वह बेदखल मुद्दे जिससे ‘मराठा आरक्षण’ कोर्ट में बच सकता हैं !

वह बेदखल मुद्दे जिससे ‘मराठा आरक्षण’ कोर्ट में बच सकता हैं !
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2015 में निकले मराठा क्रांति मोर्चा में आरक्षण की मांग प्रमुखता से सामने आयी थी


शिक्षा के क्षेत्र एवं नौकरीयों में मराठा समुदाय को आरक्षण प्रदान करने वाले सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग (SEBC) अधिनियम 2018 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा 05 मई 2021 बरोज़ बुधवार को रद्द कर दिया गया। इस अधिनियम के अंतर्गत मराठा समुदाय को महाराष्ट्र में शिक्षा के क्षेत्र में 12 फिसदी और सरकारी नौकरीयों में 13 फिसदी आरक्षण प्रदान किया गया था। इसको मुंबई उच्च न्यायलय ने 2019 में वैध करार दिया था। 

मुंबई हाईकोर्ट इस फैसले को अधिवक्ता जयश्री पाटील-सदावर्ते ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जहाँ न्या. अशोक भूषण, एल. नागेश्वर राव, एस. अब्दुल नज़ीर, हेमंत गुप्ता और रविंद्र भट की संविधान पीठ ने मुंबई हाइकोर्ट के निर्णय को बदलते हुए इस कानून को रद्द कर दिया। 

पाँच सदस्यीय पीठ ने 50 फिसदी से अधिक आरक्षण को संविधान विरोधी बताते हुए इस क़ानून को इस मर्यादा का उल्लंघन करने वाला बताया। जिस गायकवाड़ आयोग की रिपोर्ट के आधार पर मराठा समुदाय को आरक्षण बहाल किया गया था उस आयोग की रिपोर्ट को ही मानने से सुप्रीम कोर्ट ने इनकार कर दिया। 

सुप्रीम कोर्ट ने अपना निरीक्षण दर्ज करते हुए कहाँ कि, “आरक्षण की निर्धारीत 50 फिसदी की मर्यादा का उल्लंघन करते हुए मराठा समुदाय को आरक्षण बहाल करने जैसी असामान्य परिस्थिती गायकवाड़ आयोग की रिपोर्ट एवं मुंबई हाईकोर्ट के फैसले से ध्वनीत नहीं होती।” 

साथ ही इंदिरा साहनी केस में दिए गए कोर्ट के फैसले को पुनर्विचार हेतु बड़ी बेंच को सौंपने की याचिका को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि, “इस याचिका में कोई तथ्य नहीं हैं। इस से पहले इस निर्णय को चार बेंचों ने मंज़ूरी दी हैं, इस के इलावा विभिन्न मामलों में सुनवाई के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट की विभिन्न बेंचों ने इस फैसले से सहमती दर्शाई हैं।” 

यह भी ध्यान रहे कि, पिछले साल 9 सितंबर 2020 तक हुई महाराष्ट्र सरकार की नौकरीयों में भर्तीयां एवं विगत वर्ष हुए वैद्यकीय स्नातकोत्तर (PG) कोर्सेस में प्रवेशों पर सुप्रीम कोर्ट के 5 मई 2021 को आए फैसले का परिणाम नहीं होगा क्योंकि इन दोनों को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा हैं। 

स्पष्ट रणनीति एवं बैकअप प्लान के अभाव का नतीजा ये फैसला हैं। पर मराठा आरक्षण की लड़ाई अभी समाप्त नहीं हुई। अभी भी कई पर्याय खुले हैं जिन के माध्यम से मराठा समुदाय को आरक्षण का लाभ मिल सकता हैं। प्रस्तुत लेख में मराठा आरक्षण से संबंधित विभिन्न पहलुओं पर बात की गई हैं साथ ही विभिन्न अंगों से इस सुलगते मुद्दे का जायज़ा लिया गया हैं। 

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एक नज़र इतिहास पर

मराठा आरक्षण एवं मराठा समुदाय का अध्ययन करने हेतु कई आयोग और समितीयाँ आयी और गयी मगर परिणाम वहीं रहा ढाक के तीन पात। इस आरक्षण का संवेदनशील मुद्दा कई दशकों से चला आ रहा हैं। आज़ादी से पहले विभिन्न कारणों से आंध्रप्रदेश, हैदराबाद, मणिपुर और मध्यप्रदेश में बस चुके मराठा समुदाय का आज भी वहाँ अन्य पिछड़ा वर्ग में समावेश होता हैं, किंतु मराठवाड़ा में बसने वाला समुदाय आज भी अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण से वंचित हैं। 

1953 में काका कालेलकर आयोग ने 2399 जातीयों का पिछड़े वर्गों में समावेश किया था। इस रिपोर्ट में मराठा एवं कुनबी इन दो समुदायों का स्वतंत्र एवं स्पष्ट उल्लेख था। 1962 में जी. डी. देशमख समीती का गठन किया गया था। अध्ययन बाद इस कमिटी ने 180 जातियों को ओबीसी में शामील करने की सिफारिश की थी। पर इन 180 जातियों में मराठा, तेली और माली समुदायों का समावेश नहीं था। फल स्वरूप इस के विरुद्ध महाराष्ट्र में कई आंदोलन हुए। 

इन आंदोलनों का परिणाम यह हुआ कि, तेली और माली समुदाय को ओबीसी में शामील कर लिया गया अर्थात मराठा समुदाय को इस बार भी ओबीसी कोटे से वंचित रखा गया। 1994 में ओबीसी आरक्षण की मर्यादा 16 से बढ़ा कर 19 फिसदी कर दी गई पर इस बार भी मराठा समुदाय का इस में समावेश नहीं किया गया।

महाराष्ट्र सरकार ने पहले पिछड़ा वर्ग आयोग (खत्री आयोग) का गठन 1996 में किया था परंतु इस आयोग ने सर्वेक्षण नहीं किया। 1999 में सराफ आयोग ने मराठा एवं कुणबी समुदाय को पिछड़े वर्ग में शामील करने का निष्कर्ष निकाला। तत्कालीन मुख्यमंत्री सुशील कुमार शिंदे को इस आयोग ने अपनी रिपोर्ट सौंपी थी जिसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

2004 में बापट आयोग की स्थापना की गई जिस की रिपोर्ट मराठा समुदाय के हक़ में थी। परंतु आयोग के एक सदस्य का निधन होने के कारण रावसाहब कसबे को ऐन वक्त पर इस आयोग का सदस्य नियुक्त किया गया। बाद में वह रिपोर्ट अब प्रतिकुल हो चुकी थी। परिणाम यह हुआ कि रिपोर्ट नकार दी गई।

इस के बाद 2013 में नारायण राणे की अध्यक्षता में एक कमिटी गठीत की गयी। इस के आधार पर 2014 में मराठा समुदाय को SEBC प्रवर्ग के अंतर्गत 16 फिसदी आरक्षण बहाल किया गया, जिसे मुंबई हाईकोर्ट में चुनौती दी गई और कोर्ट ने इसे रद्द कर दिया। 

इस के बाद 2016 में कोपर्डी की शर्मनाक घटना का प्रगत महाराष्ट्र गवाह बना, इस घटना की निंदा हेतु औरंगाबाद शहर के क्रांति चौक से एक मोर्चा निकला और फिर शुरू हुआ ‘मराठा क्रांति मोर्चो’ का सिलसिला। धीरे धीरे इन मोर्चों ने एक अलग रूप ले लिया और अब मराठा आरक्षण की माँग तूल पकड़ने लगी।

इस के बाद 2016 में महाराष्ट्र सरकार द्वारा मराठा आरक्षण पर विचार एवं अध्ययन करने हेतु फडणवीस सरकार द्वारा ‘म्हसे आयोग’ का गठन किया गया। किंतु इस के अध्यक्ष का निधन होने के कारण आयोग निरस्त हो गया। बाद इस के 2017 में न्या. गायकवाड़ की अध्यक्षता में आयोग की स्थापना की गई। आयोग ने एक रिपोर्ट महाराष्ट्र सरकार को 2018 में सौंपी। इस को आधार बना कर तत्कालीन फडणवीस सरकार ने मराठा समुदाय को SEBC प्रवर्ग के अंतर्गत 16 फिसदी आरक्षण प्रदान किया। 

मराठा समुदाय के लिए शिक्षा के क्षेत्र में 12 फिसदी और सरकारी नौकरीयों में 13 फिसदी आरक्षण को मुंबई हाईकोर्ट ने मान्यता दी थी। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में पहले स्थगित किया गया फिर बाद में 5 मई 2021 को रद्द कर दिया।

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क्या हैं इंदिरा साहनी केस?

मराठा आरक्षण प्रदान करने वाला क़ानून रद्द होने में निम्नलिखित तीन मुद्दे महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुए। संबंधित मुद्दों की इस कानून को रद्द करने में सब से अहम भूमिका रही। जिसमे पहला, इस क़ानून के विरुद्ध याचिका कर्ताओं ने अम्बेडकर के संविधान सभा के समक्ष दिए गए उस कथन को अपना आधार बनाया जिस में उन्होंने कहा था कि, “यदि आरक्षण 50 फिसदी की मर्यादा का उल्लंघन करता हैं तो यह रिव्हर्स डिस्क्रिमिनेशन सिद्ध होगा।” याचिका कर्ताओं द्वारा प्रस्तुत इस मुद्दे का सुप्रीम कोर्ट द्वारा गंभीरता से विचार किया गया। 

दूसरा मुद्दा जो इस कानून के विरुद्ध प्रभावी सिद्ध हुआ वो था महाराष्ट्र में अब तक हुए मुख्यमंत्रियों में मराठा समुदाय से आने वाले मुख्यमंत्रियों की संख्या, महाराष्ट्र के चिनी कारखानों पर मराठा समुदाय का वर्चस्व, सहकारी बैंको और अन्य क्षेत्रों में मराठों के प्रतिनिधीत्व के आँकड़े। तीसरा मुद्दा इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ली गई भूमिका का समर्थन था। 

जब भी आरक्षण के मुद्दे पर कही कोई चर्चा या बात होती हैं तो इंदिरा साहनी केस का उल्लेख जरूर किया जाता हैं। आखिर यह मामला था क्या? आइये जानते हैं इन सवालों के जवाब।

आरक्षण की मर्यादा से संबंधित यह केस हैं। आपातकाल के बाद 1977 में सत्ता में आयी जनता दल की सरकार ने छोटी, बड़ी, माध्यम एवं पिछड़ी जातियों को आरक्षण देने हेतु कदम उठाने शुरू किये। इस उद्देश्य की प्राप्ती हेतु तत्कालीन केंद्र सरकार द्वारा 1979 में दूसरे पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया गया। 

इस आयोग के अध्यक्ष थे बिहार के सांसद बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल। यही आयोग ‘मंडल आयोग’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ और इसी की प्रतिक्रिया के स्वरुप ‘कमंडल की राजनीति’ शुरू हुयी। इस आयोग ने 1980 में तत्कालीन केंद्र सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी। इस रिपोर्ट के अनुसार उस समय भारत की 52 फिसदी आबादी सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ी हुई थी और पिछड़े वर्ग में समावेश हेतु योग्य थी। 

इसी बिच अंतर्गत मतभेदों के चलते यह सरकार अपना कार्यकाल पूरा करने से पहले ही गिर गयी और इंदिरा गाँधी का सत्ता के गलियारों में पुनरागमन हुआ। लगभग एक दशक तक मंडल आयोग की रिपोर्ट पर कोई कारवाई नहीं की गई और उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। वी. पी. सिंह सरकार द्वारा (जो कि 1989 में बनी) 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर दिया गया। 

इन सिफारिशों के लागू होने के बाद तत्कालीन सरकार के इस फैसले के खिलाफ देश में हिंसक आंदोलनों का सैलाब सा आ गया। सरकार के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई और बाद में यही केस ‘इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ। 

इस याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की 9 सदस्यीय बेंच ने बहुमत से इस केस पर अपना अंतिम निर्णय 1992 में सुनाया। अपने फैसले में इस बेंच ने तत्कालीन सरकार के फैसले को वैध बताते हुए जाति को सामाजिक एवं शैक्षणिक पिछड़ेपन का मुख्य निकष माने जाने का मत व्यक्त किया। 

अन्य पिछड़ा वर्ग हेतू 27 फिसदी आरक्षण का प्रावधान भी सुप्रीम कोर्ट ने सही बताया था। कुल उपलब्ध स्थानों में ज़्यादा से ज़्यादा 50 फिसदी आरक्षण की मर्यादा भी सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट की। असाधारण परिस्थितीयों में आरक्षण की इस मर्यादा के उल्लंघन की अनुमती भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले में दी थी। 

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मराठाओं को आरक्षण क्या ज़रूरत?

इस सवाल का जवाब की तलाश में हमें दो दशक पीछे जाना पड़ेगा। 1990 में मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद कई जातियों को ओबीसी में शामील किया गया। परिणाम स्वरुप सामान्य वर्गों के उम्मीदवारों के लिए सरकारी नौकरीयों में अवसरों की कमी आई और उन्हें आजीविका के लिए कृषि क्षेत्र की तरफ लौटना पड़ा। 

एक तरफ मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हो रही थी तो वहीं दूसरी तरफ देश में उदारीकरण की हवाएँ तेज़ थी। सारा बोझ कृषि क्षेत्र पर आने लगा और उसी दशक में खेती योग्य ज़मीनो का बड़े पैमाने पर बंटवारा हुआ। फल स्वरुप कृषि से होने वाली आय में कमी आयी। वहीं एक ओर शहरों से नज़दीक ज़मीनों के दाम आसमान छूने लगे। इस का परिणाम यह हुआ कि कई लोगों ने अपनी खेती योग्य ज़मीने बेच दी। 

एक तरफ सरकारी नौकरीयों में सामान्य वर्ग के लिए कम होते अवसरों की समस्या थी तो वहीं दूसरी तरफ खेती से होने वाली आय में आयी कमी से सामान्य वर्गों में शामील समुदाय परेशानी का शिकार थे। वहीं एक ओर निजी क्षेत्रों में रोज़गार के अवसर और उन से होने वाली आय भी संतोषजनक नहीं थी।

सरकारी नौकरियों में सामान्य वर्गों के लिए कम होते अवसरों के साथ साथ यह समुदाय सूखे की मार भी झेल रहे थे। महाराष्ट्र में 1972 के बाद हर तीन-चार सालों बाद उल्लेखनीय सूखा पड़ा था, जिसका विपरीत परिणाम खेती क्षेत्र पर पड़ा।

कृषि क्षेत्र पर निर्भर वह समुदाय जो सामान्य वर्ग में शामील हैं उसे आशा हैं कि आरक्षण मिलने पर शिक्षा के क्षेत्र और सरकारी नौकरीयों में उन का प्रतिनिधीत्व बढ़ेगा और उन्हें कृषि पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। संबंधित कारणों से महाराष्ट्र के ज़मींदार मराठा समुदाय को भी आरक्षण की आवश्यकता महसूस हुई।

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पर्याय अभी बाकी हैं

मराठा आरक्षण पर कोर्ट के फैसले से असहमती दर्शाने हेतू कुछ लोग तमिलनाडु के मॉडल का सन्दर्भ देते हैं। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तमिलनाडु ने नरसिंहराव के कार्यकाल में संविधान संशोधन के माध्यम से अपने आरक्षण मॉडल का समावेश संविधान के नववे परिशिष्ट में करवा लिया था। यही कारण हैं कि इंदिरा साहनी केस पर कोर्ट का फैसला आने के दो दशकों बाद भी तमिलनाडु का आरक्षण बचा हुआ हैं। 

भले ही 5 मई 2021 को सुप्रीम कोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया हो परंतु मराठा आरक्षण की लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई और ना ही सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला मराठा आरक्षण पर पूर्ण विराम था। अभी भी कई पर्याय खुले हैं। तो चलिए बात करते हैं उन पर्यायों की। 

पहला पर्याय तो यह हैं कि इस फैसले के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट ने पुनर्विलोकन याचिका (review petition) दायर की जा सकती हैं। जो कि दायर की गयी हैं। दूसरा पर्याय हैं सुपर न्यूमररी कोटा अथवा असाधारण परिस्थिती सिद्ध कर के मराठा आरक्षण का रास्ता साफ करना। तीसरा पर्याय हैं मराठा समुदाय को राष्ट्रपति एवं प्रधानमंत्री के निर्देशानुसार पिछड़े वर्ग की सूची में शामील करना।

चौथा रास्ता हैं मराठा समुदाय का अन्य पिछड़ा वर्ग में समावेश कर के आरक्षण प्रदान करना और इस तरीके से यदि सरकार जाती हैं तो इस के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट की मंज़ूरी की भी आवश्यकता नहीं होगी। राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग भी मराठा समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामील करने की सिफारिश राज्य सरकार से कर चूका हैं। 

यह एक आसान प्रक्रिया होगी परंतु इस रास्ते में राज्य सरकार के समक्ष दो मुख्य चुनौतीयाँ हैं। पहली तो केंद्र सरकार को विश्वास में ले कर इस के लिए मनाना और दूसरी, यदि सरकार इस रास्ते को अपनाती हैं तो महाराष्ट्र में मराठा बनाम ओबीसी संघर्ष शुरू हो जाएगा। 

मराठा समुदाय की शैक्षणिक स्थिती बयान करने वाली कोई सर्वमान्य रिपोर्ट उपलब्ध नहीं हैं। परंतु जो ज्ञापन और आँकड़े ‘राणे आयोग’ के दिए हैं वह मराठा समुदाय की स्थिती की जो तस्वीर पेश करते हैं वह अत्यंत चिंताजनक हैं। 

एक तरफ यह चित्र हैं तो वहीं दुसरी तरफ महाराष्ट्र की अधिकांश शिक्षण संस्थाएँ मराठा नेताओं के अधीन हैं। व्यवसायिक उच्च शिक्षण संस्थाओं के व्यवस्थापन को 15 फिसदी स्थान भरने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट ने प्रदान किया हैं जिसे मॅनेजमेंट कोटा कहा जाता हैं और यहाँ आरक्षण लागू नहीं होता। 

यदि यह शिक्षा सम्राट अपनी संस्थाओं में गरीब और मेधावी मराठा छात्र-छात्राओं को मुफ्त में या नाममात्र शुल्क पर प्रवेश देंगे तो यह कदम मराठा समुदाय के शिक्षा एवं रोज़गार के क्षेत्र में विकास की राह में मील का पत्थर सिद्ध हो सकता हैं। 

आधुनिक महाराष्ट्र में जाति, आरक्षण और राजनीति का स्वरुप एक जटील और अनोखी व्यवस्था हैं। आज़ादी के बाद हम ने उम्मीद की थी कि लोकतांत्रिक शासन, शिक्षा और आधुनिकीकरण आदि के प्रचार-प्रसार से जाति जैसी सामाजिक संस्थाओं का महत्त्व कम होता जाएगा और कमज़ोर हो कर यह धीरे धीरे समाप्त हो जाएगी। 

पर सात दशकों बाद जब हम राजनीति पर नज़र दौड़ाते हैं तो पाते हैं कि हमारी आशाएँ धूमील हो चुकी हैं। आज जाति एवं जाति पर आधारित संगठनों का महत्त्व पहले के मुकाबले बढ़ गया हैं। जाति आज राजनीति का प्रमुख तथ्य हैं जिसे झुठलाना बेमानी होगा। 

आरक्षण की व्यवस्था ने राजनीति में जाति और जाति में राजनीति के महत्त्व को बढ़ाया हैं। अब देखना हैं कि यह आग और क्या कुछ भस्म करती हैं। फिलहाल मराठा आरक्षण का भविष्य क्या होगा? यह कह पाना मुश्किल हैं मगर आने वाला समय इन सारे प्रश्नों के उत्तर ले कर आएगा।

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author

मोईन नईम

लेखक सामाजिक विषयों के अध्ययता और जलगांव स्थित डॉ. उल्हास पाटील लॉ कॉलेज में अध्यापक हैं।