कभी किसी के शागिर्द नहीं बने उस्ताद ग़ालिब

कभी किसी के शागिर्द नहीं बने उस्ताद ग़ालिब
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ज से 207 साल पहले की आगरा की धरती पर जन्म लिया था उस शख्स ने। उस जैसा आज तक कोई दूसरा नहीं हुआ और आगे शायद ही हो। वह बचपन से ही कोई आम शख्स नहीं था। उसे तो जैसे ईश्वर ने बड़ी तबीयत से गड़ा इस जहां के लिए। उसके हृदय में दुनिया के तमाम क कवि हृदयों को समेटकर एक साथ डाल दिया गया।

उसके मस्तिष्क में जीवन दर्शन की अंतिम ज्योति भी प्रज्वलित कर दी गई और ईश्वर भी उस शख्स को गढ़ने के दौरान कवि हृदय की असीम गहराइयों मानव जीवन दर्शन के अनंत ज्ञान लोक में खो गए। तभी तो वह उस नायाब शख्स की तकदीर पर विशेष ध्यान ना दे सके।

उस शख्स के जीवन काल की भौतिक समृद्धि और पारिवारिक सुख से नजरें चुग गई। लेकिन जो दिया दिल खोल कर दिया। जैसा आज तक किसी ना किसी को ना मिला। तभी तो उस शख्स की के अक्स को मिटा-छिपा पाने में वक्त की परते नाकाम है और उस शख्स की जुबान से निकले शेर के एक-एक शब्द की गहराई में उतरना एक नए अनुभव से गुजरना लगता है।

जाहिर है हम बात कर रहे हैं उसी अजीम शख्स की जिसका पूरा नाम मिर्जा असद उल्लाह खां था और सारा जमाना जिसे मिर्जा गालिब के नाम से जानता था।

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शायरी की जादूगरी

बड़ी बड़ी बादामी आंखों और सुर्ख गोरे रंग वाले मिर्जा गालिब का व्यक्तित्व बेहद आकर्षक था। ऐबक तुर्क वंश के इसी शख्स का मिजाज इरानी, धार्मिक विश्वासी अरबी, शिक्षा-दीक्षा फारसी भाषा उर्दू और संस्कार भारतीय था।

दस-ग्याराह साल की उम्र में मकतब (पाठशाला) में पढ़ाई के दौरान ही ग़ालिब की जुबां पर एक से बढ़कर एक शेर निकलने लगे थे। शेर सुनकर वह लोग अक्सर उनकी उसकी अवस्था और शेर के ऊंचे दर्जे के सेब भौचक्के रह जाते थे।

इस शख्स ने तो 25 पार करने से पूर्व ही उच्च कोटि के कसीदे और गजलें कह डाली थी। 30-32 के होते होते गालिब ने अपने शेर शेरो शायरी की जादूगरी से कोलकाता से दिल्ली तक हलचल मचा दी थी।

उस जमाने में दिल्ली में खासा शायराना माहौल हुआ करता था। दिल्ली के बादशाह बहादुर शाह जफर खुद शायर थे। आए दिन शेरो शायरी की महफिल जमती। इन महफिलों में गालिब ने अपने कलाम पढकर न जाने कितने मुशायरे लूट लिए।

इस शख्स के शेर तो खासम खास होते ही थे, अंदाज ए बयां (शेर कहने का ढंग) भी अलादिहा (अलग) था। जिस पर वह सुनने वाले लूट लूट जाते थे। उस्तादों के उस्ताद गालिब पर भी किसी उस्ताद के शायर के शागिर्द नहीं बने।

उन्हें तो जैसे कवित्ममय इस सुंदर दुनिया की रचना करने वाले सबसे बड़े उस्ताद ने ऊपर से ही सब कुछ सिखा कर धरती पर भेजा था। इतना कि वे शायरी जगत के समकालीन बड़े बड़े उस्तादों के शेरों की नुक्ताचीनी भी कर दिया करते थे।

जैसा कि हर शख्स हर उस शख्स की मिजाज का मिजाज कुछ खास होता है, जो आम से हटकर और असाधारण प्रतिभा का धनी होता है। गालिब का मिजाज भी बेशक अलाहिदा था।

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अजीम शख्स़ियत

दृढ स्वाभिमानी, जो निश्चित कर लिया वह ब्रह्मलकीर, जो कह दिया उससे डिगना नामुमकिन। उनकी भौतिक तकदीर सजाने में जैसे ईश्वर से चूक हो गई हो। उनका जीवन इस धरती पर भौतिक सुख के लिए सदा तरसता रहा। लेकिन उन्होंने इसके लिए कभी अपने मिजाज या कहे स्वाभिमान से समझौता नहीं किया।

इस अजीम शख्स के जीवन में धन की तंगी तो रही, पारिवारिक सुख भी बहुत कम ही मिला। आगरा में 27 दिसंबर 1797 में जन्म लेने के कुछ एक साल बाद ही पिता और चाचाजी चल बसे। बचपन में ही वे अनाथ सरीखे हो गए। लालन-पालन ननिहाल आगरा में हुआ।

इसके बाद जब से उन्होंने होश संभाला, आर्थिक तंगहाली को अपने साथ पाया, जो  ताजिन्दगी उनके साथ ही रहा। लेकिन उससे उस शख्स ने कभी हार नहीं मानी। उनके जीवन शैली कोई आम नहीं, रईसों की थी। कर्ज में डूबकर ही सही, अपने रईसी शौक से भी उन्हें तोबा नहीं की।

करेला, इमली के फूल, चने की दाल, अंगूर, आम, कबाब, शराब, मधुराग और सुंदर मुखड़े सदा उन्हें आकर्षित करते रहे। तभी तो गालिब ने एक शेर में कहा था

कर्ज की पीते थे मय और समझते थे कि हाँ

रंग लाएगी हमारी फाका मस्ती एक दिन

दिलचस्प यह है कि एक तरफ गालिब को कर्ज के पहाड़ ने अपने घर में बंद रहने तक मजबूर कर दिया। क्योंकि एक दीवानी मुकदमे में उनके खिलाफ 5000 की डिग्री हो गई और उस जमाने में कर्जदार व्यक्ति यदि प्रतिष्ठित है तो उसे घर के अंदर से गिरफ्तार नहीं किया जा सकता था।

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अंग्रेज भी थे कदरदान

दूसरी तरफ उन्हें शतरंज और चौसर खेलने का भी शौक था। दिल्ली के चांदनी चौक के कुछ जौहरी मित्रों के बीच जुआ चल करता था, जो गालिब के घर पर ही जुआ खेलने पहुंच जाते थे।

बादशाह घराने के कई लोग धनवान जोहरी से लेकर शराब विक्रेताओं तक और दिल्ली के पंडितों विद्वानों से लेकर अंग्रेज अधिकारियों तक अनेक लोग इस शख्स की बेमिसाल शायरी के कदरदान थे और जो इनके साथ मित्र भी हुआ करते थे।

20 25 साल की उम्र होने से पहले जवानी में ग़ालिब नृत्य, संगीत, शराब, सुंदरता और जुए के रंगीन दुनिया से खासे मोहित रहे। मगर इसके बाद इससे बहुत हद तक मोहभंग हो गया।

यह वक्त जैसे इस शख्स की जीवन का अहम मोड़ था। वह जीवन की जीवन दर्शन की दिशा में चल पड़े।

इस दौर में उन्होंने एक शेर लिखा-

हम मुवाहिद हैं, हमारा केश है तर्के-रसुम

मिल्लतें जब मिट गई, अजज़ाए-ईमां हो गई।

मतलब यह कि, हम एकेश्‍वरी हैं। हमारा धर्म रूढ़ियों का त्याग है। सांप्रदायिकता का लुप्त हो जाना ही सत्य धर्म का प्रकट होना है।

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अपने ही शेरों की आलोचना

उनकी शायरियों में सूफियों जैसे स्वतंत्र और धर्मनिरपेक्ष विचार वाले विचार व्यक्त होने लगे। गालिब से पहले उर्दू शायरी में गुलो-बुलबुल, हुस्ने इश्क आदि के रंग कुछ ज्यादा ही हुआ करते थे। वह गालिब को पसंद न था। इसे वे ग़ज़ल की तंग गली कहते थे।

जिससे वह अपने शेयरों के साथ गुजर नहीं सकते थे। इसलिए उन्होंने ऐसी शायरी करने वाले उस्तादों को अपने शहरों में खूब लताड़ा। इसके कारण उन इन उस्तादों द्वारा उनका मजाक उड़ाया जाता था। जिसकी उन्होंने कभी परवाह नहीं की।

वहीं ग़ालिब के शेरों की आलोचना उनसे खिसीयाए या घबराए उस्तादों ने नहीं की उतनी उन्होंने स्वयं की। यह अजीब ही था कि ग़ालिब अपनी शेरो शायरी के कटु आलोचक भी रहे। तभी तो उन्होंने बचपन से लेकर जिंदगी के अंतिम दौर तक असंख्य शेर लिखें।

जब दीवान ए ग़ालिब संकलन तायार करना शुरू किया तो अपने 2000 शेरों को बड़ी बेदर्दी से निरस्त कर दिया। इस वजह से कि ग़ालिब का यह महान संकलन छोटा तो रहा। लेकिन इसमें जो शेर है वह उर्दू शायरी के सर्वश्रेष्ठ मूल्यों से सिंचित है जिसे पढ़ने से आध्यात्मिक आनंद की अनुभूति होती है।

*उदय केसरी का ये आलेख 26 दिसंबर 2008 को  लोकमत समाचार में छपा था

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टीम डेक्कन

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