क्या इस्लाम मुस्लिम महिलाओं को आधुनिकता से रोकता है?

क्या इस्लाम मुस्लिम महिलाओं को आधुनिकता से रोकता है?
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बीसवीं सदी के अंतिम हिस्से और 21वीं सदी के शुरुआती दौर में पारंपरिक इस्लामविशेष रूप से सल्फ़ी इस्लाम को दोबारा उभरते हुए देखा गया। कोई भी समाज केवल विकास ही नहीं करता है बल्कि विकास के लिए किए गए उपाय कई समस्याओं को भी लाते हैं। इसके सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों के अलावा आर्थिक और राजनीतिक दोनों कारण हैं जिन पर यहां चर्चा नहीं की जा रहा है।

ऊदी अरब कि शायरा (कवियित्री) हिसास हलाल (Hissas Hilal) ने 2010 में अपने देश में महिलाओं के प्रति सख्त प्रतिबंधों के खिलाफ बोली। दरअसल उन्होंने एक टीवी चैनल कार्यक्रम में अपने गुस्से का इज़हार किया। सच माने तो यह विरोध की आवाज थी और बहुत ही साहसपूर्ण और अकल्पनीय विरोध था। ऐसा विरोध सऊदी अरब के जैसे समाज में शायद ही कोई सोच सकता हों। यह विरोध उनकी कविता में था।

उन्होंने अपने कविता में कहा, नक़ाब में छिपे अपने चेहरे के साथ उन्होंने इस्लामी प्रचारकों के बारे में कहा था कि जो लोग सत्ता में बैठे है, वह अपने फतवे से लोगो को डरा रहे हैं, और उनकी शांति भंग करना चाहते हैं। वे लोगों का  एक लोमड़ी की तरह शिकार कर रहे हैं।

महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें दर्शकों की जबर्दस्त दाद व तारिफ मिली और वह प्रतियोगिता के फाइनल में जगह बना सकीं। इसके कारण उन्हें मौत की धमकी भी मिली जो कई उग्रवादी वेबसाइटों पर पोस्ट की गई थी। धार्मिक मामलों में सल्फ़ी विद्वानों की मानने वाली सऊदी सरकार इस्लामी परंपरा के नाम पर महिलाओं पर सख्त प्रतिबंध बरकरार रखने पर अड़ी हुई है। महिलाओं को उनके अधिकार और ज़मीर की आवाज़ के अनुसार स्वतंत्र चुनाव करने देने से मना करती हैं।

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ऐसा सभी मुस्लिम देशों में नहीं हो सकता है लेकिन पारंपरिक मुस्लिम समाज कई प्रतिबंध लगाता हैं और अब भी इनमें किसी तरह की रियायत देने के लिए तैयार नहीं है। जिस तरह का हिजाब कई महिलाएं पहनती हैं जिसमें वह अपने चेहरे को ढंकती हैं और आंखों के लिए बने दो सुराखों से ही दुनिया को देखती हैं। हिजाब मुस्लिम उलेमा, फुकहा (धर्मशास्त्रियों) और आधुनिक बुद्धिजीवियों के बीच विवादास्पद रहा है। सवाल ये है कि क्या किया जाना चाहिए?

कोई भी ग्लोबलाईज़्ड (Globalised) दुनिया में तेज़ परिवर्तन से इनकार नहीं कर सकता है और इससे पारंपरिक समाजों में वर्तमान प्रतिबंधों को बनाए रखना कठिन हो रहा है। यह विवाद तभी से जारी है जब 19वीं सदी में आधुनिकता का दावा किया गया। मुस्लिम देशों में कई सुधार हुए और कुछ हद तक महिलाएं स्वतंत्रता प्राप्त कर सकीं हैं।

लेकिन बीसवीं सदी के अंतिम हिस्से और 21वीं सदी के शुरुआती दौर में पारंपरिक इस्लाम, विशेष रूप से सल्फ़ी इस्लाम को दोबारा उभरते हुए देखा गया। कोई भी समाज केवल विकास ही नहीं करता है बल्कि विकास के लिए किए गए उपाय कई समस्याओं को भी लाते हैं। इसके सामाजिक और सांस्कृतिक कारणों के अलावा आर्थिक और राजनीतिक दोनों कारण हैं जिन पर यहां चर्चा नहीं की जा रहा है। पारंपरिक और आधुनिकता के बीच जटिल प्रकृति का ये तनाव एक चुनौती और अवसर दोनों है।

इस बहस में जो सबसे महत्वपूर्ण है और जिसे अक्सर अनदेखा भी किया जाता है, वो ये कि हम इस्लाम के नाम पर जिस पर अमल करते हैं वह धर्म या पवित्र किताबों की शिक्षा के अनुसार कम और संस्कृति के नाम पर अधिक करते हैं और इसके अलावा महिलाओं पर लगे प्रतिबंधों का विरोध या रक्षा करते समय भी बहुत सी परंपराओं पर निर्भर करते हैं।

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इसका एक बेहतरीन उदाहरण पाकिस्तान से हाल ही में प्रकाशित हुई प्रो. खुर्शीद आलम (Prof. Khurshid Alam) की किताब चेहरे का पर्दा वाजिब है या गैर-वाजिब” (Chehre ka parda wajib ya ghair wajib) है। यह दो काबिल आलिमों के बीच उलेमाई बहस है जिसमें एक आलिम चेहरे के पर्दे का बचाव कर रहे हैं और दूसरे विद्वान इसका विरोध कर रहे हैं।

लेकिन किताब पूरी तरह मध्यकाल के कई उलमा द्वारा पैगम्बर मुहंमद (स) (Prophet Mohammad) और उनके सहाबा (साथी) के परस्पर विरोधी परंपराओं के हवाले पर निर्भर करती है। आपको दोनों तरह की कई हदीसों मिलेंगी जो चेहरे के पर्दे पर जोर देती हैं या अनावश्यक मानती हैं और दोनों उलेमा अपनी बात को साबित करने के लिए इन्हीं हदीसों को हवाले के तौर पर पेश करते हैं। ये विचारधारा सिर्फ पारंपरिक संस्कृति वाले इस्लाम को मजबूत करती है।

हमें इस तथ्य की अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि ज़्यादातर हदीस (सिवाय चरित्र, नैतिकता और इबादत के बारे में) एक तरफ अरब संस्कृति को प्रदर्शित करती हैं और दूसरी ओर मध्यकालीन दौर के पश्चिमी एशियाई या मध्य एशियाई संस्कृति को प्रदर्शित करती हैं। धार्मिक कानूनों (Shari’ah) के विशेषज्ञों का मानना ​​है कि अरब समाज की आदतें शरई कानून का हिस्सा बन सकती हैं और कई धार्मिक क़ानून में अरब की आदतें शामिल हैं।

 

जिस किताब का मैं हवाला दे रहा हूँ इसमें क़ुरआन का बहुत कम रास्त नुक्तए नज़र (प्रत्यक्ष दृष्टिकोण) है या संबंधित कुरआनी आयात (Qur’anic verses) पर नई व्याख्या नहीं है। मुसलमान फुकहा (धर्मशास्त्री) और उलमा को यह समझना होगा कि अरब समाज की आदतें खुदादाद नहीं हैं और इसीलिए ये धार्मिक कानून के लिए आवश्यक बुनियादी ढाँचा नहीं बन सकती हैं।

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महिलाओं से सम्बंधित कुरआन की आयतों पर सीधे तौर पर विचार कर और नई तफहीम (व्याख्या) द्वारा इस सांस्कृतिक आधार को बदल सकते हैं। यह कोशिश व्यक्तिगत प्रतिष्ठा और महिलाओं के चयन की स्वतंत्रता को कायम करेगा। ज़मीर की आज़ादी कुरआन का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त है और इसी तरह व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी है। मध्यकाल के पारंपरिक सांस्कृतिक संस्कार (रसूमात) की तुलना में कुरआन मानव प्रतिष्ठा और स्वतंत्रता से कहीं अधिक सामंजस्य रखती है।

इस दृष्टिकोण से शरई कानून की इलाही (दिव्य) प्रकृति को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा और यह कुरआन की आत्मा की तुलना में अरब संस्कृति के सामंती मूल्यों को शामिल करने वाली पारंपरिक संस्कृति के आधार से आज़ाद भी करेगी। यह महिलाओं को भी प्रतिबंध से मुक्त करेगी और उन्हें सम्मान और स्वतंत्रता का एहसास देकर परंपरा और आधुनिकता के बीच तनाव को कम करेगी।

इस मौके को नहीं खोना चाहिए वरना यह महिलाओं में मानसिक पीड़ा का कारण बनेगा और जो उनके लिए चुनाव की कशमकश को पैदा करेगा। अधिकांश मुस्लिम महिलाएं अपने धर्म का पालन करना चाहती हैं और साथ ही आधुनिकता के कुछ लाभ का आनंद भी हासिल करना चाहती हैं। मुसलमान फुकहा (धर्मशास्त्रियों) और उलमा को इस पीड़ा को समाप्त करना चाहिए।

(मूल अंग्रेजी का लेख आप यहां पढ सकते हैं)

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असगर अली इंजीनियर

एक भारतीय सुधारवादी-लेखक और सामाजिक कार्यकर्ता थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस्लाम में मुक्ति धर्मशास्त्र पर उनके काम के लिए जाना जाता है, उन्होंने प्रगतिशील दाउदी बोहरा आंदोलन का नेतृत्व किया। लिबरल इस्लाम के प्रवर्तक के रूप उन्हे दुनियाभर में ख्याती मिली थी। इस्लाम, महिला सक्षमीकरण, राजनीति और मुसलमानों के सामाजिक अध्ययन पर उनकी 50 से अधिक पुस्तके प्रकाशित हुई हैं।