मुघल इतिहास में अनारकली का इतिहास क्या हैं?

मुघल इतिहास में अनारकली का इतिहास क्या हैं?
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के. आसिफ निर्मित ‘मुगल ए आजम’ फिल्म का एक दृष्य


मुघल बादशाह अकबर के पुत्र सलीम और हरम की दासी अनारकली की प्रेम कहानी का इतिहास में भले ही कोई उल्लेख न मिलता हो, लेकिन किंवदंतियों और किस्से-कहानियों ने दोनों को महान प्रेमी के रूप में स्थापित किया है। सलीम-अनारकली के कथित प्रेम संबंधों पर अनेक कहानियाँ, उपन्यास, नाटक, शेर-शायरी और कविताओं की रचना हो चुकी है, हिन्दी सिनेमा ने इस हृदयस्पर्शी लोकप्रिय प्रेमगाथा को भुनाने के लिए तीन-चार फिल्में बनाई और वे सभी सफल रही। के. आसिफ द्वारा निर्मित भव्य हिन्दी फिल्म  मुगल-ए-आजमज भी अपना आकर्षण बनाए हए हैं।

मूलतः ब्लैक अँड व्हाइट में बनी यह भव्य ऐतिहासिक फिल्म रंगीन फिल्म में तब्दील की गई हैं। उम्मीद के मुताबिक इस फिल्म ने एक बार फिर लोकप्रियता के नए कीर्तिमान स्थापित किए। साहित्य, कला और फिल्म उद्योग के लिए अनारकली की प्रेम कहानी एक चिरकालिक बिकाऊ विषय है, लेकिन इतिहास में अनारकली की वास्तविकता और सलीम के साथ उसके प्रेम संबंधों का कोई महत्व नहीं है।

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इतना जरुर है कि लाहौर में एक मकबरे में कब्र के पास यह शिलालेख आज भी देखा जा सकता है। जिसमें फारसी में लिखा है -

यदि मैं एक बार अपनी प्रेयसी के हसीन चेहरे को फिर देख सकूँ,

तो मैं ता-कयामत अल्लाह का आभारी रहूँगा।

इस काव्यमय कथन के नीचे लिखा है, मजनू सलीम अकबर। लाहौर के इस मकबरे और उसमें जड़ित इस शिलालेख को देखने के बाद आज भी लोग मानते है कि यह अनारकली का मकबरा है, जिसे सलीम ने उसकी याद में बनवाया था। इसी मकबरे के अगल-बगल में कुछ दूरी पर बादशाह जहाँगीर और बेगम नूरजहाँ के मकबरे है। जनता इसे अनारकली के मकबरे के नाम से ही पहचानती है, यह भी कहा जाता है कि शाहजहाँ के बादशाह बनने के बाद नूरजहाँ ने लाहौर में निर्वासित जीवन बिताते हुए सन 1627 में अपने पति जहाँगीर का मकबरा बनवाने के साथ-साथ अनारकली की कब्र पर भी भव्य मकबरा बनवाया था।

बादशाह अकबर ने पुत्र प्राप्ति के लिए संत शेख सलीम चिश्ती की आराधना की थी। उनकी प्रेरणा से अकबर ने अजमेर में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती की मजार तक नंगे पाँव पैदल यात्रा की थी। बाद में अकबर की राजपूत बेगम हरखाबाई उर्फ जोधाबाई से 30 अगस्त 1569 को अकबर को एक पुत्र की प्राप्ति हुई। अकबर ने शेख चिश्ती का आशीर्वाद समझकर पुत्र का नाम सलीम रखा और वह प्यार से उसे ‘शेखू बाबू’ कहने लगा।

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सलीम के बाद अकबर के दो और पुत्र हुए। मुराद और दानियाल। लेकिन युवावस्था में ही दोनों की मृत्यु हो गई। अतः साम्राज्य के वारिस के रूप में सलीम का प्रतिद्वंद्वी नहीं बचा था, बौद्धिक, शारीरिक, सैनिक शिक्षा, राजनीति, कूटनीति और ललित कलाओं की व्यवहारिक शिक्षा प्राप्त करने पर भी सलीम बादशाह का लाडला होने से व्यसनी विलासी और आरामतलब हो गया। अकबर ने सलीम को एक योग्य बादशाह बनाने के लिए हर प्रकार का प्रशिक्षण और कठोर संघर्ष सहने के अवसर दिए, फिर भी विलासप्रिय सलीम की रूचि शराब और सुंदरियों में बनी रही।

अकबर ने 1585 में राजा भगवंत दास की पुत्री मानबाई के साथ सलीम का धूमधाम से विवाह किया। लेकिन यह विवाह केवल राजनीतिक संबंधों को मजबूत करने वाला साबित हुआ। मानबाई से सलीम को एक पुत्री सुल्ताउन्निसा और एक पत्र खुसरो का पिता बनने का सौभाग्य मिला, लेकिन सन 1604 में सलीम की उपेक्षा से दुखी मानबाई ने आत्महत्या कर ली।

इसके बाद जोधपुर के राजा उदयसिंह की पुत्री जगत गुसाई से उसका विवाह हुआ। बाद में सलीम ने कई और विवाह किए। पादरी जेवियर के अनुसार सलीम की विवाहित पत्नियों की संख्या 20 से कम नहीं थी। मुख्य बेगमों के अलावा उसके हरम में 300 उप पत्नियाँ और असंख्य दासीयाँ थी। इस इतिहास प्रमाणित वर्णन से स्पष्ट है कि सलीम भोग विलास में गहरी रूचि रखता था।

मानबाई से विवाह के बाद 1589 में सलीम अपने पिता अकबर के साथ लाहौर गया था अकबर चाहता था कि सलीम लाहौर का सूबेदार बनकर राज-काज संचालन और सैनिक अभियानों का स्वतंत्र संचालन करने का अनुभव प्राप्त करे। लेकिन 20 वर्षीय युवा सलीम की रूचि भोग-विलास और ललित कलाओं में ज्यादा थी। लाहौर में बादशाह अकबर के निजी सेवा में असंख्य स्त्री-पुरुष सेवक थे। इन्हीं में से एक सुंदर इरानी युवती नादिरा बेगम भी थी।

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उसके अनुपम सौंदर्य और रूप की प्रशंसा करते हुए अकबर ने उसे अनारकली का खिताब देकर सम्मानित किया था। लेकिन अनारकली, नृत्य-संगीत में माहिर थी, इसका कोई उल्लेख समकालीन इतिहास में नहीं मिलता है। कहते है कि एक दिन जब अकबर अपने निजी कक्ष में आईने के सामने सज धज रहा था, तभी उसे दिखाई दिया कि बरामदे में खड़ा सलीम रूपसी दासी अनारकली को अपलक निहार रहा था। सलीम ने अनारकली को इशारे से पास बुलाया और उसका परिचय प्राप्त किया।

आईने में यह सब देखकर अकबर को बुरा लगा कि उसका शहजादा एक साधारण-सी दासी में रूचि लेता है, उसे यह अच्छा नहीं लगा। अकबर अपने शराबी और विलासी पुत्र के चरित्र को समझता था, इसलिए उसने अनारकली को सलीम की नजरों से दूर करने के लिए हरम में अपनी बेगमों की सेवा में भेज दिया। इससे ज्यादा इतिहास में वर्णन नहीं हैं। 

है लेकिन किंवदंतियों और प्रचलित लोकप्रिय कहानियों में बताया जाता है कि सलीम अनारकली से बेहद प्रेम करते हए उसका दीवाना हो गया। शहजादे की गरिमा और मर्यादा को भूल सलीम दासी अनारकली के कदमों में लौटने लगा। अनारकली के सहारे इरानी गुट मुगल शहजादे को अपने कब्जे में लेने की कूटनीति का खेल खेलने लगे।

अकबर सलीम पर नजर रखे हुए था। एक दिन अकबर ने अपने सेनापति मानसिंह के साथ मंत्रणा कर सलीम को राजपूताना भेज दिया। सलीम की अनुपस्थिति में अकबर ने अनारकली को लाहौर किले से अज्ञात स्थान पर भेज दिया। लेकिन प्रचलित कहानी यही है कि अकबर ने अनारकली को किले की एक दीवार में जिंदा दफन कर इस प्रेमकथा को समाप्त कर दिया।

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सलीम के विद्रोह के बारे में ऐतिहासिक उल्लेख यही है कि 1590 से सलीम ने राज सिंहासन पाने के लिए जल्दबाजी दिखाई थी। इतिहासकार बदायूँनी ने मन्तखव-उत-तवारीख (अंग्रेजी अनुवाद, पृष्ठ 390) में लिखा है कि सम्राट बनने की तीव्र लालसा और आतुरता ही सलीम के विद्रोह का प्रमुख कारण थी।

उसने अकबर का अंत कर राज्य प्राप्त करने का प्रयास किया और अकबर को विष दे दिया। इससे वह बीमार पड़ गया, लेकिन बच गया। लेकिन दसरे इतिहासकार इसे सच नहीं मानते है। इतना जरूर है कि 1590 से 1597 की अवधि में सलीम ने अकबर की इच्छाओं और आदेशों की लगातार अवहेलना की। अकबर अपने पत्र के दुर्व्यवहार और अभद्रता से भी दुखी रहा।

सन 1601 में सलीम ने इलाहाबाद में स्वयं को स्वतंत्र शासक घोषित कर दिया। अकबर को चिढ़ाने के लिए उसने 1602 में प्रिय मंत्री अबुल फजल की हत्या करवा दी। अकबर अपने पुत्र के कृत्यों से इतना दुखी हो गया कि उसने सलीम को उत्तराधिकार से वंचित करते हुए उसके पुत्र खुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाने का निश्चय किया।

लेकिन एकमात्र पुत्र होने के कारण अकबर सलीम के मोह में बंधा रहा। अकबर की माता और हरम की महिलाओं के समझाने पर बादशाह ने सलीम को आगरा आने की अनुमति दे दी। सन 1604 में अकबर की पत्नी बेगम सुल्ताना सलीमा स्वयं इलाहाबाद गई और सलीम को साथ आगरा लाई। उन्होंने ही पिता-पुत्र में समझौता कराया।

सन 1605 में अकबर बीमार रहने लगा। हकीमों के इलाज से उसे कोई फायदा नहीं हुआ तो उसने जीवन की आशा छोड़ दी। बीमार अकबर की लाचार हालत में सेनापति मानसिंह और खान-ए-आजम मिर्जा कोका ने खुसरो को गद्दी पर बैठाने का निश्चय किया। उन्होंने सलीम को बंदी बनाने का षड्यंत्र भी रचा। लेकिन दरबार के ज्यादातर सरदार सलीम के पक्ष में बने रहे।

सलीम को अकबर की गंभीर बीमार हालत की सूचना मिली तो वह आगरा आया। दो-तीन दिनों तक वह लगातार अपने बीमार पिता से मिलता रहा। अकबर के अंतिम दिन सलीम उससे मिलने गया तो अकबर के आदेश पर सलीम को शाही ताज पहनाया गया और उसकी कमर में बादशाह हुमायून की कटार बांध दी गई। सलीम ने अपने पिता और बादशाह को प्रणाम कर अभिवादन किया। इसी क्षण अकबर ने आँख खोली और आशीर्वाद देने के लिए हाथ उठाया कि उसके प्राणांत हो गए।

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अकबर की मृत्यु का शोक मनाने के एक सप्ताह पश्चात 24 अक्तूबर 1605 को आगरा किले में 36 वर्ष की आय में सलीम सिंहासन पर बैठा। उसने अपना नाम जहाँगीर रखा, जहाँगीर और नरजहाँ के प्रेम संबंध भी इतिहास की अमर दास्तां है। इतिहास में दर्ज है कि इरानी अमीर मिर्जा गयास बेग की पुत्री मेहरूनिसा (नूरजहाँ) से 1599 में सलीम की मुलाकात हुई थी।

तब मेहरून्निसा की आयु 22 वर्ष थी, और योग्य वर न मिल पाने के कारण उसका विवाह नहीं हुआ था। बाद में उसका विवाह उसी वर्ष शेर अफगन से हो गया। लेकिन सलीम नूरजहाँ को नहीं भुला पाया। बादशाह बनते ही उसने षड्यंत्रपूर्वक बर्दबान (बंगाल) में शेर अफगन की हत्या करा दी और मेहरून्निसा को आगरा बुला लिया।

चार वर्ष बाद उसने विधवा मेहरून्निसा से विवाह रचाया और उसे नूरजहाँ का नाम और खिताब दिया। नूरजहाँ के प्रेम में आसक्त जहाँगीर ने राज-काज उसी के हाथों में सौंप दिया। प्रेम अनुरागी जहाँगीर के प्रति नूरजहाँ भी पूरी तरह समर्पित रही।

जहाँगीर की मृत्यु के बाद वह लाहौर चली गई और वहाँ उसने जहाँगीर का शानदार मकबरा बनाने के साथ अपने लिए भी मकबरा तैयार कराया। जब उसे अनारकली की कब्र का पता चला, तो उसने उसके लिए भी मकबरा तैयार कराया, यदि नूरजहाँ लाहौर में अनारकली का मकबरा नहीं बनवाती, तो भी सलीम अनारकली की प्रेम गाथा श्रृति-स्मृति परंपरा से जीवित रही है और अनंतकाल तक जीवित रहेगी।

(विनय दीक्षित का लिखा यह लेख लोकमत समाचार के सौजन्य से लिया हैं)

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author

टीम डेक्कन

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