इस्लाम अंग दान के बारे मे क्या कहता हैं?

इस्लाम अंग दान के बारे मे क्या कहता हैं?
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तुर्कस्थान के इस्तांबुल स्थित एक मस्जिद का विहंगम दृष्य


2018 में कानपूर के किसी इस्लामी संस्था ने एक आदेश जारी कर अंगदान को नाजायज और गुनाह ठहराया था। जिसके बाद अंग दान को लेकर भारत के मुसलमानों और इस्लामिक विचारको में तिखी बहस चलते आयी हैं। प्रसिद्ध इस्लामिक स्कॉलर जावेद अहमद गामेधी ने एक बार कही कहां था, अंग दान को लेकर मुसलमानों का नजरिया बना हैं कि वह इसे लेना जाईज समझते हैं बल्कि देना नाजाईज। इस बारे में वह आगे कहते हैं, यह बात सरासर गलत हैं। अगर आप किसी की जान बचाने का सबब बन सकते हैं तो आप बेशक अपना अंग दान कर सकते हैं। और यह जिते जी भी और मरने का बाद भी कर सकते हैं। इसी गंभीर विषय पर चर्चा करता मौलाना वहिदुद्दीन खान का यह आलेख ऩ्यूज एज ऑफ इस्लाम के सहयोग से दे रहे है। 

अंग दान क्या है? अंग दान (Organ donation) किसी ज़िंदा या मुर्दा शख्स का किसी ऐसे जीवित शख्स को कोई जैविक कोशिका या कोई इंसानी अंग दान में देना है जिसे ट्रांसप्लांट (Transplant) की आवश्यकता होl विशेषज्ञ का कहना है कि एक दान करने वाले के अंग कम से कम पचास लोगों की जान बचा सकते हैं या उनकी सहायता कर सकते हैंl अधिकतर अंग या कोशिकाएं दान करने वाले के मरने के बाद दान किए जाते हैंl लेकिन कुछ अंग और कोशिकाएं ऐसे भी हैं जिन्हें दान करने वाला अपनी ज़िन्दगी में ही दान कर सकता है और इसमें दान कर्ता का कोई नुक्सान भी नहीं हैl हर आयु और हर पृष्ठभूमि के लोग अंग दान कर सकते हैंl

अंगों का दान आधुनिक सर्जरी का एक बड़ा उपहार हैl पिछले ज़माने में इस प्रकार का दान बिलकुल असंभव थाl अंगों का दान सभी धर्मों सहित इस्लाम में भी जायज हैl अधिक यह कि इस काम में बड़ा अज्र (इनाम) भी हैl एक मानव निर्मित ट्रांस्पलांट प्राकृतिक आर्गन ट्रांसप्लांट का विकल्प कभी नहीं हो सकताl

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इस्लाम के अनुसार अंग दान सदका ए जारियाहैl जैसे कि अगर किसी की आँख उसकी मौत के बाद किसी अंधे को लगा दी जाती है और वह इससे देखने के काबिल हो जाता है तो यह सदका ए जारिया है, इसलिए कि उसकी मौत के बाद भी उसके इस दान से कोई दुसरा शख्स लाभ उठा रहा हैl

अंग दान दूसरों के साथ सहानुभूति के इज़हार का एक अनोखा अंदाज़ हैंl इस अर्थ में इससे समाज के अंदर एक महान मानवीय मूल्यों को बढ़ावा मिलता हैंl इससे दूसरों के लिए मुहब्बत व हमदर्दी के जज़्बे के साथ जीने की अहमियत उजागर होती हैंl और इसका अर्थ यह है कि एक इंसान अपनी मौत के बाद भी किसी दुसरे इंसान की सेवा करने का जज़्बा रखता हैंl अंग दान में दान कर्ता का कोई नुकसान नहीं होता, जबकि वह दूसरों को कोई ऐसी चीज प्रदान कर जाता है जो कि हीरे और जवाहरात से भी अधिक मूल्यवान हैंl

एक कहावत है कि: जीवन का कद अवधि से नहीं बल्कि दान से नापा जाता हैl” इस कहावत का संबंध अंग दान से हैl

आर्गन डोनेशन केवल एक दान ही नहीं बल्कि यह एक प्रकार की भागीदारी भी हैl इंसान का हर अंग एक प्राकृतिक उपहार है, जब कोई इंसान अपना कोई अंग किसी दुसरे को दान करता है तो वह दूसरों से भी इस उपहार में साझेदारी की आशा रखता हैl अंग दान एक प्रकार का पवित्र दान हैl कोई भी किसी अंग को नहीं बना सकता ना तो दान करने वाला और ना ही इस दान को प्राप्त करने वालाl लेकिन जब वह अपना कोई अंग किसी को दान करता है तो एक ऐसा काम करता है जो केवल अल्लाह ही कर सकता हैl यह दान कर्ता का क्या ही बड़ा उपहार हैl

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कुरआन के अनुसार इस प्रकार का काम एक बहुत अच्छा काम है जिसकी अहमियत देर तक कायम रहती है (18:46)l कुरआन की यह शिक्षा विस्तृत अर्थ में अंग दान (Organ donation) के काम पर भी सेट होती हैl असल में अंग दान केवल एक नैतिक कर्म ही नहीं अपितु एक ऐसा काम है जिसे स्वयं खुदा की रज़ा हासिल हैl

कुछ लोग कहते हैं कि अगर डोनेशन मुसला(Muthla) की तरह है, और मुसला (हाथ, पैर आदि अंगों को काट देना) इस्लाम में गुनाह हैl लेकिन यह तुलना बिलकुल गलत हैl इसलिए कि मुसलाके पीछे हमेशा बद नीयती और अपमानित करने का जज़्बा होता हैl जबकि अंग दान पुर्णतः नेक नीयती पर आधारित एक काम हैl इस काम को दुसरे इंसानों के लिए नेक इच्छाओं के साथ अंजाम दिया जाता हैl इसलिए मुसला और अंग दान के बीच कोई समानता नहीं हैl

(मूल अंग्रेजी लेख आप यहां पढ सकते हैं)

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मौलाना वहीदुद्दीन खान

एक विख्यात इस्लामिक विद्वान और शांति कार्यकर्ता है। इन्होंने कुरआन को सरल और समकालीन अंग्रेजी में अनुवाद किया है। उन्होंने सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव के संरक्षण में डेमिर्गुस पीस इंटरनेशनल अवॉर्ड प्राप्त किया है। वे टीवी फेसबुक और यूट्यूब आदि पर व्याख्यान देते रहते हैं।