भावों को व्यक्त करना हैं ग़ज़ल लिखने की चुनौती

भावों को व्यक्त करना हैं ग़ज़ल लिखने की चुनौती
Street photography in the world

ग़ज़ल का फार्म हिन्दी, उर्दू, फारसी, तुर्की आदि एशियाई भाषाओं के कवियों को ही नहीं पश्चिमी भाषाओं के कवियों को भी आकर्षित करता है। इसका कारण क्या है? संक्षेप में कह सकते हैं कि ग़ज़ल का फॉर्म  एक विचार, एक भाव, एक स्थिति, दार्शनिक या मनोवैज्ञानिक जटिलता का संपूर्ण लेखा-जोखा दो लाइनों में, संगीत के सांचे में ढ़ाल कर एक काव्यात्मक प्रस्तुति है।

ग़ज़ल में हर तरह के नये विचार और जटिल से जटिल अभिव्यक्ति के लिए स्थान है। यही कारण है कि ग़ज़ल की विषय वस्तु समय के साथ बदलती रही है। संगीत के सांचे, मतलब रदीफ़ क़ाफिये और बहरकी पूरी पाबंदियों के साथ  आधुनिकतम विचारों और भावों को व्यक्त करना ग़ज़ल के कवियों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती भी है।

ग़ज़ल एक क्लासिकल फार्म है। उसी तरह जैसे भारतनाट्यम है या और दूसरी क्लासिकल कलाएं हैं। क्लासिकल फार्म को सीखने का एक तरीका, एक पद्धति एक नियम, एक परंपरा और एक उसूल है। जिस प्रकार भारतनाट्यम या बैले (Ballet) सिर्फ देख सुन कर नहीं सीखा जा सकता उसी तरह ग़ज़ल भी सिर्फ सतही ज्ञान से नहीं सीखी जा सकती।

पढ़ें : शायरी कि बारीकियां सिखाते गालिब के कुछ खत

पढ़ें : जब तक फिल्में हैं उर्दू जुबान जिन्दा रहेंगी

कुछ गलत धारणाएं

ग़ज़ल को सिख़ने लिए किसी गुरु का होना आवश्यक नहीं है, पर किसी अनुभवी व्यक्ति से व्यक्तिगत स्तर पर सलाह लेना मदद करता है। पर यह सलाह बहुत साफ और बिना किसी लाग लपेट वाली होना चाहिए। यह कहा जा सकता है कि ग़ज़ल परफॉर्मिंग आर्ट नहीं है और इस तरह उसको सीखने के लिए किसी गुरु या किसी स्कूल की जरूरत नहीं है।

बात वाजिब है लेकिन जरूरत इस बात की है कि क्लासिकल फार्म को पूरी तरह समझ कर उसके ऊपर मास्टरीकी जाए। यह मास्टरी केवल वर्षों के अभ्यास - पहले ग़ज़ल पढ़ने और फिर लिखने से ही होता है। अभ्यास करने वाले इतनी ग़ज़लें पढ़ते और सुनते हैं कि बहरेंउनके दिमाग में पूरी तरह बैठ जाती है। और वे कभी बेबहरनहीं होते। अक्सर ग़ज़ल लिखने वाले दोस्तों से मैं पूछता हूं कि क्या उन्होंने दो-चार हज़ार गजलें पढ़ी है? वे नाराज़ हो जाते हैं।

हिन्दी के प्रबुद्ध समाज में हिन्दी ग़ज़ल को लेकर अनेकों धारणाएं हैं। हिन्दी के कुछ बड़े प्रतिष्ठित कवि हिन्दी ग़ज़ल को किसी प्रकार की कोई मान्यता देने के लिए तैयार नहीं है जबकि वही प्रतिष्ठित कवि उर्दू ग़ज़ल के बड़े जबरदस्त रसिया हैं। मीरऔर ग़ालिबपर जान देते हैं। ऐसा क्यों है?

हिन्दी में जो ग़ज़ले लिख रहे हैं उनमें से कुछ बहुत प्रतिष्ठित हैं। उनकी मान्यता है। उन्हें उर्दू के कवि और आलोचक भी स्वीकार करते हैं। शहरयार ने एक बातचीत के दौरान मुझसे कहा था कि, ‘हिन्दी के कुछ कवि अच्छी ग़ज़लें लिख रहे।मैं इस बात से सहमत हूं। लेकिन ज्यादातर ऐसा नहीं कर पा रहे।

वैसे यह अपेक्षा भी नहीं करनी चाहिए कि जो भी ग़ज़ल लिखेगा वह अच्छी ग़ज़ल लिखेगा। उर्दू में भी ऐसा नहीं होता। सौ लिखने वालों में कोई एक ऐसा होता है जो उल्लेखनीय लिखता है।

पर हिन्दी में ऐसे ग़ज़लकारों की कमी नहीं है जिन्हें ग़ज़ल शैली का पर्याप्त ज्ञान नहीं है। वे प्रायः यह समझते हैं कि पंक्तियों के अंत में दो समान से शब्द जोड़कर ग़ज़ल हो जाती है। उन्हें न तो रदीफ़ - क़ाफियेका पता है, बहरका ज्ञान है। वे संगीत के ज्ञान से भी अपरिचित हैं। दो पंक्तियों की समान लय बन रही है या बिगड़ रही है, इसका भी उन्हें अंदाजा नहीं होता। ग़ज़ल की भाषा को भी वे नहीं जानते। लेकिन फिर भी वे धड़ाके से ग़ज़ल लिख डालते हैं।

इन कवियों से अगर आप उनकी ग़ज़ल की कमियों के बारे में कोई बात करें तो वे पहला तर्क यही देते हैं कि वे हिन्दी में ग़ज़ल लिख रहे हैं जो उर्दू ग़ज़ल से अलग है। वे छंदों और मात्राओं का उदाहरण देने लगते हैं। मैं मान लेता हूं कि वे हिन्दी ग़ज़ल लिख रहे हैं।

पढ़ें : औरंगाबाद के वली दकनी उर्दू शायरी के बाबा आदम थें

पढ़ें : दकन के महाकवि थे सिराज औरंगाबादी

ग़ज़ल की परंपरा

अगर उनसे पूछा जाता है हिन्दी ग़ज़ल का इतिहास क्या है? कब से हिन्दी ग़ज़ल लिखना शुरू हुई? हिन्दी ग़ज़ल के पहले कवि कौन थे? वे भारतेंदु का नाम नहीं ले सकते क्योंकि भारतेंदु ने रसाउपनाम से उर्दू में गजलें लिखी हैं। कुछ कबीर को हिन्दी ग़ज़ल का आदि कवि मानते हैं पर यह बात भी बड़ी अटपटी है कि 14वीं शताब्दी में पहला कवि होता है  और उसके बाद सीधे बीसवीं शताब्दी में दूसरा कवि सामने आता है।

तब सवाल यह खड़ा होता है कि यदि हिन्दी ग़ज़ल की कोई परंपरा ही नहीं है तो आज हिन्दी कवियों का ग़ज़ल के प्रति इतना आकर्षण कैसे पैदा हो गया?

हिन्दी ग़ज़ल वालों से एक प्रश्न यह भी पूछा जाता है कि क्या वे उर्दू की ग़ज़ल परंपरा से अनभिज्ञ रहे हैं? क्या उनके ग़ज़ल संस्कार बनाने में उर्दू ग़ज़ल का कोई योगदान नहीं रहा? क्या उन्होंने उर्दू की गजलें नहीं पढ़ी या सुनी? क्या ऐसा होता है की हिन्दी की ग़ज़ल उर्दू जानने वाला नहीं समझ पाता या हिन्दी वाला उर्दू की ग़ज़ल नहीं समझ पाता? ऐसा नहीं होता।

तब हिन्दी ग़ज़ल उर्दू ग़ज़ल का विभाजन कैसे हो सकता है? क्या हिन्दी का कोई कवि कभी यह कहता है कि वह हिन्दी में कविता लिख रहा है या उर्दू का कोई कवि यह कहता है कि मैं उर्दू में कविता लिख रहा हूं? दरअसल हिन्दी और उर्दू दो भाषाएं है ही नहीं।

क्योंकि भाषाओं की भिन्नता का आधार व्याकरण का भेद होता है न की शब्द भंडार और लिपि। हिन्दी और उर्दू के व्याकरण एक है। इसलिए हिन्दी उर्दू के संदर्भ में ग़ज़ल को विभाजित नहीं किया जा सकता। न उर्दू ग़ज़ल है न हिन्दी ग़ज़ल है, बस ग़ज़ल है। उसकी एक परंपरा है।

ग़ज़ल लिखने वालों को ग़ज़ल लिखने की सभी चुनौतियोंका सामना करना चाहिए। किसी तरह से बचाव करने की कोशिशमें रचना का स्तर गिर जाता है।

जाते जाते पढ़ें :

*रोमन’ हिन्दी खिल रही हैतो ‘देवनागरी’ मर रही है

* उर्दू और हिन्दी तरक्की पसंद साहित्य का अहम दस्तावेज़

You can share this post!

author

डॉ. असग़र वजाहत

लेखक जामिया विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यापक और जाने-माने लेखक हैं। नाटककार, लघु कथाकार और उपन्यासकार के रूप में वे परिचित हैं। उनके कई पुस्‍तकें प्रकाशित है। हिन्दी साहित्‍य में विशेष योगदान के लिए उन्हें केंद्रीय साहित्‍य अकादमी और कथा यू.के. जैसी संस्‍थाओं ने पुरस्‍कृत किया है।