शैलेंद्र के गीत कैसे बने क्रांतिकारी आंदोलनों कि प्रेरणा?

शैलेंद्र के गीत कैसे बने क्रांतिकारी आंदोलनों कि प्रेरणा?
Archive

तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू के साथ गीतकार शैलेंद्र


किताबीयत : धरती कहे पुकार के..

फिल्मी दुनिया में शैलेंद्र एक ऐसे गीतकार हुए हैं, जिन्होंने अपने गीतों के जरिए आम आदमी के जज्बात को बड़े फलक तक पहुंचाया। उनके सुख-दुःख में अपने गीतों के मार्फत वे शरीक हुए। उन्हें नया हौसला, नई उम्मीद प्रदान की। यही वजह है कि शैलेंद्र के गीत आज भी जनता में उतने ही लोकप्रिय हैं, जितने कल थे और आगे भी रहेंगे।

इप्टा और फिल्मी दुनिया की ऐसी अजीम शख्सियत शैलेंद्र के व्यक्तित्व और कृतित्व को अच्छी तरह से जानने-समझने के लिए धरती कहे पुकार के...गीतकार शैलेंद्रऔर गीतकार शैलेंद्र तू प्यार का सागर हैशानदार किताबें है। जिनका संपादन शैलेंद्र और उनके गीतों के शैदाई इंद्रजीत सिंह ने किया है। पहली ही नजर में इन दोनों किताबों में उनकी बेशुमार मेहनत, शैलेंद्र और उनके गीतों के जानिब बेपनाह मुहब्बत और हद से ज्यादा जुनून साफ दिखलाई देता है।

इठलाती हवा नीलम सा गगन

कलियों पे ये बेहोशी की नमी

ऐसे में भी क्यों बेचैन है दिल

जीवन में न जाने क्या है कमी

क्यों आग सी लगा के ...

ये रात भीगी-भीगी ...

इन दोनो किताबों के वास्ते उन्होंने 80 से ज्यादा लोगों से शैलेंद्र के बारे में लिखवाया है। संबंधित किताब में 60 लेखकों ने लिखा हैं, जिसमें कवि, गीतकार, कहानीकार और आलोचकों के अलावा शैलेंद्र के खास रिश्तेदार और अजीज दोस्त भी शामिल हैं।

पढ़ें :फिल्म इंडस्ट्री के क्लब क्लासको जिम्मेदार बनना होगा

पढ़ें : सिनेमा को बुराई कहने पर गांधी पर उखडे थे ख्वाजा अहमद अब्बास

क्या हैं खासियत?

किताब में रामविलास शर्मा, डॉ. नामवर सिंह, मैनेजर पांडेय, शरद दत्त, अरविंद कुमार, त्रिलोचन, मंगलेश डबराल, फणीश्वरनाथ रेणु, भीष्म साहनी, कमलेश्वर, डॉ. राजेन्द्र अवस्थी, नीरज, कैफी आजमी, हसरत जयपुरी, गुलजार, योगेश, निदा फाजली, डॉ. इरशाद कामिल, राज कपूर, मन्ना डे, विजय आनंद, बासु चटर्जी, शकुंतला शैलेंद्र, शिवानी कैलाश, मनोज शंकर शैलेंद्र, अमला शैलेंद्र मजुमदार, दिनेश शंकर शैलेंद्र आदि के लेख हैं।

कमोबेश सभी लेखक-कलाकारों ने शैलेंद्र के ऊपर दिल से लिखा है। शैलेंद्र के योगदान को रेखांकित करते हुए प्रसिद्ध अभिनेता, निर्देशक राज कपूर ने अपने लेख में लिखा है, मैं ही नहीं भारत की पूरी जनता इस महान कलाकार को कभी नहीं भुला पाएगी। क्योंकि यह उनका प्रतिनिधि था। उनका कवि था।

तू ज़िन्दा है तो ज़िन्दगी की जीत में यकीन कर,

अगर कहीं है स्वर्ग तो उतार ला ज़मीन पर!

सुबह औ'''' शाम के रंगे हुए गगन को चूमकर,

तू सुन ज़मीन गा रही है कब से झूम-झूमकर,

वहीं गीतकार शैलेंद्र के बारे में कहानीकार भीष्म साहनी की राय है, शैलेंद्र के आ जाने पर (फिल्मी दुनिया में) एक नई आवाज सुनाई पड़ने लगी थी। यह आज़ादी के मिल जाने पर, भारत के नए शासकों को संबोधित करने वाली आवाज थी। इसके तेवर ही कुछ अलग थे। बड़ी बेबाक, चुनौती भरी आवाज थी। इसमें दृढ़ता थी। जुझारूपन था। पर साथ ही इसमें अपने देश और देश की जनता के प्रति अगाध प्रेमभाव था......पर साथ ही साथ शासकों से दो टूक पूछा भी गया था, “लीडरो न गाओ गीत राम राज का/इस स्वराज का क्या हुआ किसान, कामगार राज का।

एक ही किताब में इतनी सारी सामग्री इकट्ठा करना आसान काम नहीं। खास तौर से शैलेंद्र के परिवार और फिल्म वालों से लिखवाना। जिनमें से कुछ का तो लिखने से कोई तआल्लुक ही नहीं है। फिर भी उन्होंने शैलेंद्र के ऐसे-ऐसे आत्मीय प्रसंग लिखे हैं, जो पाठकों की आंखों को नम कर देंगे।

उनकी पत्नी शकुंतला शैलेंद्र, अपने पति को याद करते हुए लिखती हैं, “मस्तिक में उनकी स्मृतियां मेला-सा लगा देती हैं। यह याद आता है, वह याद आता है। हंसी-खुशी भरी दुनिया आंखों के आगे घूमने लगती है। उनकी मुस्कराती अगणित छवियां चारों और घूम रही हैं। कहां गए, वह जो मेरी नाराजगी का उत्तर कविता में दिया करते थे, जिए जा रहे हैं कि ऐ जिन्दगानी कोई अब तलक प्यार करता है हमसे।’’

पढ़ें : मौसिखी और अदब कि गहरी समझ रखने वाले आदिलशाही शासक

पढ़ें : औरंगजेब नें लिखी थीं ब्रह्मा-विष्णू-महेश पर कविताएं

बेमिसाल किताब

मार्मिक प्रसंग शैलेंद्र को याद करते हुए उनके बेटे मनोज शंकर शैलेंद्र, दिनेश शंकर शैलेंद्र और बेटी अमला शैलेंद्र मजुमदार ने लिखे हैं। किताब के लिए रचनाएं जुटाने के दौरान कई लेखक, कलाकार हमसे हमेशा के लिए जुदा हो गए, लेकिन फिर भी किताब का काम लेखक इंद्रजीत सिंह उसी मनोयोग से करते रहे। इसमें कहीं कोई रुकावट नहीं आई। जिसका नतीजा ये बेमिसाल किताब है। किताब में शैलेंद्र का आत्मकथ्य मैं, मेरा कवि और मेरे गीतजो कि उस वक्त की लोकप्रिय पत्रिका धर्मयुगमें छपा था, इसके अलावा शैलेंद्र का एक हस्तलिखित गीत और कविता भी संकलित है।

सच मायने में शैलेंद्र एक जनगीतकार थे। आज़ादी से पहले कवि सम्मेलनों और इप्टा के मंच से, तो आज़ादी के बाद फिल्मों के माध्यम से उन्होंने जनता को शिक्षित, आंदोलित करने का महती कार्य किया। उनका एक नहीं, कई ऐसे गीत हैं जो जन आंदोलनों में नारों की तरह इस्तेमाल किए जाते हैं। मसलन हर जोर-जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है..’, “क्रांति के लिए उठे कदम, क्रांति के लिए जली मशाल!

हर ज़ोर जुल्म की टक्कर में, हड़ताल हमारा नारा है !

तुमने माँगे ठुकराई हैं, तुमने तोड़ा है हर वादा

छीनी हमसे सस्ती चीज़ें, तुम छंटनी पर हो आमादा

तो अपनी भी तैयारी है, तो हमने भी ललकारा है

बंगाल के अकाल, तेलंगाना आंदोलन और भारत-पाक बंटवारे जैसे तमाम महत्वपूर्ण घटनाक्रमों पर उन्होंने कई मानीखेज गीत लिखे। वामपंथी विचारधारा में डूबे उनके परिवर्तनकामी, क्रांतिकारी गीतों को सुनकर लोग आज भी आंदोलित हो उठते हैं। उनके अंदर कुछ करने का जज्बा पैदा हो जाता है। फिल्मी दुनिया के अपने छोटे से कैरियर यानी सिर्फ सतरह साल में शैलेंद्र ने 800 से ज्यादा गीत लिखे, लेकिन इन गीतों में भी भाषा और विचारों की एक उत्कृष्टता है। अपने गीतों से उन्होंने हमेशा अवाम की सोच को परिष्कृत किया।

पढ़ें : शकील बदायूंनी : वो मकबूल शायर जिनके लिये लोगों ने उर्दू सीखी

पढ़ें : अब्बू जां निसार अख्तर से मुझे अनमोल विरासत मिली

इप्टा के संस्थापक

शैलेंद्र इंडियन पीपुल्स थियेटर एसोसिएशनयानी इप्टा के संस्थापक सदस्यों में से एक थे। अगस्त क्रांति आंदोलन के दौरान वे जेल भी गए। फिल्मों में गीत लिखना, उन्होंने आर्थिक मजबूरी में कबूला था, जो बाद में उनके साथ सदैव के लिए जुड़ गया। धुन पर गीत लिखने में उन्हें महारत हासिल थी। उन्होंने तिसरी कसम नामक फिल्म का निर्माण थी किया था राज कपूर और फिल्म वितरकों के लाख कहने के बावजूद, उन्होंने इसका अंत नहीं बदला था।

शैलेंद्र आसान जुबान मे लिखते उनकी इस भाषा का ही कमाल है कि उनके गीत सहजता से हमारी जबान पर आ जाते हैं। शैलेंद्र को लोक परंपरा और लोक जीवन की भी अच्छी समझ थी। यही वजह है कि उनके कई गीतों में यह परंपरा और जीवन पूरी सज-धज के साथ आता है।

माना अपनी जेब से फकीर हैं

फिर भी, यारो ! दिल के हम अमीर हैं

लुटे जो प्यार के लिए, वो ज़िन्दगी

जले बहार के लिए, वो ज़िन्दगी

किसी को हो न हो, हमें है एतबार

किताब में शामिल अलग-अलग लेखों में इस बात को भी प्रमुखता से रेखांकित किया गया है कि शैलेंद्र के गीतों में उनकी प्रतिबद्धता और जनपक्षधरता स्पष्ट दिखलाई देती है और वह है आम आदमी के प्रति। इतिहासकार, वामपंथी चिंतक लाल बहादुर वर्मा ने शैलेंद्र को भारत का बॉब डिलन कहा है। बॉब डिलन अमेरिका के लोकगीतकार थे और उन्हें अपनी गायकी के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया था।

लिखते हैं, “भारतीय संदर्भ में यह पुरस्कार यदि किसी को मिलता, तो इसके सबसे पहले हकदार, शैलेंद्र होते। क्योंकि वे भी लोकप्रिय कवि हैं।शैलेंद्र और उनके गीतों की लोकप्रियता का ही यह सबब है, कि छह-सात दशक पहले लिखे शैलेंद्र के गीतों की अहमियत को प्रस्तुत किताब में, उनके साथ की पीढ़ी तो बतलाती ही है, बल्कि नई पीढ़ी ने भी उन्हें उसी शिद्दत से याद किया है।

गीतकार शैलेंद्र, वाकई प्यार का सागर थे। जो उनके गीतों में डूबा, वह मानो सागर पार कर गया। धरती कहे पुकार के...किताब शैलेंद्र के शैदाईयों के लिए वाकई एक नायाब तोहफा हैं, जो उन्हें जरूर पसंद आएगा।

##

किताब का नाम : धरती कहे पुकार के... गीतकार शैलेंद्र

संपादक : इंद्रजीत सिंह

प्रकाशक : वी.के. ग्लोबल पब्लिकेशन प्रा. लि., फरीदाबाद (हरियाणा)-2019

पन्ने : 344

भाषा : हिन्दी

कीमत : 300 रुपये

किताबीयत में पढ़े :

* दास्ताने मुग़ल--आज़मसुनने का एक और आसिफ़

* उर्दू और हिन्दी तरक्की पसंद साहित्य का अहम दस्तावेज़

You can share this post!

author

ज़ाहिद ख़ान

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और आलोचक हैं। कई अखबार और पत्रिकाओं में स्वतंत्र रूप से लिखते हैं। लैंगिक संवेदनशीलता पर उत्कृष्ठ लेखन के लिए तीन बार ‘लाडली अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। इन्होंने कई किताबे लिखी हैं, जिसमें संघ का हिन्दुस्थान, आज़ाद हिन्दुस्थान में मुसलमान, तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ शामिल हैं।