क्या मुगल काल भारत की गुलामी का दौर था?

क्या मुगल काल भारत की गुलामी का दौर था?
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लखनऊ स्थित रुमी दरवाजा


ब जेम्स स्टुअर्ट मिल ने भारतीय इतिहास को हिन्दू काल, मुस्लिम काल और ब्रिटिश काल में विभाजित किया, उसी समय उन्होंने अंग्रेजों को ‘फूट डालो और राज करो’ की उनकी नीति को लागू करने का मजबूत हथियार दे दिया था। परंतु इसके साथ ही उन्होंने भविष्य में सांप्रदायिक राजनीति करने वालों को भी लोगों को बांटने की एक रणनीति दे दी थी।

आगे चलकर मुस्लिम सांप्रदायिक तत्वों ने यह दावा करना प्रारंभ कर दिया कि भारत पर उनका राज था। इसी तरह, सांप्रदायिक हिन्दुओं ने भी यह कहना शुरू कर दिया कि मुसलमान तो विदेशी हैं और भारत तो अनंतकाल से हिन्दुओं का देश रहा है।

भारतीयों के मानस में यह सोच कितने गहरे तक घुस चुकी है इसका सबूत है उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की यह घोषणा कि आगरा में बनने वाले मुगल संग्रहालय का नाम बदलकर छत्रपति शिवाजी महाराज संग्रहालय रखा जाएगा।

उनका तर्क है कि यदि संग्रहालय का नाम मुगल संग्रहालय होगा तो यह हमारी गुलामी का प्रतीक होगा। मुगल संग्रहालय की नींव उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने रखी थी। यह संग्रहालय आगरा में ताजमहल के पास बन रहा है जिसमें उस समय की संस्कृति और मुगल राजाओं के हथियारों का प्रदर्शन होगा। उत्तरप्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देना इस संग्रहालय के निर्माण का मुख्य लक्ष्य था।

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तीन नजरिये

हिन्दू संप्रदायवादियों द्वारा ताजमहल के महत्व को कम करने का प्रयास किया जा रहा है। पी.एन. ओक नामक एक सज्जन इसे तेजोमहालय (शिव मंदिर) बताते हैं जिसे बाद में शाहजहां ने मकबरा बना दिया।

फ्रांसीसी जौहरी टेवर्नेअर ने अपने यात्रा संस्मरणों में लिखा है कि शाहजहां ने अपनी पत्नी मुमताज महल की याद में ताजमहल बनाया था। इसी तरह, शाहजहां के दरबार की बहियों में ताजमहल पर हुए खर्च का विस्तृत विवरण दिया गया है। यह भी बताया गया है कि जिस जमीन पर ताजमहल बनाया गया है उसका मुआवजा राजा जयसिंह को देकर उसे खरीदा गया था।

जब योगी ने उत्तरप्रदेश की सत्ता संभाली तब उन्होंने ताजमहल को उत्तरप्रदेश के महत्वपूर्ण स्थलों की सूची से हटा दिया था। योगी के हालिया कथन कि मुगलों को याद करना हमारी गुलामी की प्रवृत्ति का प्रतीक है, उस सांप्रदायिक विचारधारा के अनुरूप है जो मानती है कि इस्लाम एक विदेशी धर्म है और मुसलमान विदेशी हैं।

दरअसल भारतीय इतिहास को देखने के तीन नजरिये हैं। पहला, गांधी-नेहरू नजरिया, जिसके अनुसार भारतवर्ष समृद्ध विविधता वाला मुल्क है और जिन मुस्लिम राजाओं ने भारत पर शासन किया वे भारत को अपना मानते थे। बहुसंख्यक मुस्लिम राजाओं ने भारत की बहुवादी धार्मिक परंपरा का सम्मान किया।

महात्मा गांधी ने कहा था कि, “मुस्लिम राजाओं के शासन में हिन्दू और हिन्दुओं के शासनकाल में मुसलमान फले-फूले। दोनों ने यह महसूस किया कि परस्पर वैमनस्य आत्मघाती है और दोनों को यह पता था कि तलवार की नोंक पर दूसरे को उसका धर्म त्यागने के लिए बाध्य करना संभव नहीं होगा। दोनों ने शांतिपूर्वक रहने का निर्णय किया। अंग्रेजों के आने के बाद झगड़े प्रारंभ हो गए।”

इसी तरह, जवाहरलाल नेहरू ने अपनी किताब ‘भारत एक खोज’ में हिन्दुओं और मुसलमानों के परस्पर सामंजस्य को ‘गंगा-जमुनी तहजीब’ बताया है। जिसका अत्यधिक प्रभावी प्रस्तुतिकरण श्याम बेनेगल के टीवी धारवाहिक ‘भारत एक खोज’ में देखने को मिलता है।

क्या वह युग जिसमें भारतवर्ष के अनेक हिस्सों पर मुस्लिम राजाओं ने शासन किया (जिनमें न सिर्फ मुगल वरन अन्य अनेक राजवंश, जिनमें गुलाम, खिलजी, गजनवी और दक्षिण में बहमनी शामिल थे) उसे गुलामी का काल कहा जाए? इसमें कोई संदेह नहीं कि महमूद गजनवी, मुहंमद घौरी, चंगेज खान (चंग इज कहेन) आदि कई राजा भारत को लूटकर वापिस चले गए। वहीं ऐसे अन्य कई राजा थे जिन्होंने यहां शासन किया और यहीं के हो कर रह गए। निसंदेह उन्होंने भारत का शोषण किया परन्तु यह तो अधिकांश राजा करते हैं।

लेकिन इस युग को गुलामी का युग नहीं कहा जा सकता। असली गुलामी का काल तो अंग्रेजों के आने के बाद प्रारंभ हुआ जिन्होंने अपने शासन के दौरान लूटपाट की और किसानों का जम कर खून चूसा। शशि थरूर ने अपनी किताब ‘एन इरा ऑफ डार्कनेस’ में बताया है कि जब अंग्रेज भारत आए थे उस समय भारत की जीडीपी, विश्व की जीडीपी का 23 प्रतिशत थी और जब वे भारत छोड़कर गए जब यह मात्र 3 प्रतिशत रह गई थी।

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टकराव का इतिहास

ब्रिटिश राज का एक सकारात्मक पहलू भी है। अंग्रेजों के आने के पूर्व भारत के सामाजिक ढ़ांचे में कोई परिवर्तन नहीं हुआ था परंतु ब्रिटिश शासन के दौरान लोकतांत्रिक समाज और आधुनिक देश के निर्माण की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण पहलें हुईं जिनमें रेलवे, संचार सुविधाएं, आधुनिक शिक्षा, न्याय प्रणाली एवं लोकतांत्रिक संस्थाओें की स्थापना शामिल था।

सांप्रदायिक हिन्दू और मुस्लिम, अंग्रेजों की व्याख्या को आगे बढ़ाते हुए देश के इतिहास को हिन्दुओं के मुसलमानों के बीच टकराव का इतिहास बताते हैं। दोनों अपने को इस धरती का मालिक और दूसरे के अत्याचारों का शिकार बताते हैं। दोनों अंग्रेजों द्वारा की गई लूटपाट को पूरी तरह से नजरअंदाज करते हैं।

दूसरी ओर, अम्बेडकर भारतीय इतिहास को बुद्ध धर्म द्वारा स्थापित सामाजिक बराबरी और ब्राम्हणवाद के बीच संघर्ष का इतिहास बताते हैं।

सभी हिन्दू राजा महान नहीं थे और सभी मुस्लिम राजा क्रूर खलनायक नहीं थे। अकबर और दारा शिकोह बहुलवाद के पैरोकार थे जिन्होंने सभी धर्मों की अच्छी बातों को स्वीकार किया और शिवाजी उन राजाओं में थे जिन्होंने गरीबों पर थोपे गए करों को कम किया।

इस तरह आज़ाद भारत के असली हीरो वे हैं जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण में योगदान दिया। इसकी तीन प्रमुख धाराएं हैं - पहले हैं गांधीजी, जिन्होंने देश को अंग्रेजों के साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष के माध्यम से एक सूत्र में पिरोया।

दूसरे हैं अम्बेडकर जिन्होंने सामाजिक समानता और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए संघर्ष किया। तीसरी धारा के प्रतिनिधि हैं भगत सिंह, जिन्होंने अंग्रेजी राज के विरूद्ध संघर्ष करते हुए गरीबों की दुर्दशा के प्रति जागरूकता फैलाई।

सच पूछा जाए तो इन तीनों मूल्यों से ही आधुनिक भारत को प्रेरणा लेनी चाहिए ना कि राजशाही के मूल्यों से, जो बुनियादी रूप से सामाजिक असमानता और किसानों के शोषण पर आधारित था। हमें विविधता और समानता के सिद्धांतों को ही भविष्य के भारत के निर्माण का आधार बनाना चाहिए।

वास्तविक, मुगल संग्रहालय हमारे बीते हुए दिनों के सांस्कृतिक स्वरूप को दिखाने का प्रयास है ना कि गुलामी का प्रतीक। दुर्भाग्य से हम ऐसे समय में रह रहे हैं जब भारतीय संस्कृति को संपन्न बनाने में मुसलमानों के योगदान के सभी प्रतीकों को उखाड़ फेंकने का प्रयास हो रहा है है। इसी इरादे से इलाहबाद, फैजाबाद और मुगलसराय के नामों को बदला गया है।

सभार : नवजीवन

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राम पुनियानी

लेखक आईआईटी मुंबई के पूर्व प्रोफेसर हैं। वे मानवी अधिकारों के विषयो पर लगातार लिखते आ रहे हैं। इतिहास, राजनीति तथा समसामाईक घटनाओंं पर वे अंग्रेजी, हिंदी, मराठी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषा में लिखते हैं। सन् 2007 के उन्हे नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित किया जा चुका हैं।