बेकसूरों के बार-बार जेल के पिछे क्या हैं साजिश?

बेकसूरों के बार-बार जेल के पिछे क्या हैं साजिश?
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दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने एक अहम फैसले में दिल्ली दंगें (Delhi riots) मामले में देवंगाना कालिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल तन्हा को जमानत दे दी है। देवांगना चार मामलों जबकि नताशा तीन मामलों में मुकदमे का सामना कर रही हैं। उन्हें सभी मामलों में जमानत दे दी गई है। जबकि आसिफ़ ने एक जांच अदालत की ओर से उनकी जमानत याचिका को खारिज किए जाने के आदेश को चुनौती दी थी।

जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल और जस्टिस एजे भंभानी की पीठ ने इन सभी को जमानत देते हए कहा, मौजूदा चार्जशीट और उसमें शामिल सामग्री को पढ़ने पर पहली नजर में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ लगाए गए आरोप, हमें उस सामग्री में भी नजर नहीं आते जिस पर वे आधारित हैं।

चार्जशीट में लगाए गए इल्जाम पूरी तरह से बेबुनियाद हैं। पहली नजर में सरकार, हमें अपनी दलीलों से संतुष्ट नहीं कर सकी कि यूएपीए की धाराओं 15, 17 या 18 के तहत अपराध किया गया। दिल्ली हाई कोर्ट ने उस गलतफहमीको भी खारिज किया कि केंद्र सरकार की ओर से नियुक्त एक स्वतंत्र प्राधिकार के जुटाए गए साक्ष्यों को यूएपीए की धारा 45 के तहत स्वतंत्र समीक्षा की आवश्यकता है।

पीठ ने स्पष्ट तौर पर कहा, यह कानूनी अनिवार्यता अदालत को स्वतंत्र रूप से इस पर विचार करने की आवश्यकता से मुक्त नहीं करती है। अदालत ने कहा कि इस मामले में अभी अभियोग निर्धारित होने हैं। इसमें करीब 740 गवाह हैं, जिनसे मुकदमे की सुनवाई के दौरान पूछताछ करनी होगी।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस प्रक्रिया में लंबा समय लगेगा। क्योंकि अभी तक एक भी गवाह से पूछताछ नहीं हुई है। क्या अदालत इन गवाहों की लम्बी प्रक्रिया पूरा होने तक अभियुक्तों को जेल में रहने दे ?

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नाजायज गिरफ्तारी को चुनौती

अदालत ने यूएपीए के बढ़ते बेजा इस्तेमाल पर भी अपनी सख्त नाराजगी दिखाई और कहा, कानून विरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम यानी यूएपीए के कड़े प्रावधानों के तहत लोगों पर मामला दर्ज करना, संसद के उस उद्देश्य की अवहेलना करना होगा, जिसके लिए यह कानून बनाया गया था।

गौरतलब है कि जेएनयू स्टूडेंट नताशा नरवाल और देवंगाना कालिता, दिल्ली स्थित महिला अधिकार ग्रुप पिंजरा तोड़की सदस्य हैं। जबकि आसिफ जामिया मिल्लिया इस्लामिया का स्टूडेंट है।

इन स्टूडेंट और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को उत्तर-पूर्वी दिल्ली हिंसा मामले में दिल्ली पुलिस ने भारतीय दंड संहिता, यूएपीए, आर्म्स एक्ट और सार्वजनिक संपत्ति क्षति निवारण कानून की कई धाराओं के तहत पिछले साल गिरफ्तार किया था।

इन सभी पर पुलिस ने अपनी चार्जशीट में उत्तरपूर्वी दिल्ली में फरवरी 2020 में हुए सांप्रदायिक हिंसा के लिए साजिश रचने और सीएए एवं एनआरसी के खिलाफ़ प्रदर्शन कर, लोगों को हिंसा के लिए भड़काने जैसे गंभीर इल्जाम लगाए थे।

उत्तर पूर्वी दिल्ली में पिछले साल 24 फरवरी को दंगे हुए थे। इसमें 53 लोगों की मौत हो गई थी और लभगग 200 घायल हो गए थे। हिंसा के दौरान कई दुकानों और मकानों को फूंक दिया गया। बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संपत्ति का नुकसान हुआ।

बहरहाल इस मामले में दिल्ली पुलिस और जांच एजंसियों ने कार्यवाही करते हुए कई लोगों को गिरफ्तार किया। जिसमें ये स्टूडेंट भी शामिल थे। अपनी इस नाजायज गिरफ्तारी को चुनौती देते हुए, इन स्टूडेंटों ने जमानत के लिए अदालत में गुहार लगाई। जिसमें उन्हें एक साल बाद जमानत हासिल हुई है।

दिल्ली हाई कोर्ट के पास जब यह मामला पहुंचा, तो उसने सबसे पहले आरोपियों के खिलाफ पुलिस द्वारा पेश की गई चार्जशीट और सबूतों का अध्ययन किया। फिर दोनों पक्षों का पक्ष सुना और उसके बाद जमानत पर अपना फैसला सुनाया।

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सत्यता पर सवाल

अदालत ने अपने जमानत आदेशों में आरोपों की सत्यता पर कई सवाल उठाए हैं। मसलन नताशा नरवाल के मामले में जमानत आदेश में कहा, हम यह सोचने के लिए आश्वस्त नहीं है कि प्रथम दृष्टया नताशा नरवाल के खिलाफ लगाए गए आरोप यूएपीए की धारा 15, 17 और 18 के तहत कोई अपराध है। लिहाजा यूएपीए की धारा 43 डी (5) में निहित कठोर शर्तें लागू नहीं होंगी।

नताशा के खिलाफ लगाए गए आरोपों का गहन अध्ययन करने के बाद पता चलता है कि सीएए विरोधी और एनआरसी विरोधी प्रदर्शनों के आयोजन में शामिल रहने के अलावा उनके द्वारा कोई विशिष्ट या निश्चित कार्य नहीं किया गया, जिससे उन पर इस तरह के आरोप लगाए जाएं।

वहीं, आसिफ इकबाल के जमानती आदेश में अदालत ने कहा, हालांकि मुकदमे के दौरान राज्य निस्संदेह साक्ष्य को मार्शल करने का प्रयास करेगा और अपीलकर्ता के खिलाफ लगाए गए आरोपों को सही करेगा। जैसा कि हमने अभी कहा ये सिर्फ आरोप हैं और जैसा ही हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं, हम प्रथम दृष्टया इस प्रकार लगाए गए आरोपों की सत्यता के बारे में आश्वस्त नहीं हैं।

अदालत यहीं नहीं रुक गई, बल्कि आरोपों की प्रकृति पर चिंता जताते हुए नरवाल और कलीता के जमानत आदेश में उसने सरकार को भी कठघरे में रखते हुए सख्त टिप्पणी की, ऐसा लगता है कि असहमति को दबाने की अपनी चिंता और मामले के हाथ से निकल जाने की चिंता में सरकार ने विरोध के अधिकार की संवैधानिक गारंटी और आतंकी गतिविधियों के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है। अगर यह मानसिकता जोर पकड़ती है तो यह लोकतंत्र के लिए दुखद दिन होगा।

अदालत ने तफ्सील से दिए गए अपने आदेश में आगे कहा, पुलिस ने जो सबूतपेश किए हैं, उनमें कहीं भी हिंसा भड़काने की बात नहीं आ रही, ज़्यादा से ज़्यादा विरोध प्रदर्शन और चक्का जाम की आ रही है। जिसे आतंकवादी या हिंसक या राष्ट्रविरोधी कार्रवाई नहीं माना जा सकता।

सरकार या संसदीय कार्रवाई के बड़े पैमाने पर होने वाले विरोध के दौरान भड़काऊ भाषण देना, चक्का जाम करना या ऐसे ही अन्य कृत्य असामान्य नहीं हैं। सरकारी या संसदीय कार्रवाई के खिलाफ प्रदर्शन वैध हैं। बेशक, प्रदर्शनों के शांतिपूर्ण और अहिंसक होने की उम्मीद की जाती है, लेकिन प्रदर्शनकारियों की ओर से कानूनी तौर पर स्वीकृत सीमा से आगे बढ़ जाना असामान्य नहीं है।

दिल्ली पुलिस द्वारा स्टूडेंट के खिलाफ पेश की गई चार्जशीट पर सवाल उठाते हुए न्या. सिद्धार्थ मृदुल और न्या. अनूप जे भंभानी की पीठ ने कहा, अगर हम कोई राय व्यक्त किए बिना दलील के लिए यह मान भी लें कि मौजूदा मामले में भड़काऊ भाषण, चक्का जाम, महिला प्रदर्शनकारियों को उकसाना और अन्य कृत्य, जिसमें याचिकाकर्ता के शामिल होने का आरोप है, संविधान के तहत मिली शांतिपूर्ण प्रदर्शन की सीमा को लांघते हैं, तो भी यह गैर-कानूनी गतिविधि निरोधक अधिनियम (यूएपीए) के तहत आतंकवादी कृत्य’, ‘साजिशया आतंकवादी कृत्य को अंजाम देने के लिए साजिश की तैयारीकरने जैसा नहीं है।

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यूएपीए की धाराएं क्यों?

एक सामान्य कानून व्यवस्था के मामले में पुलिस ने यूएपीए की धाराएं क्यों लगाई हैं ? जाहिर है कि अदालत ने अपने आदेश में जो भी कहा वह पूरी तरह से कानूनसम्मत और हमारे संविधान के ही अनुरूप है। विरोध प्रदर्शन, चक्का जाम और सरकार की नीतियों के खिलाफ भाषण, लोकतंत्र का एक हिस्सा है।

यदि इस बिना पर लोगों के ऊपर कार्यवाही होती रही, तो देश की कोई भी विपक्षी पार्टी या नागरिक अधिकार संगठन सरकार की नीतियों और आदेशों पर सवाल नहीं उठा पाएंगे। यह बात समझ से परे है कि नागरिकता कानून का विरोध, आतंकवादी कृत्य कैसे हो जाता है ?

यह पहली मर्तबा नहीं है, जब दिल्ली पुलिस ने बिना किसी ठोस सबूत और तहकीकात के नौजवान स्टूडेंट और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं पर झूठे मामले बनाए हैं, बल्कि पिछले एक साल में दिल्ली की तमाम अदालतों से ऐसे कई लोग रिहा हुए या उन्हें जमानत मिली, जो मनगढ़ंत आरोप में जेल के अंदर थे।

इन लोगों पर यूएपीए और देशद्रोह जैसे कठोर कानूनों की धाराएं लगा दी गईं, ताकि उन्हें जमानत न मिल पाए। दिल्ली दंगों के ही मामलों में दिल्ली हाईकोर्ट के तीन अलग-अलग फैसले आए और तीनों में अदालत ने आरोपियों को जमानत दी।

इस मामले को ही यदि देखें, तो दिल्ली पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ सतरह हजार से ज्यादा पन्नों की एक चार्जशीट बनाई थी, जिसमें उन पर कई संगीन आरोप लगाए, लेकिन उसमें एक भी ऐसा सबूत नहीं था, जो अदालत को संतुष्ट कर पाया।

इस पूरे मामले में सरकार, दिल्ली पुलिस और जांच एजंसियों की कार्यप्रणाली तो सवालों के घेरे में है ही, सवाल मीडिया के एक बड़े हिस्से पर भी है, जो किसी मामले की सत्यता को जाने बिना सरकार और पुलिस की जांच थ्योरी को ही सही मान लेती है। वह अपने तमाम प्रकाशनों और प्रसारणों में बेकसूर लोगों को अपराधी की तरह पेश करती है। कोई आरोप साबित हुए बिना उनका मीडिया ट्रायल किया जाता है। 

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कुछ और हैं मामला

देवंगाना कालिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल तन्हा को भले ही पुलिस ने दिल्ली दंगे मामले में गिरफ्तार किया हो, लेकिन यह मामला दरअसल कुछ और है। दिल्ली पुलिस की इन लोगों पर कानूनी कार्यवाही, संशोधित नागरिकता कानून यानी सीएए और एनआरसी कानून का विरोध करने वालों को निशाना बनाने का एक तरीका है। सत्ता की जी हुजूरी में यूएपीए जैसे कठोर कानून का दुरुपयोग है। ताकि कोई सरकार की नीतियों का विरोध न करे।

एक तरफ बेकसूर स्टूडेंट और मानव अधिकार कार्यकर्ताओं को दिल्ली दंगे मामले में जानबूझकर फंसाया जा रहा है, तो दूसरी ओर सार्वजनिक तौर पर भड़काऊ भाषण देने वाले और हिंसा के लिए उकसाने वाले कई दक्षिणपंथी नेताओं पर पुलिस ने अभी तक कोई बड़ी कार्रवाई नहीं की है। जबकि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर इनके सांप्रदायिक और नफरती भाषण को सबने देखा था।

दिल्ली हाई कोर्ट का हालिया फैसला नागरिक अधिकारों की स्वतंत्रता को बहाल करने की दिशा में एक बड़ा फैसला है। जमानत के आदेश में एक बड़ा हिस्सा राईट टू प्रोटेस्टयानी प्रतिरोध करने के आम आदमी के अधिकार पर है।

जिसमें अदालत ने संविधान की व्याख्या के साथ-साथ असहमति के स्वर को एक मूलभूत अधिकार बताया है। संविधान के अनुच्छेद 19 के तहत हर एक नागरिक को अपने अधिकारों के लिए प्रदर्शन का अधिकार है और उनसे कोई यह अधिकार छीन नहीं सकता।

भले ही देवंगाना कालिता, नताशा नरवाल और आसिफ इकबाल तन्हा को जमानत मिल गई हो, लेकिन इस मामले में आज भी ऐसे कई बेकसूर लोग हैं, जो जेल की सलाखों के पीछे बंद हैं और अपनी जमानत की बारी का इंतजार कर रहे हैं।

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ज़ाहिद ख़ान

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और आलोचक हैं। कई अखबार और पत्रिकाओं में स्वतंत्र रूप से लिखते हैं। लैंगिक संवेदनशीलता पर उत्कृष्ठ लेखन के लिए तीन बार ‘लाडली अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। इन्होंने कई किताबे लिखी हैं।