मराठा इतिहास के इबारत में डी बॉन का स्थान क्यों अहम हैं?

मराठा इतिहास के इबारत में डी बॉन का स्थान क्यों अहम हैं?
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बेनेट डी बॉन (1751–1830)


भारत में विदेशी यायावर (एक जगह टिककर न रहने वाले) योद्धाओं का इतिहास विविधतापूर्ण रहा है। उनमें से तमाम दुस्साहसिक शून्य से शिखर तक के अपने सफरनामे के दौरान जाने कितनी बाधाओं को पार करते हुए वहाँ पहुँचे, जहाँ शायद उन्हें भी उम्मीद रही होगी।

इन लोगों ने अपने मुल्क से खाली हाथ आकर यहाँ अपनी सेनाएं बनाई, साम्राज्य विजित किये अथवा स्थापित राजा-रजवाड़ों का मार्गदर्शन किया, बादशाहों और शहंशाहों को बनाया-बिगाड़ा।

उन्होंने कहीं रक्तपात से, तो कहीं कूटनीति से सफलता की नई इबारतें लिखी, तो खुद की रियासतें भी बनाने में कामयाब हुए। क्या यह एक चमत्कार से कम नहीं?

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प्रतिष्ठा या धूर्तता

सच यह भी है कि तत्कालीन भारत की राजशाही या वंशानुगत राज करने के तंत्र में यूरोप की जनतांत्रिक हवाओं के झोंको को साथ लाना कोई आसान काम था।

ऐसा कोई भी काल हमेशा अल्प होता है। लोग हजारों सालों के इतिहास को रातों-रात आधुनिकता की लहर में सम्मिलित होता नहीं देख सकते। उनके मन में संशय होना स्वाभाविक भी है।

इसलिए इन यायावरों ने जो भी उद्यम किया, वह भी समय के साथ उनकी प्रतिष्ठा या धूर्तता के साथ स्वतः ही आसानी से विस्मृत होता गया। इस संक्रमण काल में उनका योगदान या कालखंड मात्र कुछ प्रस्तरों में ही सिमट कर रह गया, जिसको जानने-समझने में हम लोगों ने कभी रुचि भी नहीं ली।

यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्हें, उनके जीवन और कामों को सिर्फ अकादमिक इतिहास के रूप में जाना गया। ऐसे में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व को केवल किन्हीं विदेशी, खास तौर से यूरोपीय मुल्कों के आक्रांताओं की श्रेणी में रख कर नकारना या उपेक्षित करना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।

वह भी तब जबकि इतिहास में दर्ज है कि वे अधिकतर लोग वो थे जो तो किसी सबल आर्थिक पृष्ठभूमि से आये थे, ही किसी विशेष विचारधारा से बंधे थे, और उन्हें इस भारत जैसे विशाल और वैविध्यपूर्ण संस्कृतियों, भौगोलिक परिस्थितियों तथा यहाँ की परंपराओं और लोक जीवन का किंचित अंदाज भी रहा था।

अगर ऐसे प्रवासी योद्धा (यायावर) सिर्फ भारत को एक सोने की चिड़िया समझ कर इसकी संपदा का दोहन करने भी आये हों, तो भी उनका जिन्दगीनामा एक ऐसे दुस्साहस की तस्वीर प्रस्तुत करता है, जिसे हम सबको इतिहास की एक सीख के रूप में जानना चाहिए।

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कौन था डी बॉन?

मूल रूप से सेवॉय गणराज्य, जो बाद में फ्रान्स का हिस्सा बना का निवासी बेनेट डी बॉन’ (Benoît de Boigne) उन्हीं चुनिंदा यायावरों में से एक था।

अगर कहा जाए कि तत्कालीन भारत में माधव जी सिंधिया जैसे सशक्त मराठा छत्रप की सफलता के पीछे डी बॉन ही था, तो अतिशयोक्ति होगी। यह वही बॉन था जिसकी रणनीतियों ने मराठों को जो शक्ति दी, वह उन्हें शायद कभी नहीं मिल सकती थी।

जब वह निकलता था तो उसकी तोपों की गर्जनाओं से उत्तर भारत के वो रजवाड़े दहल उठते थे, जिनके विरुद्ध उसका अभियान होता था। उसने जो किया इतनी शिद्दत से किया कि उस पर ग्रंथ लिखे जा सकते हैं। वह भारत में यूरोपियन यायावरों का ऐसा दमकता चेहरा था, जो अपने सिद्धांतों पर चला करते थे।

वह जिसके साथ रहा, पूरी तरह समर्पित रहा। उसने सेनाओं को आधुनिक बनाया, रणनीतियों में समृद्ध किया, पैसा भी कमाया, पर इतनी सतर्कता बरती कि लूटपाट कर अपनी जेबों को भरने की प्रवृत्ति से स्वयं को दूर रखा, ताकि उसके नाम पर कोई धब्बा लगे।

उसके बावजूद आज हम उसे और उसके समकालीन तमाम ऐसे यायावरों को इस लायक भी नहीं समझते कि इतिहास में उनका उपयुक्त उल्लेख हो, शायद सिर्फ इसलिए कि वे यूरोपियन थे, यह पूर्वग्रह के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

ये यूरोपियन यायावर समय के साथ, ख़ास तौर से वारेन हेस्टिंग के कार्यकाल में या उससे भी पूर्व भारत के तमाम हिस्सों में अपनी-अपनी जगह ढूँढने निकले थे। कुछ वाकई लुटेरे थे, कुछ सिर्फ यहाँ की अपार नैसर्गिक संपदा से विस्मित थे, और तमाम ऐसे भी थे जो इस देश में आकर ऐसा कुछ करना चाहते थे, ताकि दुनिया उन्हें जाने।

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अनुशासित सेना का गठन

डी बॉन के अलावा आयरिश जॉर्ज थॉमस भी एक ऐसा ही बेहतरीन चेहरा था, जो बाद मेंहांसी का राजाके नाम से विख्यात हुआ, पर उसका करियर भी बॉन की तरह अल्प समय में ही लुप्त हो गया।

यह बात अपनी जगह उचित है कि यह वह दौर भी था जब भाड़े के इन सैनिकों के आवागमन और सक्रियता से संक्रमण काल से गुजर रहे देश में युद्ध, षड्यंत्रों, मारकाट तथा लूट की घटनाओं को प्रमुखता मिलने लगी थी।

उनमें तमाम वे भी थे जिनको उनके असैद्धान्तिक कार्यकलापों से इतिहास ने गुमनामी के अंधेरों में विस्मृत हो जाने दिया।

आधुनिक इतिहास में अकसर डी बॉन को इस बात का श्रेय दिया जाता है कि उसने माधव जी सिंधिया को नियमित, आधुनिक और अनुशासित सेना के गठन की महत्ता के विषय में बताते हुए ऐसे सैन्य बल के गठन पर राजी किया था।

मराठा इतिहास के उस अवधि के घटनाक्रम पर एक ईमानदार दृष्टि डालने से कोई भी समझ सकता है कि तत्कालीन भारत में उसके होने के मायने क्या रहे होंगे! या वाकई में वह इतिहास के कुछेक प्रस्तरों अथवा पन्नों में ही पढ़ा-समझा, चर्चा किये जाने और सिमट जाने वाले चरित्र का न्सा था?

इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका ने उसके विषय में उल्लेख करते हुए यूँ ही नहीं लिख दिया था कि एक समय ऐसा भी आया कि अगर बॉन चाहता तो वह भारत का एकछत्र राजा बन सकता था, पर उसने धूर्तता की जगह निष्ठा का मार्ग चुना। यही उसकी चारित्रिक विशिष्टता थी, जिसके लिए उसे सम्मान की दृष्टि से देखा गया।

उस इतिहास को आप स्वयं पढ़ कर देखिये। जब हर तरफ संशय और भ्रम का वातावरण था, तब इन लोगों ने इतिहास की जो इबारतें लिखने का काम किया, उसका मूल्याँकन होना ही चाहिए। वह भी वस्तुनिष्ठ, बिना उनके अस्वाभाविक उद्गम, निष्ठा और सोच पर विचार किये। उसका मूल्याकन समाज को स्वयं करने दीजिये।

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author

राजगोपाल सिंह वर्मा

लेखक आगरा स्थित साहित्यिक हैं। भारत सरकार और उत्तर प्रदेश में उच्च पदों पर सेवारत। इतिहास लेखन में उन्हें विशेष रुचि है। कहानियाँ और फिक्शन लेखन तथा फोटोग्राफी में भी दखल।