क्या क़ुरआन में इशनिंदा कि कोई सज़ा भी हैं?

क्या क़ुरआन में इशनिंदा कि कोई सज़ा भी हैं?
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आए दिन इशनिंदा के मामलो को लेकर दुनिया में इस्लाम पर आपत्ती उठाई जाती हैं जब भी कोई इस्लामी देशों मे इस तरह के मामले सामने आते हैं, तब मुसलमानों के धर्म और उनके पवित्र ग्रंथो पर टिप्पणी कि जाती हैं जबकि कुरआन स्पष्ट रूप से कही पर भी इशनिंदा के मामले का समर्थन नही करता ना ही हदिसों में इस तरह के प्रमाण मिलते हैंपैगम्बर कि जीवनी उठाकर देखे तो ऐसे कई मामले नजर आयेंगे जहां वे अपनी आलोचनाओ को हल्के में लिया करते थें जबकि आज उन्हीं के अनुयायी देशो में पैगम्बर के कथित अवमान को लेकर हिंसा और रक्तपात फैलाया जा हैं इसी विषय पर चर्चा करता फरीद जकारिया का यह आलेख

पेरिस में 7 जनवरी 2015 को चार्ली एब्दो’ (Charlie hebdo) पत्रिका के दफ्तर में कार्टूनिस्ट व पत्रकारों सहित 12 लोगों चरमपंथीओं ने हत्या कर दी। उसके बाद उन्होंने चिल्लाकर कहा कि पैगंबर के अपमान का बदला ले लिया गया है। ये उन अन्य चरमपंथीयों के नक्श-ए-कदम पर ही चले, जो अखबार के दफ्तरों में धमाके करते रहे हैं। फिल्मकार को चाकू घोंपने, लेखकों व अनुवादकों की हत्याओं की वारदातें भी हुई हैं। उन्होंने यह सब ईशनिंदा (Blasphemy) के खिलाफ किया। उन्हें लगता था कि कुरआन के मुताबिक ईशनिंदा की यही सजा है।

किंतु वास्तविकता तो यह है कि ईशनिंदा के लिए कुरआन में कोई सजा मुकर्रर नहीं है। इस्लामी चरमपंथ के ज्यादातर उन्मादी और हिंसक पहलुओं की तरह यह विचार भी राजनेताओं व धर्मगुरुओं की उपज है कि पैगंबर (Prophet Muhammad) का अपमान करने का जवाब हिंसा से दिया जाना चाहिए। नेताओं व धर्मगुरुओं ने राजनीतिक एजेंडे के तहत ऐसा किया है। यह विचार इसी एजेंडे का हिस्सा रहा है।

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एक पवित्र ग्रंथ का ईशनिंदा से गहरा ताल्लुक है और वह ग्रंथ है बाइबल (Bible)। ओल्ड टेस्टामेंट (Old Testament) में ईशनिंदा और ईशनिंदा करने वालों की आलोचना की गई है और उनके लिए कड़ी सजा बताई गई है। इस बारे में सबसे मशहूर अंश लेविटिकस अध्याय 24, पद 14 से है -

कोई भी यदि ईश्वर के नाम की निंदा करता है तो उसे मौत की सजा देनी चाहिए। उसे जनसभा में पत्थर मार-मारकर मृत्युदंड देना चाहिए। विदेशी हो या स्वदेशी यदि वे ईशनिंदा करते हैं तो उन्हें मौत की सजा मिलनी ही चाहिए।ऐसा स्पष्ट उल्लेख इसमें किया गया है।

इसके विपरीत कुरआन में कही भी ईशनिंदाजैसा शब्द नहीं है (और संयोग से कुरआन में कहीं भी पैगंबर साहब का चित्र बनाने से रोका नहीं गया है। हालांकि, हदीस जैसी व्याख्याएं व टिप्पणियां हैं, जो मूर्ति पूजा के खिलाफ सावधान करती हैं)।

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इस्लामी विद्वान मौलाना वहीदुद्‌दीन खान (Maulana Wahiduddin Khan) ध्यान दिलाते हैं, “कुरआन में ऐसी 200 से ज्यादा आयतें हैं, जिनसे पता चलता है कि पैगंबर के समकालीनों ने बार-बार वह कृत्य किया है, जिसे अब ईशनिंदा  कहा जाता है, लेकिन कुरआन में कहीं भी कोड़े लगाने की सजा या मृत्युदंड या किसी अन्य प्रकार के दंड की बात नहीं कही गई है या उस तरह का कोई उल्लेख है।

कई मौकों पर उनकी और उनकी शिक्षाओं की खिल्ली उड़ाने वालों के साथ पैगंबर मुहंमद साहब ने समझ-बूझ और दयालुता का व्यवहार किया है। वहीदुद्‌दीन कहते हैं, “इस्लाम में ईशनिंदा शारीरिक सजा की बजाय बौद्धिक विचार-विमर्श का विषय रहा है।जाहिर है विचार-विमर्श का संबंध समझदारी से हैं।

कोई चरमपंथीयों को यह बताना भूल गया। उन्हें नहीं बताया गया कि पवित्र ग्रंथ में ईशनिंदा जैसी कोई अवधारणा नहीं है। किंतु जेहादियों का यह वीभत्स और खूनी विश्वास मुस्लिम जगत में सामान्य है, तथाकथित मध्ममार्गी मुस्लिमों में भी कि ईशनिंदा और स्वधर्म त्याग इस्लाम के खिलाफ भयानक गुनाह है और वे भी मानते हैं कि उसकी कड़ी सजा होनी चाहिए। कई मुस्लिम देशों में ईशनिंदा और मजहब छोड़ने के खिलाफ कड़े कानून हैं और खेद है कि कई स्थानों पर उन्हें पूरी सख्ती से अमल में भी लाया जाता हैं।

पाकिस्तान ईशनिंदा विरोधी मुहिम के अराजक होने के उदाहरण की मिसाल है। ईशनिंदा कानूनों का वहां सबसे ज्यादा उपयोग हुआ है। अमेरिका के अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता आयोग (U.S. religious freedom commission) के मुताबिक मार्च 2014 तक उस देश में 14 लोग इस अपराध के लिए मौत की सजा का सामना कर रहे थे जबकि 19 उम्रकैद की सजा भुगत रहे थे। देश के सबसे बड़े मीडिया समूह के मालिक को 26 साल कैद की सजा सुनाई गई है, क्योंकि उनके समूह के एक चैनल ने विवाह समारोह के प्रसारण में पैगंबर मुहंमद की बेटी के प्रति भक्तिमय गीत प्रसारित किया था। और पाकिस्तान अकेला नहीं है।

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बांग्लादेश, मलेशिया, मिस्र, तुर्की और सूडान इन सारे देशों ने लोगों को परेशान करने और जेल में डालने के लिए ईशनिंदा (Blasphemy Law) कानूनों का इस्तेमाल किया है। उदारवादी इंडोनेशिया में 2003 के बाद से ईशनिंदा के आरोप में 120 लोगों को जेल में डाल दिया गया है। सऊदी अरब में अपने इस्लाम के वहाबी स्वरूप के अलावा किसी भी धर्म के पालन की बिल्कुल इजाजत नहीं है। पाकिस्तान का मामला एक मिसाल है, क्योंकि वहां ईशनिंदा विरोधी कानून का सर्वाधिक कठोर स्वरूप है। यह तुलनात्मक रूप से ज्यादा पुरानी बात नहीं है और राजनीतिक एजेंडे की उपज है।

1970 के दशक के उत्तरार्ध और 1980 की शुरुआत में देश के तानाशाह शासक रहे जनरल मुहंमद जिया उल हक (Mohammed Zia ul-Haq) लोकतांत्रिक व उदारवादी विपक्ष को हाशिये पर डालकर इस्लामी कट्‌टरपंथियों को गले लगाना चाहते थे, फिर वे चाहे कितने ही कट्‌टर क्यों न हों। यह उनका अपना राजनीतिक एजेंडा था। उन्होंने कई कानून पारित कर पाकिस्तान का इस्लामीकरण किया, जिसमें वह ईशनिंदा विरोधी कानून भी शामिल है, जिसके तहत पैगंबर मुहंमद साहब का किसी भी तरह अपमान करने पर मौत की सजा या उम्रकैद मुकर्रर है।

जब सरकारें कट्टरपंथी (Fanatics) लोगों को अपने पक्ष में करने की कोशिश करती हैं, तो अंतत: कंट्टरपंथी लोग कानून अपने हाथ में ले लेते हैं। ऐसा होना अपरिहार्य है। पाकिस्तान में यही हुआ और जेहादियों ने उन दर्जनों लोगों की जान ले ली, जिन पर वे ईशनिंदा का आरोप लगाते थे। इनमें वे बहादुर नेता सलमान तासीर (Salmaan Taseer) भी शामिल हैं, जिन्होंने ईशनिंदा कानून को काला कानून’ (Black law) कहने की हिम्मत दिखाई थी। ऐसे लोग ही इस कानून का निशाना बनते हैं।

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हमें चरमंपंथ से लड़ना होगा, लेकिन हमें समस्या के स्रोत से भी लड़ना होगा। यदि उनकी सरकारें ईशनिंदा के विचार का समर्थन करती हैं तो मुस्लिम नेताओं के लिए इतना ही काफी नहीं है कि ईशनिंदा के नाम पर हत्या करने वालों की निंदा करें। अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग और संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार समिति दोनों ने ईशनिंदा कानून को मानव अधिकारों के खिलाफ बताया है (क्योंकि वे अभिव्यक्ति की आजादी का उल्लंघन करते हैं)। दोनों संस्थाएं बिल्कुल सही हैं।

मुस्लिम बहुल देशों में कोई इन कानूनों को वापस लेने की बात करने की हिम्मत नहीं करता। पश्चिमी देशों में कोई सहयोगी देश उनसे इन मुद्‌दों पर नहीं टकराता। वे इसे उनका घरेलू मामला समझते हैं। किंतु ईशनिंदा कोई विशुद्ध रूप से घरेलू मुद्‌दा नहीं है। केवल उन लोगों से संबंधित नहीं है, जो देश के आतंरिक मामलों को लेकर चिंतित हैं। यह इस्लामी कट्‌टरपंथियों और पश्चिमी समाजों के बीच प्रमुख मुद्‌दा बन गया है, जिसके काफी खूनी नतीजे निकले हैं। इसे अब और नहीं टाला जा सकता। पश्चिमी राजनेताओं, मुस्लिम नेताओं और दुनियाभर के बुद्धिजीवियों को ध्यान दिलाना चाहिए कि ईशनिंदा ऐसी चीज है, जिसका कुरआन में कोई वजूद नहीं है और निश्चित ही आधुनिक विश्व में भी इसका कोई स्थान नहीं होना चाहिए।

(मूल अंग्रेजी का लेख आप यहां पढ सकते हैं)

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फरीद ज़कारिया

भारतीय मूल के अमेरिकी पत्रकार और लेखक हैं। न्यूजवीक में स्तंभकार और न्यूज़वीक इंटरनेशनल के संपादक के रूप में लंबे समय के कैरियर के बाद हाल ही में उन्हें टाइम के एडिटर-एट-लार्ज के रूप में घोषित किया गया। वे सीएनएन के फरीद ज़कारिया जीपीएस के होस्ट भी हैं और अंतरराष्ट्रीय संबंधों, व्यापार और अमेरिकी विदेश नीति से संबंधित मुद्दों के एक सतत आलोचक और लेखक हैं।