चाँद बीबी : दो सल्तनतों की मल्लिका जो छल से मारी गई

चाँद बीबी : दो सल्तनतों की मल्लिका जो छल से मारी गई
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फिरोज शेख का नजरिया:

ध्यकालीन समय में भारत के इतिहास में खुद की एक छवि तैयार करने वाली बहादुर स्त्री राजकर्ती के रूप में निजामशाह की बेटी और आदिलशाह की बीवी चाँद खातून का काम बहुत महत्त्वपूर्ण रहा।

राज्य प्रशासन के सुधारणाओं की वजह से लोकप्रिय रहने वाली चाँद खातून ने रणभूमी में भी चमकदार प्रदर्शन करके दुश्मनों को मात दिलाई। बचपन मे ही अच्छी घुडसवार के रूप में मशहूर होने वाली चाँद बीबी ने युद्ध में भी कौशल प्राप्त किया है।

अरबी, फारसी और तुर्की भाषा में प्रभुत्व हासिल करने के साथ साथ उन्होंने कानडी और मराठी भाषा भी सीखी है। संगीत और कला में भी उसकी दिलचस्पी थी। खेल-कुद, सितार बजाना और पेंटिंग करना उसके खास शौक में शामिल था।

चाँद बीबी का जन्म 1550 में सुल्तान हुसैन निज़ाम शाह (प्रथम) और अहमदनगर के सुल्ताना ख़ानज़ादा हुमायूँ के यहाँ हुआ था। वह हॉकी जैसी खेल गतिविधियों में रुचि रखती थी, जो आमतौर पर राजकुमारों और सुल्तानों के लिए आरक्षित थी, महिलाओं के लिए नहीं।

इन सबसे परे, यह उनकी रणनीतिक सोच और सैन्य कौशल था जिसने उन्हें फलने-फूलने और चाँद सुल्ताना बनने की अनुमति दी। अपनी शुरुआती किशोरावस्था में उनका विवाह बीजापुर के सुल्तान अली आदिल शाह से दो राज्यों के बीच एक गठबंधन के रूप में हुआ था।

अपने राजनिति की व्यवस्था के लिये निजाम शाह ने अपनी बेटी चाँद खातून का विवाह बीजापुर में किया था। चाँद बीबी एक कुशल राजकन्या थी। कम समय में वह बीजापुर के शाही महलों के राजनीति में हिस्सा लेने लगी। अपने पति आदिलशाह के साथ जंग पर भी जाने लगी।

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दो राज्यों पर था शासन

1580 में आदिलशाह के मौत के बाद उनके भाई का बेटा इब्राहिम को गद्दी पे बिठाकर चाँद बीबी ने राज्य प्रशासन शुरू किया। इस समय में बीजापुर के सरदार और प्रधान ने उसके खिलाफ आवाज उठाई लेकीन उन्हें भी उन्होंने मात दी।

लगातार विद्रोह करने वाले जनरलों के बावजूद दकन की रानी न केवल दो राज्यों पर शासन करने में सफल रही, बल्कि उसने एक दकन परिसंघ का भी बीड़ा उठाया और मुगल सेना के खिलाफ बार बार अपना बचाव किया।

युवा राजा, इब्राहिम आदिल शाह द्वितीय के बहुमत प्राप्त करने तक कुछ वर्षों के भीतर, उसने सिंहासन हड़पने के तीन प्रयासों को विफल कर दिया। 

सबसे पहले उनके भरोसेमंद मंत्री कमाल खान ने उन्हें अपने पद से हटाने का प्रयास किया। चांद सुल्ताना ने एक अन्य कुलीन हाजी किशवा खान के साथ गठजोड़ करके इससे निपटा। हालाँकि, कुछ सालों में वह भी सत्ता के भूखे हो गए और रईसों के बीच विद्रोह कर दिया। 

आखिरकार उसने उसे और युवा सुल्तान को सातारा किले में कैद कर लिया और खुद को सुल्तान घोषित कर दिया। हालाँकि, वह रईसों के भीतर अपनी स्थिति को मजबूत नहीं कर सकी। 

बाद में अमिरों उसे राज्य से उखाड़ फेंकने की साजिश भी रची। षड्यंत्रकारी जनरलों के नेता, एक हब्शी मंत्री इखलास खान को तब चाँद बिबी द्वारा रीजेंट नियुक्त किया गया था, जिन्होंने उन्हें एक करीबी सहयोगी के रूप में रखा था।

हालाँकि, कुछ महीनों के भीतर ही उसके अपने राज्य में अस्थिरता फिर से बढ़ गई। क्योंकि इखलास खान ने तानाशाही की घोषणा कर दी थी। स्थिति का लाभ उठाते हुए अहमदनगर के निजाम शाही सुल्तान ने गोलकुंडा के कुतुब शाही के साथ मिलकर बीजापुर पर हमला बोल दिया। बीजापुर में उपलब्ध सैनिक संयुक्त हमलें का सामना करने के लिए पर्याप्त नहीं थे।

इखलास इस संयुक्त हमले को रोक नहीं सका और चाँद बिबी को नेतृत्व लौटा दिया। गठबंधन और सैन्य रणनीति बनाने की अपनी क्षमता के साथ, उसने मराठा सेना से दुश्मन की आपूर्ति लाइनों को काटने का आह्वान किया, जिससे अहमदाबाद-गोलकुंडा सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर होना पड़ा।

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साजिशों का दौर

1582 में चाँद खातून के भाई अहमदनगर के सुल्तान ने बीजापुर की खदीजा सुल्ताना से शादी की। जनरल दिलावर खान को रीजेंट नियुक्त करके, अपने वतन लौट आया।

कालांतर में अहमदनगर में कई राजनीतिक उठापटक हुई। कुछ ही समय के भीतर, चाँद बिबी का भाई मुग़ल राजकुमार मुराद के साथ युद्ध में मारा गया। इसने उनके छोटे बच्चे को वारिस के रूप में छोड़ दिया और चाँद बीबी को उसका रीजेंट बना दिया।

मगर राज्य में इस बदलाव से लोग खुश नहीं थे। जिससे साजिशों का दौर चल निकला। निजाम के हत्या के बाद उसकी गद्दी के लिये बड़ा विवाद शुरू हुआ। मायके का ये सवाल छुड़ाने के लिये चाँदबीबी अहमदनगर को आयी।

इस बार सुल्ताना ने अहमदनगर की राजनीति में बड़ी स्मरणीय भूमिका का निर्वाह किया। इसी समय में दिल्ली का शहजादा मुराद अपने बहोत सैन्यो के साथ दक्षिण में हमले के सिलसिलें मे आया, लेकीन चाँद बीबी ने पुरे कौशल्य के साथ मुराद को मात दी।

निजामशाही अमीर वर्ग के चार गुटों द्वारा दावेदारों ने गद्दी के लिए अपने दावे प्रस्तुत किये। जिसमें एक का समर्थन मियाँ मंजू (दकनी) ने किया। जबकि दूसरे पक्ष का नेतृत्व चाँद बीबी ने किया। विद्रोही मियां मंजू ने 12 वर्षीय अहमद शाह को गद्दी पर बैठाना चाहा। मगर उसका पक्ष कमजोर हुआ।

जब मियाँ मंजू ने अपने समर्थन की स्थिति संकटग्रस्त देखी तो उसके मुगल सम्राट अकबर के पुत्र मुराद को अपनी सहायता के लिए आमंत्रित किया। इस आमंत्रण के प्रत्युत्तर में मुराद ने अपनी सेनाओं सहित अहमदनगर की ओर प्रस्थान किया।

मगर जल्द ही मियां मंजू को अपनी गलती का एहसास हुआ लेकिन मुगलों को आमंत्रित करने में बहुत देर हो चुकी थी। उसने चाँद बीबी को सत्ता छोड़ दी।

जब मुगल आए तो उनका सामना एक तैयार और एकजुट सेना के साथ हुआ। किले पर कब्जा करने के लिए प्रिंस मुराद की रणनीति इसके चारों ओर पांच खदानें बनाने की थी।

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बहादूरी से की रक्षा

ऐसा कहा जाता है कि अकाल से पीड़ित अपने सैनिकों को प्रोत्साहित करने और अपनी मातृभूमि की सुरक्षा के लिए, चाँद बीबी ने खुद अपने सेनापतियों के साथ विस्फोट होने से पहले पांच में से दो खदानों को खोदा।

वह भी एक अभूतपूर्व क्षण में मुगलों के खिलाफ अपने सैनिकों का नेतृत्व करने के लिए एक घूंघट पहने हुए एक तलवार और कवच के साथ महल से बाहर आ गई। उसने एक रणनीति तैयार की जिसने उन्हें मुग़लों पर लगातार हमला करने की अनुमति दी जिससे उनकी आपूर्ति समाप्त हो गई।

राजकुमार मुराद, अपनी सेनाओं के बीच विद्रोह से चिंतित, शांति के बदले में एक छोटे से जिले को लेकर बातचीत करने का फैसला किया।

शांति की इस अवधि में, चाँद बीबी अन्य दकन सल्तनत तक पहुंच गई, क्योंकि उसके पिता ने मुग़लों के खिलाफ एक संघ बनाने के लिए किया था। इसलिए अगली बार जब राजकुमार मुराद ने अहमदनगर के बाहरी इलाकों में गुप्त रूप से कब्जा करने का प्रयास किया तो वह सभी दकन राज्यों की संयुक्त सेना के साथ मिला।

चाँद बीबी ने बहादुरी के साथ अहमदनगर के प्राचीर की रक्षा की। हालांकि राजकुमार मुराद ने यह लड़ाई जीती। अंत में उसे मुग़लों से समझौता करना पड़ा तथा बरार क्षेत्र मुग़लों को समर्पित कर दिया।

लेकिन शहर में दाखिल होने से पहले उन्हें सम्राट अकबर ने वापस बुला लिया। सुल्ताना के इस धैर्य पे खुश होकर शहजादा मुराद ने उन्हें चाँद सुलतानाका किताब दिया।

इधर दकन संघ इतना मजबूत बल बन गया कि आक्रमण के अगली कोशिश का नेतृत्व खुद सम्राट अकबर ने किया। और यहीं फौसला दकन के लिए घातक साबित हुआ। क्योंकि अहमदनगर में उस समय आंतरिक अस्थिरता छाई हुई थी। साजिशों और षडयंत्रो का दौर चल रहा था, जिसमें कई जनरलों और गुटों ने चाँद बिबी को जान से मारने की कोशिश की थी।

सुल्ताना ऐसे समय में मुग़लों से लड़ने की अपनी क्षमता के बारे में अनिश्चित थी और उसने बातचीत करने का विकल्प चुना। हालाँकि, जब यह बात फैली कि चाँद सुल्ताना युद्ध की तैयारी नहीं कर रही, तो सेना और रईसों ने उसे उखाड़ फेंकने की साजिश रची और उसके महल के कमरे में घुसकर चाँद बीबी की हत्या कर दी।

सुल्ताना की मौत के कुछ महीनों बाद मुग़लो का दकनी सल्तनत पर कब्जा कर लिया गया और मुगल साम्राज्य में उसे एकीकृत कर दिया गया।

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चाँद बीबी की विरासत

अक्सर कहा जाता है कि महिलाओं की विरासत उनकी संतानों की महानता में निहित है। लेकिन चाँद सुल्ताना के मामले में, यह दकन सल्तनत की एकता में निहित था, जिसने आज के प्रगतिशील विचारों वाले महाराष्ट्र राज्य का गठन किया है।

हालांकि इस इतिहास को आज हर किताब और स्कूली सिलेबसों से लगभग मिटा दिया गया है। मगर आज भी चाँद बीबी के शौर्य तथा वीर गाथाएं महाराष्ट्र में सुनी-सुनाई जाती हैं। इतिहास ने उसकी शौर्य गाथाओं को बड़ी जगह दी हैं। उसके कई सारे चित्र दुनिया भर के म्यूज़ियमों में मौजूद हैं।

हालांकि बाबर से पहले के मध्यकालीन दौर के बहुत कम शासकों ने स्थानीय सभ्यता, संस्कृति और प्रादेशिकता को अपनाया था। उन कम शासकों में सुल्ताना चाँद बीबी का नाम अग्रणी हैं।

मगर अफसोस की आज इस वीर सम्राज्ञी की कहानी, दो सबसे शक्तिशाली और बहुसांस्कृतिक दकन सल्तनतों की विरासत को लिए कब्र में दफन हो कर रह गई हैं। उसके कब्र के बाहर 100 शब्दों के पट्टी में उसका गौरवशाली इतिहास सिमट कर रह गया है।

(लेखक अहमदनगर स्थित इतिहासप्रेमी हैं।)

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टीम डेक्कन

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