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देश के चार बड़े किसान आंदोलन जब झुकीं सरकारे

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गुलाम नबी आज़ाद राज्यसभा से:

माननीय चेयरमैन सर, आज मैं यहाँ माननीय राष्ट्रपति जी का धन्यवाद करने के लिए खड़ा हुआ हूँ कि उन्होंने दोनों सदनों के सदस्यों को संबोधित किया। सर, मैं अपनी बात सिर्फ दो मुद्दों पर रखूगा-किसान और जम्मू - कश्मीर।

माननीय राष्ट्रपति जी के भाषण में बहुत सारे मुद्दे हैं, जिन पर हमारे दूसरे बहुत सारे साथी चर्चा करेंगे। मुझे खुशी है कि माननीय प्रधान मंत्री जी भी यहाँ तशरीफ लाए हैं। उन दोनों विषयों पर माननीय प्रधान मंत्री जी का ध्यान जाना बहुत ही जरूरी है और जिन दो मुद्दों पर मैं बोलने वाला हूँ, उन पर ये ही समाधान निकाल सकते

सर, माननीय राष्ट्रपति जी के भाषण में नौजवानों-नौजवानों से मेरा मतलब उनसे है, जो कि हमारे फौजी हैं - और किसानों के बारे में चर्चा की गई है। जय जवान, जय किसान हमारी पार्टी का और भूतपूर्व प्रधान मंत्री, स्वर्गीय लाल बहादुर शास्त्री जी का नारा रहा है।

यह नारा जितना तब जरूरी था, उतना ही आज भी जरूरी है। हमारे समाज के ये दो सेक्शंस ऐसे हैं, जिनके बगैर हम शून्य हैं। हमारे जवान, जो सरहदों पर लड़ते हैं, वे किस तरह की जिन्दगी गुजारते हैं और कितनी ठंड में रहते हैं, यह हम सब जानते हैं। सन् 1991 में जब शरद पवार जी रक्षा मंत्री थे, तब मैं पार्लियामेंटरी अफेयर्स मिनिस्टर था।

हम कश्मीर की पहाड़ियों पर चले गए थे, जहां 16,000 फीट की बुलंदी पर, ग्लेशियर में हमारे फौजी रहते हैं। वहां छत बर्फ की, दीवारें बर्फ की और फ़र्श भी बर्फ का होता है और इस बार जितनी सर्दी पड़ी है, शायद इतिहास में कभी नहीं पड़ी, मुझे लगता है कि वहां -50 से -60 डिग्री तापमान होगा।

ऐसी ठंड में उन ग्लेशियर्स पर हमारे फौजी हमारी सीमाओं की रक्षा करते हैं। उसी रीजन में गल्वान वैली में हमारे 20 नौजवान पिछले साल शहीद हुए हैं, इसलिए मैं उन शहीदों को भी श्रद्धांजलि देता हूं। मेरी पार्टी की तरफ से पूरी हमदर्दी, सहानुभूति और पूरा सहयोग है, उन फौजियों को, जो रेगिस्तानों की गर्मी में और पहाड़ों पर सर्दी में रहते हैं। हम हमेशा उनके साथ रहेंगे।

महोदय, उन पौने दो सौ किसानों को, जो सरकार से अपनी मांगें मनवाने के लिए पिछले दो - ढाई महीने में शहीद हुए, ठंड में और कई अन्य कारणों से वे मर गए, शहीद हो गए, मैं अपनी तरफ से उनको भी श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं।

किसानों और सरकार के बीच जो गतिरोध बना हुआ है, यह पहली बार नहीं हुआ। सैकड़ों सालों से किसान संघर्ष करता रहा है, अपने हक के लिए लड़ाई लड़ता रहा है, कभी सामंतीवाद के खिलाफ ये लड़ते रहे, कभी ज़मींदारी के खिलाफ लड़ते रहे और कभी सरकार के खिलाफ लड़ते रहे।

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और सरकारे झुकी हैं

मैं कुछ महत्त्वपूर्ण उन आंदोलनों के बारे में उल्लेख करना चाहता हूं, जिनमें आखिर में सरकार को अंग्रेजों के जमाने में झुकना पड़ा। मैं कई दिनों से किसानों के आंदोलन के बारे में पढ़ रहा था और विशेष रूप से अंग्रेजों के शासन के समय के आंदोलन के बारे में पढ़ रहा था, तमाम आंदोलन का नतीजा यह हुआ कि सरकार को झुकना पड़ा, पिछे हटना पड़ा।

मैं इस नतीजे पर पहुंचा हूं कि किसानों की ताकत, हिन्दुस्तान में सबसे बड़ी ताकत है। किसानों से लड़ाई करके हम किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं और न पहुंच सकते हैं। यदि आपकी अनुमति हो मैं इतिहास के कुछ पन्ने आपके सामने रखता हूं।

वर्ष 1900 से वर्ष 1906 के बीच में तीन कानून, यूनाइटेड इंडिया में और बिटिश इंडिया की हुकूमत में हुए, वे हैं The Punjab Land Alienation Act 1900, The Doab Bari Act, The Punjab Land Colonization Act. इन तीन कानूनों में यह था कि ज़मीन की मालिक ब्रिटिश सरकार होगी और मालिकाना हक से किसानों को वंचित रखा जाएगा।

उन्हें बिल्डिंग बनाने, घर बनाने और पेड़ काटने का अपनी ज़मीन पर कोई हक नहीं होगा और परिवार का जो बड़ा बेटा होगा, अगर वह वयस्क नहीं होगा, बालिग नहीं होगा और मर गया, तो यह जमीन छोटे भाई को, जो नाबालिग है, उसको ट्रान्सफर नहीं होगी, ज़मीन गवर्नमेंट की होगी। इस पर बवाल मच गया और इस पर वर्ष 1907 में आंदोलन हुए।

इस आंदोलन का संचालन भगत सिंह जी के बड़े भाई सरदार अजीत सिंह, भगत सिंह के पिता किशन सिंह जी, घसीटा राम जी और सूफी अम्बा जी कर रहे थे। और पूरे पंजाब में आंदोलन हुआ। उस वक्त जो जंग के एडिटर बांके दयाल थे, उन्होंने पगड़ी संभाल जट्टा, पगड़ी संभाल वे का एक गीत बनाया। जो उस वक्त का सबसे बड़ा मशहूर और क्रांतिकारी गीत बना।

मैं उसमें से कुछ अंश यहां पर बताना चाहता हूं।

पगड़ी संभाल जट्टा, पगड़ी संभाल

तेरा लुट गया माल वे जट्टा, पगड़ी सभाल

सारे जग दा पेट भरे तू, अन्नदाता कहलाए तूं

उठ और उठ के खाक के ज़र्रे, एक सितारा बन जा तूं

बुझा-बुझा सा क्यूं है दिल तेरा, एक अंगारा बन जा तूं

ओ सदियों के ठहरे पानी, बहती धारा बन जा तू

लुट गया माल तेरा, लुट गया माल वे

पगड़ी संभाल जट्टा, पगड़ी संभाल

इस गीत ने एक नया जोश, एक नया वलवला, एक नई जागृति उन किसानों में पैदा की। लाला लाजपत राय जी बीच में आए और उन्होंने भी अपना समर्थन दिया। गवर्नमेंट ने उस बिल में अमेंडमेंट का प्रस्ताव रखा और उसमें अमेंडमेंट किया। उसमें केवल माइनर अमेंडमेंट किया, लेकिन इस अमेंडमेंट से आंदोलन और ज्यादा बढ़ गया, क्योंकि यह उनके इत्मिनान के मुताबिक नहीं था।

इस तरह से रावलपिंडी, गुजरांवाला और लाहौर में वायलन्स (हिंसा) हुआ, तब इंडिया युनाइटेड था। इसका यह नतीजा हुआ कि अंग्रेज़ हुकूमत ने तीनों बिल वापस लिए। मैं दूसरा उल्लेख करना चाहता हूं, अपनी हिस्ट्री नहीं बोल रहा हूं।

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चम्पारण की मिसाल

1917 में चम्पारण सत्याग्रह गांधी जी के नेतृत्व में हुआ। साउथ अफ्रीका से आने के बाद यह गांधी जी का पहला सत्याग्रह था। वहां भी नील की खेती होती थी, जिसको अंग्रेजी में इंडिगो बोलते हैं। अंग्रेज़ जबर्दस्ती वह खेती करवा रहे थे। उन्हें अपने धान वगैरह की खेती करने की इजाजत नहीं थी। मैं यहां पर लम्बी स्टोरी नहीं बताना चाहता, गांधी जी पहुंचे और उन्होंने सरकार को मजबूर किया कि नील की खेती को खत्म करने के लिए कानून लाए।

पहले बिहार और डिशा एक ही स्टेट था। उसमें एक बिल लाया गया, लेकिन मेम्बर्स ने यह मांग की कि इस बिल को सेलेक्ट कमेटी को भेजा जाए। ब्रिटिश सरकार ने उन मेम्बर्स की वह मांग मानी और इसको सेलेक्ट कमेटी में भेजा गया। इस बिल को न सिर्फ सेलेक्ट कमेटी में भेजा गया, बल्कि एक कॉपी गांधी जी को भी दी गई और उनसे कहा कि आप भी इस बारे में अपने सुझाव दें। इस तरह से गांधी जी के सुझाव लिए गए और सेलेक्ट कमेटी के भी सुझाव आए और नील की खेती बंद हो गई।

अंग्रेज़ हुकूमत की और इस चम्पारण की एक दूसरी मिसाल है। माननीय प्रधान मंत्री जी मुझसे ज्यादा जानते हैं, क्योंकि मैं उनकी स्टेट की बात कर रहा हूं। चौथा आंदोलन 1918 में खेड़ा सत्याग्रह हुआ था, जिसे महात्मा गांधी जी ने शुरु किया। बाद में उसका संचालन सरदार वल्लभभाई पटेल ने किया और उनके साथियों ने उसको चलाया।

गांधी जी और पटेल जी ने कहा कि देश भर से लोग नहीं आएंगे, गुजरात के लोग भी नहीं आएंगे, यहां के लोग सिर्फ इसका आंदोलन करेंगे या ज्यादा से ज्यादा गुजरात के लोग आ सकते हैं, लेकिन बाहर के लोग बिल्कुल नहीं आएंगे। उन्होंने बम्बई सरकार को, कमिश्नर को पिटिशन दी कि हमारे टैक्स खत्म किए जाएं। बम्बई सरकार, जो उस वक्त ब्रिटिश हुकूमत की युनाइटेड सरकार थी, उसने उनकी डिमांड को रद्द कर दिया। और उनको वॉर्न किया गया कि यदि आप टैक्स नहीं देंगे, तो आपकी ज़मीन जब्त की जाएगी, आपकी प्रॉपर्टी जब्त की जाएगी और आप जेल भी जा सकते हैं।

रिवोल्ट इतनी बढ़ी कि लोगों ने उसकी कोई परवाह नहीं की। उनकी प्रॉपर्टी ली गई, उनकी ज़मीन ली गई, ज़मीन सीज़ की गई और लोगों को अरेस्ट भी किया गया, लेकिन आंदोलन खत्म नहीं हुआ। उसका नतीजा यह हुआ कि उस साल के टैक्स माफ किए गए, सरकार ने जो टैक्स इन्क्रीज़ किए थे, वे भी घटा दिए और सरकार ने जो ज़मीन और घर लिए थे, वे उनको वापस दे दिए गए। इस प्रकार इसमें वापस फिर से किसानों की जीत हुई।

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बारदोली सत्याग्रह 

दूसरा, मैं पांचवें सत्याग्रह बारदोली, 1928 की बात करना चाहता हूं। इसमें भी 1925 में बम्बई प्रेसीडेंसी ने किसानों के 22 प्रतिशत टैक्स बढ़ाए। इतना टैक्स कभी भी नहीं बढ़ा था। उसके बाद सरदार वल्लभभाई पटेल जी ने गवर्नर, बम्बई को टैक्स कम करने के लिए लिखा, लेकिन गवर्नर ने उसको रिजेक्ट कर दिया।

उसके बाद नॉन पेमेंट की वजह से लोगों को तंग किया गया, उनकी प्रॉपर्टी, उनके जान-माल की हिफ़ाज़त करना मुश्किल हो गया था। गवर्नमेंट ने ज़मीनों और घरों की नीलामी कर दी थी, लेकिन एक भी आदमी उस नीलामी के लिए नहीं आया। गवर्नमेंट ने तो नीलामी की, लेकिन न जमीन लेने के लिए कोई आया, न घर लेने के लिए कोई आया और न ही पशू लेने के लिए आया।

यह यूनिटी सरदार पटेल जी के नेतृत्व में थी। उसका रिज़ल्ट यह हुआ कि 1928 में गुजरात में सरदार पटेल जी के नेतृत्व में सबसे बड़ा सविनय अवज्ञा हुआ। उसका रिज़ल्ट यह हुआ कि गवर्नमेंट ने तमाम ज़मीनें वापस कर दी और जो 22 प्रतिशत टैक्स लगा था, लगान लगा था, उसको 6.03 परसेंट किया।

उसका मतलब यह है कि उसको 22 परसेंट से 6 परसेंट कर दिया गया। एक बार फिर किसानों की जीत हुई। तेलंगाना में 1946 से 1950 तक जमींदार, जिनके पास सारी जमीनें थीं, उन्होंने एक गरीब वॉशर वुमन की ज़मीन हड़प ली। उसके बाद आंदोलन शुरू हुआ और वह आंदोलन इतना बढ़ा कि जो ज़मींदारों की अपनी ज़मीनें भी थीं, वे भी लोगों ने वापस ले ली - इस तरह के आंदोलन हमारे इतिहास में हुए हैं और ताकत को हमेशा उनके सामने सिर झुकाना पड़ा।

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टिकैत का किसान आंदोलन

मैं एक 32-33 साल पुरानी बात बताना चाहता हूं। जिस फैसले में मैं पार्टी रहा। अक्टूबर, 1988 में कांग्रेस पार्टी बोट क्लब पर एक रैली करना चाहती थी। उन दिनों बोट क्लब में पब्लिक मीटिंग करने की इजाज़त थी। माननीय राजीव गांधी जी उस समय प्रधान मंत्री थे।

मैं नए संगठन का जनरल सेक्रेटरी था कई राज्यों, यू.पी., पंजाब और हरियाणा का इंचार्ज था और रैली का भी इंचार्ज था। हमने तकरीबन पांच लाख या दस लाख लोगों की रैली के लिए पूरे देश में ट्रेनें लगाई थीं। मुझे सब्जेक्ट मालूम नहीं है कि हमने रैली क्यों की थी, लेकिन रैली की थी। मैं उस रैली का इंचार्ज था और रेली बोट क्लब में थी।

पूरे देश से ट्रेनें आने वाली थीं। कई दिनों से टिकैत जी का किसान आंदोलन चल रहा था - आज जो प्रेजेंट टिकैत है, इनके पिताजी थे, वे बुजुर्ग थे और हुक्का पीते रहते थे। राम गोपाल यादव जी को मालूम होगा कि कई दिनों से उनका यू.पी. में आंदोलन भी चल रहा था, लेकिन पेपर्स में जब यह आया कि इस डेट को बोट क्लब में कांग्रेस की रैली हो रही है और हम तैयारी कर रहे थे - दूसरे दिन सुबह ट्रेनें आनी थीं और कांग्रेस पार्टी की किसानों की रैली थी।

हमने देखा है कि एक दिन पहले टिकैत जी 50 हजार लोगों के साथ बिस्तरे, खाट, हुक्के और अनाज लेकर बोट क्लब में बैठे हैं। We were taken by surprise, अब बीच में एक दिन था और सरकारी कर्मचारी आए, मैं प्रधान मंत्री जी के पास बैठा, तो उन्होंने कहा कि उन्हें निकाला जाए। हमने कहा कि किसानों के साथ लड़ाई नहीं करनी है। हम अपना वेन्यू हटा देते हैं। हमने अपना वेन्यू लाल किले में बना दिया।

हमने उसको एलान नहीं किया। हमने सुबह जहां ट्रेनें आनी थीं, ट्रक आने थे, वहां सैकड़ों लोगों को रखा और कहा कि बोट क्लब में नहीं जाना है, लाल किले में जाना है। इसलिए उनको पता नहीं लगा कि वे लाल किले में आ सकते हैं। हम पिछे हटे, हमने लड़ाई नहीं लड़ी, वरना अगर बेदखल करते, तो कितने लोग ज़ख्मी होते।

उसका नतीजा हुआ कि दो - तीन दिन के बाद टिकैत जी खुद विथड्रा करके चले गए। यह मैं हाल की मिसाल बताना चाहता हूं। माननीय प्रधान मंत्री जी, ये किसान हमारे किसान हैं। जब मैं हमारे किसान कहता हूं, तो वे कांग्रेस के नहीं, बल्कि आपके, हमारे और पूरे हिंदुस्तान के 130 करोड़ लोगों के अन्नदाता हैं। इनके बगैर हम कुछ भी नहीं हैं।

इन्सान को जिन्दा रहने के लिए तीन वक्त की रोटी और दो वक्त की रोटी तो कम से कम मिलनी ही चाहिए। ये आज न सिर्फ हम 130 करोड़ लोगो को रोटी देते हैं, बल्कि दुनिया के देशो में जहां हम अनाज भेजते हैं और प्राइवेट तौर पर भी - ये उनकी भी अन्नदाता हैं इनसे क्या लड़ाई हैं? हमें लड़ाई लड़ने के लिए और बहुत फ्रंट हैं हमारे बॉर्डर पर जो दूश्मन खड़ा हैं - पाकिस्तान हैं, चीन हैं, हम उनसे मिलकर लड़ाई लड़ेगे इसमें हम आपके साथ हैं, पुरा देश आपके साथ हैं, हमारी पार्टी आपके साथ हैं

(क्रमश:)

आगे कि बहस सुनने के लिए इस वीडियो पर जाए l

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टीम डेक्कन

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