे। उन की कई फिल्में फ्लॉप हुई मगर वे लगातार आगे बढ़ते रहे और कामियाबी उन के कदम चूमती रही। एक दौर ऐसा भी आया जब उन की देशभक्ति पर ऊँगलीया उठने लगी मगर वो डिगे नहीं। 

उन्हें अपने योगदान के लिए सदीयों तक याद रखा जाएगा। दिलीप कुमार एक ज़माना था जो गुज़र गया मगर इस की चमक कयामत की सुबह तक बरकरार रहेगी।

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author

मोईन नईम

लेखक सामाजिक विषयों के अध्ययता और जलगांव स्थित डॉ. उल्हास पाटील लॉ कॉलेज में अध्यापक हैं।