मणि कौल ने फिल्मों से पैसा नहीं बल्कि नाम कमाया

मणि कौल ने फिल्मों से पैसा नहीं बल्कि नाम कमाया
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पुराने दोस्तों की याद किसी भी चोर दरवाजे से अंदर आ जाती है। कुछ ही दिन पहले फिल्मकार मणि कौल (1944-2011) की याद आ गई। उनकी याद उनके सुनाए एक किस्से से आई। मणि कौल राजस्थान में किसी फिल्म की शूटिंग कर रहे थे। जैसा कि होता है काफी तामझाम था। पैसा भी खर्च हो रहा था। एक दिन गांव के एक किसान ने मणि कौल से पूछा- यह जो पैसा खर्च हो रहा है क्या तुम्हारा पैसा है?”

मणि कौल ने कहानहीं, मेरा पैसा नहीं है, सरकारी पैसा है।

किसान ने कहा, “तब तो ठीक है। सरकारी पैसा तो गाजर की पिपिहरी है, जब तक बजे बजाओ, न बजे तो खा जाओ।

सन 1977 की बात है जनता पार्टी पावर में आ गई थी। दिनमानमें फिल्म समीक्षा लिखने वाले मित्र नेत्र सिंह रावत बहुत सक्रिय थे। वे मणि कौल की फिल्मों की समीक्षा कर चुके थे और उनकी दोस्ती हो गई थी। इस बीच विख्यात समाजवादी छात्र नेता, चित्रकार और छायाकार चंचल जी से भी रावत के माध्यम से मुलाकात हुई थी।

उस जमाने में हम सब पर फिल्म का जुनून सवार था। सब फिल्म बनाना चाहते थे और फिल्मकारों की मदद करना अपना फर्ज समझते थे। जनता पार्टी की सरकार में कुछ ऐसे मंत्री थे जिन्हें चंचल जी जानते थे और कुछ ऐसी कोशिश हो रही थी कि उन के माध्यम से मणि कौल को फिल्म बनाने का कोई कोई प्रोजेक्ट मिल जाए।

कोशिश तो बहुत जोरों पर हुई थी लेकिन बात कुछ बन नहीं पाई थी क्योंकि जल्दी ही जनता पार्टी की सरकार ताश के पत्तों की तरह बिखर गई थी।

मणि कौल बुद्धिजीवी फिल्मकार थे। उनके काम और विचारों से आप सहमत या असहमत हो सकते हैं लेकिन इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि उन्होंने फिल्म के माध्यम को एक बुद्धिजीवी की तरह देखा और परखा था। यही नहीं उन्हें संस्कृत के जटिल ध्वनि शास्त्र की व्याख्या करने में भी बड़ी रूचि थी। लेकिन वे अपनी बौद्धिकता से आतंकित करने पर विश्वास नहीं करते थे।

बातचीत के दौरान दिलचस्प गपशप किया करते थे। फिल्म इन्स्टिट्यूट (FTII) में ऋत्विक घटक (Ritwik Ghatak) (दादा) ने उनके बैच को पढ़ाया था। ऋत्विक घटक जैसे अराजक लेकिन प्रतिबद्ध फिल्मकार किस तरह पढ़ाते थे इसके कई प्रसंग मणि कौल सुनाया करते थे। रात में तीन बजे हॉस्टल के कमरों के दरवाजे खटखटाए जाते थे और कहा जाता था कि दादा शॉट लेने जा रहे हैं, तैयार हो जाओ। चार बजे से पहले दादा स्टूडेंट्स को लेकर पहाड़ की किसी चोटी पर सूरज निकलने का शॉट लेने के लिए पहुंच जाते थे।

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कुछ असाधारण किस्से

मणि कौल ने कितनी फिल्में बनाई हैं और उनको कितने एवार्ड और सम्मान मिले हैं यह सब जानते हैं और नहीं जानते तो आसानी से जान सकते हैं। लेकिन यहां मैं उन बातों को बताना चाहता हूं जिन्हें आसानी से नहीं जाना जा सकता। ऐसा नहीं है कि वे बहुत बड़ी बातें हैं, साधारण बातें हैं लेकिन फिर भी उनका महत्त्व है।

उस दौरान मेरा मुंबई जाना होता रहता था। कभी मुजफ्फर अली की किसी न बन पाने वाली फिल्म को लिखने के सिलसिले में तो कभी अपनी डॉक्यूमेंट्री फिल्म की एडिटिंग के सिलसिले में मुंबई का चक्कर लगता रहता था। मैं वहां कभी कभी अपने दोस्त शायर और लेखक मदहोश बिलग्रामी के यहां ठहर जाता था।

उनका घर समानांतर फिल्मकारों का अच्छा अड्डा हुआ करता था। वहां सईद मिर्जा, कुंदन शाह, कभी-कभी प्रकाश झा आते थे। संगीत निर्देशक मानस मुखर्जी तो बराबर बने रहते थे। इसके अलावा चक्रफिल्म के डायरेक्टर रविंद्र धर्मराज और उनकी पत्नी और बहुत से दूसरे लोग आया करते थे। रात में बारह एक बजे तक महफिल जमती थी। एक दो बार मुझसे मिलने के लिए मणि कौल भी यहां आए थे।

एक दिन मुझे पुराने मुंबई  शहर की तरफ जाना था तो सोचा मणि कौल को फोन करके उनके घर भी हो लूं। मेरे ख्याल से वे पेडर रोड पर रहा करते थे। शानदार इमारत के शानदार फ्लैट की मैंने जब घंटी बजाई तो एक आठ दस साल की लड़की ने दरवाजा खोला और लोहे वाले जालीदार दरवाजे के पीछे से पूछा कि क्या है? मैंने कहा, मणि कौल से मिलना चाहता हूं। उसने कहा, “नहीं है। मैं क्या करता लौट आया।

कोई तीन चार बजे मणि कौल हांपते- कांपते पेडर रोड से बांद्रा पहुंचे और कहने लगे, “यार जैसे ही मुझे पता चला कि तुम मेरे दरवाजे से लौट गए हो, मैं तुमसे मिलने के लिए निकल पड़ा। माफ करना मैं बिल्कुल भूल गया था।

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पैसा नही नाम कमाया

मणि कौल के भूलने और याद करने का एक और मज़ेदार किस्सा है। एक दिन खाने पर मेरे घर आए। काफी टेंस लग रहे थे। पूछा कि क्या बात है, क्यों परेशान है? कहने लगे कि यार इसी वक्त मुझे एक मीटिंग में होना चाहिए था। बड़ी बोर मीटिंग होने होती इसलिए मैं गया नहीं। वहां लोग मेरा इंतजार कर रहे होंगे, इसीलिए टेंशन में हूं। कोई एक आद घंटे के बाद अच्छे मूड में आ गए। मैंने पूछा कि, कुछ देर पहले तो आप बहुत टेंशन में थे अब ?”

उन्होंने कहा, “अब तक वो मेरा इंतजार करते करते थक गए होंगे और मीटिंग शुरू हो गई होगी, इसलिए अब मैं टेंशन में नहीं हूँ।

व्यवसायिक सिनेमा वाले उन पर यह आरोप लगाते थे कि मणि कौल ने तो सिर्फ नाम कमाया है। मणि कौल उन पर आरोप लगाते थे कि उन्होंने सिर्फ पैसा कमाया है। कहते, फैसला आप लोग कर लीजिए किस की कमाई कैसी हुई है।

मणि कौल से मिलने के पहले उनके पूर्वजों से मेरा परिचयहो चुका था। पर यह नहीं मालूम था कि वे मणि कौल के पूर्वज हैं। किस्सा कुछ यूं है।

चार पिढ़ी के पूर्वज

एक जमाने में जामा मस्जिद के आसपास कबाड़ी बाजार लगा करती थी जहां दिलचस्प कबाड़ के अलावा पुरानी किताबें भी बिकती थीं। कुछ साल बाद यह बाजार दरियागंज में लगने लगा। उसके बाद कुछ ऐसा हुआ होगा कि शहर के नेताओं और अधिकारियों को यह खतरनाक लगा होगा इसलिए यह आदेश हुआ कि किताबों की बाजार लाल किले के पीछे लगा करे।

हर इतवार को कबाड़ी बाजार जाना दिल्ली में पढ़े लिखे बुद्धिजीवियों की पहचान मानी जाती थी। अगर कोई वहां नहीं जाता था तो समझा जाता था कि वह बहुत नासमझ और बचकाना है। मैं इन आरोपों से बचने के लिए कबाड़ी बाजार  जाया करता था।

एक दिन मैंने देखा कि एक आदमी उर्दू और फारसी की पुरानी किताबें बेच रहा है और खरीदने वाला कोई नहीं है। मैंने चार-पांच किताबें पसंद कीं। इनमें से कुछ पिछली शताब्दी मतलब 19वीं शताब्दी की छपी हुई किताबें थी और कुछ बीसवीं शताब्दी के शुरू में छपी थी। मैंने देखा सन1843 में छपी किताब बाग़-ओ-बहारपर चार पीढ़ियों के नाम लिखे है।

फारसी में लिखा है मालिक इं किताब बंदा पंडित.......(नाम पूरा पढ़ने में नहीं आया।) उर्फ मेहेर लाल कौल, दूसरी पीढ़ी का नाम भी फारसी में है मालिक इं किताब बंदा पंडित राज मोहन कौल देहली, तीसरी पीढ़ी का नाम अंग्रेजी में पंडित विशंभर नाथ कौल लिखा है और तारीख डाली गयी है 15.10.83… चौथी पीढ़ी का नाम अंग्रेज़ी में लिखा है और तारीख पड़ी है 19.10.1902... हिन्दी में एक नाम शाम मोर नाथ लिखा है और फारसी में एक मोहर लगी है जिसमें श्याम मोहन नाथ लिखा है।

अचानक इन नामों का ज़िक्र मणि कौल से हुआ तो पता चला ये सब मणि कौल के पूर्वज थे। यह किताब अब भी मेरे पास है। मैं जब इसे खोलता हूं तो लगता है मणि कौल की चार पीढ़ियों का स्पर्श मौजूद है। मैं जब इसे पढ़ता हूं तो लगता है मेरे साथ-साथ मणि कौल की चार पीढ़ियां भी इस किताब को पढ़ रही हैं।

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मुझे एक्टर बनाया

सन 1982-83 के दौरान मणि कौल माटी मानसनाम की डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे थे। यह फिल्म मिट्टी से कलात्मक चीजें और बर्तन बनाने की कला पर आधारित थी। एक किसी लोक कथा के अनुसार मिट्टी की देवी, मिट्टी को मुट्ठी में बंद कर लेती है और जब मुट्ठी खोलती है तब मिट्टी का फूल बना हुआ दिखाई देता है। मणि कौल ने फिल्म में इस शॉट को दिखाने के लिए बहुत जतन किए थे।

इस फिल्म से जुड़ा एक दिलचस्प किस्सा है। श्रीराम सेंटर की कैंटीन में मणि कौल की चीफ असिस्टेंट एक महिला मेरे पास आयीं और बोली, “मणि कौल अपनी नई फिल्म माटी मानसमैं आपको एक रोल देना चाहते हैं। यह एक आर्कियोलॉजिस्ट का रोल है।

मैंने कहा कि मैंने जिन्दगी में कभी फिल्म के लिए एक्टिंग नहीं की। पता नहीं कैसे होती है। उन्होंने कहा कि आपको यह सब सोचने की जरूरत नहीं है। कुछ देर में मणि कौल भी आ गए और कहने लगे, तुम उस रोल के लिए बिल्कुल फिट हो। बहुत अच्छा रोल है। कल तुम स्क्रीन टेस्ट के लिए आ जाना। प्रगति मैदान में कर रहे हैं।

अगले दिन मैं प्रगति मैदान पहुंचा तो मणि कौल ने फिल्म के बारे में बताना शुरू किया बोले, “मैं चाहता हूं कि इस फिल्म में एक तरह की इलास्टिसिटी आए। मतलब यह कि रियलिस्टिक न लगे। इसके एक्शन ऐसे होने चाहिए जो रियल न हों। इसलिए मैंने फिल्म को कैमरे में उल्टा लोड किया हुआ है। एक्शन अगर उल्टे होंगे तो प्रिंट निकलने के बाद वे सीधे हो जाएंगे लेकिन उनके अंदर इलास्टिसिटी आ जाएगी।

मेरी समझ में कुछ नहीं आया कि वे क्या कह रहे हैं। लेकिन फिर जो उन्होंने कहा, उसने तो मुझे हैरान और परेशान कर दिया कहने लगे, सारे एक्शन उल्टे होना हैं। मतलब यह कि अगर सीढ़ी पर चढ़ना है तो उतरना होगा लेकिन सामने मुंह करके नहीं बल्कि पीछे मुँह करके।

दो तीन एक्टर और भी थे। मुझे स्क्रीन टेस्ट के लिए सीढ़ी से उल्टा उतारा गया। काफी डर रहा था कि कहीं गिर न जाऊं और चोट न लग जाए लेकिन ऐसा हादसा नहीं हुआ। दो चार ऐसे और भी काम करवाए गए। मणि कौल ने कहा, दो दिन के बाद रशेज़देखने आना। मैं दो दिन के बाद रशेज़ देखने गया तो देख कर हैरान हो गया। खुद अपने आप को नहीं पहचान पा रहा था लेकिन मणि कौल तारीफ किए जा रहे थे। कह रहे थे वाह वाह क्या शॉट दिया है। मैंने कहा यार शाट वाट छोड़ो मेरी तो टांग टूटते टूटते बची है।

बाहर किस्सा कोताह यह की मुझे फिल्म में ले लिया गया और बताया गया की फिल्म की शूटिंग लेह से लेकर कन्याकुमारी तक एक महीना चलेगी। मतलब यह है कि महीने भर सब काम उल्टे करने पड़ेंगे। जामिया से एक महीने की छुट्टी न मिलेगी। घायल हो जाने का डर है। यह सब सोचकर मैंने रोल करने से इंकार कर दिया। एक्टर बनते बनते बच गया।

जामिया में नौकरी के अनेकों फायदे होने के अलावा एक बड़ा फायदा यह भी हुआ कि मैं फिल्मी हस्तीबनने से बच गया। नहीं तो दाढ़ी और बाल बढ़ाए, रंगीन कुर्ता पहने, स्टार बना नजर आता या पता नहीं कब का मर खप चुका होता।

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डॉ. असग़र वजाहत

लेखक जामिया विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यापक और जाने-माने लेखक हैं। नाटककार, लघु कथाकार और उपन्यासकार के रूप में वे परिचित हैं। उनके कई पुस्‍तकें प्रकाशित है। हिन्दी साहित्‍य में विशेष योगदान के लिए उन्हें केंद्रीय साहित्‍य अकादमी और कथा यू.के. जैसी संस्‍थाओं ने पुरस्‍कृत किया है।