टीवी मीडिया का अंधायुग और टीआरपी की होड़

टीवी मीडिया का अंधायुग और टीआरपी की होड़
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हाराष्ट्र और मुंबई किसी के बाप की नहीं है। मुंबई मराठियों के बाप की है‚ जो इसे नहीं मानता वह अपने असली बाप का नाम बताए। जो उखाड़ना हो उखाड़ लो। उखाड़ दिया। मुंबई पीओके है। मेरा घर राम मंदिर है‚ वहां फिर बाबर आया है। उद्धव ठाकरे‚ आज मेरा घर टूटा है कल तेरा घमंड टूटेगा। हरामखोर‚ नॉटी गर्ल‚ एक दूसरे की औकात देख लेने से होते हुए बॉलीवुड में ड्रग्स और नशे के गटर के रास्ते पूरा मसला संसद तक जा पहुंचा है।

बात थाली की होने लगी। जब बीजेपी सांसद और भोजपुरिया अभिनेता रविकिशन ने बॉलीवुड के ड्रग्स गटर का मुद्दा उठाया तो जया बच्चन ने कह डाला कि जिस थाली में खाते हो उसी में छेद करते हो। कंगना फिर मैदान में उतरीं और कैसी थालीॽ किसकी थाली का सवाल उठाते हुए कह डाला कि आपकी बॉलीवुड की थाली में हीरोइनों को सिर्फ 2 मिनट का रोल मिलता है और उसके बदले उसे पूरी रात हीरो के साथ गुजारनी पड़ती है।

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क्या अनदेखा हो रहा है?

टीवी न्यूज चैनलों के क्रिएट किए हुए ये सारे सवाल आज विमर्श और डिबेट के मुख्य विषय हैं। करीब तीन महीने पहले सुशांत सिंह राजपूत की रहस्यमय मौत से शुरू होकर बिहार‚ सुप्रीम कोर्ट‚ सीबीआई‚ ईडी और नारकोटिक्स ब्यूरो से होते हुए रिया नाम की ‘विषकन्या'''''''''''''''' की गिरफ्तारी के बाद अब यह एक नया आकार ले रहा है।
टेलीविजन ने ही इन्हें इतना बड़ा मुद्दा बना दिया कि नेता‚ अभिनेता‚ पुलिस‚ सीबीआई‚ सरकार और विपक्ष सब इसके लपेटे में हैं। लगता है कि देश ये टीवी चैनल चला रहे हैं और कई बार ये भी लगता है कि टीवी चैनल वही चला–दिखा रहे हैं जो सत्ताधारी और सरकारें चाहती हैं। इसका ठीक–ठीक अंदाजा लगा पाना कठिन है।

देश अभूतपूर्व संकट के दौर से गुजर रहा है। कोरोना महामारी पूरे देश को चपेट में लेती जा रही है। रोजाना कोरोना संक्रमितों के करीब 1 लाख नये मामले आ रहे हैं। अमेरिका के बाद भारत दूसरे स्थान पर है। यही रफ्तार रही तो साल बीतते–बीतते भारत पहले नम्बर पर होगा।
डर और रोजी–रोटी से जूझते गरीब‚ मध्यवर्ग अपने आपको को अजीब किस्म के अंधकारमय भविष्य में जाते देख रहे हैं। करीब दो करोड़ लोगों की नौकरियां जा चुकी हैं। करीब 12 करोड़ असंगठित कामगार बेरोजगार हो चुके हैं।

धीरे–धीरे वे काम पर लौट भी रहे हैं तो बात पहले वाली नहीं है। पैसे आधे मिल पा रहे हैं। औंधे मुंह गिरती विकास दर के आंकड़े एक अलग डरावनी तस्वीर पेश कर रहे हैं। अर्थव्यवस्था आजादी के बाद के सबसे बड़े संकट से गुजर रही है। देश की सीमा पर तनाव और अंदर हिंदू–मुसलमान के बीच चौड़ी होती दीवार कोई शुभ संकेत नहीं देते।

पाकिस्तान की क्रॉस बॉर्डर फायरिंग‚ लद्दाख सीमा पर चीन और हमारी सेना के बीच आये दिन फायरिंग बड़े युद्ध का संकेत है।

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संजीदा विमर्श के दरवाजे बंद

लेकिन कुछ एक अपवाद को छोड़ दिया जाए तो हिन्दी टीवी न्यूज से ये सारे सवाल गायब हैं। टेलीविजन न्यूज चैनल समूचे देश को एक ऐसे दौर में धकेलने पर आमादा हैं‚ जहां सच–झूठ के सारे फर्क समाप्त होते दिखते हैं।

टीवी का ये शगल नया नहीं है। कभी तीन तलाक तो कभी मदरसों में आतंकी‚ कभी जेएनयू तो कभी अफजल गुरु‚ कभी धारा 370 और कश्मीर तो कभी सीएए और एनआरसी‚ जामिया और शाहीनबाग‚ कभी देशभक्त बनाम देशद्रोह का नैरेटिव तो कभी पाकिस्तान भेज देने की नसीहतें‚ मंदिर–मस्जिद के झगड़े तो कभी दिल्ली के दंगे। पिछले 5 साल से टेलीविजन न्यूज चैनलों के विमर्श के केंद्रीय प्रश्न इसी तरह के हैं।

और तो और जब दुनिया कोरोना जैसी महामारी की गिरफ्त में आ चुकी थी और हिन्दुस्तान पर खतरे के बादल मंडरा रहे थे तब भी ये सारे चैनल तब्लीगी जमात को कोरोना की मूल वजह मानकर एक धर्म विशेष को कटघरे में खड़ा करने में लगे थे। और जब महामारी ने पूरे देश में अपने पैर फैला लिए तब ये चैनल पिछले करीब तीन महीने से सुशांत–रिया और कंगना–शिवसेना को देश का सबसे बड़ा मुद्दा बना दिया है।

देर सबेर इसमें भी हिंदू–मुसलमान का कोई न कोई एक कोण जरूर आएगा। निशाने पर बॉलीवुड की सेक्युलर जमात और अवार्ड वापसी गैंग होंगे। कोई खान‚ कोई शाह‚ कोई आलम और कोई अहमद होगा। अपने स्वभाव के अनुकूल ये चैनल इसकी तलाश में जरूर लगे होंगे।
इस तमाशे को किसी न किसी रूप में बिहार चुनाव तक जिंदा रखने की कोशिश होती रहेगी। हिंदू–मुसलमान का सवाल भी बड़ा है और महत्त्वपूर्ण भी है लेकिन उसके लिए एक संजीदा विमर्श की जरूरत है।

आजादी से पहले और बाद में भी देश ने इसे गांधी जैसे महात्मा की जान गंवाने की हद तक झेला है। टीवी चैनल के स्टूडियो में बैठकर हिंदू को और ज्यादा हिंदू बनाने और मुसलमान को और ज्यादा कट्टर मुसलमान बनाने की मुहिम अंततः संजीदा विमर्श के सारे दरवाजे बंद कर देते हैं।

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पाप के भागीदार

न्यूज टेलीविजन का छोटा पर्दा शोर–शराबा‚ मारामारी‚ चिल्ला–चिल्ली‚ अपमान‚ अभद्रता और अहंकार का प्रतीक बनता दिख रहा है और उनके इस पाप के भागीदार सभी हैं। टीवी न्यूज को आत्मनियंत्रित रखने वाली न्यूज ब्राडकास्टर्स असोसिएशन (एनबीए) भी है‚ जिसे सरकार और चैनल के मालिकों ने कुछ ताकत और दायित्व दिए हैं।

देश की बड़ी अदालतों को भी आज कहना पड़ रहा है कि मीडिया ट्रायल नहीं हो सकता। यह भी पूछना पड़ रहा है कि टीवी न्यूज की कोई रेगुलेटरी बॉडी है या नहींॽ हाल में बॉम्बे और दिल्ली हाई कोर्ट ने अलग–अलग मामलों की सुनवाई करते वक्त कई सवाल पूछे हैं। इस बीच बीते 15 सितम्बर को सुप्रीम कोर्ट के एक अंतरिम आदेश और टिप्पणियां टेलीविजन न्यूज चैनलों को सावधान हो जाने का इशारा करती हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यहां तक कह दिया कि समुदाय विशेष को निशाना बनाकर टीआरपी की होड़ राष्ट्र को अस्थिर कर सकती है। प्रेस की आजादी पर अंकुश लगाने और एनबीए से अलग एक 5 लोगों की नई रेगुलेटरी अथॉरिटी की बात भी अदालत ने कही है। अगर ये हुआ तो तय मानिए कि कुछ टीवी चैनलों के कुकर्मों के चलते चोर दरवाजे से सरकारी दखल को कानूनी मुहर लगने की शुरुआत हो जाएगी।

दरअसल‚ भारत में हिन्दी टेलीविजन न्यूज 21वीं शताब्दी की खास परिघटना है। शुरुआती चार–पांच साल तक खांटी न्यूज और मनोरंजन का सिलसिला चला। 2003 के बाद बाजार में कई चैनल आए और फिर शुरू हुई टीआरपी की होड़।
सांप‚ बिच्छू से लेकर भूत–प्रेत और क्राइम के साथ‚ क्रिकेट‚ सिनेमा‚ और कंट्रोवर्सीज का कॉकटेल टीवी हिन्दी न्यूज पर लंबे समय तक छाया रहा। इसी दौर में रहस्य रोमांच से भरपूर बिना ड्राइवर वाली कार और हरियाणा के एक बालक प्रिंस के बोरवेल में गिरने और निकालने जैसे तमाशे छाए रहे।

नये युग की शुरुआत अन्ना आंदोलन और उसके बाद नरेंद्र मोदी के उदय से लेकर अब तक जारी है। ये टीवी का अंधायुग है। अंधायुग आजादी के बाद के बड़े पत्रकार और साहित्यकार धर्मवीर भारती के मशहूर नाटक का नाम है।
धर्मवीर भारती की लिखी एक कविता है–

हम सबके दामन पर दाग‚
हम सबकी आत्मा में झूठ‚
हम सबके माथे पर शर्म‚
हम सबके हाथों में टूटी तलवारों की मूठ।

धीरे धीरे टीवी के हाथों में टूटी हुई तलवारों की सिर्फ मूठ यानी हत्था ही शेष रहने वाला है। दुर्भाग्य रहा कि जैसे–जैसे टीवी बढ़ता गया अखबार की हैसियत कम होती गई। अखबारों ने अपनी राष्ट्रीय भूमिका छोड़ लोकल बनना स्वीकार कर लिया। राष्ट्र का जिम्मा हिन्दी टेलीविजन न्यूज चैनलों के हवाले कर दिया।

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टेलीविजन दर्शकों कि पसंद

टीवी दर्शकों के 2019 में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक देश में करीब 95 करोड लोग टीवी देखते हैं। इनमें कभी-कभार देखने वाले भी शामिल हैं। सबसे ज्यादा करीब 74 प्रतिशत लोग टीवी सिरियल और सिनेमा देखते हैं। करीब 9 प्रतिशत लोग न्यूज देखते हैं, जिनमें हिन्दी, अंग्रेजी औऱ क्षेत्रीय भाषाओं के न्यूज चैनल शामिल हैं।

इसमें मनोरंजन 49.9, फिल्म 23.9, न्यूज 8.9, म्यूजिक 6.4, कार्टून 6.4, स्पोर्ट्स 3.2 और अन्य 1.3 हैं। मतलब आज भी 9 प्रतिशत से भी कम लोग टीवी न्यूज देखते हैं‚ जिसमें हिन्दी टीवी न्यूज का हिस्सा 5 प्रतिशत है‚ लेकिन कुल समाज में ज्यादा है। इसलिए हिन्दी टीवी न्यूज को इसका एहसास करते हुए देर सबेर संजीदगी की तरफ लौटना होगा।

कहते हैं कि पत्रकारिता मूलतः इतिहास का ढिंढोरची है‚ लेकिन कई बार ढिंढोरा पिटते–पिटते इतिहास के कूड़ेदान में जाने का खतरा बना रहता है।
(वरिष्ठ पत्रकार अरुण पाण्डेय का लिखा यह लेख 19 सितम्बर 2020 को राष्ट्रीय सहारा में छपा था)

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author

टीम डेक्कन

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