हजरत बन्दा नवाज - समतावादी सूफी ख़लिफा

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गुलबर्गा स्थित बन्दा नवाज कि दरगाह


सूफी आंदोलन इस्लामी मानवतावादी तत्वज्ञान कि मूल प्रेरणाओंपर आधारित था। सूफीयों के चिश्ती सिलसीले नेॆ एकेश्वरत्व, इन्सानी जिन्दगी में समता, गरीबों कि आर्थिक उन्नती को अपने आंदोलन का उद्देश्य माना। हजरत बन्दा नवाज गेसू दराज को दकन में चिश्ती आंदोलन के प्रमुख नेताओं के रुप में याद किया जाता है। आध्यात्मिक आंदोलन के साथ हजरतने 100 से ज्यादा किताबें लिखी हैं। दकनी साहित्य के विकास में उनकी भूमिका अहम है। उनकी कविताओं को दकनी साहित्य में काफी महत्त्व दिया जाता है।

त्तर की तुलना में सरजमीने दखन में सूफी आंदोलन की सरगर्मीयां अधिक रही। सूफी आंदोलन ने यहां नए आयाम स्थापित किए। विशेषतः हिंदू निचली जातीयों में इस्लाम के प्रसार में उनकी अहम भूमिका रही। रिचर्ड इटन जो दखनी सूफी आंदोलन के महान अभ्यासक हैं, उनका मानना है की, ‘‘सूफीयों के अलावा दखन कि निचली जातीयों में इस्लाम का फैलाव मुमकीन था। सूफीयों ने विषमता के अहसास को जिंदा कर निचली जातीयों में समता कि अपेक्षा पैदा की।’’

सूफीयों ने दकन कि संस्कृति को अपने आंदोलन का माध्यम माना। दखनी बोली का अपने चिंतन को प्रस्तुत करने लिए सूफी औलियाओं ने खूब इस्तमाल किया। यहां आए सेकडो सूफी औलियाओं ने दकनी में काव्यरचनाएं की। बडे दुख कि बात है की, हजरत बंदा नवाज गेसू दराज और ख्वाजा अमीनुद्दीन की चंद कविताओं के अलावा अब यह साहित्य उपलब्ध नही है। सूफी संतो के सांस्कृतिक योगदान की यह घोर विडंबनाही है की हमने उनके इतिहास स्त्रोत हम लोगों ने वक्त के साथ पिछे छोड दिए

इसी वजह से बंदा नवाज जो दकन की सूफी तहरीक के मुख्य आधार माने जाते हैं, का इतिहास दुर्लक्षित रहा। स्कुट कुगल और सुलैमान सिद्दीकी के कुछ अंग्रेजी लेख और मौलाना . गफूर कुरैशी का सूफी मलफुजात पर किया गया कार्य बंदा नवाज का इतिहास जानने के लिए आज मददगार साबित हो रहा है।

हजरत पहली बार दकन में अपने पिता के साथ मुहंमद तुघलक के आदेश से आये थे। उस वक्त वे एक बालक थे, सो उस इतिहास को सूफी तहरीक के इतिहास में दुर्लक्षित किया गया है। दुसरी बार हजरत सन १३९८ में ८० साल की उम्र में दकन पहुंचे। बंदा नवाज नसिरुद्दीन चराग दहेलवी के प्रमुख शिष्यों मे से थे। उनकी शिक्षा भी हजरत नसिरुद्दीन चराग के मार्गदर्शन में ही मुकम्मल हुई थी

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सुलतानों के साथ रिश्ते

मध्यकाल के बहोत कम सूफी ऐसे हैं, जिनके सुलतानों के साथ अच्छे रिश्ते रहे। सुलतान अपनी राजनीति के लिए हमेशा धर्म को माध्यम समझते रहे हैं। बादशाहों, सुलतानों कि इसी नितीका सूफीयों की तहरीकने जमकर विरोध किया। उसी वजह से निजामुद्दीन औलीया को मुहंमद तुघलक ने दिल्ली छोडने का हुक्म दिया था। और राजनिती से जुडे रहने कि वजह से अपने सबसे प्रिय शिष्य अमीर खुसरो को निजामुद्दीन औलीयाने अपनी खिलाफत नहीं सौपी थी।

जहां निजामुद्दीन औलीया के साथ मुहंमद तुघलक का टकराव हुआ वहीं उसके भतीजे फेरोज तुघलक से निजामुद्दीन औलिया के शिष्य बंदा नवाज गेसू दराज का भी रिश्ता कुछ ऐसा ही रहा। सय्यद सबाहुद्दीन उत्तर के सूफी आंदोलन के अभ्यासक हैं वे लिखते हैं, ‘‘कुछ लोगों ने सुलतान फेरोजशाह तुघलक को यह खबर पहुंचाई कि, बंदा नवाज की मजलिस समामें मुरीदीन अपना सर जमीं पर रखा करते हैं और बडा शोर मचाते हैं।

सुलतान ने यह सुनकर बंदा नवाज को कहलवा भेजा के अपनी मजलिस समा खिलवत’ (अकेले में) किया करे। इसके बाद से गेसूदराज अपने हिजरे में यह महफील आयोजित करने लगे।  खानकाह में  बीच में एक पर्दा डाला जाता था, एक तरफ गेसू दराज होते और दूसरी तरफ उनके मुरीद बैठते थे। जब गेसू दराज पर जोश जारी होता तो उनके मुरीद हुजरे (आश्रम) का दरवाजा बंद कर देते थे।’’

जब बंदा नवाज दूसरी बार दकन आए उस वक्त भी उनका बहमनी सुलतान से संघर्ष हुआ। शुरुआत में उनका फेरोजशाह बहमनी ने गुलबर्गा में स्वागत किया, उन्हे कुछ तोहफे भी दिए। मगर जब फेरोजशाह अवाम की परेशानीयों को ना समझते हुए कर वसुलने लगा तो गेसू दराज ने उसका जमकर विरोध किया। विरोध के लिए कुछ सभाएं भी उन्होने ली। उन्होने फेरोजशाह का विरोध करते हुए कहा, ‘‘ जालिम बादशाह का विरोध करना पवित्र युद्ध (जिहाद) में भाग लेने समान पुण्यकर्म है।’’

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बंदा नवाज का साहित्य

बंदा नवाज गेसू दराज जब उत्तर भारत में थे तो उन्होने फारसी भाषा में कई किताबें लिखी। जब वे दकन पहुंचे तो उन्होने दकनी भाषा में किताबें लिखी। उन्होने दकनी भाषा में कई कविताएं भी लिखी हैं। दखनी साहित्य के अभ्यासक डॉ. मोहियोद्दीन कादरी जोर ने उनकी कुछ दकनी कविताओं का उल्लेख अपनी किताबों में किया है। उनमें से एक कविता

‘‘खडे खडे पियो, जियो में अफसीं आप दिखावे

ऐसे मिठे माशुक कुं कवी क्युं देख पावे

जिन्हे देखे इसे कोई भावे’’

इसी तरह उनकी एक अन्य कविता है

‘‘कलसे मुहीत है इसे कौन पछाने

जो कोई आशिक इस पिउ के इस जियो में जाने

इसे देख गुम रहे जैसे हैं दिवाने’’

एक अन्य कविता में उन्होने अपने गुरु नसिरुद्दीन का जिक्र किया है

‘‘ख्वाजा नसिरुद्दीन जिन्हे साईयां पिओ बनाए

जियो का घुंघट खोलकर पिया मुख आप दिखाए

राखे सय्यद  मोहम्मद हुसैनी पियो संग कईया जाए’’

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बंदा नवाज कि दकनी कविताओं का संकलन अबतक नही हो पाया। मगर उनकी किताबों के बारे में कुछ शोधकर्ताओं ने उल्लेखनिय कार्य किया है। सय्यद सबाउद्दीन और मौलाना अब्दुल गफूर ने उनके मलफुजात पर किया हुआ शोधकार्य सरहानीय है। बंदा नवाज ने कुरआन पर भाष्य भी लिखा है। भारत में लिखी गयी यह सबसे पुरानी तफ्सीर (कुरआन भाष्य) है।

इसके अलावा हदिस के मशहूर ग्रंथमशारीकुल अन्वारका विश्लेषण भी बंदा नवाज ने लिखा है। साथ ही इसी किताब का उन्होंने फारसी भाषा में स्वतंत्ररुप से अनुवाद भी किया था। उनका मुरीदों के आचरण तत्वों पर आधारीतआदाबुल मुरीदीनग्रंथ भी विख्यात है।

इसके अलावा इमाम अबुल कासीम कि पुस्तिका रिसाला तशीरीयाका फारसी अनुवाद, शरीयत, तरीकत और हकीकत पर चर्चा करनेवाली किताबरिसाला इस्तखामत शरीअत तरिकत हकीकतइस किताब का जिक्र इंडिया ऑफीस लायब्ररी के मख्तुतात कि सूची में भी किया गया है। बंदा नवाज ने १०० से ज्यादा ग्रंथ लिखे थे। कई इतिहासकारोंने उनके ग्रंथो कि संख्या इससे भी अधिक बतायी है।

मगर इस संदर्भ विश्वसनीय स्त्रोत उपलब्ध होने की वजह से सिर्फ अनुमान लगवाया जा सकता है। अब जिन ग्रंथो कि उपलब्धी हुई उसकी संख्या लगभग ३० के करीब है। उनके मलफुजात के जरिए तत्कालीन भारत की सामाजिक एवं राजकीय स्थिती, तथा निचली जातीयों के हालात, भारत कि धर्मव्यवस्था की जानकारी मिलती है।

सूफी संतो में हजरत बंदा नवाज गेसू दराज ही एकमात्र संत जिन्होने १०० ज्यादा ग्रंथ लिखे हुए है। दकनी समाजजीवन  पर आज भी उनके कार्य के परिणाम देखे जा सकते हैं। गुलबर्गा में स्थित उनकी दर्गाह हिंदू-मुस्लिम भक्तों के आस्था का केंद्र है।

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सरफराज अहमद

लेखक युवा इतिहासकार तथा अभ्यासक हैं। मराठी, हिंदी तथा उर्दू में वे लिखते हैं। मध्यकाल के इतिहास में उनकी काफी रुची हैं। दक्षिण के इतिहास के अधिकारिक अभ्यासक माने जाते हैं। वे गाजियोद्दीन रिसर्स सेंटर से जुडे हैं। उनकी मध्ययुगीन मुस्लिम विद्वान, सल्तनत ए खुदादाद, असा होता टिपू सुलतान, आसिफजाही इत्यादी कुल 8 किताबे प्रकाशित हैं।