लाज़वाब किस्सों से भरी थी जोश मलीहाबादी कि ज़िन्दगानी

लाज़वाब किस्सों से भरी थी जोश मलीहाबादी कि ज़िन्दगानी

किताबीयत : यादों की बरात

काम है मेरा तगय्युर (कल्पना), नाम है मेरा शबाब (जवानी)

मेरा नाम इंकलाबो, इंकलाबो, इंकिलाब।

उर्दू अदब में जोश मलीहाबादी वह आला नाम है, जो अपने इंकलाबी कलाम से शायर-ए-इंकलाब कहला। जोश का सिर्फ यह एक अकेला शे ही उनके तआरुफ और अज्मत को बतलाने के लिए काफी है। वरना उनके अदबी खजाने में ऐसे-ऐसे कीमती हीरे-मोती हैं, जिनकी चमक कभी कम नहीं होगी।

उत्तर प्रदेश में लखनऊ के नजदीक मलीहाबाद में 5 दिसम्बर, 1896 में पैदा हुए शब्बीर हसन खां, बचपन से ही शायरी के जानिब अपनी बेपनाह मुहब्बत के चलते, आगे चलकर जोश मलीहाबादी कहलाए। शायरी उनके खून में थी। उनके अब्बा, दादा सभी को शेर-ओ-शायरी से लगाव था। घर के अदबी माहौल का ही असर था कि वे भी नौ साल की उम्र से ही शायरी कहने लगे थे और महज 25 साल की छोटी उम्र में उनकी गजलों का पहला मजमुआ रूहे-अदबशाया हो गया था।

इस इंकलाबी शायर की अपनी जिंदगानी में पंद्रह से ज्यादा किताबें प्रकाशित हुईं। उनकी कुछ अहम किताबें हैं, ‘नकशोनिगार’, ‘अर्शोफर्श’, ‘शोला-ओ-शबनम’, ‘फिक्रो-निशात’, ‘हर्फो-हिकायत’, ‘रामिशो-रंग’, ‘सुंबुलो-सलासिल’, ‘सरोदो-खरोशऔर सुमूमोसबाआदि। मलीहाबादी ने मुल्क की आजादी से पहले कलीमऔर आज़ादी के बाद आजकलमैगजीन का संपादन किया। फिल्मों के लिए कुछ गाने लिखे, तो एक शब्दकोश भी तैयार किया। लेकिन उनकी मुख्य पहचान एक शायर की है।

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शुरुआती दौर

तरक्कीपसंद तहरीक के वे रहनुमाओं में से एक थे। जोश मलीहाबादी की जिन्दगानी का शुरुआती दौर, मुल्क की गुलामी का था। जाहिर है कि इस दौर के असरात उनकी शायरी पर भी पड़े। हुब्बुलवतन (देशभक्ति) और बगावत उनके मिजाज का हिस्सा बन गई। उनकी एक नहीं, कई ऐसी कई गजलें-नज्में हैं, जो वतनपरस्ती के रंग में रंगी हुई हैं। मिसाल के तौर पर वफादाराने-अजली का पयाम’, ‘शिकस्ते-जिंदा का ख्वाब’, ‘मातमे-आजादीके नाम अव्वल नंबर पर लिए जा सकते हैं।

इंकलाब और बगावत में डूबी हुई उनकी ये गजलें-नज्में, जंग-ए-आज़ादी के दौरान नौजवानों के दिलों में गहरा असर डालती थीं। वे आंदोलित हो उठते थे। यही वजह है कि जोश मलीहाबादी को अपनी इंकलाबी गजलों-नज्मों के चलते कई बार जेल भी जाना पड़ा। लेकिन उन्होंने अपना मिजाज और रहगुजर नहीं बदली।

जोश मलीहाबादी का अदबी सरमाया जितना शानदार है, उतनी ही जानदार-जोरदार उनकी जिन्दगी थी। जोशसाहब की जिन्दगी में गर हमें दाखिल होना हो, तो सबसे बेहतर तरीका यह होगा कि हम उन्हीं के मार्फत उसे देखें-सुनें-जानें। क्योंकि जिस दिलचस्प अंदाज में उन्होंने यादों की बरातकिताब में अपनी कहानी बयां की है, उस तरह का कहन बहुत कम देखने-सुनने को मिलता है।

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किताब का मिजाज

बुनियादी तौर पर उर्दू में लिखी गई इस किताब का पहला एडिशन साल 1970 में आया था। तब से इसके कई एडिशन आ चुके हैं, लेकिन पाठकों की इसके जानिब मुहब्बत और बेताबी कम नहीं हुई है। यादों की बरातकी मकबूलियत के मद्देनजर, इस किताब के कई जबानों में तजुर्मे हुए और हर जबान में इसे पसंद किया गया।

हिन्दी में भी इस किताब का सबसे पहले अनुवाद हिन्दी-उर्दू जबान के मशहूर लेखक हंसराज रहबर ने किया था। एक लंबे अरसे के बाद यादों की बरातका एक और अनुवाद आया है। इस मर्तबा यह, नौजवान लेखिका-अनुवादक नाज खान ने किया है।

अनुवाद के बजाय इसे लिप्यंतरण कहें, तो ज्यादा बेहतर ! उर्दू जबान के लबो-लहजे से जरा सी भी छेड़छाड़ न करते हुये, उन्होंने इस किताब का हिन्दी जबान में जो तर्जुमा किया है, उसे पढ़कर उर्दू की लज्जत आ जाती है। यही एक अच्छे अनुवाद की पहचान भी है कि मूल जबान का लहजा बरकरार रहे। वरना मुताबिकअल्फाज का भी अनुसारअनुवाद कर देने वाले अनुवादक, पाठकों के अंदर एक खीज ही पैदा करते हैं।

बहरहाल, बात यादों की बरातकी। जोश मलीहाबादी ने यह किताब अपनी जिन्दगी के आखिरी वक्त में लिखी थी। आज हम इस किताब के गद्य पर फिदा हैं, लेकिन शायर-ए-इंकलाब के लिए यह काम आसान नहीं था। खुद किताब में उन्होंने यह बात तस्लीम की है कि ‘‘अपने हालाते-जिन्दगी कलमबंद करने के सिलसिले में उन्हें छह बरस लगे और चौथे मसौदे में जाकर वे इसे मुकम्मल कर पाये’’

हांलाकि, चौथे मसौदे से भी वे पूरी तरह से मुतमईन नहीं थे। लेकिन जब किताब आई, तो उसने हंगामा कर दिया। अपने बारे में इतनी ईमानदारी और साफगोई से शायद ही किसी ने इससे पहले लिखा हो। अपनी जिन्दगी के बारे में वे पाठकों से कुछ नहीं छिपाते। यहां तक कि अपने इश्क भी, जिसका उन्होंने अपनी किताब में तफ्सील से जिक्र किया है।

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जिन्दगी के अहम पल

अलबत्ता जिनके इश्क में वे गिरफ्तार हुये, उनके नाम जरूर उन्होंने कोड वर्ड में दिए हैं। मसलन एस. एच., एन. जे., एम. बेगम, आर. कुमारी। 510 पेज की यह किताब पांच हिस्सों में बंटी हुई है। पहले हिस्से में जोश की जिन्दगी के अहम वाकए शामिल हैं, तो दूसरे हिस्से में वे अपने खानदान के बारे में पाठकों को बतलाते हैं।

किताब के सबसे दिलचस्प हिस्से वे हैं, जब जोश अपने दोस्त, अपने दौर की अजीब हस्तियां और अपनी इश्कबाजियों का खुलासा करते हैं। जिन दोस्तों मसलन अबरार हसन खां असरमलीहाबादी, मानी जायसी, ‘फानीबदायूंनी, आगा शायर कजलबाश, वस्ल बिलगिरामी, कुंवर महेंन्द्र सिंह बेदी’, पंडित नेहरू, सरोजिनी नायडू, सरदार दीवान सिंह मफ्तूं’, ‘फिराकगोरखपुरी, ‘मजाजवगैरह का उन्होंने अपनी किताब में जिक्र किया है, वे खुद सभी मामूली हस्तियां नहीं हैं, लेकिन जिस अंदाज में जोश उन्हें याद करते हैं, वे कुछ और खास हो जाते हैं।

उनकी शख्सियत और भी ज्यादा निखर जाती है। उनको जानने-समझने के लिए दिल और भी तड़प उठता है। किताब में सरोजनी नायडू का तआरुफ वे कुछ इस तरह से करते हैं, ‘‘शायरी के खुमार में मस्त, शायरों की हमदर्द, आजादी की दीवानी, लहजे में मुहब्बत की शहनाई, बातों में अफसोस, मैदाने जंग में झांसी की रानी, अमन में आंख की ठंडक, आवाज में बला का जादू, गुफ्तगू में मौसिकी, जैसे-मोतियों की बारिश, गोकुल के वन की मीठी बांसुरी और बुलबुले-हिंदुस्तान, अगर यह दौर मर्दों में जवाहरलाल और औरतों में सरोजिनी की-सी हस्तियां न पैदा करता, तो पूरा हिन्दुस्तान बिना आंख का होकर रह जाता।’’ (पेज - 367)

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मेरे दौर की चंद अजीब हस्तियां

किताब के इस हिस्से में जोश ने उन लोगों पर अपनी कलम चलाई है, जो अपनी अजीबो-गरीब हरकतों और ना भुलाई जाने वाली बातों से उन्हें ताउम्र याद रहे और जब वे कलम लेकर बैठे, तो उनको पूरी शिद्दत और मजेदार ढंग से याद किया।

जोश ने बड़े ही किस्सागोई से इन हस्तियों का खाका खींचा है कि तस्वीरें आंखों के सामने तैरने लगती हैं। जैसे विलक्षण किरदार, वैसा ही उनका वर्णन। कई किरदार तो ऐसे हैं कि पढ़ने के बाद भी यकीन नहीं होता कि हाड़-मांस के ऐसे भी इन्सान थे, जो अपनी जिद और अना (हठ) के लिए क्या-क्या हरकतें नहीं करते थे।

यादों की बरातकी ताकत इसकी जबान है, जो कहीं-कहीं इतनी शायराना हो जाती है कि शायरी और नज्म का ही मजा देती है। मिसाल के तौर पर सर्दी के मौसम की अक्कासी वे कुछ इस तरह से करते हैं, ‘‘आया मेरा कंवार, जाड़े का द्वार अहा! जाड़ा-चंपई, शरबती, गुलाबी जाड़ा-कुंदन-सी दमकती अंगीठियों का गुलजार, लचके-पट्टे की रजाइयों में लिपटा हुआ दिलदार, दिल का सुरूर, आंखों का नूर, धुंधलके का राग, ढलती शाम का सुहाग, जुलेखा का ख्वाब, यूसुफ का शबाब, मुस्लिम का कुरआन, हिन्दू की गीता और सुबह को सोने का जाल, रात को चांदनी का थाल।’’ (पेज - 49)

यह तो सिर्फ एक छोटी सी बानगी भर है, वरना पूरी किताब इस तरह के लाजवाब जुमलों से भरी पड़ी है। किताब पढ़, कभी दिल मस्ती से झूम उठता है, तो कभी लबों पर आहिस्ता से मुस्कान आ जाती है। यादों की बरातको पढ़ते हुए, यह एहसास होता है कि जैसे हम भी जोश मलीहाबादी के साथ इस बरात में शरीक हो गए हों।

हिन्दोस्तां के उस गुजरे दौर, जब मुल्क की आज़ादी की जद्दोजहद अपने चरम पर थी, तमाम हिन्दुस्तानी कद्रें जब अपने पूरे शबाब पर थीं, इन सब बातों को अच्छी तरह से जानने-समझने के लिए, इस किताब को पढ़ने से उम्दा कुछ नहीं हो सकता।

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किताब का नाम : यादों की बरात (आत्मकथा)

लेखक : जोश मलीहाबादी

हिन्दी अनुवाद :  नाज़ ख़ान

प्रकाशक : संवाद प्रकाशन, मेरठ (उ.प्र.)

किमत : 400 (पैपरबैक संस्करण),

न्ने : 510

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ज़ाहिद ख़ान

लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार और आलोचक हैं। कई अखबार और पत्रिकाओं में स्वतंत्र रूप से लिखते हैं। लैंगिक संवेदनशीलता पर उत्कृष्ठ लेखन के लिए तीन बार ‘लाडली अवार्ड’ से सम्मानित किया गया है। इन्होंने कई किताबे लिखी हैं, जिसमें संघ का हिन्दुस्थान, आज़ाद हिन्दुस्थान में मुसलमान, तरक्कीपसंद तहरीक के हमसफर’ शामिल हैं।