मीडिया में सांप्रदायिकता कैसे शुरु हुई?

मीडिया में सांप्रदायिकता कैसे शुरु हुई?
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CAA के खिलाफ प्रदर्शनी में लगा एका पोस्टर (प्रतिकात्मक तस्वीर)


मीडिया मे सांप्रदायिकता कैसी हैं, इसके तीन स्टेप हैं पहला, 1975 के इमरजेंसी के बाद जनता पार्टी की सरकार पावर में आई उस समय लालकृष्ण आडवाणी जो डेप्युटी प्राइम मिनिस्टर रह चुके हैं; वह सूचना और प्रसारण मंत्री थे इस पद पर रहते हुए उन्होंने पब्लिक सेक्टर एजेन्सीज, जिसका नियंत्रण केंद्र सरकार करती है उमें पूरे सांप्रदायिक लोगों को घुसेडना चालू कर दिया असल में यहां से मीडिया की गिरावट शुरू हुई

यह गिरावट फिर भी उतनी नहीं हुई जितना 2002 और 2004 के आसपास हुई। उस समय अभी के प्रधानमंत्री गुजरात में पावर में थे। उन्होंने कॉरपोरेट वर्ल्ड से बहुत गहरी दोस्ती की और इन्हीं उद्योगपतीयों ने धीरे-धीरे मीडिया चैनल्स को खरीदना शुरू किया जो पत्रकार धर्मनिरपेक्ष और न्यूट्रल थे उनको नौकरी से निकाल दिया। वहां ऐसे लोगों को भरना शुरू किया जो बहुत सतही, सुपरफिशियल थे। जो ज्यादातर वैचारिक रूप से सांप्रदायिक राजनीति में घिरे हुये थे

जब तक हम इन प्रक्रिया को नही जानते, तब तक हम आज के सांप्रदायिक राजनीति को भी नही समझ सकते। आज का मुख्य चैनल कौन सा हैं? उसमें किसे टारगेट किया जाता है हम इन सब को अलग रखकर नहीं देख सकते। हम ये समझ ले कि कौन सी विचारधारा के द्वारा मुस्लिमों को टारगेट किया जा रहा है ये पत्रकार कौन सी विचारधारा को मानते हैं, ये भी समझना जरुरी हो जाता हैं।

इनमें से कई एंकर फेमस भी हो गये हैं में से एक रिपब्लिक चैनल है उसमें एक खतरनाक एंकर है, उन्होंने बीजेपी के सासंद के साथ मिलकर ये चैनल निकाला हैये चैनल ऐसी खबरों को लेता है जिससे मुसलमानों को ज्यादा से ज्यादा खराब खबरों में और नेगेटिव तरीके से पेश किया जा सके।

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झुठा नरेशन

तीसरा स्टेप, वह पार्टी जिसका चुनाव चिन्ह कमल का फुल है इसने एक आईटी सेल बनाया है, जिसका काम फेक न्यूज़ को समाज में प्रसारित करना है। आपको याद होगा कि 2013 में उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में दंगे हुये। जिसमें लव जिहाद वाले मुद्दे को लाया गया कथित रूप से एक मुसलमान लड़का हिन्दू लड़की को छेड़ता है, ऐसी कहानी लाई गई उसके बाद प्रदेश में भीषण दंगे हुये। इसके लिए एक फोटो सर्कुलेट किया गया, जिसमे 40-50 मुस्लिम जैसे दिखने वाले लोग किसी को बेरहमी से पीट रहे हैं

जांच के बाद पता चला कि, वह फोटो मुजफ्फरनगर का नहीं बल्कि पाकिस्तान का था वहां 2 चोर पकड़े गए और भीड़ उन्हें बेरहमी से मार रही थी इस फोटो को मुजफ्फरनगर में ऐसा प्रेजेंट किया कि जैसे वहां के मुसलमान हिन्दू नवयुवकों को पीट रहे हैं। बाकी अन्य आयामों के साथ आईटी सेल मैदान में आ गया उसने खबरों को तोड़-मरोड़कर (डिस्ट्रॉय) करके बताना शुरु किया।

नेहरू-गांधी कि बदनामी

इस जैसा दूसरा और उदाहरण हैं। आज हम मानते हैं कि भारत में धर्मनिरपेक्षता, सद्भावना, बहुलवाद जैसे इन मूल्यों को मजबूती से जि व्यक्ति ने सामने लाया, का नाम जवाहरलाल नेहरू था। इनकी बेटी इंदिरा गांधी बाद में प्रधानमंत्री बनी। इस नेहरू-गांधी परिवार को बदनाम करने के लिए ये लोग (बीजेपी समर्थक) अलग-अलग चीजें समाज में गन्द कि तरह फैलाते रहते हैं जैसे आपने पढ़ा होगा कि नेहरू के बारे में न्होंने कई मैल फैलाई है। जैसे, उनके दादा मुसलमान थे, उनके पिता मुसलमान थे वगैरह.. वगैरह..

अभी कुछ दिन पहले मुझे एक मैसेज आया, जिसमें कहा गया कि इंदिरा गांधी मुसलमान थी जब उनकी शव यात्रा निकली तो उसमें राजीव गांधी, राहुल गांधी और और दूसरे व्यक्ति नरसिंह राव कलमा पढ़ रहे थे ऑल्ट न्यूज़ के प्रतीक सिन्हा जब इसकी जांच की और सच्चाई को सामने लाया तो पता चला की वह जो पूरा प्रोसेशन गलत था वह फोटो इंदिरा गांधी के मृत्यु का नही बल्कि खान अब्दुल गफ्फार खान का था। आपको याद होंगा की इंदिरा गांधी कि मृत्यु तो दिल्ली में हुई थी।

वह सरहद गांधी जिन्होंने महात्मा गांधी के विचारों को देश में, नॉर्थ ईस्ट में कई जगह पर अच्छे से फैलाया; उनके ज़नाजे की वह फोटो थी बताया गया कि यह इंदिरा गांधी की अंतिम यात्रा कि फोटो है मुसलमानों के साथ नेहरू की बदनामी भी; यह दोनों चीजें साथ में चल रही है जो व्यक्ति धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं, उनकी बदनामी एक तरफ और दूसरे जो लोग खासतौर पर मुस्लिम, ख्रिश्चियन इनकी बदनामी के लिए यह बहुत कुछ करते हैं

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बेदखली भी है बदनामी

किसी समाज को बदनाम करने का क और तरीका होता हैं, उनसे जुडी कुछ खबरों को इग्नोर करो ऐसे खबरों को अपने अखबारों में जगह न देनापिछले एक-डेढ़ साल से जगह-जगह ख्रिश्चन समुदाय के विरोध में उनके प्रार्थना सभाओ पर हमले किये जा रहे हैं। कहा जा रहा है कि इनसे हिन्दू धर्म को खतरा है इसी के चलते 2003 में उड़ीसा में इसाई पादरी ग्राहम स्टेन्स की हत्या की गई थी अभी छोटी-छोटी जगह पर लोग इस प्रकार की प्रार्थना सभाओं पर हमले कर रहे हैं।

एक तरफ मीडिया अल्पसंख्यक लोगो को बदनाम कर रहा हैं। उनपर कीचड़ उछाल रहा है तो दूसरी और उनके मानवाधिकारों के हनन की जो घटनाएं हैं उसको मीडिया से बाहर रख रहा हैं। मेरे खयाल से शाहीन बाग का आंदोलन, देश का अभूतपूर्व आंदोलन था मुस्लिम महिलाएं कितनी मजबूती से अपने समाज की बात करने की कोशिश कर रही थी। पर मीडिया ने उसे कैसे प्रेजेंट किया! उसने उसे एक सुपरफिशियल तरीके से डिसमिस कर दिया। लगातार आलोचना कीआलोचना जरुर करे पर उसके सकारात्मक चीजों को तो नोटिस करना चाहीए था। कितने दिनों तक ये महिलाएं वहां आ रही थी और प्रदर्शन कर रही थी।

इसके उलट क्या हुआ आईटी से सेल ने कहा कि जो औरतें वहां जाती है धरने पर बैठने को उन्हें 500 रोज और बिरयानी दी जाती है मुसलमान औरते इस आंदोलन को मैनेज कर रही थी, उन्होंने पहले तो कहा, ये क्या बकवास है बाद में उन्होंने आईटी सेल वालों से कहा, भैया आप अपने मां और बहन को भेज दीजिए हम उनको 5,000 रुपये रोज देंगे एक ने कहा, जिस बिरयानी की आप बात कर रहे हो वह मेरी बहू इतना अच्छा बनाती है कि आप आइये उसको खाइये। मतलब इस जैसे छोटी-छोटी बातों को लेकर भी मुसलमानों को बदनाम किया गया

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एकतर्फी खबरे

ऐसी ही एक घटना मुंबई के 26/11 के हमले के बाद कसाब के साथ हुई थी। कहा गया कि कसाब जेल में बिरयानी दी जा रही है इससे झूठी बात और कोई हो ही नहीं सकती थी। जेल का खाना कैसा होता हैं, आप इसका अंदाजा लगा सकते हैं। कहा गया कि सरकार तो तुष्टिकरण कर रही है मुसलमान क़ैदियों को बिरयानी खिलाई जा रही है

इस बात को लेकर भी बदनाम किया गया। बता दू कि विशेष सरकारी वकिल कहे जाने वाले उज्ज्वल निकम ने बाद में इस पर अपनी सफाई पेश कि थी। उन्होंने एक जगह इंटरव्यू में कहा, उस समय लोगों के भावनाओं को काबू करने के लिए उनसे झुठ बोला गया था।

यह सब हमारा मीडिया जिसे अनक्रिटिकल कहते हैं, मतलब कोई बर होती है उसके दोनों पहलू देखे जाते हैं। उसके बाद उस को जनता तक ले जाया जाता हैं। पर मीडिया ने यहां ऐसा कुछ नही किया। एकतर्फा खबरों को सुर्खियों मे जगह दी। मीडिया की जिम्मेदारी बहुत गहरी है और आज मीडिया का बड़ा तबका इस जिम्मेदारी से दूर ऐसे काम कर रहा है जिससे मुसलमानों के खिलाफ नफरत का माहौल बढ़ता जा रहा है।

चौथा आयाम सोशल मीडिया का है। समाज में सेकुलर लोग, जो धर्मनिरपेक्षता को मानते हैं, संविधान को मानते हैं, बहुल्यवाद को मानते हैं, वह लोग चुप बैठे हैं और संघ परिवार और भाजपाप्रणित लोग हजारों-लाखों व्हाट्सएप ग्रुप, हजारों-लाखों फेसबुक ग्रुप के माध्यम से नफरत फैलाने का काम कर रहे हैं यह सारी नफरत मुसलमानों के खिलाफ फैलाई जा रही हैआज का मीडिया जो घटनाओं को हिन्दू-मुस्लिम नजरिए से देखता है एक्चुअली ये हिन्दू-मुस्लिम नहीं बल्कि स्पष्ट रूप से मुस्लिम विरोधी ही है।

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author

राम पुनियानी

लेखक आईआईटी मुंबई के पूर्व प्रोफेसर हैं। वे मानवी अधिकारों के विषयो पर लगातार लिखते आ रहे हैं। इतिहास, राजनीति तथा समसामाईक घटनाओंं पर वे अंग्रेजी, हिंदी, मराठी तथा अन्य क्षेत्रीय भाषा में लिखते हैं। सन् 2007 के उन्हे नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित किया जा चुका हैं।