इबने तुमरत वह अरब फ़िलोसॉफ़र जिसने खिलाफ़त में मचाई हलचले

इबने तुमरत वह अरब फ़िलोसॉफ़र जिसने खिलाफ़त में मचाई हलचले
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इबने तुमरात की लिखी मघरेबी स्क्रीप्ट की पाण्डुलिपी


बारहवीं सदी (1121 ईसवीं -1269 ईसवीं) में उत्तर अफ़्रीका (तत्कालीन मग़रिब) में बर्बर मसमुदा का राजनैतिक, धार्मिक और सामाजिक आंदोलन उठा जिसका नेतृत्व अबु अब्दुल्ला मुहंमद इबने तुमरत (Ibn Tumart) (1080 ईसवीं-1130 ईसवीं) ने किया। शुरुआती दौर में इबने तुमरत का पूरा ज़ोर धार्मिक आस्थाओं के शुद्धिकरण पर था। तत्समय उत्तरी अफ़्रीका पर अल मुराबितून वंश की ख़िलाफ़त (Almoravid dynasty) का आधिपत्य था।

इबने तुमरत ने स्पेन में शिक्षा ग्रहण की और बाद में वह बग़दाद गया जहाँ अब्बासी ख़िलाफ़त के प्राश्रय में प्रचलित अशअरी विचारधारा और अल ग़जाली (1058 ईसवीं - 1111 ईसवीं) के संपर्क और प्रभाव में आया जिन्हें पश्चिम में Algazelus और Algazel के नाम से जाना जाता है।

विभिन्न धाराओं के अध्ययन के बाद इबने तुमरत ने जिस विचारधारा की उत्पत्ति की उसे प्रोटो-वाहाबियत कहा जा सकता है। उसने एक-ईश्वरवाद (तौहीद) की अपनी व्याख्या प्रस्तुत की और अल्लाह के अल अस्मा अल हसना (Attributes of Allah) के स्वतंत्र वजूद के पक्ष में प्रचलित धारा के विरुद्ध मुखर विरोध शुरू किया।

उसके आंदोलन से जुड़े लोग और अनुसरण करने वाले लोग अल मुवाहिदून (पश्चिम में Almohads) जाने गये। 1117 ईसवीं में इबने तुमरत मग़रिब लौटा और उसने अपनी विचारधारा का प्रचार शुरू किया जिसके अंतर्गत धर्मगुरुओं से शास्त्रार्थ, वाद विवाद और विलासिता और उसके साधनों के विरोध में शराब की दुकानों पर हमले और बाज़ारों में दंगे किये।

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मालिकी मज़हबका विरोध

अल मुराबितून ख़िलाफत में राज्यदर्जा प्राप्त मालिकी मज़हबका मुखर विरोध किया क्योंकि उसके अनुसार मालिकी न्यायशास्त्र (jurisprudence) क़ुरआन और सुन्नत के अतिरिक्त इजमा (Consensus) को भी महत्व देता था।

दरअसल शरीयत में इजमा या क़ियास (Analogy) का विरोध जिस धारा ने शुरू किया था उसे ज़ाहिरी’/‘दाऊदीविचारधारा के नाम से जाना जाता है जिसकी आधारशिला नौंवी सदी में दाऊद अल-ज़ाहिरी (815 ईसवीं-883 ईसवीं) में रखी थी।

अपने क्रिया-कलापों के कारण इबने तुमरत को फ़ेज़से निष्कासित कर दिया और वह मोरोक्को चला गया जहाँ संयोग से एक दिन स्थानीय मस्जिद में मुराबितून अमीर अली इबने यूसुफ़ से उसका सामना हो गया। तत्काल उसने, अमीर और उसके उलेमा को मुनाज़रे (Doctrinal debate) की चुनौती दे डाली।

शास्त्रार्थ में इबने तुमरत विफल हो गया, उलेमा ने यह निष्कर्ष दिया कि इबने तुमरत के विचार ख़तरनाक और धर्मविरोधी (blasphemous) हैं और मृत्युदण्ड तजवीज़ किया गया, लेकिन अमीर ने दयाभाव का प्रदर्शन करते हुए केवल निर्वासन का दण्ड दिया। इबने तुमरत अपने मूल गाँव इगिलिज़ के निकट सौज़ घाटी की एक गुफा में सन्यासी के रूप में जीवन व्यतीत करने लगा।

अक्सर वह लोगों के मध्य भाषणों में चरमपंथी विचार प्रकट करता और इस आधार पर धार्मिक सुधार की बात करता जो धीरे-धीरे अवाम में मक़बूलियत ग्रहण करने लगे। अल-मुराबितून ख़िलाफ़त को अपने वैचारिक आंदोलन से प्रभावित करने में असफल रहने पर उसने 1121 ईसवीं में स्वयं को इमाम मेहदीघोषित करते हुए सशस्त्र आंदोलन की घोषणा कर दी। अपने एक शिष्य उमर हीनताई के मशवरे पर अल-अतलस-अल कबीर (High Atlas) की घाटी में क़िलाबंदी करके अल मुवाहिदून आंदोलन की आध्यात्मिक और राजनैतिक गतिविधियों का केंद्र स्थापित कर लिया।

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अल मुवाहिदून ख़िलाफ़त

इबने तुमरत ने पहला काम यह किया कि तमाम मसमूदा कबीलों को एक सूत्र में बंधा और केंद्र पर कम्यूनक़िस्म की स्थापना करते हुए विशुद्ध धार्मिक जीवन शैली को प्रचलित कराया। इसके बाद मुराबितून रियासत के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध की शुरुआत की जिसका सिलसिला आठ साल तक जारी रहा।

1130 के शुरुआत में इसके निकट साथी अल बशीर ने सैन्य कमान संभाली और खुले तौर पर मुराबितून ख़िलाफ़त के विरुद्ध विद्रोह की घोषणा कर दी।

शुरू में मुराबितून सैनिक कमज़ोर प्रतीत हुए लेकिन मई तक अल मुवाहिदून विद्रोह को कुचल दिया गया और विद्रोहियों को भारी हानि उठाना पड़ी जिसमें आधे से अधिक अल मुवाहिदून नेतृत्व ख़त्म हो गया। अगस्त 1130 ईसवीं में इबने तुमरत की भी मौत हो गई।

इबने तुमरत ने जिस प्रकार आंदोलन के ख़द ओ ख़ाल तराशे थे उस से इस आंदोलन का ख़ात्मा इतनी आसानी से और इतनी शीघ्र होना नामुमकीन था। इबने तुमरत की मौत के बाद उत्तराधिकार के संघर्ष के बाद नेतृत्व की बागडोर अब्दुल मुमीन के हाथ में आयी।

1132 ईसवीं में अब्दुल मुमीन के नेतृत्व में अल मुवाहिदून आंदोलनकारियों ने नई ऊर्जा के साथ मुराबितून सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह प्रारंभ कर दिया जिसके अपेक्षित परिणाम सामने आने लगे। अब्दुल मुमीन की मौत (1163 ईसवीं) तक ना केवल मुराबितून ख़िलाफ़त को उखाड़ फेंका गया बल्कि मिस्र तक अल मुवाहिदून ख़िलाफ़तख़िलाफ़त स्थापित हो गई।

1173 ईसवीं में हिस्पेनैया की उमैय्या ख़िलाफ़त जिसे अंदलूसिया के नाम से जाना जाता है, भी अल मुवाहिदून आंदोलन की भेंट चढ़ गई। इस प्रकार 12 वीं सदी में अब्बासी ख़िलाफ़त के मुक़ाबले में स्पेन में अल मुवाहिदून ख़िलाफ़त वजूद में आयी जिसकी राजधानी करोडोवा (Córdoba) से सेविल्ली स्थानांरित हो गयी।

अल मुवाहिदून ख़िलाफ़त स्थापित हो जाने के बाद पुरातन वैचारिक आंदोलन को भी कतिपय पड़ावों से गुजरना पड़ा, और धीरे-धीरे अल मुवाहिदून ख़िलाफ़त अपने प्रतिद्वंदी मुराबितून ख़िलाफ़त से भी वैचारिक रूप से भी अधिक मॉडरेट हो गयी जिसमें अल याक़ूब अल मंसूर का विशेष योगदान कहा जाता है जिसने अरब जगत के सुप्रसिद्ध दार्शनिक इबने रुशद को प्रश्रय (Patronage) प्रदान किया।

(लेखक असग़र मेहदी स्वतंत्र टिपण्णीकार हैं।)

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टीम डेक्कन

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