कुतुबशाही के तीन कवि जिन्होंने दकनी को दिलाया बडा स्थान

कुतुबशाही के तीन कवि जिन्होंने दकनी को दिलाया बडा स्थान
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कुतुबशाही राजवंश के कुली कुतुबशाह ने चारमिनार को 1591 में बनवाया था


कुली कुतबशाह कला और साहित्य का बडा भोक्ता था। वह खुद एक अच्छा कवि था। जिसने कई बेहतरीन रचनाएं कि हैं। उसके बारे में कहा जाता हैं कि उसने शायरी और कविताओं को फारसी के चंगुल से छुडाया हैं और दकनी और उर्दू को शायरी कि जुबान बनाया

जिसके बाद शायरी उच्चकुलीन वर्ग से निकलकर आम लोगों के बीच आ गई समाज के अनेक अंगो को साहित्य तथा कविताओं में आने से समाज का अलग चरित्र प्रस्थापित हुआ बाद कुली कुतुबशाह के दरबार में अच्छे अच्छे साहित्यिक और कविओं कि भरमार रही। 

आज हम कुतुबशाही दरबार के तीन प्रतिष्ठित कविओं के बारे में जानने कि कोशिश करेंगे जिसमें वजही, गौव्वासी और इब्ने निशाती प्रमुख हैं। 

वजही

कन के मुहंमद कुली कुतुबशाह के राज्यकाल में वजहीनाम का अत्यंत प्रतिष्ठित कवि हुआ हैं। कहा जाता हैं कि उसने सुलतान की युवावस्था प्रेम-कहानी कुतुब-मुशतरी नाम से लिखी और बादशाह ने बड़ी उदारता से उसे अपने युग का सबसे बड़ा कवि कहकर अपना मित्र बनाया।

कुतुब-मुशतरीएक बड़ी मनोरंजक मसनवी हैं, जिसका नायक कुली कुतुबशाह हैं। शृंगार-रस में डुबी हुई यह प्रेम-गाथा वजहीकी कल्पनात्मक रचना हैं।

यह कहना गलत होगा कि इसकी सारी कहानी बादशाह के जीवन से ली गयी हैं, परंतु इसमे संदेह नहीं किया जा सकता कि वजहीने अपनी काल्पनिक कहानी की आड़ में बादशाह की वीरता, उदारता, दानशीलता और प्रेम-भावना का चित्र खींचने कि कोशिश की हैं।

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दक्षिण की उत्कृष्ट काव्य-कृतियों में कुतुब-मुशतरी एक ऊंचा स्थान हैं। यह कहानी दकन और बंगाल के बीच में घूमती हैं और उस समय कि कथाओं की तरह असंभव बातों से भरी हुई हैं।

उसकी भाषा बहुत सुगम नहीं कही जा सकती, उसमें जहाँ फारसी-अरबी के शब्द हैं वहीं संस्कृत के तत्सम और तद्भव शब्दों की भी कमी नहीं हैं। केवल यही नहीं, वजही ने भाषा के संबंध में बड़ी आजादी से काम लेकर फारसी, अरबी और संस्कृत शब्दों का उर्दू व्याकरण के नियमानुसार प्रयोग किया हैं।

कुतुब-मुशतरी के इन लाईनों में लेखक का विचार हैं कि यदि उसे सिर्फ भाषा की दृष्टि से पढ़ा जाये त भी बहुत फायदा होगा। उदाहरण के लिए यह शेर देखिए -

छिपी रात उजाला हुआ दीस का।

लगा जग करन सेव परमेस का।।

जो आया झलकता सुरज दाट कर।

अँधेरा जो था सो गया न्हाट कर।।

सुरज यूँ हैं रंग आसमानी मने।

कि खिल्या कमल फूल पानी मने।

वजहीने गद्य में भी सबरसके नाम से एक उत्कृष्ट पुस्तक लिखी हैं। इस तसव्वुफ़ के अभिप्राय गर्भित विचार भी प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत किये गये हैं। सारांश यह कि वजहीउस युग का सबसे बड़ा कवि और लेखक माना जाता हैं।

उसे गद्य और पद्य दोनों पर पूर्णतः अधिकार प्राप्त था। वजही जिंदगी के बारे में अभी तक अधिक कुछ पता नहीं हो सका हैं, परंतु यह मालूम होता हैं कि कुतुब-मुश्तरी’ 1608 ईसवी में और सबरस’ 1635 ईसवी में लिखी गई।

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गौव्वासी

इस युग का दूसरा बड़ा कवि गौव्वासीथा। कुतुबशाही राज्य न मलिकुश्शोअरा (कविराय) बना दिया था, परंतु उसके हालात का ठीक से पता न चलता।

उसकी प्रसिद्ध रचनाएँ सैफुल-मुलूको-बदीउल-जमालऔर तूतीनामा दोनों में कहीं-कहीं उसने अपने संबंध में भी थोड़ा-बहुत लिखा हैं, परंतु उसके जीवन की पूरी कहानी बयाँ नही होती।

उससे बस इतना पता चलता हैं कि गौव्वासी शुरुआत में बड़ी कठिनाई से जीवन व्यतीत करता था। वह जब राज-दरबार में पहुँच गया, तो उसकी मान-प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गयी और वह अपने युग का सबसे बड़ा कवि माना जाने लगा।

1624 ईसवी में सैफुलमुलूकलिखी गयी और तूतीनामा’ 1631 ईसवी में। पहली मसनवी एक प्रेम-कहानी हैं, जो अलिफ लैलासे ली गयी हैं और दूसरी रचना हितोपदेशके एक फ़ारसी अनुवाद पर आधारित हैं।

गौव्वासीअपनी कविताओं में अपना बखान आप करता हैं, मगर उसका यह बखान कुछ अनुचित नहीं हैं, क्योंकि वास्तव में उसकी कविताएँ रस और भावुकता, सुंदरता और मज़े से भरी हुई हैं। उसकी भाषा में फ़ारसी-अरबी के शब्द कम मिलते हैं। उसकी शैली में सरलता और प्रवाह बहुत हैं। सैफुलमुलूक हिंदी और उर्दू दोनों लिपियों में प्रकाशित हो चुकी हैं।

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इब्ने-निशाती

कुतुबशाही युग का तीसरा बड़ा कवि इब्ने-निशातीथा, उसकी प्रसिद्ध मसनवी फूलबनहैं जो दकनी-उर्दू के साहित्य कोश का एक अनमोल रत्न समझी जाती हैं।

इब्ने-निशातीकी जीवन-गाथा भी भलीभाँति मालूम नहीं हैं। कुछ पुराने लेखकों ने, जिनमें गासा-द-तासीका नाम भी लिया जा सकता हैं; लिखा हैं कि उसने भी तूतीनामाके नाम से एक काव्य लिखा हैं, परंतु यह उनकी भूल हैं।

इसी प्रकार फूलबनके संबंध में भी कुछ ऐसी ही बातें कही गयी हैं, जो ठीक नहीं हैं। अब फूलबनप्रकाशित हो चुकी हैं और उसके अध्ययन से ठीक जानकारी प्राप्त की जा सकती हैं। इस बात से यह स्पष्ट होता हैं कि इने-निशातीफ़ारसी भाषा में निपुण और काव्य शास्त्र से अच्छे से परिचित था।

वह फूलबनके शुरुआती भाग में अपनी और अपनी कविता की सराहना करता हैं और कहता हैं कि उसने गद्य में भी कई रचनाएँ की हैं। अब उनमें से कोई भी उपलब्ध नहीं हैं।

उसे भाषा और शब्दों के प्रयोग पर पूरा अधिकार था। वह जिस सफलता से मनोभावनाओं का चित्रण करता हैं उसी प्रकार सामाजिक परिस्थितियों का वर्णन भी कर सकता हैं। फूलबनएक प्रेम कथा हैं, जिसकी पृष्ठभूमि भारतीय हैं।

इसमें जीवन के ऐसे चित्र खींचे गये हैं, जिनके देखने से उस युग की सामाजिक स्थिती, रहन-सहन, रीति रिवाज के समझने में बड़ी सहायता मिलती हैं।

जैसा कि कहा जा चुका हैं दरबारी संरक्षण और जनप्रियता के कारण बिजापूर और गोलकुंडा में बहुत से कवि पैदा हो गये थें। यहाँ उनके नाम भी नहीं दिये जा सकते, परंतु इस बात को अवश्य याद रखना चाहिए कि दकनी-उर्दू जो उस समय खडी बोली की साहित्यिक अभिव्यक्ति का माध्यम थीं, भारतीय भाषाओं के खजाने में बहुत कुछ बढ़ा चुकी थी।

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इसमें कोई शक नहीं कि उसके साहित्य पर फ़ारसी का भी प्रभाव था, परंतु यह बात स्पष्ट हैं कि राष्ट्रीयता की जो लहर मुग़ल काल में उत्तरी भारत से उठ रही थी, उसका विकास साहित्यिक रूप से दक्षिण भारत ही में हो रहा था।

इसके अतिरिक्त एक ओर प्रेम-मार्ग पर चलने वाले भक्त कवि इस्लामी तसव्वुफ़ को अपना विषय बनाकर गद्य और पद्य दोनों में रचनाएँ कर रहे थे और दूसरी और इमाम हुसैन के श्रद्धा प्रकट करने वाले कवि करबला की उत्सर्ग वेदी का शोक पूर्ण चित्र मरसियों और दूसरी धार्मिक कविताओं में कर रहे थें।

इस प्रकार कि कविताओं की शुरुआत बीजापुर के अशरफ़ नामक कवि से होती हैं, जिसने नौसरहारकी रचना करके करबला की महान दुखान्त घटना का अपने ढंग से प्रस्तुत किया। यह काल 1525 ईसवी में लिखा गया।

इसके बाद कुली कुतुबशाह’, ‘वजही’, ‘अली आदिलशाह’, ‘नुसरती’, ‘गौव्वासी’, सभी ने मरसिये लिखे। इनमें कुछ कवि भी हैं, जो अपने जीवन भर केवल मरसिया ही लिखते रहे, क्योंकि वह इसे पवित्र और धार्मिक मान कर दूसरे विषयों से अपनी रचनाशक्ति भ्रष्ट नहीं करना चाहते थें।

इस संक्षिप्त आलेख  में उनका वर्णन विस्तारपूर्वक संभव नहीं हैं, साथ ही उन रचनाओं और पुस्तकों की भी कमी नहीं, जिनमें भारत के जीवन और समाज का चित्रण मिलता हैं।

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हिन्दुस्तान की प्राचीन कथाओं पर आधारित कहानियाँ लिखी गयीं, जिनमे मनोहर मधुमालती’, ‘पद्मावत’, ‘चंद्रबदन और महयारऔर तूतीनामा’, विशेष रूप से अध्ययन योग्य हैं।

संक्षेप में यह कहा जा सकता हैं कि उस काल की रचनाओं में स्थानीय रंग बहुत गहरा हैं, भाषा में फ़ारसी-अरबी की भरमार नहीं हैं, कविता पर राज्य दरबार का प्रभाव तो जरुर हैं, परंतु लगता हैं कि वह अपने बादशाहों की प्रशंसा करने पर मजबूर न थे। इसके अतिरिक्त उनमें धर्म और भक्ति से पैदा होने वाली स्वतंत्रता भी प्रबल थी।

इसमें संदेह नहीं कि उस युग में जो कुछ लिखा गया उसका एक बड़ा भाग आज कोई साहित्यिक महत्त्व नहीं रखता, किन्तु जिन कविताओं और पुस्तका का उल्लख ऊपर किया गया, उनका केवल ऐतिहासिक महत्त्व नहीं हैं बल्कि भाषा और साहित्य की दृष्टि से उर्दू साहित्य के इतिहास में उन्हें उच्च स्थान प्राप्त हैं।

*संबंधित लेख प्रो. एहतेशाम हुसेन के उर्दू साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास किताब  के आधार से बनाया गया हैं 

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टीम डेक्कन

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