जिन्दगी को करीब लाती हैं भीष्म साहनी की कहानियाँ

जिन्दगी को करीब लाती हैं भीष्म साहनी की कहानियाँ

प्रगतिशील और प्रतिबद्ध रचनाकार भीष्म साहनी को याद करना, हिन्दी की एक शानदार और पायदार परम्परा को याद करना है। वे एक अच्छे रचनाकार के अलावा कुशल संगठनकर्ता भी थे। प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव के तौर पर उन्होंने देश भर में इस संगठन की विचारधारा फैलाने का महत कार्य किया। 

भीष्म साहनी की रचनाशीलता मुख्तसर नहीं है, बल्कि इसका दायरा काफी विस्तृत है। उपन्यास, कहानियां, नाटक, आत्मकथा, लेख और कला की तमाम दीगर विधाओं में उन्होंने अपनी कलम निरंतर चलाई। वे प्रगतिशील लेखक संघ से एक बार जुड़े, तो इसमें आखिर तक रहे।

अपने बड़े भाई अभिनेता बलराज साहनी की तरह भीष्म साहनी भी भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा के समर्पित कार्यकर्ता थे।

भीष्म साहनी वैचारिक तौर पर एक परिपक्व रचनाकार थे। सभी मामलों में उनका नजरिया बिल्कुल स्पष्ट था। उन्होंने इसे अपनी आत्मकथा ‘आज के अतीत’ में स्पष्ट करते हुए लिखा हैं,

‘‘विचारधारा यदि मानव मूल्यों से जुड़ती है, तो उसमें विश्वास रखने वाला लेखक अपनी स्वतंत्रता खो नहीं बैठता। विचारधारा उसके लिए सतत प्रेरणास्त्रोत होती है, उसे दृष्टि देती है, उसकी संवेदना में ओजस्विता भरती है।”

वामपंथ से प्रभावित 

भीष्म साहनी एक कुशल संगठनकर्ता थे। ‘प्रलेस’ के महासचिव के तौर पर उन्होंने देश भर में इसकी विचारधारा फैलाने का काम किया। भारतीय साहित्य में प्रगतिशील आंदोलन और प्रगतिशील लेखक संघ की भूमिका को वे महत्वपूर्ण मानते थे।

वे लिखते हैं, ‘‘यह भारत की सभी भाषाओं का साझा मंच था, धर्मनिरपेक्ष जनतंत्रात्मक की दृष्टि से प्रेरित और वामपंथी विचारधारा से गहरे प्रभावित जो एक देश के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ता था, तो दूसरी ओर विश्वव्यापी स्तर पर उठने वाली घटनाचक्र के प्रति सचेत था।’’ 

भीष्म साहनी का जन्म अविभाजित भारत के शहर रावलपिंडी में 8 अगस्त, 1915 को हुआ। उन्होंने अपनी आला तालीम लाहौर में पूरी की। पढ़ने-लिखने और रंगमंच में उनकी दिलचस्पी बचपन से ही थी। उन्होंने अपनी पहली कहानी ‘अबला’ उस वक्त लिख दी थी, वे जब दसवीं कक्षा में पढ़ते थे। बाद में यह कहानी उनके कॉलेज की पत्रिका ‘रावी’ में भी छपी। 

साहनी की नौजवानी का दौर, देश की आजादी की जद्दोजहद का दौर था। साल 1942 में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ छिड़ा, तो वे भी कांग्रेस में शामिल हो गए। सियासी गतिविधियों में हिस्सा लेने लगे।

इस हंगामाखेज दौर में उनकी मुलाकात सियासत और साहित्य दोनों ही क्षेत्र की अनेक महान हस्तियों महात्मा गांधी, पंडित जवाहरलाल नेहरू, प्रेमचंद, सुदर्शन, दयानारायण निगम, जैनेन्द्र, बनारसीदास चतुर्वेदी, इम्तयाज अली ‘ताज’, रवीन्द्रनाथ टैगोर, उदयशंकर आदि से हुई।

जिसका असर आगे चलकर उनकी जिन्दगी पर भी पड़ा। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने अपने पिता के साथ कुछ दिन व्यापार भी संभाला, लेकिन उनका मन इसमें नहीं रमता था।

जल्द ही वे इससे आज़ाद हो गए और लाहौर के एक कॉलेज में ऑनरेरी तौर पर पढ़ाने लगे। बाकी जो वक्त मिलता, उसे पढ़ने-लिखने और नाट्य कर्म में इस्तेमाल करते। उन्हीं दिनों वे कहानियां और लेख लिखने लगे। जो उस वक्त के मशहूर पत्र-पत्रिकाओं ‘विशाल भारत’, ‘सरस्वती’ और ‘हंस’ में प्रकाशित हुए।

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साहित्य में जिन्दगी की सच्चाई 

बंटवारे के बाद भीष्म साहनी का पूरा परिवार भारत आ गया। देश के कई विश्वविद्यालयों में उन्होंने अध्यापन का कार्य किया। साल 1953 में उनका पहला कहानी संग्रह ‘भाग्यरेखा’ प्रकाशित हुआ और इसके तीन साल बाद 1956 में दूसरा, ‘पहला पाठ’। 

भीष्म साहनी हमेशा मकसदी अदब के कायल रहे। कहानी की शैली-शिल्प और भाषा से ज्यादा उनका ध्यान इसके उद्देश्य पर रहता था। कहानी के मुताल्लिक उनका नजरिया था, “कहानी में कहानीपन हो, उसमें जिन्दगी की सच्चाई झलके, वह विश्वसनीय हो, उसमें कुछ भी आरोपित न हो, और वह जीवन की वास्तविकता पर खरी उतरे।’” 

वहीं कहानी की भाषा के बारे में भीष्म साहनी का ख्याल था कि जहां जरूरी लगे वहां हिन्दी की सहोदर भाषाओं और बोलियों का इस्तेमाल करना चाहिए। उनके मुताबिक ‘‘उत्तर भारत की भाषाएं एक-दूसरी से इतनी मिलती-जुलती हैं कि एक के प्रयोग से दूसरी भाषा बिगड़ती नहीं, बल्कि समृद्ध होती है।’’ 

यही वजह है कि भीष्म साहनी की सारी कहानियां हमें जिन्दगी के करीब लगती हैं। उनमें कुछ भी अपनी ओर से थोपा हुआ नहीं लगता। उनकी कहानी-उपन्यास की भाषा से भी पाठक भावनात्मक तौर पर जुड़ जाते हैं। जिसमें वे पंजाबी शब्दों, वाक्यांशों के इस्तेमाल से बचते नहीं हैं। हिन्दी, उर्दू के ज्यादातर बड़े रचनाकारों ने अपने कथा साहित्य में इस परंपरा का निर्वाह किया है। फिर वे रेणु हों, चाहे राही, विजयदान देथा, यशपाल, कृष्णा सोबती, मोहन राकेश, कृष्ण बलदेव वैद।

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अनुवाद भी किया

साल 1957 से लेकर साल 1963 तक भीष्म साहनी मास्कों में विदेशी भाषा प्रकाशन गृह में अनुवादक के तौर पर कार्यरत रहे। इस दौरान उन्होंने करीब दो दर्जन किताबों जिसमें टॉल्सटॉय के उपन्यास भी शामिल हैं, का हिन्दी में अनुवाद किया। 

अनुवाद को भीष्म साहनी एक कला मानते थे। इस बारे में उन्होंने लिखा है, ‘‘अनुवाद कार्य भी एक कला है, पाठक को जो रस कहानी-उपन्यास को मूल भाषा में पढ़ने पर मिले, वैसा ही रस अनुवाद में भी मिले। तभी अनुवाद को सफल और सार्थक अनुवाद माना जाएगा। शाब्दिक अनुवाद-जिसे मक्खी पर मक्खी बैठाना कहा जाता है, साहित्यिक कृतियों के लिए नहीं चल सकता।’’ 

भीष्म साहनी ने अपनी ज्यादातर कहानियां मध्य वर्ग के ऊपर लिखी हैं। उनके चर्चीत उपन्यास - ‘तमस’, ‘कुन्तो’, ‘बसंती’, ‘कड़ियां’, ‘झरोखे’, ‘मय्यादास की माड़ी’ और ‘नीलू, नीलिमा नीलोफर’ तथा कहानी संग्रह-‘भाग्यरेखा’, ‘निशाचर’, ‘पाली’, ‘डायन’, ‘शोभायात्रा’, ‘वांडचू’, ‘पटरियां’, ‘भटकती राख’, ‘पहला पाठ’ हैं। तो नाटकों में ‘कबिरा खड़ा बाजार में’, ‘हानूश’, ‘माधवी’, ‘मुआवजे’।

मध्य वर्ग के सुख-दुःख, आशा-निराशा, पराजय-अपराजय उनकी कहानियों में खुलकर लक्षित हुई हैं। ‘चीफ की दावत’, ‘वांड्चू’, ‘खून का रिश्ता’, ‘चाचा मंगलसेन’, ‘सागमीट’ जैसी उनकी कई कहानियां, हिन्दी कथा साहित्य में खास मुकाम हासिल कर चुकी हैं। 

कहानी ‘चीफ की दावत’ साल 1956 में साहित्य की लघु पत्रिका ‘कहानी’ में प्रकाशित हुई थी। इस कहानी को प्रकाशित हुए छह दशक से ज्यादा हो गए, लेकिन यह कहानी आज भी मध्य वर्ग की सोच की नुमाइंदगी करती है। इस वर्ग की सोच में आज भी कोई ज्यादा बड़ा फर्क नहीं आया है। भारत के बंटवारे पर हिन्दी में जो सर्वक्षेष्ठ कहानियां लिखी गई हैं, उनमें से ज्यादातर भीष्म साहनी की हैं। 

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विभाजन का दर्द

उन्होंने और उनके परिवार ने खुद बंटवारे के दुःख-दर्द झेले थे, यही वजह है कि उनकी कहानियों में बंटवारे के दृश्य प्रमाणिकता के साथ आएं हैं। कहानी ‘आवाजें’, ‘पाली’, ‘निमित्त’, ‘मैं भी दिया जलाऊंगा, मां’ और ‘अमृतसर आ गया है’ के अलावा उनका उपन्यास ‘तमस’ बंटवारे और उसके बाद के सामाजिक, राजनीतिक हालात को बड़े ही बेबाकी से बयां करता है। 

उपन्यास ‘तमस’ बंटवारे की पृष्ठभूमि, उस वक्त के सांप्रदायिक उन्माद और इस सबके बीच पिसते आम आदमी के दर्द को बयां करता है। ‘तमस’ पर निर्देशक गोविंद निहलानी ने ‘तमस’ शीर्षक से ही टेली सीरियल बनाया, तो इसे उपन्यास से भी ज्यादा ख्याति मिली। इसकी मकबूलियत का आलम यह था कि पूरे देश में लोग इस नाटक के प्रसारण का इंतजार करते। 

सीरियल को चाहने वाले थे, तो कुछ मुट्ठी भर कट्टरपंथी इस सीरियल के खिलाफ भी थे। उन्होंने सीरियल को लेकर देश भर में धरने-प्रदर्शन किए। यहां तक कि दूरदर्शन के दिल्ली स्थित केंद्र पर हमला भी किया। लेकिन जितना इस सीरियल का विरोध हुआ, यह उतना ही लोकप्रिय होता चला गया।

‘झरोखे’ भीष्म साहनी का पहला उपन्यास था, जो उन्होंने सोवियत संघ से लौटकर लिखा था। इसके बाद उनका उपन्यास ‘कड़ियां’ आया। इन दोनों उपन्यासों को सम्पादक धर्मवीर भारती ने ‘धर्मयुग’ में धारावाहिक रूप से छापा। 

‘मय्यादास की माड़ी’ भीष्म साहनी का एक और महत्वपूर्ण उपन्यास है। इस उपन्यास में उन्होंने बड़े ही विस्तार से यह बात बतलाई है कि किस तरह देश में ब्रिटिश उपनिवेशवाद की स्थापना हुई। देशी शासक और सेनापति यदि विश्वासघात नहीं करते, तो देश कभी गुलाम नहीं होता। 

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रंगमंच से नाता

साहनी का रंगमंच से भी शुरू से ही नाता रहा। इप्टा की स्थापना से ही वे अपने बड़े भाई बलराज साहनी के साथ इससे जुड़ गए थे। उन्होंने इप्टा के लिए न सिर्फ नाटक लिखे, अभिनय किया बल्कि कुछ नाटकों मसलन ‘भूतगाड़ी’, ‘कुर्सी’ का निर्देशन भी किया। कहानी और उपन्यास की तरह भीष्म साहनी के नाटक भी काफी चर्चित रहे। लेकिन उनके नाटक की शुरूआत बड़ी ठंडी रही। 

नाट्य लेखन के जरिए समाज को उन्होंने हमेशा एक संदेश दिया। भीष्म साहनी ने कुछ सीरियलों और फिल्मों में अभिनय भी किया। मसलन ‘तमस’, ‘मोहन जोशी हाजिर हो’ और ‘मिस्टर एंड मिसेज अय्यर’।

प्रेमचंद की तरह भीष्म साहनी का भी यह मानना था कि लेखक राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है। 

भीष्म साहनी को एक लंबी उम्र मिली और उन्होंने अपनी इस उम्र का सार्थक इस्तेमाल किया। जिन्दगी के आखिरी लम्हों तक वे सक्रिय रहे। उनका निधन 11 जुलाई, 2003 को हुआ। बीमारी, शारीरिक दुर्बलता के बावजूद उन्होंने अपना लिखना-पढ़ना और सांगठनिक जिम्मेदारियां नहीं छोड़ी। वे सचमुच एक कर्मयोगी थे।

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ज़ाहिद ख़ान

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और आलोचक हैं। कई अखबार और पत्रिकाओं में स्वतंत्र रूप से लिखते हैं। लैंगिक संवेदनशीलता पर उत्कृष्ठ लेखन के लिए तीन बार ‘लाडली अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। इन्होंने कई किताबे लिखी हैं।