अच्छी खबरें ही देखें‚ ‘भोंपू़ मीडि़या’ को करें खारिज

अच्छी खबरें ही देखें‚ ‘भोंपू़ मीडि़या’ को करें खारिज
cartoonistsatish.com

कुछ दिनों पहले सुप्रीम कोर्ट ही नहीं‚ कम से कम देश के दो उच्च न्यायालय मीडिया में खबरों (ॽ) के गिरते स्तर को लेकर चिंतित रहे। सुप्रीम कोर्ट ने एक कार्यक्रम को राष्ट्र के लिए अहित करने वाला बता कर रोका तो बॉम्बे हाई कोर्ट ने टीवी चैनलों के सुशांत-रियातोतारटंत पर सरकार से जवाब मांगा।

दिल्ली स्थित एक चैनल का कार्यक्रम न केवल समुदाय-विशेष को यूपीएससी जेहादीबताने वाला था‚ बल्कि उस समुदाय के सिविल सेवा में उत्तीर्ण हो कर आए सभी अफसरों को भी इसी ब्रुश से रंगने वाला था। इस कार्यक्रम को प्रसारित करने के सरकार के आदेश पर सरकारी वकील (एसजी) का तर्क हास्यास्पद होने की हद तक भौंडा था।

उनका कहना था यह खोजी पत्रकारिता है और पत्रकारों की आजादी सर्वोपरि है।सरकार शायद भूल गई कि जब उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले में एक पत्रकार ने बच्चों को मध्याह्न भोजन के नाम पर रोटी-नमक खिलाए जाने की खबर दी तो उस पर जिले के अधिकारियों ने मुकदमा कर दिया था।

दिल्ली दरबार की नाक के नीचे नोएड़ा में कोरोना काल में जिन पत्रकारों ने क्वारंटाइन में भोजन न मिलने और अन्य सुविधाओं के अभाव की खबर दिखाई तो उन्हें प्रशासन ने जेल भेजने की धमकी दी।

सुदर्शन टीवी के इस कार्यक्रम में कहा गया था कि सिविल सेवा में मुसलमानों को 35 साल की आयु और छह प्रयास की छूट है जबकि हिंदुओं को 32 साल और चार प्रयास ही मिलते हैं। यह एकदम गलत तथ्य है‚ जिस पर कोर्ट ने नाराजगी जाहिर की।

शीर्ष कोर्ट का अपनी टिप्पणी में कहना था यह कार्यक्रम खतरनाक‚ किसी समुदाय को कलंकित करने वाला‚ कपटतापूर्ण और धार्मिक कट्टरता से ओतप्रोत है और राष्ट्र का अहित करने वाला है।

यूपीएससी के ताजा रिकॉर्ड के अनुसार केवल 4.2 प्रतिशत मुसलमान ही इस सेवा में पास हुए जबकि आबादी में उनकी हिस्सेदारी 14.2 प्रतिशत है। फिर अगर किसी समुदाय के लोग अपने बच्चों को देश की सबसे कठिन परीक्षा में उत्तीर्ण करा लेते हैं‚ तो यह अन्य समुदायों के लिए सीखने की बात है‚ या उन्हें जेहादीकरार देने की।

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घटिया कार्यक्रम पसंद‚ पर मीडिया से नाराजगी

अक्सर समाज के आमो-खास से आवाज उठती है, इस घटिया मीडिया पर नियंत्रण जरूरी हो गया है। ताज्जुब तो तब होता है‚ जब ऐसी ही ध्वनि मीडिया की कुछ संस्थाएं और उनमें के कुछ लोग उठाते हैं। इसके दो कारण होते हैं।

या तो वे संविधान‚ एक संस्था के रूप में मीडिया की प्रकृति और शासक-वर्ग का चरित्र नहीं जानते या सिद्ध करना चाहते हैं कि मीडिया में रह कर चूंकि हम घटिया मीडियाके खिलाफ मुद्दा उठा रहे हैं‚ लिहाजा हम तो स्वयं-सिद्ध पाक-साफ हैं। लेकिन मीडिया का कुछ वर्ग गंभीरता से इसमें सुधार चाहता है नियमन के जरिए।

नियमन के लिए नियम बनाना होता है। मीडिया के लिए भी नियमन करने वाली संस्था होनी चाहिए। कुछ नियम होने चाहिए जिनका अनुपालन न करने पर नियामक संस्था सजा देने का अधिकार रखे। नियमन की यह संस्था कौन बनाएगाॽ क्या सरकारॽ तो फिर संविधान में दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 19 (1) (अ) का क्या होगाॽ क्या अनुच्छेद 19 (2) में दिए गए आठ युक्तियुक्त निर्बंध (रिजनेबल र्ट्रिरक्शन) और उनसे शक्ति हासिल कर राज्य द्वारा मीडिया पर अंकुश के लिए बनाए गए लगभग 38 कानून काफी नहीं हैंॽ

फिर संविधान निर्माताओं ने अभिव्यक्ति स्वातंत्र्य मीडिया के लिए कोई अलग से नहीं दी है। यह सभी नागरिकों को उपलब्ध है। मीडिया यानी औपचारिक मीडिया यानी न्यूज चैनल और अखबार को यह अलग से नहीं मिली है।

तात्पर्य यह कि नियमन की वकालत करने वाले धयान रखें कि जिस दिन इस औपचारिक मीडिया पर किसी भी किस्म का बाहरी नियंत्रण हुआ‚ उस दिन सामान्य जन से लेकर विपक्ष की आवाज भी बंद हो जाएगी क्योंकि कलक्टर को वे अधिकार होंगे जो प्रजातंत्र को ऑक्सीजन देने वाली नली को काट देंगे।

फिर इसका एक और पहलू है। सोशल मीडिया के जमाने में हर नेट-यूजरपत्रकार बन गया है। वह अद्वैतवाद से अवमूल्यन तक हर विषय पर अपने ज्ञानानुसार तर्क-कुतर्क के जरिए झूठ-सच परोस रहा है। अगर सुशांत-रिया सोशल मीडिया पर ट्रेंड हो रहा है और लाखों-करोड़ों लोग उसे लाइक-डिसलाइककर रहे हैं‚ तो गलती किसकी हैॽ

खबरिया चैनल का एक छोटा सा वर्ग ही नहीं‚ सोशल मीडिया की कुछ साइट्स भी किसानों की समस्या को लेकर‚ बाढ़ की विभीषिका झेलते ग्रामीणों के मुद्दे पर‚ देश में विकराल रूप लिए बेरोजगारी पर बहुत कुछ दिखा रही हैं‚ लेकिन क्या समाज को स्वयं अपनी समस्या में दिलचस्पी हैॽ

रिया और फिल्मी दुनिया में ड्रग्स की लत उसे अपनी पेट की आग से ज्यादा अहम लगती है। तभी तो सुशांत-रिया-ड्रग्स दिखने में घिनौनेपन की सारी हदें पार करने वाला चैनल टीआरपी में कुलांचे भरता निकला जाता है और बाकी चैनल उसी के नक्शेकदम पर चलने लगते हैं। लोगों को क्या बेरोजगारी की विकरालता दिखाने वाला चैनल नहीं दिखताॽ

समाज में एक छोटे लेकिन गंभीर वर्ग का ऐतराज (सबका रहता तो बेहूदा चैनलों की टीआरपी न बढ़ती) किस बात को लेकर हैॽ यही न कि अधिकांश चैनल दिन-रात सुशांत‚ कंगना और आगे आने वाले आठ-नौ महीने बाद अनुष्का की डिलीवरी की खबर दिखाएंगे।

जरा सोचिए‚ किस कानून से कोई नियामक संस्था किसी चैनल को कह सकती है कि सुशांत की आत्महत्या पर कितने दिन स्टूडियो डिस्कशन करें‚ कितना चीखें और किस गेस्ट से क्या सवाल पूछेंॽ क्या एक एडिटर को बाध्य किया जा सकता है कि अपने रिपोर्टरों की टीम और ओबी वैन टीम बांद्रा या जुहू में किस हेरोइन का किस हीरो से क्या चल रहा हैप्रोग्राम के अंतर्गत साथ-साथ रेस्तरां से निकलना दिखाने में लगाए या कोलाबा में बिहारी मजदूरों की समस्या दिखाने में।

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भौंड़ा तर्क

बहरहाल‚ यह हमारा कुतर्क होता कि हम कहें कि वे देखते हैं तो हम दिखाते हैं।यह तर्क भांड देते हैं‚ अपनी कमर को भौंडे कामुक ढंग से हिलाने के औचित्य के रूप में। अगर देश की जीडीपी विकास-दर बढ़ गई है‚ तो गोदी मीडिया मोदी-भक्तिके डेलिरियम में चीखने लगेगा क्योंकि उसे नहीं मालूम कि मानव विकास सूचकांक (जो विकास का असली पैमाना है) क्या होता है।

अगर इस पैमाने पर भारत गिर भी जाए तो शाहरुख-सलमान अनबन से काम चला लेंगे। अगर नवम्बर-दिसम्बर माह में डीएपी खाद का संकट है‚ तो लाखों रुपये महीने की पगार पाने वाले इन एडिटरों के यह बात सिर के ऊपर से निकल जाएगी कि किसानों का क्या हश्र होगाॽ

आसान है एडिटर के लिए कि रिपोर्टर को किसी एक्ट्रेस के घर के सामने भेज कर ओबी लगा कर तीन घंटे समाज को बताता रहे कि आजकल किस एक्टर से उसका क्या चल रहा है।इसमें बीच-बीच में मुन्नी कैसे बदनाम हुईका ठुमका दिखा कर एक ओर टीआरपी लूटा जा सकता है और दूसरी ओर आम दर्शक की सोच को और जड़वत किया जा सकता है।

कोई आंकड़ा जानने या संविधान पढ़ने की जरूरत ही नहीं है। ये या इनका मालिक राज्य सभा की सदस्यता या उच्च नागरिक अवार्ड को जीवन की सार्थकता समझते हैं। लिहाजा‚ मोदी में इन्हें रबदिखता है। छह साल पहले दूसरा धड़ा हिंदुओं को गरिया कर आत्मतोष से लबरेज हो जाता था।

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स्व-नियमन फेल हुआ मीडिया के भांडपन सेॽ

सन 2007 में जब इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक वर्ग एलियन को धरती पर दिखाने लगायानी भारतीय न्यूज चैनल फिसलन की सबसे निचले सोपान पर थे और जनाक्रोश अपने चरम पर तो कुछ संपादकों ने बैठकर एक स्व-नियमन संस्था बनाई। लगभग उसी समय मालिक-सीईओ ने भी एक संस्था बनाई।

संपादक अपनी मोटी तनख्वाह की वजह से मालिक-सीईओ के रहमो-करम पर रहने लगा और पहली संस्था लगभग कहीं कोने में अंतिम सांसें ले रही है। मालिकों वाली संस्था चूंकि बैलेंसशीट के हिसाब से पत्रकारिता को देखती है‚ लिहाजा टीआरपी से नजरें हटा नहीं सकी।

एडिटर्स में क्षमता हो सकती थी कि जन-अभिरुचि के जन-सरोकार की ओर अपनी नजरें मोड़ें लेकिन उनमें पत्रकारिता की वो समझ जाती रही। मार्केट फोर्सेज और मालिकों ने सुनिश्चित किया असली और नैतिक रूप से मजबूतपत्रकार बाजार से बाहर हो जाएं क्योंकि इनके जरिए यानी जन-सरोकार की पत्रकारिता करके टीआरपी लाना और विज्ञापनदाताओं को लुभाना खर्चीला धंधा था।

सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई जारी है और संभव है कि मीडिया के घटिया स्वरूप पर शायद उसका फैसला कोई प्लास्टिक सर्जरी कर सके।

*एन. के. सिंह का ये आलेख 19 सितम्बर 2020 को राष्ट्रीय सहारा में छपा था

(लेखक ब्रॉड़कास्ट एडि़टर्स एसोसिएशन के पूर्व महासचिव हैं)  

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टीम डेक्कन

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