भारत में आरक्षण आंदोलनों का इतिहास और प्रावधान

भारत में आरक्षण आंदोलनों का इतिहास और प्रावधान
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महाराष्ट्र के बीड शहर में 2015 को आरक्षण कि मांग करते हुए भव्य आंदोलन हुआ था


भारत में आरक्षण एक संवेदनशील विषय रहा हैं। पिछले कुछ दशकों में यह मुद्दा सामाजिक और राजनीतिक दृष्टी से बहुत संवेदनशील बन चूका हैं। भारत में इस पर राजनीति के एक लंबे दौर के हम गवाह हैं। देश ने आरक्षण के लिए आंदोलनों का एक लंबा दौर देखा हैं। आरक्षण के लिए अलग अलग राज्यों में आरक्षण के लिए आंदोलन होते रहे हैं, जिन में राजस्थान में गुर्जरों का, हरियाणा में जाटों का, गुजरात में पाटीदारों का और महाराष्ट्र में मुसलमानों एवं मराठों के आंदोलन मुख्य आंदोलनों में शामील हैं।

आरक्षण (Reservation) का अर्थ है अपनी जगह सुरक्षित करना। प्रत्येक व्यक्ति की इच्छा हर स्थान पर अपनी जगह सुरक्षित या सुनिश्चित करने या रखने की होती है, चाहे फिर वह रेल के डिब्बे या बस में यात्रा करने के लिए हो या किसी अस्पताल में अपनी चिकित्सा कराने के लिए, किसी संस्था में शिक्षा प्राप्त करने के लिए हो या फिर विधानसभा या लोकसभा का चुनाव लड़ने की बात हो या किसी सरकारी विभाग में नौकरी पाने की।

अर्थात आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक क्षेत्र में आज हर नागरिक अपना स्थान सुनिश्चित करना चाहता हैं और अपना स्थान पहले ही सुनिश्चित करने का नाम आरक्षण हैं।

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इतिहास एक नजर में

भारत में आरक्षण की बहस एवं शुरुआत आज़ादी के बहुत पहले से हो चुकी थी। आज आरक्षण का जो मॉडल भारत में हैं यह मॉडल कई चरणों में विकसित हुआ हैं। आइये इन चरणों पर बात करते हैं।

*भारत में आरक्षण की शुरुआत 1882 में हंटर आयोग के गठन के साथ हुई थी। उस समय विख्यात समाज सुधारक महात्मा जोतिराव फुले ने सभी के लिए नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षा तथा अंग्रेज सरकार की नौकरियों में आनुपातिक आरक्षण/प्रतिनिधित्व की मांग की थी।

*1891 के आरंभ में त्रावणकोर के सामंती रियासत में सार्वजनिक सेवा में योग्य मूल निवासियों की अनदेखी कर के विदेशियों को भर्ती करने के खिलाफ प्रदर्शन के साथ सरकारी नौकरियों में आरक्षण के लिए मांग की गई।

*1901 में महाराष्ट्र के सामंती रियासत कोल्हापुर में शाहू महाराज द्वारा आरक्षण की शुरुआत की गई। यह अधिसूचना भारत में दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाला पहला सरकारी आदेश है।

*1908 में अंग्रेजों द्वारा बहुत सारी जातियों और समुदायों के पक्ष में (प्रशासन में जिनका थोड़ा-बहुत हिस्सा था के लिए) आरक्षण शुरू किया गया।

*1909 और 1919 के भारत सरकार अधिनियम में आरक्षण का प्रावधान किया गया।

*1921 में मद्रास प्रेसीडेंसी ने जातिगत सरकारी आज्ञापत्र जारी किया, जिसमें गैर-ब्राह्मणों के लिए 44 प्रतिशत, ब्राह्मणों के लिए 16 प्रतिशत, मुसलमानों के लिए 16 प्रतिशत, भारतीय-एंग्लो/ईसाइयों के लिए 16 प्रतिशत और अनुसूचित जातियों के लिए 8 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।

*1935 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने प्रस्ताव पास किया, (जो पूना पॅक्ट कहलाता है) जिसमें दलित वर्ग के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र की मांग की गई थी।

*1935 के भारत सरकार अधिनियम में आरक्षण का प्रावधान किया गया था।

*1942 में बी. आर. अम्बेडकर ने अनुसूचित जातियों की उन्नति के समर्थन के लिए अखिल भारतीय दलित वर्ग महासंघ की स्थापना की। उन्होंने सरकारी सेवाओं और शिक्षा के क्षेत्र में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण की मांग की।

*1946 के कैबिनेट मिशन प्रस्ताव में अन्य कई सिफारिशों के साथ आनुपातिक प्रतिनिधित्व का प्रस्ताव दिया गया था।

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स्थिति का मूल्यांकन

26 जनवरी 1950 को भारत का संविधान लागू हुआ। भारतीय संविधान में सभी नागरिकों के लिए समान अवसर प्रदान करते हुए सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछले वर्गों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिए संविधान में विशेष धाराएं रखी गई हैं।

इसके अलावा 10 सालों के लिए उनके राजनीतिक प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए अलग से निर्वाचन क्षेत्र आवंटित किए गए थे। (हर दस साल के बाद सांविधानिक संशोधन के जरिए इन्हें बढ़ा दिया जाता है)।

*1953 में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए कालेलकर आयोग का गठन किया गया था। इस आयोग के द्वारा सौंपी गई अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से संबंधित रिपोर्ट को स्वीकार कर लिया गया, लेकिन अन्य पिछड़ी जाति (OBC) के लिए की गई सिफारिशों को अस्वीकार कर दिया गया।

*1979 में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए मंडल आयोग की स्थापना की गई थी। इस आयोग के पास अन्य पिछड़े वर्ग (OBC) के बारे में कोई सटीक आंकड़ा नहीं था और इस आयोग ने ओबीसी की 52 प्रतिशत आबादी का मूल्यांकन करने के लिए 1930 की जनगणना के आंकड़े का इस्तेमाल करते हुए पिछड़े वर्ग के रूप में 1,257 समुदायों का वर्गीकरण किया था।

*1980 में मंडल आयोग ने एक रिपोर्ट पेश की और तत्कालीन कोटा में बदलाव करते हुए इसे 22 प्रतिशत से बढ़ाकर 49.5 प्रतिशत करने की सिफारिश की। 2006 तक पिछड़ी जातियों की सूची में जातियों की संख्या 2297 तक पहुंच गई, जो मंडल आयोग द्वारा तैयार समुदाय सूची में 60 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।

*1990 में मंडल आयोग की सिफारिशों को विश्वनाथ प्रताप सिंह द्वारा सरकारी नौकरियों में लागू किया गया। छात्र संगठनों ने इसके विरोध में राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन शुरू किया और दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र राजीव गोस्वामी ने आत्मदाह की कोशिश की थी।

*1991 में नरसिम्हा राव सरकार ने अलग से अगड़ी जातियों में गरीबों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत की।

*1992 में इंदिरा साहनी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को सही ठहराया।

*1995 में संसद ने 77वें सांविधानिक संशोधन द्वारा अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की तरक्की के लिए आरक्षण का समर्थन करते हुए अनुच्छेद 16(4)(ए) का गठन किया। बाद में आगे भी 85वें संशोधन द्वारा इस में पदोन्नति में वरिष्ठता को शामिल किया गया था।

*12 अगस्त 2005 को उच्चतम न्यायालय ने पी. ए. इनामदार और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य के मामले में 7 जजों द्वारा सर्वसम्मति से फैसला सुनाते हुए घोषित किया कि राज्य पेशेवर कॉलेजों समेत सहायता प्राप्त कॉलेजों में अपनी आरक्षण नीति को अल्पसंख्यक और गैर-अल्पसंख्यक पर नहीं थोप सकता है।

लेकिन इसी साल निजी शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों और अनुसूचित जाति तथा जनजाति के लिए आरक्षण को सुनिश्चित करने के लिए 93वां सांविधानिक संशोधन लाया गया। इसने अगस्त 2005 में सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को प्रभावी रूप से उलट दिया।

*2006 से केंद्रीय सरकार के शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण शुरू हुआ।

*10 अप्रैल 2008 को भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने सरकारी धन से पोषित संस्थानों में 27 प्रतिशत ओबीसी (OBC) कोटा शुरू करने के लिए सरकारी कदम को सही ठहराया। इसके अलावा न्यायालय ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर को आरक्षण नीति के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए।

*वर्ष 2019 में 103वें संविधान संशोधन के माध्यम से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 16 में संशोधन किया गया। संशोधन के माध्यम से भारतीय संविधान में अनुच्छेद 15 (6) और अनुच्छेद 16 (6) सम्मिलित किया, ताकि अनारक्षित वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को आरक्षण का लाभ प्रदान किया सके।

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आरक्षण की जरुरत हैं क्या?

भारतीय संविधान में आरक्षण से संबंधित स्पष्ट प्रावधान मौजूद हैं। भारत में आरक्षण को संवैधानिक दर्जा, संरक्षण एवं आधार प्राप्त हैं। संविधान के भाग तीन में समानता के अधिकार की भावना निहित है। इसके अंतर्गत अनुच्छेद 15 में प्रावधान है कि किसी व्यक्ति के साथ जाति, प्रजाति, लिंग, धर्म या जन्म के स्थान पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद 15(4) के मुताबिक यदि राज्य को लगता है तो वह सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है।

*अनुच्छेद 16 में अवसरों की समानता की बात कही गई है। अनुच्छेद 16(4) के मुताबिक यदि राज्य को लगता है कि सरकारी सेवाओं में पिछड़े वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह उनके लिए पदों को आरक्षित कर सकता है।

*अनुच्छेद 330 के तहत संसद और 332 में राज्य विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए सीटें आरक्षित की गई हैं।

अब इस के बाद किसी के मन में यह सवाल उपस्थित हो सकता हैं कि, आरक्षण की आवश्यकता हैं क्या? अथवा आरक्षण क्यों दिया जाता हैं? भारत में सदीयों तक कुछ जातियां सामाजिक भेदभाव का शिकार रही। वे शिक्षा एवं पसंदीदा व्यवसाय जैसे अधिकारों से भी वंचित थी।

इस व्यवस्था के चलते यह जातियां विकास और मुख्य धारा से बहुत दूर थी। भारत में आरक्षण का उद्देश्य केंद्र और राज्य में सरकारी नौकरियों, कल्याणकारी योजनाओं, चुनाव और शिक्षा के क्षेत्र में इन पिछड़े वर्गों की हिस्सेदारी को सुनिश्चित करना था ताकि समाज के पिछड़े वर्गों को आगे आने एवं मुख्य धारा में शामील होने का अवसर प्रदान किया जा सके।

भारत में सरकारी सेवाओं और संस्थानों में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं रखने वाले पिछड़े समुदायों तथा अनुसूचित जातियों और जनजातियों के सामाजिक और शैक्षिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए भारत सरकार ने सरकारी तथा सार्वजनिक क्षेत्रों की इकाइयों और धार्मिक/भाषाई अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों को छोड़कर सभी सार्वजनिक तथा निजी शैक्षिक संस्थानों में पदों तथा सीटों के प्रतिशत को आरक्षित करने के लिए कोटा प्रणाली लागू की है।

भारत के संसद में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के प्रतिनिधित्व के लिए भी आरक्षण नीति को विस्तारित किया गया है।

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प्रावधान के मुद्दे

संविधान सभा के समक्ष जब यह मुद्दा उठा कि, आरक्षण किसे दिया जाए तो उस समय गहन विचार विमर्श के बाद कुछ जातियों को अनुसूचित जातियों में शामील कर के उन के लिए 15 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया। वही दूसरी तरफ कुछ जातीयों का समावेश अनुसूचित जनजातीयों में कर के उन के लिए 7.5 प्रतिशत आरक्षण का प्रबंध किया गया।

शुरुआत में यह आरक्षण केवल 10 वर्षों के लिए था परंतु हर बार इसे 10 वर्षों के लिए बढ़ा दिया गया, इस आरक्षण की इस बार की समय सीमा 2026 में समाप्त होने वाली हैं। शुरुआत में अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षण का प्रावधान नहीं था।

मोरारजी देसाई सरकार ने मंडल कमीशन का गठन किया परंतु कई सालों तक इस आयोग की रिपोर्ट एवं सिफारिशें ठंडे बस्ते में रही मगर वी. पी. सिंह की सरकार ने मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू कर अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया जिसे उच्चतम न्यायलय ने वैध करार दिया।

इस के बाद 2019 में मोदी सरकार ने आर्थिक रूप से पिछड़े वर्ग के लिए 10 प्रतिशत का प्रावधान किया और आज के समय में आरक्षण की मर्यादा 49.5 प्रतिशत से बढ़ कर 59.5 प्रतिशत हो गई। बाकी 49.5 प्रतिशत जगह सामान्य वर्ग के लिए हैं जो कि आरक्षित वर्गों से आने वाले उम्मीदवारों के लिए भी खुली हैं। आंकड़ों की बात कि जाए तो अनुसूचित जाती (SC) 15, अनुसूचित जनजाती (ST) 7.5, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) 27, आर्थिक पिछड़ा वर्ग (EWS)  10  प्रतिशत आरक्षण हैं। यानि कुल 59.5 प्रतिशत भारत में लागू हैं, यानी पचास फिसद से उपर।

वही दूसरी तरफ महाराष्ट्र में आरक्षण की सीमा 52 प्रतिशत हैं जबकि 16 प्रतिशत मराठा आरक्षण का मुद्दा न्यायालय में सुनवाई हेतू अधीन हैं था, 5 मई 2021 को कोर्ट ने अपना फासली सुनाते हुए इस आरक्षण को स्थगिती दे दी हैं। यदि उच्चतम न्यायालय मराठा आरक्षण को हरी झंडी दिखा देता, तो यह आरक्षण 52 प्रतिशत से बढ़ कर 68 प्रतिशत हो जाता।

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धर्म की नजर

यदि मुसलमानों को मुख्य धारा में लाना हैं या विकास के धारे से जोड़ना हैं तो निःसंदेह इस में आरक्षण एक अहम भूमिका अदा कर सकता हैं। अब यहां एक दिक्कत यह हैं कि, जब भी मुस्लिम आरक्षण की बात की जाती हैं तो कई लोग यह तर्क देते हैं कि भारत में धर्म के आधार पर आरक्षण नहीं दिया जा सकता जबकि तथ्य कुछ और ही बयान करते हैं।

अनुसूचित जातीयों में अभी तक हिंदू, सिख और बौद्ध ही शामील हैं। हालांकि अनुसूचित जाति आदेश 1950 के पैरा 03 में शुरू में लिखा गया था कि, “ऐसा कोई व्यक्ती अनुसूचित जाती में शामील नहीं होगा जो हिंदू धर्म से इतर किसी और धर्म को मानता हो।

फिर बाद में सिखों की माँग पर 1955 में इस में हिंदू शब्द के साथ सिख शब्द जोड़ा गया और 1990 में नवबौद्ध शब्द जोड़ कर बौद्ध धर्म अपनाने वाले दलितों को भी अनुसूचित जाती के आरक्षण का लाभ देने का रास्ता साफ कर दिया गया।

1996 में नरसिंह राव सरकार ने एक अध्यादेश के माध्यम से ईसाई धर्म अपनाने वाले दलितों को भी अनुसूचित जातियों में शामील करने की कोशीश की थी मगर भाजपा के तीखे तेवर एवं विरोध के चलते इस अध्यादेश को ठंडे बस्ते में डालना पड़ा। तब से आज तक दलित ईसाई एवं वे मुसलमान जिन के पूर्वज कभी दलित हुआ करते थे खुद को इस वर्ग में शामील करने के लिए आंदोलन एवं मांगों के माध्यम से सरकारों पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

उपरोक्त संदर्भ में यदि बात की जाए तो भारत में बहुत हद तक आरक्षण का आधार धर्म ही रहा हैं। यह तथ्य उन लोगों की आँखें खोलने के लिए काफी हैं जो धर्म को मुस्लिम आरक्षण की राह में बाधा मानते हैं। खैर...

मुसलमानों एवं ईसाईयों के इन आंदोलनों का ही नतीजा था कि, केंद्र सरकार ने 2007 में रंगनाथ मिश्रा आयोग को इस मसले पर विचार कर के सिफारिश करने का ज़िम्मा सौंपा था। जस्टीस रंगनाथ मिश्रा ने अपनी रिपोर्ट में साफ लिखा हैं कि, “धर्म के आधार पर मुसलमानों एवं ईसाईयों को आरक्षण से वंचित रखना संविधान के खिलाफ हैं।

जस्टिस रंगनाथ मिश्रा ने यह भी कहा हैं कि, “संविधान में संशोधन किये बगैर ही ईसाई और इस्लाम धर्म अपनाने वाले दलितों को भी अनुसूचित जातियों में शामील किया जा सकता हैं। मिश्रा आयोग की सिफारिशों पर अनुसूचित जाती आयोग भी अपनी मुहर लगा चूका हैं।

यदि रंगनाथ मिश्रा आयोग की सिफारिशों को मान लिया जाता हैं तो अनुसूचित जातीयों को मिलने वाली तमाम सुविधाएं बेहद गरीब तबके के मुसलमानों को भी मिलने लगेगी लोकसभा की 79 और देश भर की विधान सभाओं की 1050 से अधिक सीटों पर चुनाव लड़ने का रास्ता भी साफ हो जाएगा जो अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं। इस चर्चा से यह बात भी साफ हो जाती हैं कि धर्म मुस्लिम आरक्षण की राह में बाधा नहीं हैं।

उपरोक्त विवेचन से साफ स्पष्ट हैं कि सरकार चाहे केंद्र की हो या राज्य की, दोनों ही सरकारों ने मुस्लिम आरक्षण एवं विकास के मामले में हमेशा अपना ठंडा रवैया कायम रखा हैं। स्वतंत्रता के पश्चात से ही मुस्लिम आरक्षण समय की मांग और आवश्यकता थी और आज भी मुसलमानों के शैक्षणिक एवं राजनीतिक विकास के लिए आरक्षण ज़रूरी हैं।

सरकारी नौकरियों के क्षेत्र में मुसलमानों के नगण्य प्रतिनिधीत्व के नकारात्मक प्रभावों से मुस्लिम समुदाय की रक्षा और इस चित्र को बदलने हेतू मुस्लिम आरक्षण समय की मांग हैं।

लेखक इस बात से भी सहमत हैं कि आरक्षण मुसलमानों की समस्यायों का मुकम्मल समाधान नहीं हैं परंतु आरक्षण से मिलने वाली सुविधाओं और आरक्षित सीटों पर चुनाव लड़ने के रास्ते के साफ होने के लाभों को भी नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता जो कि मुसलमानों की हर क्षेत्र में मौजूद दुर्दशा में सुधार हेतू रामबाण उपाय अथवा मील का पत्थर साबित हो सकते हैं। फिलहाल इस शेर पर कलम रोक रहा हूँ कि,

वक्त कम हैं... जितना हैं ज़ोर लगा दो

कुछ को मैं जगाऊँ कुछ को तुम जगा दो

जाते जाते :

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author

मोईन नईम

लेखक सामाजिक विषयों के अध्ययता और जलगांव स्थित डॉ. उल्हास पाटील लॉ कॉलेज में अध्यापक हैं।