‘डिजिटल मीडिया सेन्सरशिप’ या सरकारविरोधी खबरों पर लगाम !

‘डिजिटल मीडिया सेन्सरशिप’ या सरकारविरोधी खबरों पर लगाम !
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किसान आंदोलन में सरकार समर्थित मीडिया की आलोचना करता एक पोस्टर


आकार पटेल का नजरिया :

मैंने हाल ही में एक किताब लिखने का काम पूरा किया है। इसका शीर्षक है प्राइस ऑफ मोदी ईयर्सयानी मोदी काल की कीमत। यह किताब इस साल प्रकाशित होकर आ जाएगी। दरअसल इसमें 2014 के बाद के भारत का इतिहास है।

मैंने अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, शासन, न्यायपालिका और अन्य क्षेत्रों के आंकड़ों के आधार पर इसके पीछे की राजनीति और नीति का आंकलन किया है। मैं अभी किताब के बारे में और अधिक नहीं बोलना चाहता, लेकिन मैं उस बारे में जरूर बोलना चाहता हूं जहां से मैंने इस किताब के लिए आंकड़े, जानकारियां आदि हासिल किए।

मैंने जिन स्रोतों का किताब में जिक्र किया है, उनमें सर्वाधिक बार एक वेबसाइट द वायर डॉट इन का जिक्र है। पूरे 85 बार मैंने इस वेबसाइट का जिक्र किया है। इसके बाद दूसरे नंबर पर स्क्रोल डॉट इन। इसका मैंने 54 बार जिक्र किया है। वहीं टाइम्स ऑफ इंडिया का 37 बार जिक्र है। इसका कारण यह है कि मुझे जिस किस्म की रिपोर्ट चाहिए थीं वह इन वेबसाइट से मिलीं न कि किसी अखबार में।

वास्तविकता यह है कि बीते करीब एक दशक से द वायर और द न्यूज मिनट और ऑल्ट न्यूज जैसी अन्य वेबसाइट खबरों और असली खबरों का मुख्य स्त्रोत बन चुकी हैं न कि अखबार जैसा परंपरागत मीडिया साधन।

इन जैसी ज्यादातर वेबसाइट को पत्रकारों ने शुरु किया है और वे आमतौर पर चंदे या किसी किस्म की आर्थिक मदद से चलती हैं। इनके मालिकाना हक किसी बड़े कार्पोरेट या किसी बड़े मीडिया हाऊस के पास नहीं हैं।

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हर महीने 200 करोड

परंपरागत मीडिया कई मामलों में सरकार पर निर्भर रहती हैं। ध्यान रहे कि सरकार हर साल 12,00 करोड़ (हर महीने 100 करोड़) रुपए अपने प्रचार पर खर्च करती है। इसके अलावा केंद्रीय सरकारी इकाइयां भी करीब 1000 करोड़ रुपए सालाना खर्च करती हैं।

इस तरह मीडिया को हर महीने करीब 200 करोड़ रुपए दिए जाते हैं। यह एक बड़ी रकम है और इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। इस सबके अलावा राज्य सरकारों के भी अपने विज्ञापन बजट हैं।

इतना ही नहीं, और भी बहुत कुछ है। मसलन टीवी चैनल का लाइसेंस, मुफ्त में या फिर सस्ते दामों पर जमीन, मशीनें और अखबारी कागज के कस्टम और इम्पोर्ट ड्यूटी आदि। साथ ही बड़े मीडिया हाऊस अपने शिखर सम्मेलन करते हैं जिसमें आमतौर पर प्रधानमंत्री और कई केंद्रीय मंत्रियों को बोलने के लिए बुलाया जाता है।

लेकिन अगर प्रधानमंत्री किसी खबर से नाखुश हैं तो वे इन सम्मेलनों में नहीं आएंगे और फिर केंद्रीय मंत्री भी किनारा कर लेंगे। इससे इन कार्यक्रमों को प्रायोजित करने वाले हाथ खींचेंगे क्योंकि उन्हें अपने पैसे की भरपाई नहीं हुई। इन सबके चलते परंपरागत मीडिया हाऊस सरकारी दबाव में रहते हैं, जबकि वेबसाइट्स के साथ ऐसा नहीं है।

इन्हीं सबके चलते मोदी सरकार ने सूचना प्रोद्यौगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश एंव डिजिटल मीडिया आचार संहिता), नियम 2021 को पेश किया है। इस निगरानी व्यवस्था को बिना किसी नए कानून को बनाए इसलिए सामने लाया गया है ताकि जिस तरह सूचना प्रसारण मंत्रालय टीवी चैनलों पर नजर रखता है, उसी तरह इंटरनेट पर भी नजर रखी जा सके या नियंत्रित किया जा सके। सरकार ने एक तरह से खुद को इंटरनेट और यहां तक कि मैसेजिंग सेवाएं देने वाली कंपनियों पर भी सेंसर करने की ताकत दे दी है।

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अखबार को छुट वेबसाईट पर लगाम

रोचक है कि इन नियमों से ई-पेपर को छूट है। यानी स्थापित पब्लिशिंग हाऊस (वे प्रकाशन जिन्हें सरकार से पैसा मिलता है) को द वायर या फिर स्क्रोल जैसी वेबसाइट के मुकाबले फायदा है। इसके अलावा अगर आप ऐसी वेबसाइट चलाते हैं और आपका न्यूजपेपर भी है तो भी आपकी वेबसाइट इन नियमों से बाहर रहेगी।

लेकिन अगर आप सिर्फ वेबसाइट चलाते हैं और अखबार नहीं निकालते हैं तो आप इसके दायरे में रहेंगे। आसान शब्दों में कहें तो अगर आपने किसी अलगाववादी का इंटरव्यू लिया है और उसे अखबार में छापा है, और फिर उसी इंटरव्यू को वेबसाइट पर भी अपलोड किया है तो आप पर राजद्रोह का मामला नहीं बनेगा। लेकिन अगर यहीं इंटरव्यू सिर्फ वेबसाइट पर गया है और आपका अखबार नहीं है तो आप पर राजद्रोह का मामला बन सकता है।

सूचना प्रोद्योगिकी अधिनियम, 2000 न्यूज मीडिया को दायरे में नहीं लेता, इसलिए नई गाइडलाइंस की कोई कानूनी वैधता उस तरह नहीं है। दरअसल इन बदलावों को इसलिए किया गया है ताकि मूल कानून की शक्तियों को अधिक विस्तारित करते हुए न्यूज मीडिया पर दबाव बने।

इन नियमों से सरकार को किसी भी सामग्री को जो न्यूज और करेंट अफैयर्स के पब्लिशर ने प्रकाशित की है, उसे नियंत्रित किया जा सके। यह नियम एकदम एकतरफा और खुला नियम है और इसमें बहुत सी बातें धुंधली हैं।

अगर आप नागिरक हैं तो आपको भी यह नियम प्रभावित करता है। क्योंकि इन नियमों के दायरे में व्हाट्सऐप, सिग्नल और टेलीग्राम जैसी सेवाएं भी हैं। अब इन सेवाओं को सरकार को बताना होगा कि कोई कंटेंट किसने शेयर किया है या पहली बार क्रिएट किया है।

मसलन अगर प्रधनमंत्री का कोई कार्टून है जो वायरल हो जाता है, जो जिसने इसे पहली बार भेजा उसपर इसका नियंत्रण नहीं है कि इसे कितनी बार और कितने लोगों ने फॉरवर्ड किया। और फिर यह किस ग्रुप के पास पहुंच रहा है। इसी तरह किसी जोड़े या मित्र मंडली द्वारा कोई ऐसा कंटेंट शेयर किया गया जो उस जगह पहुंच गया जहां उसे नहीं पहुंचना था।

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कडी सेंसरशिप

नियम कहते हैं कि केंद्र सरकार द्वारा एक तरह की निगरानी व्यवस्था है जो किसी भी इंटरनेट आधारित प्लेटफॉर्म पर प्रकाशित की जाती है। सरकार इन नियमों के तहत सामग्री को ब्लॉक कर सकती है और इसे प्रकाशित करने वाले पब्लिशर से माफी का स्क्रोल चलाने को भी कह सकती है।

बड़े प्लेटफॉर्म्स ने इस सबको ध्यान में रखते हुए अपने यहां स्वत: नियमीकरण व्यवस्था कर ली है, यानी अपने ही संस्थान में एक तरह की सेंसरशिप ताकि ऐसी सामग्री प्रकाशित न हो जो सरकार को पसंद न हो या जिससे सरकार नाराज हो जाए।

ये सबकुछ भारत के लिए अच्छा नहीं है। सरकार बेहद शक्तिशाली है और प्रधानमंत्री बहुत लोकप्रिय हैं। विपक्ष अभी भी अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश भर कर रहा है और धार्मिक अधिनायकवाद के कथानक के खिलाफ एक मजबूत दीवार नहीं बन पा रहा है।

भारत को एक स्वतंत्र मीडिया की जरूरत है जो यह बता सके कि हमारे देश में क्या हो रहा है। और ऐसा न हो सके, यह सुनिश्चित करने के लिए सरकार हर संभव प्रयास कर रही है। ध्यान रहे विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत 142 वें स्थान पर है। अगले महीने जब इस मोर्चे की रैंकिंग आएगी तो हम कहां खड़े होंगे, यह देखने वाली बात होगी।

(सभार : नवजीवन)

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आकार पटेल

लेखक राजनीतिक विश्लेषक और एमनेस्टी इंटरनेशनल के पूर्व संचालक (भारत) हैं।