सूफी-संतो को कभी नहीं थी जन्नत की लालसा!

सूफी-संतो को कभी नहीं थी जन्नत की लालसा!
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मुस्लिम शासकों द्वारा सिंध व उत्तर भारत पर कब्ज़ा किए जाने से पूर्व अरब व्यापारी मलबार तटों पर इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए आये।

उन्होंने यहां मस्जिदों का निर्माण किया और स्थानीय महिलाओं से विवाह करके भारत में अपने घर बनाए। उन्हें नोपलह’ (मोपला) शब्द से नवाजा गया, जिसे दामाद शब्द का पर्याय माना जाता है। इस तरह मलबार क्षेत्र में उनके आगमन पर कोई नकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं देखी गई।

लेकिन वहीं उत्तर भारत में स्थिति इसके ठीक विपरीत रही। मुस्लिम आक्रमणकारियों को पंजाब व दिल्ली के रास्ते में कड़े मुकाबले व संघर्ष का सामना करना पड़ा।

स्थानीय जनमानस में उनकी छवि एक हमलावर शत्रु जैसी थी, जिन्हें स्थानीय लोग मलेच्छकहकर संबोधित करते थे। उन्होंने इनसे किसी भी तरह का मेल-मिलाप करना पसंद नहीं किया।

ये आक्रमणकारी स्थानीय लोगों की भाषा नहीं बोल सकते थे और अरबी, टर्किश, पश्तो और फारसी बोलते थे। सौभाग्य से उनके साथ कुछ ऐसे आध्यात्मिक संतों के कुछ ऐसे परिवार थे जो अपने देशों में सताये हुए और अत्याचारों से त्रस्त थे।

उन्होंने अपने डेरे शासकों के महलों और उमरों की हवेलियों से दूर बसाए। उन्होंने स्थानीय लोगों से संवाद स्थापित किया, उनकी भाषा सीखी और उन्हें शांति और प्रेम का पाठ पढ़ाया। वे सूफी के रूप में जाने जाते थे।

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रूढि़वादी उलेमाओं से परहेज

सूफी शब्द सूफशब्द से बना है, जिसके उच्चारण की वजह है कि वे मोटे खुरदुरे ऊनी वस्त्र धारण किए रहते थे। वे विभिन्न मत-मतांतरों में विभाजित थे, जिनमें से 12 की स्पष्ट पहचान की गई थी।

इनमें सर्वाधिक लोकप्रिय चिश्ती थे जो मूल रूप से अफगानिस्तान के चिश्त के रहने वाले थे। इनमें सबसे प्रमुख थे अजमेर के ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (1236 सवीं) तथा दिल्ली के हजरत निजामुद्दीन (1334 सवीं)।

इन चिश्तियों ने सुल्तान और उमरों से सम्मानजनक दूरी बनाए रखी। वे सुल्तानों को प्रशासन व न्याय के मामले में परामर्श देने वाले रूढि़वादी उलेमाओं से भी परहेज करते रहे हैं। सूफी दरगाहों का माहौल रूहानी था और वहां कव्वाली, रूहानी समागम व लंगरों का आयोजन होता था।

इनमें धनी-निर्धन और सभी जातियों के लोग शामिल होते थे। तत्कालीन सुल्तान और उमर उन्हें सम्मान देने वहां अकसर आते थे। सूफी सुल्तानों के महलों में जाने से परहेज करते थे, हालांकि इसके कुछ अपवाद भी थे। लेकिन इसके बावजूद चिश्ती शासक वर्ग से टकराव करने से बचते रहे हैं।

ये सूफी सांसारिक भोगों से परहेज में विश्वास करते थे। उस काल के कुछ सूफियों के कथनों से इस बात का पता चलता है। बसरा के हसन (बसरी) (728 सवीं), जो भारत के पहले सूफी कहे जाते हैं, उन्होंने कहा था संसार सांस की तरह है, उसकी छुओ तो मुलायम लगता है लेकिन उसका विष जान लेने वाला होता है।

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नहीं थी जन्नत की लालसा

शुरुआती दौर की महिला सूफी राबिया (बसरी) (801 सवीं) प्रार्थना का मकसद कुछ यूं बयां करती हैं – “हे मेरे खुदा! यदि मैं जहन्नूम के डर से दुआ करती हूं तो मुझे जहन्नूम में भस्म कर दे। यदि जन्नत की लालसा में प्रार्थना करती हूं तो मुझे जन्नत से बाहर फेंक दे। यदि मैं तुम्हारी दुआ सिर्फ तुम्हारे लिये करती हूं तो वह स्वार्थों से दूर इलाही नज़ारे के लिए हो।

फातिमा हुसैन की हालिया प्रकाशित किताब दि वार दैट  वाज़ नॉट : दि सूफी एंड दि सुल्तान (मुंशीराम मनोहरलाल से प्रकाशित)। सूफी-संतों की विस्तृत गाथा को पढ़ते हुए पाठक मंत्रमुग्ध हो जाता है।

डॉ. हुसैन लेडी श्रीराम कालेज और जेएनयू में पढ़ी-खिली हैं और आजकल दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर हैं। यह किताब उनके उस शोध-कार्य का पुस्तक रूप है, जो उन्होंने पीएचडी के लिए चुना था।

अन्य अकादमिक सामग्री के जैसे ही इसमें भी विस्तृत आंकड़ों व नामों का विस्तृत विवरण है जो कभी भी पठनीयता में खासा रुकावट पैदा करता है। इसके बावजूद यह हिंदू-मुस्लिम संबंधों का अध्ययन करने वाले शोध-छात्रों के लिए महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध कराती है।

* मशहूर लेखक खुशवंत सिंह का ये आलेख 2010 में दैनिक ट्रिब्यून में प्रकाशित हुआ था

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टीम डेक्कन

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