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नामदेव ढ़साल : नोबेल सम्मान के हकदार कवि

नामदेव ढ़साल : नोबेल सम्मान के हकदार कवि
VIVEK BENDRE

नामदेव ढ़साल कविताओ में तिखें शब्दों के इस्तेमाल के लिए जाने जाते हैं। मराठी का ये कवि विद्रोह का जिता जागता शोला था। जिसने न सिर्फ समाज मे पनपे ब्राह्मण्यवाद, उच-निच पर प्रहार किया बल्कि एक सांस्कृतिक नवजागरण भी दर्ज कराया, जो आज एक वर्चस्ववादी सांस्कृतिक आंदोलन का हिस्सा बना हैं।

ढ़साल विवादों का भी एक नाम हैं। वो बवाल फिर दलित पँथर कि भूमिका को लेकर हो या फिर मराठी साहित्यिकों के खिलाफ हो, चाहे अपने कड़वे शब्दों से कवि जगत में मची हलचल हो। ढ़साल विवादों से कभी नही घबराए; ना ही डगमगाए।

बल्कि ऐसा कहे तो कोई अतिश्योक्ति नही होगी हर विवाद के बाद उनका कलम और भी निखरी हैं। चर्चित कवि विष्णु खरे के मुताबिक नामदेव ढ़साल आधुनिक भारतीय कविता का सर्वाधिक विवादास्पद हस्ताक्षर था।

अपने दोस्तों मे नाम्याके नाम से प्रसिद्ध इस शख्स का जन्म 15 फ़रवरी 1949 को पुणे जिले के खेड़ तालुके के ‘पूर’ गांव में हुआ, जबकि उनका बचपन मुंबई के बदनाम गली में गुजरा।

उनके परिवार कि माली हालात काफी बुरी थी। आर्थिक तंगी से जुझते हुये इनके वालेद रोजगार कि तलाश में मुंबई आ गये। यहां एक बदनाम बस्ती में उनका मकान था, जहां आये दिन विवाद, फसाद, झगडा होते रहता। चोर-उचक्को के सोहबत में वे बड़े होते गये।

खुद ढ़साल ने लिखा है कि अगर कविता मुझे नहीं खींचती तो मैं टॉप लेवल का गैंगस्टर या स्मगलर होता या फिर किसी चकला घर का मालिक।

मुझे जन्म देने वाली माँ

चली गई आकाश के बाप की ओर

फुटपाथ के भूतों की यातनाओं से ऊबकर

धोती का अन्धेरा धोने के लिए

और किसी फ्यूज आदमी की तरह

मैं बढ़ता रहा

रास्ते की गन्दगी पर

युवा होते होते नामदेव एक चोटी के कवि, साथ ही कार्यकर्ता के रुप में स्थापित हो गये। कई समाजसेवी संघठनो से जुडे, उसी तरह कई राजनीतिक पार्टीयो से भी उनका राबता रहा। होल टाइमर होने के चलते उन्हें माली तंगी रहती। शादी के बाद रोजी-रोटी के लिए टैक्सी ड्राइवर बन गये। उनके ये दिन भी आर्थिक तंगी से जुझते हुए गुजर रहे थे।

इस बारे में ढ़साल कि बेगम मल्लिका अमर शेख ने अपनी आत्मकथा मला उद्ध्वस्त व्हायचे आहे” (मुझे बरबाद होना हैं) में लिखा हैं, “पैसो और राशन के लिए घर में आये चिख-पुकार रहती, कभी उसका (नामदेव) कोई दोस्त कुछ राशन कि थैलिया छ़ोड जाता, उससे कुछ दिन बीत जाते फिर और हालात पहले जैसे।

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विद्रोही साहित्य प्रवाह का जन्मदाता

बुरे दिनों में अपना और अपने समाज के दर्द को बयां करने के लिए वे कविता को सहारा बनाते। कहते हैं, विषम परिस्थितियों में रहकर की कवि कि प्रतिभा को निखार आता हैं। इसी तरह उन्होंने अपने अनगिणत दर्द और दु:खो को अपनी प्रतिभा बनाकर दुनिया को विस्मित कर दिया। उन्होंने अपने दर्द को समाज के दु:खों और संघर्षो के साथ जोड़ा। दर्द उकेरने के लिए साहित्य और राजनीति उनका स्थायी मुकाम बन गया।

सन 1971 में ढ़साल का पहला काव्य संग्रह गोलपिठाआया तो उसने मराठी साहित्य मे हलचले मचा दी। प्रस्थापित साहित्यिक और कवियों को उसने सदमें मे डाल दिया। जीवन के यथार्थ से जुड़े इस तरह के नरेशन को पहली बार किसी ने कविता के माध्यम से शब्दों मे पिरोया था। जिससे गैरब्राह्मणी युवा वर्गों मे चेतना का माहौल भर गया तो दूसरी और मराठी सारस्वतों में मातम का।

वरिष्ठ हिन्दी लेखक उदय प्रकाश कहते हैं, “ढ़साल सही मायने में विद्रोही कवि थे। उन्हें आप प्रगतिशील नहीं कह सकते। उनकी कविताओं में बहुत ही तीव्र और बहुत तीखी प्रतिक्रिया थी। सड़कों और गटरों में पैदा होने वाली भाषा को उन्होंने कविता में आयात किया और कविता की परंपरा को बदल दिया।

एक ही कवितासंग्रह से उन्होंने ब्राह्मणी साहित्यिक संघों को हिला कर रख दिया। उनको विवश कर दिया कि उनके जैसी कविता को ही समसामयिक मराठी की मुख्यधारा मान लिया जाए। दूसरी ओर अनेक नवयुवक, दलित कवि, गद्यकार, नाटककार और आलोचक उनसे प्रेरित हुये और उन्होंने साहित्य के एक नये प्रवाह को जन्म दिया।

ढ़साल अपने कविताओं के माध्यम से साहित्यिक गूटबाजी, घेराबंदी और ब्राह्मणी सांस्कृतिक वर्चस्ववाद के ख़िलाफ़ ज़िन्दगी भर लड़ते रहे। उन्होंने कथित रूप से मुख्यप्रवाही कही जाने वाली साहित्य के धारा को बदल कर रख दिया।

मेरी कविता की डायरी

इसके पहले मैंने कबीर को दी थी

इस बाज़ार में कबीर नहीं

मैं ख़ुद ही खड़ा हूँ

ये ऐसा वक़्त ऐसा था जब मराठी साहित्य जगत में एक ही जाति और वर्ण के तबके का वर्चस्व था। उनके ही जीवन के पहलू, भावविश्व, रूमानी और तिलिस्मी दुनिया, अस्मिता, संस्कृति और धर्मवादी मानसिकता को साहित्य में शब्दांकित किया जा रहा था।

अल्पसंख्य तथा वंचित तबक़ो जीवन संघर्ष को दूर दूर तक कोई जगह नही थी। वैसे समय में विद्रोही साहित्य प्रवाह उभरा जिसने उस समय मौजूद सभी प्रस्थापित लेखकों, कवियों और उनके लिखे साहित्य को नकारा।

विष्णु खरे के मुताबिक, “अंतर्राष्ट्रीय कविता जगत में भारतीय कविता के विजिटिंग कार्ड का नाम नामदेव ढ़साल हैं। उन्होंने कविता की संस्कृतिक को बदला हैं, कविता को परंपरा से मुक्त किया एवं उसके आभिजात्यपन को तोडा हैं संभ्रात कविता मर चुकी हैं, और इसे मारने का काम ढ़साल ने किया हैं

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अवसरवादिता का पर्दाफाश

हाशिये पर धकेले गये इस समाज से कई कवि और उपन्यासकार निकले जिन्होंने अपने दु:ख-दर्द, सवाल, समस्या और संघर्ष को साहित्य में जगह दी। तो दूसरी और प्रस्थापित साहित्य और उनके लेखकों के नासमझ और अवसरवादिता का पर्दाफाश किया। नामदेव इसी विद्रोही परंपरा के कवि थे।

नामदेव ढ़साल की भाषा उनकी खासियत थी, जिसने कथित प्रमाण मराठी को धूल कि तरह हव्वा में उड़ा दिया। वंचित तबकों में उनके जीवन संघर्ष का सिधा असर उनके सामाजिक व्यवहार और भाषा पर पड़ता हैं। जिससे उनके भाषा में तल्खी, रुखापन और गुस्सा झलकता हैं।

इस सिधे लहेजा और गालिबाज शब्दों को नामदेव ने अपनी कविता कि भाषा बनाया। उनकी प्रत्येक कविता ठेठ गालिबाज मुंबइया मराठी है। जिसमें आदर, सम्मान के आग्रह दूर दूर तक दिखाई नही देते।

उन्हें करीब से जानने वाले उनके दोस्त सुबोध मोरे मानते हैं की उन्होंने भाषा माध्यम से सांस्कृतिक राजनीति की हैं। जिसमें प्रस्थापित ब्राह्मणी परंपरा को सिरे से नकारना या फिर उसका मजाक बनाना शामिल था। मोरे कि माने तो उनकी भाषा ने सांस्कृतिक राजनीति के धारा को बदलकर रख दिया, जिसका सिधा असर महाराष्ट्र के दलित राजनीति पर पड़ा। जिसे आगे चलकर प्रकाश अम्बेडकर और रामदास आठवले जैसे नेताओं ने अपने नेतृत्व से दलित राजनीति को एक नई दिशा प्रदान की।

जिस तरह भीमराव अम्बेडकर ने सारी दलित बिरादरी के राजनीतिक और सामाजिक भविष्य को बदल डाला उसी तरह नामदेव ने भी गोलपिठासे दलितों के अस्मिता और अभिव्यक्ती को बदलकर रख दिया। गोलपिठाने मराठी साहित्य जगत में एक बड़ा विस्फोट साबित हुआ और उसने मराठी कविता के नरेशन हमेशा के लिए बदलकर रख दिया।

वह चौथा खम्बा भी लापता हो गया ख़ुद ही

बदन से कपड़े तन से जान चली गई लेकिन

अभी भी है साबुत जबान और है गरिमा से जीने की चाह

जबकि नहीं गया बुलन्दशहर बुलन्दशहर

मेरे भीतर आकर चिल्ला रहा है

बुलन्द भारत की बुलन्द तस्वीर

प्रसिद्ध रंगकर्मी विजय तेंडुलकर गोलपिठा के भूमिका में लिखते हैं, “सफेदपोश दुनिया के सीमा खत्म होकर सफेदपोशों के दृष्टि से जहां नो मैन्स लँड  - निर्मनुष्य प्रदेश शुरु होता हैं, वहां से नामदेव ढ़साल के कविता से मुंबई के गोलपिठा कही जानेवाली दुनिया शुरु होती हैं।

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दलित पैंथर के संस्थापक

नामदेव ढ़साल चर्चा में तब आये जब उन्होंने दलित पैंथरका गठन किया। इस बारे में उन्होंने पनी किताब आम्बेडकरी चळवळ आणि सोशालिस्ट, कम्युनिस्टमें लिखा हैं, 9 जुलै 1972 को 204 चर्नी रोड, गिरगांव मुंबई के संयुक्त समाजवादी पार्टी के कार्यालय से निचे उतकर मैं और मेरे दोस्त ज. वि. पवार दोनों ने दलित पैंथर इस संघठन कि स्थापना की।

बाद में इस संघठन को धुरंधर राजा ढ़ाले का भी साथ मिला। इस संगठन ने दलित अत्याचारों और उत्पीड़नों का जवाब बेहद रैडिकल तरीके से दिया। स्थापना के एक महीने बाद ही ढ़साल ने यह घोषणा कर दी, ‘यदि विधान सभा या संसद सामान्य लोगों की समस्यायों को हल नहीं करेगी तो पैंथर उन्हें जलाकर राख कर देंगे।

यह संगठन अमरीका के ब्लैक पैंथर मुवमेंटसे प्रेरित था जो अमेरिका में अफ्रीकियों ने अपने हकों की रक्षा के लिए खड़ा किया था। जो गोरों द्वारा अश्वेतों पर किए जाने वाले अत्याचार के विरोध में काम करता था।

ढ़साल द्वारा स्थापित संघठन दलितों के उत्पीड़नउ, नके इंसानी हुकूक, सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों पर काम करता था और पूरे भारत में सक्रिय था। जहां भी दलितों पर अत्याचार होता, ‘दलित पैंथरवहां खड़ा दिखता। जिसका बड़ा प्रभाव 1972-75 तक देश भर में देखने को मिला।

उनके व्यक्तित्व की एक सबसे बड़ी ख़ूबी थी कि वो बहुत ही सहज स्वभाव के थे। गुस्सैल और गालिबाज भी थे। दोस्तों के बिच जो मुंह मे आया बोल देते। उसी तरह वे भावनाप्रधान भी थे।

रंगकर्मी और नेशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा के पूर्व निदेशक वामन केंद्रे लिखते हैं, “मेरे पहले नाटक झुलवा को देख कर वह रो पड़े थे। नाटक ख़त्म होने के बाद वह मुझसे मिले और कहा, “जो कोशिश हम 30-35 सालों से कर रहे हैं उस कोशिश को तुम्हारे एक नाटक ने तीन-चार क़दम आगे बढ़ा दिया है।

हे मेरी प्रिय कविता

नहीं बसाना है मुझे अलग से कोई द्वीप,

तू चलती रह, आम से आम आदमी की उंगली पकड़

मेरी प्रिय कविते,

जहां से मैंने यात्रा शुरू की थी

फिर से वहीं आकर रुकना मुझे नहीं पसंद,

मैं लांघना चाहता हूं अपना पुराना क्षितिज।

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वामपंथ से फासिवादी समर्थन तक

नामदेव की विद्रोही कविताएं अनपढ दलितों को भी आंदोलित करती थीं। उनमे उत्साह का वातावरण भरती। अपने दर्द को कोई कविताओं के माध्यम से बयां कर रहा हैं, ये उनके लिए किसी आश्चर्य से कम नही था। इसके बाद उनके कई कावितासंग्रह आते गये और साहित्यिक जगत में छा गये।

मुर्ख म्हाताऱ्याने डोंगर हलविले’, ‘तुझी यत्ता कंची’, ‘गांडु बगिचा’, ‘खेळ, मी मारले सुर्याचे सात घोडे, या सत्तेत आता जीव रमत नाही’, और प्रियदर्शिनीउनके चर्चित कवितासंग्रह रहे। उन्होंने उपन्यास ‘निगेटिव्ह स्पेस’, ‘हाडकी हाडवळा’, ‘उजेडाची काळी दुनिया’ भी लिखे। ‘आंधळे शतकऔर आंबेडकरी चळवळ आणि सोशालिस्ट कम्युनिस्टनाम से लिखे राजनीतिक लेख भी चर्चित रहे।

विष्णु खरे के मुताबिक, “नामदेव की कविता ने, अपने महान पूर्वज नामदेव की तरह, मराठी कविता और अन्य विधाओं को तो बदला ही, अपनी दलित बिरादरी को अपूर्व नेतृत्व, आत्मविश्वास, साहस और गरिमा से समृद्ध किया।

कविताओं के माध्यम से अपने जीवन-काल में ही वे क्लासिक बन गये थे। जिसका महत्व मराठी से बाहर भी बढ़ता गया। जिससे दलित साहित्य के नये प्रवाह को जन्म दिया। आगे चलकर इस प्रवाह ने देश में ही नहीं, विश्व-स्तर पर सम्मान, प्रतिष्ठा और कुबुलियत हासिल की। उनकी कविताएं 26 भाषाओं में अनूदित की गयी हैं। हिन्दी में भी वो काफ़ी लोकप्रिय हैं।

नामदेव विद्रोही और खुले विचारों के नेता और साहित्यकार थे। वामपंथ से उनका गहरा जुडाव था।  अगर आगे चलकर वह कम्युनिस्ट और समाजवादी नेताओं से खफा हुए। कार्यकर्ता और नेताओं के आपसी रंजिश और विचारधाराओं की गड़बड़ीयों ने उन्हें इन दोनों पार्टियों से अलग कर दिया। 

 

वह वामपंथ और समाजवादी पार्टी तथा उनके नेताओं के वह तिखे आलोचक थे। अपनी किताब आम्बेडकरी चळवळमें उन्होंने कई समाजवादी नेताओ के बारे में काफी कुछ अच्छा और बुरा भी लिखा हैं।

कविताओं से वे सामान्य लोगों के दुखो को आवाज देते तो दलित पैंथर के नेता के रूप में वह अमानवीय बर्ताव, अत्याचार, सामाजिक न्याय के लिए संघर्ष करते। आखरी दिनों में वे शिवसेना के राजनीतिक विचारों का समर्थन करने लगे। जिससे उनके करिबी दोस्त काफी नाराज भी रहे।

उन्होंने शिवसेना के मुखपत्र सामनाके लिए कई साल तक कॉलम भी लिखा। आरएसएस के कार्यक्रमों में भी शिरकत करते रहे। संघ के एक कार्यक्रम में वे कहते हैं कि मैं संघ परिवार का सदस्य नहीं हूं, लेकिन यदि संघ सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए अपने 40-50 सालों के अनुभवों के बाद कुछ करना चाहता है तो मैं संघ को अस्पृश्य नहीं मानता हूं।

शिवसेना के हिंदुत्ववादी और फासिस्ट रवैय्ये से वे वाकिफ थे। उन्हें पता था सेना और संघ के मंच पर जाने से अनेक प्रगतिवादी दोस्त नाराज हैं। इसपर उनका कहेना था, “मैं पक्का सिद्धान्तवादी हूं और डॉ. आम्बेडकर के विचारों पर चलने वाला सर्वसाधारण कार्यकर्ता हूं। जाति प्रथा के कारण मैंने अपना बचपन खोया है। मैं महाराष्ट्र की महार जाति से संबंधित हूं और मतांतरित बौद्ध हूं।

उनके कई दोस्त आज भी नामदेव के फासिवादी समर्थन को सहीं नही मानते। इसको वे नामदेव ढ़साल कि सबसे बड़ी भूल मानते हैं। जिसका असर महाराष्ट्र के दलित राजनीति पर पड़ा आगे चलकर शिव शक्ति भीम शक्ति नामक गठबंधन में इसका परिणाम दिखने लगा। मुसलमानों के खिलाफ हुये  सांप्रदायिक दंगों में भी उसका बहुत भयावह असर देखने को मिला।

उनके बहुत से दोस्त मानते हैं कि शिवसेना में शामिल होना उनकी आर्थिक मजबूरी थी। लेकिन इस गठजोड़ से उनकी विद्रोही छवी और अब्राह्मणी भूमिका नहीं बदली। हां कुछ मामले में जरूर ढीला रवैया देखने को मिला।

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नोबेल के हकदार

उनकी हर एक कविता और लेखन मकसदी रहा हैं। उन्होंने कविताओ एक खास उद्देश्य के तहत लिखा है। उनका मकसद सामाजिक और राजनितीक व्यवस्था का बदलाव का था।

समाज के नजरिये और सोंच मे बदलाव का था, यह बदलाव उच्च-निट भेद को मिटाने का था। इन्सान को जो लोग हिन जानवर समझते थे, उनके गिरती सोंच मे परिवर्तन लाने का ये बदलाव था।

दिलीप चित्रे ने एक बार कहा भी था, “यदि भारत से किसी कवि को नोबेल पुरस्कार मिलना चाहिए तो एकमात्र नामदेव ढ़साल को।ये मुमकीन हो सकता था, गर उनकी कविताएं यूरोपीय भाषा में अनुवादित होती।

बहुत समय बाद चित्रे ने उनकी कुछ कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया जबकि चंद्रकांत देवताले ने हिन्दी में। मगर उनकी बहुत सारी कविताएं जो नोबेल प्रमाणित मानी जाती है; वह मराठी भाषियों के अलावा दीगर जुबानो में नहीं पहुंच पाई।

कविता के जानकार मानते हैं, नामदेव ने दक्षिण-एशियाई साहित्य को स्थायी रूप से प्रभावित किया था। कुछ लोग तो उन्हें भारतीय कविता का अम्बेडकर भी मानते है। खरे के मुताबिक, “आज के भारत में नामदेव रवीद्रनाथ ठाकुर से बड़ा प्रासंगिक कवि है।

उनको कविता के लिए अनेक सम्मान और पुरस्कार मिले। तो कई पुरस्कारों से वे वंचित भी रहे। ढ़साल को उनके रचनाओं के लिए महाराष्ट्र सरकार की ओर से सन 1973, 1974, 1982, 1983 में साहित्य का पुरस्कार दिया गया था।

सन 1974 में उनके पहले काव्य-संग्रह गोलपिठापर उन्हें सोवियत लँड नेहरू अवार्ड मिला।  भारत सरकार ने सन 1999 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा। सन 2001 में बर्लिन में संपन्न इंटरनेशनल लिटरेरी फेस्टिवल में आपने भारत का प्रतिनिधित्व किया था। सन 2004 में साहित्य अकादमी ने आपको गोल्ड़न लाइफ टाइम एचीवमेंट अवार्डसे नवाजा था।

ढ़साल लम्बे समय से कैंसर से जूझते रहे और 2014 के 15 जनवरी की सुबह मुंबई के बॉम्बे हॉस्पिटल में जिन्दगी की जंग हार गए। भेदभाव से वर्जित एक समतामूलक समाज की स्थापना की करना इनका अहम मकसद था, अपनी इस मुहिम को अधुरा छ़ोडकर वे हमेशा के लिए रुखसत हुये

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कलीम अज़ीम

हिन्दी, उर्दू और मराठी भाषा में लिखते हैं। कई मेनस्ट्रीम वेबसाईट और पत्रिका मेंं राजनीति, राष्ट्रवाद, मुस्लिम समस्या और साहित्य पर नियमित लेखन। पत्र-पत्रिकाओ मेें मुस्लिम विषयों पर चिंतन प्रकाशित होते हैं।