वेदों और उपनिषदों का अभ्यासक था अल बेरुनी

वेदों और उपनिषदों का अभ्यासक था अल बेरुनी

अल बेरुनी एक महज प्रवासी नही था बल्कि व बहुत बडा ज्ञानयोगी था। उसने दुनिया को प्राचीन भारत का दर्शन कराया। पूर्वाग्रह और अभिनिवेश न रखते हुए असल भारत के चित्रण को उसने अपने कलम का सामर्थ्य प्रदान किया। जिसके फलस्वरूप भारत के सांस्कृतिक विरासत कि पहचान दुनिया को हुई। साथ ही उसे संजो कर रखने कि बुद्धि तथा समझ भारतीयों को प्रदान हुई। आईये इस महान ज्ञानयोगी के बारे जान लेते हैं। 

र्मद्वेशी और जहरिला प्रचार अपने परिसीमा को पार करता हैं, तब हिंदू मुस्लिम का सांस्कृतिक सौहार्द का मिलाप करनेवाले अल बेरुनी नामक इस विद्वान शोधकर्ता का स्मरण होना लाजमी हैं। ग्यारहवी शताब्दी में भारत आए इस ज्ञानयोगी कि पुस्तक अल-बेरुनिज़ इंडियाहमें विवेक और सहनशीलता का अभ्यास करने के लिए प्रेरित करती है।

अल-बेरुनीएक अरब प्रवासी था जो ग्यारहवीं शताब्दी में भारत आया था। उसकी पुस्तक अल-बेरुनीज़ इंडियामें भारत की सांस्कृतिक विरासत का वर्णन हैं। यह महान पुस्तक संयोग से मेरे हाथों में लग गई। (एडवर्ड सैको द्वारा अंग्रेजी अनुवाद और संपादन) भारत में अल बेरुनी इसवीं 973 से 1048 की अवधि में था।

भारत में लंबे समय तक रहने के दौरान उसने न केवल संस्कृत भाषा पर अपना वर्चस्व कायम किया, बल्कि इस भाषा का मूल ज्ञान भण्डार फारसी और अरबी में भी अनुवादित किया। इसके जरीए प्राचीन भारत का ज्ञान भण्डार अपने देशवासीयों तक पहुँचाया। हिन्दू मुस्लिम इन दो संस्कृतियों को करीब लाने को लिए उसने ईमानदार प्रयास किया था।

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अल बेरुनीस इंडियापुस्तक को पढ़ते समय मुझे एक ओर राजनीतिक घटनाओं के बीच विरोधाभास और दूसरी तरफ दो अलग-अलग संस्कृतियों को एकजुट करने के अल बेरुनी के प्रयास के बारे में पता चल रहा था।

अल बेरुनी कई वर्षों तक विशेष रूप से भारत के उत्तर में था। इस दौरान उसने काफी यात्रा की। लेकिन उसकी उक्त पुस्तक महज यात्रा वृत्तान्त नहीं है। वास्तव में, यात्राओं का वर्णन लिखना उसका उद्देश्य नहीं था। वह एक विद्वान शोधकर्ता था।

उसे अरबी और फारसी भाषा पर वर्चस्व था। लेकिन भारत आने के बाद, उसने संस्कृत भाषा पर भी कमान प्राप्त कर ली। उसने न केवल साधक की निष्ठा के साथ उस भाषा का असीम ज्ञान प्राप्त किया, बल्कि अपने समकालीन और भविष्य के चिकित्सकों के लिए फारसी और अरबी में अनुवाद करके एक समृद्ध विरासत को एक आतिहासिक सामग्री के रूप में पीछे छोड़ दिया।

अल बेरुनी की दिलचस्पी कई विषयों में थी। लेकिन उसके विशेष अध्ययन का विषय धर्मशास्त्र, दर्शन, खगोल विज्ञान, ज्योतिष था। वह एक धर्मनिष्ठ मुसलमान था। उसने धार्मिक रीति-रिवाजों और कर्मकांडों का निष्ठा से पालन किया। लेकिन वह कट्टर नहीं था।

व्यापकता और उदारता में उसका विश्वास था। इसलिए, उसके पास न तो दुर्भावनापूर्ण पूर्वाग्रह था और न ही कोई अभिनिवेश। इसलिए वह समृद्ध भारतीय संस्कृति को समझ सका और साथ ही इस संस्कृति की कालातीत महानता को स्वीकार कर सका।

अल बेरुनी गजनी के महमूद का समकालीन था। लेकिन महमूद के साथ उनका सुर कभी मेल नहीं खाता था। इसके विपरीत, वह एक कठोर आलोचक था। वह लिखता हैं कि महमूद ने भारतीय संस्कृति और समृद्धि को नष्ट कर दिया। अपनी विनाशकारी नीति के कारण, हिंदुओं की हालत सभी जगह-जगह बिखरे हुए धुलिकणों की तरह हो गई है।

अल बेरुनी की कई पुस्तकों में, भारत का तहकीक-मा-लिल-हिंदअरबी में विशेष रूप से प्रसिद्ध है। इसवी 1030 में लिखी गई इस पुस्तक को भारतीय विज्ञान, धर्म परंपराओं और संस्कृति का विश्वकोश माना जाता है। उसके लेखन का उद्देश्य इस्लामी दुनिया को हिन्दू परंपराओं, संस्कृति, दर्शन और विज्ञान के बारे में विस्तृत जानकारी देना था।

तहकीक-मा-लिल-हिंद पुस्तक की शुरुआत में, बेरुनी ने हिंदू समाज की विशेषताओं, उनकी भाषा, उनके ग्रह संबंधी पूर्वाग्रहों आदि का वर्णन करके हिंदू और मुसलमानों के बीच समानता और अंतर का वर्णन किया।

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हिन्दू परंपराओं का विश्लेषण करने के लिए, बेरुनी वेदों और पुराणों का एक विशेष अध्ययन करता हैं। उसने कुल 18 पुराणों में से विष्णू पुराण, वायू पुराण, मत्स्य पुराण, विष्णू धर्मोतर पुराण और आदित्य पुराण का अध्ययन किया। उपनिषदों के एकेश्वरी को ध्यान में रखते हुए, भगवद्गीता की भावना की विशेष रूप से प्रशंसा की गई है।

वह आत्मा की शाश्वत अवधारणा के लिए एक विशेष जुनून पाता है। इसके साथ ही पतंजलि के योगशास्त्र, संहिता प्रणाली में आध्यात्मिक अवधारणाएँ आदि। उनकी पुस्तक में विषयों के उल्लेख भी पाए जाते हैं।

अल बेरुनी एक शानदार प्रतिभा का धनी था। पुस्तक अल-बेरुनीज़ इंडियाकी सामग्री पर ध्यानपूर्वक नज़र दौडाने पर उसकी बुद्धि और उसके असीम ज्ञान दोनों का पता चल जाता है। 600 से अधिक पृष्ठों वाली इस किताब में कुल 80 विषय सूची हैं और इसे पाँच खंडों में विभाजित किया गया है। इनमें से प्रत्येक खंड एक ही विषय पर एक स्वतंत्र ग्रंथ है।

केवल इस छोटेसे लेख में उसके महान कार्य का उल्लेख करना असंभव है। लेकिन इससे भी अधिक, यह पुस्तक मानती है कि आज के तनावपूर्ण वातावरण में विवेक और सहनशीलता को प्रेरित करने का सामर्थ्य निश्चित रूप से इस ज्ञानयोगी के विचारों और ज्ञान में है।

इसलिए वह बार-बार उन्हें सलाम करने को दिल चाहता है। उन लोगों की समझदारी को याद करते हुए, मैं अल बेरुनी को शतश: नमन करता हूँ जो दो संस्कृतियों, हिंदू और मुस्लिम में सामंजस्य बनाने की कोशिश कर रहे हैं।

सलाम अल-बेरुनी! आपको स्थायी शांति का लाभ हो।

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अब्दुल कादर मुकादम

लेखक मुंबई स्थित सामाजिक और राजकीय विश्लेषक हैं। पिछले पाँच दशको से वे भारतीय संविधान, इतिहास, राजनीति तथा मुस्लिम विषयो पर अंग्रेजी तथा मराठी भाषा में लिखते हैं। बहुत से समाजसेवी संघठनों से भी वे जुडे हैं।