‘ट्रम्प के साथ नाश्ता नही बल्कि आपको गृह मंत्री का पद छोडना चाहिए’

‘ट्रम्प के साथ नाश्ता नही बल्कि आपको गृह मंत्री का पद छोडना चाहिए’
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दिल्ली में दंगों के बाद अस्त-व्यस्त पडा सामान और उसे निहारते लोग


राज्यसभा में जावेद अली खान ने 12 मार्च को दिल्ली दंगों पर चर्चा में हिस्सा लेते हुए, अब तक तमाम दंगों के मामलों में गठित की गई न्यायिक जांच दलों की रिपोर्ट का हवाला देकर एक खास विचारधारा और उसे पोषित करने वाले RSS की भूमिका की तरफ इशारा किया। उन्होंने अमित शाह के इस्तीफे की मांग करते हुए कहा कि गृह मंत्री ने दंगों के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ नाश्ता छोडा अब वे गृह मंत्री का पद छोड दे और देश के साथ न्याय करे। पुरा भाषण राज्यसभा टीवी के सौजन्य से हम आपके लिए दे रहें हैं।

माननीय उपसभाध्यक्ष जी, एक बहुत ही गंभीर और महत्वपूर्ण मुद्दे पर सदन बहस कर रहा है। कल लोकसभा में बड़ी विस्तृत चर्चा हुई और वहां पर माननीय गृह मंत्री जी का जवाब भी हम लोगों के सामने है। सर, बहुत से सवाल हैं, जो इधर से भी आ रहे हैं और उधर से भी आ रहे हैं। आज से कोई 50-60 साल पहले साहिर लुधियानवी ने एक सवाल पूछा था।

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मुझे ठीक तारीख तो नहीं पता है। मैं उस सवाल के बारे में जब देखता हूँँ तो मुझे लगता है कि शायद साहिर साहब ने यह सवाल आज की सरकार से और आज के गृह मंत्री जी से पूछा था, जो 50-60 साल के बाद भी आज प्रासंगिक है

ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता

ये किसका लहू है कौन मरा

ये जलते हुए घर किसके हैं

ये कटते हुए तन किसके हैं,

तकसीम के अंधे तूफ़ान में

लुटते हुए गुलशन किसके हैं,

बदबख्त फिजायें किसकी हैं

बरबाद नशेमन किसके हैं,

कुछ हम भी सुनें, हमको भी सुना

ऐ रहबर-ए-मुल्क-ओ-कौम बता

ये किसका लहू है कौन मरा।

मैं चाहता हूँँ कि जब माननीय गृह मंत्री जी अपना जवाब दें, तो साहिर लुधियानवी के इस सवाल का जवाब भी आपको देना चाहिए।

आज के हालात क्या हैं? इस पक्ष से कुछ और कहा जाता है, हमारी तरफ से कुछ कहा जाता है और उधर से कुछ कहा जाता है। माननीय उपसभाध्यक्ष जी, मैं देश के एक ऐसे बड़े नेता के बयान को यहां रखना चाहूंगा और आपके सामने उद्धृत करना चाहूंगा, जिनका एक्रॉस पार्टी लाइन पूरे देश के अंदर बड़ा सम्मान है। जिनकी देश के प्रति निष्ठा पर, जिनकी धर्मनिरपेक्षता के प्रति निष्ठा पर, जिनकी लोकतंत्र के प्रति निष्ठा पर कोई सवालिया निशान आज किसी पक्ष की तरफ से लगाया नहीं जा सकता।

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मैं शिरोमणी अकाली दल के सर्वेसर्वा माननीय श्री प्रकाश सिंह बादल जी, जो हमारे लिए सम्मानित हैं, मैं उनके बयान को यहां उद्धृत करना चाहता हूँ।

इन हालातों पर उन्होंने क्या कहा हमारे संविधान में तीन मुख्य विचार निहित हैं: धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और लोकतंत्र। आज न कोई धर्मनिरपेक्षता है, न कोई समाजवाद। अमीर और अमीर हो रहे हैं, गरीब और ज्य़ादा गरीब होते जा रहे हैं। हालाँकि, लोकतंत्र केवल दो स्तरों पर मौजूद है - एक संसदीय चुनाव है, और दूसरा राज्य चुनाव है। बाकी, यह (लोकतंत्र) कहीं पर भी पाया नहीं जाता है।

इसका मतलब क्या है? बादल साहब कोई राजनैतिक लाभ की प्राप्ति के लिए तो ऐसा बयान नहीं दे सकते हैं। बादल साहब उम्र के अब जिस पड़ाव में हैं, वहां उनसे कम गंभीर होने की भी उम्मीद नहीं की जा सकती है।

मैं यह चाहता हूँ कि हमारी न मानें, विपक्ष की न मानें, लेकिन आज की जो हमारी मौजूदा सरकार है, कम से कम उन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सबसे पुराने और राबरो वरिष्ठ सहयोगी श्री प्रकाश सिंह बादल जी के बयान का संज्ञान लेना चाहिए और उस पर बहुत ज्यादा न चल सकें, सौ कदम न चल सकें, तो दस, बीस या पचास कदम बादल साहब के बताए हुए रास्ते को या उनकी जो स्थिति है, उस पर गौर करके दो-चार कदम आगे बढ़ना चाहिए।

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कल (11 मार्च) लोकसभा में बड़ी तारीफ की गई और दिल्ली पुलिस को सारा का सारा समर्थन गृह मंत्रालय से मिला और मिलना भी चाहिए, आखिर उस विभाग के मंत्री हैं, लेकिन जब तक दिल्ली की पुलिस हमारे इस सदन के माननीय सदस्य श्री. नरेश गुजराल जी के पत्र का संतोषजनक जवाब नहीं देती है, तब तक मैं किसी भी तरीके से दिल्ली की पुलिस को दी जाने वाली क्लिन चीट को मानने के लिए तैयार नहीं हूँ।

नरेश गुजराल जी ने क्या लिखा था - उस पत्र की प्रति आपकी नज़र से भी गुज़री होगी, मेरे पास भी उस पत्र की प्रति है। उन्होंने अपने दुख को बयान करते हुए कहा कि एक सांसद (एमपी) की शिकायत के बावजूद भी, जिन लोगों का नाम और पता उन्होंने दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को बताया था, दिल्ली की पुलिस ने उन्हें रत्ती भर राहत पहुंचाने की दिशा में कोई काम नहीं किया।

मैं यह कहना चाहता हूँ कि जब आप जवाब दें तो कम से कम इस बात पर भी रोशनी डालिएगा। चलिए, हम फोन करते, या टीएमसी वाले करते, या सीपीएम वाले करते, या काँग्रेस वाले करते तो आपके हिसाब से पुलिस चल रही थी, शायद हमें वह नजरअंदाज कर देती, लेकिन गुजराल साहब के फोन को, उनकी शिकायत को बेदखल करने की कौन सी मजबूरियां दिल्ली पुलिस की रहीं कि उस पर भी कोई गौर और फिक्र दिल्ली पुलिस ने नहीं किया।

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बहुत सारी बातें कही गयीं, आरोप लगाए गए - अगर आप 2002 की बात करोगे तो हम 1984 की बात करेंगे, तो मैं उन सब लोगों से कहना चाहता हूँ, जो इस प्रतिस्पर्धा में पड़ते हैं कि 1984 में इतना हुआ था तो 2002 में इतना हुआ और जो कमी रह गई, उसे अब हम 2020 में पूरा करेंगे, यह कोई बहुत स्वस्थ प्रवृत्ति (healthy trend) कम से कम विचार-विमर्श करने का या बहस का नहीं हैं।

मैं इतिहास में नहीं जाना चाहता, खास करके इतिहास में राजनैतिक लाभ के लिए जो कदम उठाए गए या जो काम किए गए, चाहे वे सांप्रदायिक तरीके से हों या दूसरे तरीकों से हों, लेकिन इतिहास के कुछ ऐसे उद्धरण मेरे हाथ में हैं, समय कम होने की वजह से मैं उन्हें पडूंगा नहीं, लेकिन मैं माननीय गृह मंत्री जी और सदन से कहना चाहूंगा कि इन पर वे गौर करें।

1969 - अहमदाबाद के दंगे, जस्टिस जगमोहन रेड्डी कमीशन, 1970 - भिवंडी के दंगे, जस्टिस डी. पी. मदान कमीशन, 1971 - तेलिचेरी, केरल में कुन्नूर जिले का है, वहां के दंगे, जस्टिस जोसफ कमीशन, 1979 में जमशेदपूर के दंगे - जस्टिस जितेन्द्र नारायण कमीशन और 1982 में कन्याकुमारी के दंगे, जो हिन्दू और क्रिश्चियन्स के दंगे थें, उसमें जस्टिस वेणुगोपाल कमीशन - इन सब कमिशन्स की रिपोर्ट्स के उद्धरण मेरे पास हैं, मैं चाहता हूं कि आज वे देश के सामने होने चाहिए।

इन सारे के सारे कमिशन्स ने एक खास राजनैतिक विचार, एक खास राजनैतिक परिवार, जो इस देश के अंदर तबाही और बरबादी मचाना चाहता है, उसकी तरफ नाम लेकर इशारा किया है - सब समझ गए होंगे। कमिशन्स के बारे में कहा जा सकता है कि इनकी उदारता (leniency) किसी तरफ थी या इनका झुकाव किसी तरफ था।

हमारे सदन के एक सदस्य हैं, वे यहां पर मौजूद थे, अभी चले गए हैं, एम. जे. अकबर साहब - जमशेदपुर के दंगों के बाद उनकी एक बड़ी मशहूर किताब Riot After Riotआई है, उसके अंदर उन्होंने तत्कालीन एक परिवार या संघ (RSS) या जो भी कहिए, उसके सरवरा का नाम लेकर उनकी तरफ इंगित किया था कि किस तरीके से दंगों को संचालित किया जाता हैं। आखिर में, क्योंकि समय कम है, मैं लम्बी बात नहीं कहूंगा।

मैं यह कहना चाहता हूँ, कभी बात कपिल मिश्रा कि जा रही थीं जो कभी रास्ते खाली करवाने का दावा कर रहे थें। चौधरी साहब हैं जो कह रहे थे यह सब बलात्कारी हैं जो तुम्हारे घरों मे घुस जाएगें। एक (अनुराग) ठाकुर साहब हैं उन्होंने तो शुटिंग के ऑर्डर भी जारी कर दिए थें। मंत्री के मुँह से निकला वह आदेश होता हैं।

एक साहब और भी हैं जो 15 करोड का दम भर रहे थे वहां खडे खडे। 14 करोड और 85 करोड कह रहे थें। एक साहब हैं जो कई साल जिनका वीडिओ चलता हैं, वह पंधरा मिनिट की धमकी देते हैं। वह चाहे गोली चलाने वाले ठाकुर साहब हो, चाहे रास्ता खाली कराने वाले मिश्रा जी हो और चाहे वह 15 करोड वाले पठान साहब हो या 15 मिनट वाले छोटे भाईजान हो मैं यह कहना चाहता हूँ माननीय उपसभा अध्यक्षजी यह सब कुछ भी नही हैं यह सब खिलौंने हैं और मा. गृह मंत्रीजी जितनी चाबी आप इन खिलौंने मे भरते हो यह इतनी दूर तक जाते हैं जिनका अपने आप मे कोई क्लू नही।  

आखीर में मैं दिल्ली के सभी हिन्दुओ से, सभी मुसलमानों से, सभी सिख्खो सें, सभी इसाईओं से लोगो से, सभी धर्मो के लोगो से अपनी पार्टी के तरफ से यह अपील करते हुए दिल्ली के सांम्प्रदायिक सौहार्द को बनाए रखे।

माननीय गृहमंत्री आप की बात पर कहना चाहूंगा, कल आप ने कहां आप ने ट्रम्प के साथ नाश्ता छोड दिया, ट्रम्प के साथ लंच छोड दिया, ट्रम्प के साथ डिनर नही किया। आपने इतना सब कुछ छोड दिया हैं, अगर दंगों कि जिम्मेदारी लेते हुए यह गृहंमत्री के इस पद छोड देते तो देश के साथ बहुत बडा न्याय होता।

*जावेद अली खान का पुरा भाषण आप यहां देख सकते हैं।

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author

टीम डेक्कन

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