‘हिन्दोस्ताँनी राष्ट्रीयता’ का सम्राट अकबर था जन्मदाता

‘हिन्दोस्ताँनी राष्ट्रीयता’ का सम्राट अकबर था जन्मदाता
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नेहरु की लेखमाला :

पण्डित नेहरू कि ‘Glimpses of world history’ किताब मध्यकालीन भारत के इतिहास का एक संपन्न और सर्वकालिक दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। यह ग्रंथ 1934 में लिखा गया था। आज जब मध्यकाल के इतिहास को तोड-मरोडकर पेश किया जा रहा हैं, तब नेहरू कि यह किताब हम सब के लिए जरुरी हो जाती हैं हम डेक्कन क्वेस्ट के माध्यम से पाठको को इस किताब का रिविजन करा रहे हैं आज इस लेखमाला में मुघल का महान सम्राट अकबर के व्यक्तित्व के बारे में पढेंगे

हुमायून बहुत सभ्य और विद्वान था लेकिन अपने पिता की तरह बहादुर न था। उसके नये साम्राज्य में सब जगह गड़बड़ फैल गई और आखिर में 1540 ईसवी में, बाबर की मृत्यु के दस साल बाद, शेरशाह नामक बिहार के एक अफगान सरदार ने उसे हराकर हिन्दोस्ताँ के बाहर निकाल दिया।

इस तरह दूसरा मुगल बादशाह इधर-उधर छिपता हुआ और बडी मुसीबतें झेलता हुआ मारा-मारा फिरने लगा। इसी दर-दर मारे फिरने की हालत में, नवम्बर सन् 1542 ईसवीं में, राजपूताना के रेगिस्तानों में, उसकी बीवी को एक लड़का पैदा हुआ। रेगिस्तान में पैदा हुआ यह लडका आगे जाकर अकबर के नाम से मशहूर हुआ।

अपने दादा की तरह अकबर को भी बहुत जल्दी (13 साल) राजगद्दी मिल गई। बैरमखाँ, जिसे खानबाबा भी कहते है, इसका निगहबान और रक्षक था। लेकिन चार ही वर्षों में अकबर इस निगहबानी और दूसरे के इशारे पर चलने से तंग आ गया और उसने राज की बागडोर अपने हाथों में ले ली।

ईसवीं 1556 से 1605 तक, याने करीब पचास वर्ष तक, अकबर ने हिन्दोस्ताँ पर राज किया। यह जमाना यूरोप में निदरलैण्ड के विद्रोह का और इग्लैंड में शेक्सपीयर का था। अकबर का नाम हिन्दोस्ताँ के इतिहास में जगमगा रहा है और कुछ बातों में वह हमें अशोक की याद दिलाता है।

यह एक अजीब बात है कि ईसा से तीन सौ वर्ष पहले का एक बौद्ध सम्राट और ईसा के बाद सोलहवींदी के हिन्दोस्ताँ का एक मुसलमान बादशाह, दोनों एक ही तरह से और करीब-करीब एक ही आवाज में बोल रहे हैं।

ताज्जुब नहीं कि यह खुद भारत की ही आवाज हो, जो उसके दो महान पुत्रों के जरिये से बोल रही हो। अशोक के बारे में हम सिर्फ उतना ही जानते है जितना उसने खुद पत्थरों पर खुदा हुआ छोड़ा है। लेकिन अकबर के बारे में हम बहुत कुछ जानते हैं।

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एक अक्लमं बादशाह

उसके दरबार के दो इतिहास लिखनेवालों ने बडे लम्बे बयान लिखे हैं, और जो विदेशी उससे मिलने आये थे, खासकर जेसुइट (जेसुइट शब्द ईसा मसीह से बना है। 1539सवीं में सोसाइटी ऑफ जीसस बनाई गई थी। जिसके मेम्बर जेसुइट कहलाते थे।

यह लोग दुनिया में घुमते फिरते थे और इनका सरकार ब्लैक- पोपकहलाता था, हालांकि यह अपना धर्मगुरु पोप को ही मानते थे।) लोग, जिन्होंने अकबर को ईसाई बनाने की बहुत कोशिश की थी। उन्होंने भी लम्बे-चौडे हाल लिखे हैं।

अकबर बाबर की तीसरी पीढ़ी में से था। लेकिन मुघ़ल लोग अभी इस देश के लिए नये थे। वे विदेशी समझे जाते थे और उनका अधिकार उनकी फोजी ताकत के बल पर था।

अकर के राज में मुल खानदान की जड़े हिन्दोस्ताँ में जम चुकी थी। उसको खास हिन्दोस्ताँ की जमीन का और उसके खयालों को बिलकुल हिन्दोस्ताँनी बना दिया। इसके राज्य-काल में यूरोप में महान् मुगल’ (Great Mughal) का खिताब काम में लाया जाने लगा।

वह बहुत स्वेछाचारी था और उसकी ताकत को कोई रोकनेवाला न था। उस समय हिन्दोस्ताँ में राजा के अधिकारों को कम करने की कोई चर्चा तक नहीं थी। खुशकिस्मती से अकबर एक अक्लमंद स्वेच्छाचारी राजा था और वह हिन्दोस्ताँ के लोगों की भलाई के लिए दिन-रात कोशिश करता रहता था।

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राष्ट्रवादी सम्राट

एक तरह से तो वह ‘हिन्दोस्ताँ में राष्ट्रीयता का जन्मदाता समझा जा सकता है। ऐसे समय में, जबकि देश में राष्ट्रीयता का कुछ भी निशान न था और धर्म लोगों को एक-दूसरे से अलग कर रहा था। अकबर ने जुदा-जुदा मजहबों के दावों का खयाल न करके एक आम ‘हिन्दोस्ताँनी राष्ट्रीयता के खयाल को अधिक महत्व दिया।

यह अपनी कोशिश में पूरी तरह कामयाब तो नही हुआ, लेकिन यह ताज्जुब की बात है कि वह कितना आगे बढ गया और उसकी कोशिशों को कितनी ज्यादा कामयाबी मिली।

लेकिन फिर भी जो कुछ कामयाबी अकबर को मिली वह सब बिना किसी को मदद के ही नहीं थी। जबतक कि ठीक मौका न आ गया हो और वातावरण सहायक न हो, तब तक कोई भी बड़े काम में सफल नहीं हो सकता। एक बड़ा आदमी खुद भी तो जमाने और उसके वातावरण का ही फल होता हैं इसी तरह अकबर हिन्दोस्ताँ के उस जमाने का फल था

जिन दो संस्कृतियों (तहजीबों) और मजहबों का संघर्ष इस देश में शुरु हो चुका था, उन दोनों के एकीकरण या मेल के लिए उस समय हिन्दोस्ताँ में अंदरुनी ताकतें काम कर रही थी। गृह शिल्प की नई शैली और हिन्दोस्ताँी भाषाओं खासकर उर्दू या हिन्दोस्ताँी के विकास के बारे में लिखी हैं

रामानन्द, कबीर और गुरुनानक जैसे सुधारक और धार्मिक नेताओं के बारे में भी लिख चुका हूँ जिन्होंने इस्लाम और हिन्दू धर्म के समान पहलुओं पर जोर देकर और उनके बहुत से रस्म-रिवाज को जिन्दा करके दोनों मजहबों को एक-दूसरे के नजदीक लाने की कोशिश की थी।

उस समय एकीकरण या मेल का यह खयाल चारों तरफ फैला हुआ था। अकबर ने, जिसका दिमाग बहुत जल्दी प्रभावित होनेवाला और नई अच्छी-अच्छी बातों को पकड़ने वाला था, इसको जरूर इख्तियार किया होगा; बहुत कुछ उसके मुताबिक काम किया होगा। असल में वह इसका खास संरक्षक हो गया था।

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हिन्दुओं से विशेष प्रेम

एक राजनीतिज्ञ की हैसियत से भी वह इसी नतीजे पर पहुँचा होगा कि उसकी और कौम की ताकत इसी एकीकरण या मेल से बढ़ सकती है।

यह एक बहुत हादुर योद्धा और काबिल सेना नायक था। अशोक की तरह वह लड़ाई से नफ़रत नहीं करता था। लेकिन तलवार की विजय से वह प्रेम की विजय को अच्छी समझता था और यह भी जानता था कि ऐसी विजय ज्यादा टिकाऊ होती है।

इसलिए ह पक्का इरादा करके इस कोशिश में लगा कि हिन्दू सरदारों और हिन्दू जनता का प्रेम प्राप्त करे। उसने और गैर मुस्लिमों से वसूल किया जानेवाला जजियाऔर हिन्दू तीर्थ यात्रियों पर लगाया जानेवाला टैक्स बं कर दिया। उसने खुद अपनी शादी एक राजपूत सरदार की लड़की से की; बाद में उसने अपने लड़के का विवाह भी एक राजपूत लड़की से किया और उसने ऐसी मिश्रित शादियों को प्रोत्साहन दिया।

अकबर ने अपने साम्राज्य के सबसे ऊँचे ओहदों पर राजपूत सरदारों को तैनात किया। उसके सबसे बहादुर सिपहसालारों और सबसे काबिल जीरों और गवर्नरों में कितने ही हिन्दू थे। राजा मानसिंह को तो उसने कुछ दिनों के लिए काबुल तक का गवर्नर बनाकर भेजा था। असल में राजपूतों और अपनी हिन्दू प्रजा को खुश करने के लिए कभी-कभी तो वह इतना गे बढ़ जाता था कि मुसलमान प्रजा के साथ अक्सर अन्याय हो जाता था।

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राणा प्रताप का संघर्ष

बहरहाल यह हिन्दुओं का प्रेम जीतने में कामयाब हुआ और उसकी नौकरी और उसे इज्जदेने के लिए उसके चारों तरफ से करीब-करीब सब राजपूत लोग इकट्ठे होने लगे, सिवाय राणा प्रताप के जिसने कभी सिर नहीं झुकाया। राणा प्रताप ने अकबर को नाममात्र के लिए भी अपना सम्राट मानने से इन्कार कर दिया।

लड़ाई में हार जाने पर भी उसने अकबर का दास होकर ऐश आराम की जिन्दगी बिताने के बनिस्बत जंगल में भटकना अच्छा समझा। जिन्दगी भर यह राजपूत दिल्ली के महान् सम्राट से लड़ता रहा, और उसके सामने सिर झुकाना मंजूर नहीं किया। इस बांके राजपूत की यादगार राजपूताने की एक बेशकीमती धरोहर है और इसके नाम के साथ कितनी ही कहानियां जुड़ गई हैं।

इस तरह अकबर ने राजपूतों को अपनी तरफ़ कर लिया और वह जनता का प्यारा हो गया। वह पारसियों और उनके दरबार में आनेवाले जेसुइट पादरियों तक के प्रति बड़ा उदार था। लेकिन इस उदारता की वजह से और मुस्लिम शरियत से कुछ-कुछ लापरवाह होने की वजह से मुसलमान लोग उससे नाराज हो गये और उसके खिलाफ़ कई बलवे उठ खडे हुए।

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रहमदिल और उदार

मैंने अकबर की बराबरी अशोक से की है। लेकिन बहुत सी बातों में वह अशोक से बिलकुल जुदा था। वह बड़े लम्बे-चौडे मनसूबे रखने वाला था, और अपनी जिन्दगी के आखिरी दिनों तक अपने साम्राज्य बढ़ाने का इरादा करता रहा और मुल्क जीतता रहा। जेसुइट लोगों ने लिखा है कि वह,

होशियार और तेज दिमाग वाला था; यह फैसले करने में बड़ा सच्चा, मामलों में बहुत समझदार, और इन सबके अलावा रहमदिल, मिलनसार और उदार था। इन गुणों के साथ उसमें ऐसे लोगों की हिम्मत भी थी जो बड़े-बड़े जोखिम के कामों को उठाते है और पूरा करते हैं।

वह बहुत सी बातों में दिलचस्पी रखता था, और उनके बारे में जानने का इच्छुक रहता था, उसे न सिर्फ फौजी और राजनैतिक बातों का ही बल्कि कला कौशल का भी काफ़ी इल्म था।

जो लोग उसके व्यक्तित्व पर हमला करते थे उनपर भी इस राजा की दया और नम्रता की रोशनी फैलती रहती थी। उसे गुस्सा बहुत कम आता था और अगर कभी आता था तो उस वक्त वह गुस्से से पागल हो जाता था, लेकिन उसका यह गुस्सा ज्यादा देर तक न टिकता था।

या रहे कि यह बयान किसी चापलूस मुसाह का नहीं है, लेकिन एक विदेशी अजनबी का है, जिसे अकर पर गौर करने के काफ़ी मौके मिलते थे।

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author

टीम डेक्कन

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