वो आपातकाल था, तो यह ‘आफ़तकाल’ हैंं

वो आपातकाल था, तो यह ‘आफ़तकाल’ हैंं
Rane Prakash/Hindustan Times

प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाये गये आपातकाल को 45 साल हो चुके हैं मगर आज के दौर में भी देश के हालात उसी तरह नजर आते हैं, जैसे 1975 में थे इस स्थिति पर चर्चा करता वरीष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त का यह आलेख आपके लिए दे रहे हैं। लेखक आपातकाल के दौरान जेल में बंद थे। हमने इसे समाजवादी विचार : संकल्प बदलाव काकिताब से लिया गया हैं, जो पिछले साल प्रकाशित हुई थी

पातकाल और उस अवधि में हुए दमन-उत्पीड़न तथा असहमति के स्वरों और शब्दों को दबाने के प्रयासों को न सिर्फ याद रखने बल्कि उनके प्रति चौकस रहने की भी जरूरत है। ताकि भविष्य में कोई सत्तारूढ़ दल और उसका नेता वैसी हरकत और हिमाकत न कर सके जैसा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 25-26 जून 1975 की दरम्यानी रात में किया था।

उस काली रात को देश को आपातकाल और सेंसरशिप के हवाले कर नागरिक अधिकार एवं स्वतंत्रताएं छीन ली गई थी। राजनीतिक विरोधियों को उनके घरों, ठिकानों से उठाकर जेलों में डाल गया था। अभिव्यक्ति की आजादी पर सेंसरशिप का ताला जड़ दिया गया था। पत्र-पत्रिकाओं में वही सब छपता और आकाशवाणी पर वही प्रसारित होता था जो उस समय की सरकार चाहती थी। प्रकाशन-प्रसारण से पहले सामग्री को प्राधिकृत अधिकारी के पास भेज कर उसे सेंसर करवाना पड़ता था। तुलनात्मक नजरिए से देखें तो क्या आज के हालात उस समय के आपातकाल से अलग है?

दरअसल, आपातकाल एक खास तरह की राजनीतिक संस्कृति और प्रवृत्ति का परिचायक था, जिसे लागू तो इंदिरा गांधी ने किया था लेकिन बाद के दिनों-सालों में और आज भी वह एकाधिकारवादी प्रवृत्ति कमोबेश सभी राजनीतिक दलों और नेताओं में देखने को मिलती रही है।

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आपातकाल की पृष्ठभूमि

इंदिरा गांधी 1971 के आम चुनाव में बैंकों के राष्ट्रीयकरण, राजाओं के प्रिवी पर्स की समाप्ति जैसे अपने फैसलों पर आधारित गरीबी हटाओ के नारे के साथ भारी बहुमत के साथ सत्तारूढ़ हुई थी। उन्होंने अपने प्रचारतंत्र और मीडिया का सहारा लेकर अपनी गरीब हितैषी और अमीर विरोधी छवि बनाई थी।

लेकिन आगे चलकर गुजरात के एक इंजीनियरिंग कॉलेज में हॉस्टेल में बढ़ी फीस और घटिया भोजन की आपूर्ति के विरोध में शुरू हुए छात्र आंदोलन ने नव निर्माण आंदोलन का व्यापक रूप धर लिया था। इस आंदोलन की परिणति राज्य में कांग्रेस की सत्ता से बेदखली के रूप में हुई थी। और फिर ऐतिहासिक रेल हड़ताल और बिहार आंदोलन ने, जिसने आगे चलकर देश भर में लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में संपूर्ण क्रांति आंदोलन का रूप धारण करने के साथ ही, केंद्र में शक्तिशाली इंदिरा गांधी की सरकार को भी भीतर से झकझोर दिया था।

इस आंदोलन को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को छोड़कर प्रायः सभी गैर कांग्रेसी दलों का सहयोग-समर्थन था। तभी 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति जगमोहनलाल सिन्हा का ऐतिहासिक फैसला आ गया। सिन्हा ने रायबरेली में इंदिरा गांधी से पराजित समाजवादी नेता राजनारायण के द्वारा उनके संसदीय चुनाव को चुनौती देनेवाली चुनाव याचिका पर फैसला सुनाते हुए श्रीमती गांधी के चुनाव को अवैध घोषित करने और लोकसभा की उनकी सदस्यता रद्द करने के साथ ही उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था।

इंदिरा गांधी की अपील पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट के अवकाशकालीन जज वी आर कृष्णा अय्यर ने 24 जून को इलाहाबाद हाइकोर्ट के फैसले पर स्थगनादेश जारी करते हुए यह व्यवस्था भी दी थी कि इस मामले में आखिरी और पूर्ण फैसला आने तक श्रीमती गांधी प्रधानमंत्री बनी रह सकती हैं। वह संसद की कार्यवाहियों में भाग भी ले सकती हैं, लेकिन सदन में किसी मुद्दे पर वोट नहीं कर सकती।

दूसरी तरफ, श्रीमती गांधी पर अंदर और बाहर से भी पद त्याग के लिए दबाव बनने लगा था। उनके पद त्याग नहीं करने की स्थिति में अगले दिन 25 जून को जयप्रकाश नारायण एवं संपूर्ण विपक्ष ने दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में एक लाख से अधिक लोगों की रैली - सभा कर देशवासियों से अनिश्चितकालीन देशव्यापी आंदोलन का आह्वान किया था।

यहां तक कि सेना और पुलिस से भी सरकार के गलत आदेशों को नहीं मानने का आह्वान किया गया था। इसी मैदान में जेपी ने राष्ट्र कवि रामधारी सिंह दिनकर की मशहूर कविता की पंक्ति - सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’, का उद्घोष किया था।

फरवरी 2020 में दिल्ली दंगो के दैरान खिंची गई यह तस्वीर कापी कुछ कहानी बयां करती हैं

फरवरी 2020 में दिल्ली दंगो के दौरान खिंची गई यह तस्वीर काफी कुछ कहानी बयां करती हैं (फोटो - रॉयटर्स)

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आपातकाल का फरमान

जेपी ने अपने भाषण में कहा था, मेरे मित्र बता रहे हैं कि मुझे गिरफ्तार किया जा सकता है क्योंकि हमने सेना और पुलिस को सरकार के गलत आदेश नहीं मानने का आह्वान किया है। मुझे इसका डर नहीं है और मैं आज रामलीला मैदान की इस ऐतिहासिक रैली में भी अपने उस आह्वान को दोहराता हूं ताकि कुछ दूर, संसद में बैठे लोग भी सुन लें। मैं सभी पुलिस कर्मियों और जवानों का आह्वान करता हूं कि इस सरकार के आदेश नहीं मानें क्योंकि इस सरकार ने शासन करने की अपनी वैधता खो दी है।

जेपी को वही से गिरफ्तार कर लिया गया। कांग्रेस के अंदर भी चंद्रशेखर, रामधन, मोहन धारिया और कृष्णकांत जैसे युवा तुर्कों के इंदिरा विरोधी स्वर तेज होने लगे थे। लेकिन बाहर और अंदर से भी बढ़ रहे राजनीतिक विरोध और दबाव से निबटने के नाम पर श्रीमती गांधी ने पद त्याग करने के लोकतांत्रिक रास्ते को चुनने के बजाय अपने छोटे बेटे संजय गांधी, कानून और न्याय मंत्री हरिराम गोखले और वरिष्ठ अधिवक्ता एवं पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री सिद्धार्थ शंकर रे जैसे कुछ खासुलखास सलाहकारों से मंत्रणा के बाद आंतरिक उपद्भव की आशंका के मद्देनजर संविधान की धारा 352 का इस्तेमाल करते हुए आधी रात को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से देश में आंतरिक आपातकाललागू करने का फरमान जारी करवा दिया था।

देशवासियों को अगली सुबह आकाशवाणी पर श्रीमती गांधी ने राष्ट्र के नाम जारी अपने संदेश में कहा, “भाइयों और बहनों, राष्ट्रपति जी ने आपातकाल की घोषणा की है। इससे घबराने अथवा आतंकित होने की जरूरत नहीं है। उन्होंने आपातकाल को जायज ठहराने के इरादे से विपक्ष पर साजिश कर उन्हें सत्ता से हटाने और देश में आंतरिक उपद्रव की स्थिति पैदा करने का आरोप लगाया और कहा कि सेना और पुलिस को भी विद्रोह के लिए उकसाया जा रहा था।

उन्होंने कहा, “जबसे मैंने आम आदमी और देश की महिलाओं के फायदे के लिए कुछ प्रगतिशील कदम उठाए हैं, तभी से मेरे खिलाफ गहरी राजनीतिक साजिश रची जा रही थी। आपातकाल और उससे पहले 25 जून की शाम को रामलीला मैदान में हुई विपक्ष की रैली की खबर देश में न पहुंचे इसलिए, दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित अखबारों के दफ्तरों की बिजली रात में ही काट दी गई।

रात को ही इंदिरा गांधी के विशेष सहायक आर. के. धवन के कमरे में बैठ कर संजय गांधी और ओम मेहता उन लोगों की लिस्ट बनाते रहे जिन्हें गिरफ्तार किया जाना था। पूरे देश को राजनीतिक विरोधियों के लिए जेलखाना बनाने की तैयारियां परवान चढ़ने लगी।

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काले पन्नो पर पाबंदी

27 जून को प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी गई थी। इसके विरोध में 28 जून को इंडियन एक्सप्रेस, स्टेट्समैन और नई दुनिया जैसे कई अखबारों ने संपादकीय की जगह को खाली यानी ब्लैकछोड़ दिया था। बाद में सरकार ने ब्लैंक स्पेसपर भी पाबंदी लगा दी थी। सबसे दिलचस्प तरीका टाइम्स ऑफ इंडिया ने निकाला था। 28 जून को क्लासिफाइड विज्ञापन वाले स्टाइल में स्मृति शेष वाले पन्ने पर उसने जो छापा वह सिर्फ आपातकाल का विरोध नहीं बल्कि विरोध का एक आइडिया भी था।

विज्ञापन छपा था।- ‘O’ Cracy, D.E.M., beloved husband of T-Ruth, loving father of L.I. Bertie, brother of Faith, Hope And Justicia, expired on June 26 लेकिन आगे चलकर हमारा मीडिया प्रतिरोध या कहें कि सांकेतिक विरोध को भी जारी नहीं रख सका।

भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी के शब्दों में कहें तो झुकने को कहा गया था लेकिन हमारा मीडिया आपातकाल में रेंगने लगा था। सच तो यह है कि आपातकाल में मीडिया ही नहीं न्यायपालिका भी डर गई थी। दरअसल, आपातकाल में सबसे भयानक था संविधान के अनुच्छेद 21, 22 को खत्म कर देना। इससे लोगों की नागरिक आज़ादी खत्म कर दी गई थी। किसी को भी कभी भी हिरासत में लिया जा सकता था।

इससे जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने आपातकाल में नागरिकों के मौलिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं को रद्द करने के सरकार के अधिकार को जायज ठहराते हुए नागरिकों के जीने के अधिकार भी छीन लिए जाने की ताईद की थी।

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देवरस ने किया था समर्थन

बहरहाल, आपातकाल लागू होने के बाद मोरारजी देसाई, चंद्रशेखर, अशोक मेहता, मधु लिमये, राजनारायण, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी सहित तत्कालीन विपक्ष के तमाम बड़े-छोटे नेता-कार्यकर्ता आंतरिक सुरक्षा कानून (मीसा) और भारत रक्षा कानून (डी. आई. आर.) के तहत गिरफ्तार कर जेलों में ढूंस दिए गए थे। आरएसएस, जमाते इस्लामी, आनंद मार्ग एवं कुछ अन्य संगठनों पर प्रतिबंध लागू कर दिया गया था।

इन संगठनों से जुड़े लोगों के साथ ही राजनीतिक विरोधियों को भी उनके घरों, ठिकानों से उठाकर जेलों में डाला जाने लगा। उन्हें परेशान किया गया। कइयों की तो जान भी चली गई जबकि जार्ज फनांडिस और कर्पूरी ठाकुर जैसे कुछ बड़े नेता भूमिगत भी हो गए। बाद में उन्हें भी बड़ौदा डायनामाईट कांड के मुख्य अभियुक्त के रूप में गिरफ्तार कर लिया गया। जनसंघ के नेता सुब्रह्मण्यम स्वामी भी भूमिगत हो गए थे।

गौरतलब है कि स्वयं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरसंघचालक बालासाहेब देवरस ने 22 अगस्त और 10 नवंबर 1975 को पुणे की येरवडा जेल से स्वयं इंदिरा गांधी को दो माफीनामा नुमा पत्र लिखकर संविधान संशोधन पर आधारित सुप्रीम कोर्ट में उनके रायबरेली के चुनाव को वैध ठहराने वाले फैसले पर उन्हें बधाई देने के साथ ही उनके शासकीय कार्यों में संघ के प्रचारकों, स्वयंसेवकों के सहयोग की इच्छा जताई थी।

उन्होंने सफाई दी कि आपातकाल विरोधी और यहां तक कि गुजरात और बिहार आंदोलन अथवा जेपी के आंदोलन से भी संघ का कोई सरोकार नहीं है। संघ के ऊपर से प्रतिबंध हटाने और संघ के लोगों को नाहक परेशान करना बंद करने का अनुरोध भी उन्होंने किया।

इंदिरा गांधी के द्वारा उनके पत्रों का जवाबतक नहीं देने पर देवरस ने आपातकाल को शांति पर्व कहनेवाले संत विनोबा भावे को 12 जनवरी 1976 को लिखे पत्र में उनके और इंदिरा गांधी के बीच मध्यस्थता और समझौता कराने का आग्रह किया। वह इंदिरा गांधी और संजय गांधी से मिलना भी चाहते थे लेकिन वह संभव नहीं हो सका।

बाद में पर्दे के पीछे बनी किसी सहमति के आधार पर स्थानीय और व्यक्तिगत स्तर पर एक पंक्ति का माफीनामा’ (मैं सरकार के बीस सूत्री कार्यक्रम का समर्थन करता हूं भरकर संघ के एवं कुछ अन्य संगठनों के भी बहुत सारे लोग जेलों से बाहर आए थे। वे लोग भी आज लोकतंत्र रक्षक सेनानीकहे जाते हैं।

यह सही है कि संघ ने आपातकाल का खुलकर कभी विरोध नहीं किया। संघ पर जमाते इस्लामी, आनंद मार्ग एवं कुछ अन्य संगठनों के साथ ही प्रतिबंध लगा था। प्रतिबंधित संगठनों के लोग गिरफ्तार किए गए थे। लेकिन बाला साहेब देवरस का यह कहना कि संघ का बिहार आंदोलन या जेपी आंदोलन से कुछ भी लेना देना नहीं है, सही नहीं था।

इस साल का सबसे लंबा चलनेवाला CAA और NRC के विरोध में महिलाओं आंदोलन

CAA और NRC के खिलाफ महिलाओं का आंदोलन इस साल सबसे लंबा चला (फोटो- सोशल मीडिया)

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आज तो आफ़तकाल

तीन वर्ष पहले भाजपा के वरिष्ठ और बुजुर्ग नेता लालकृष्ण आडवाणी ने हमारी मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था में ही इन प्रवृत्तियों के मौजूद रहने और आपातकाल के भविष्य में भी लागू किये जाने की आशंकाएं बरकार रहने का संकेत देकर इस धारणा को और प्रामाणिकता प्रदान की थी। आज छह साल बाद स्थितियां ठीक उसी दिशा में जाते हुए दिख रही हैं। देश आज अंध राष्ट्रवाद और धार्मिक कट्टरपंथ पर आधारित माब लिंचिं के सहारे एक अराजक माहौल और अघोषित आपातकाल या कहें कि आफ़तकालकी ओर ही बढ़ रहा है।

सत्ता पोषित और समर्थित भीड़ यह तय करने में जुट गई है कि हमें क्या खाना है, क्या पहनना है, क्या बोलना है, क्या देखना और पसंद करना है, किससे प्रेम और विवाह करना है, कैसे जीना है। कही भी उत्तेजित और उन्मादी भीड़ सरे राह और रेल गाड़ियों में भी किसी की पिटाई कर उसकी जान ले सकती है।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ी साफ दिख रही है। प्रेस और मीडिया पर भी सरकारी विज्ञापनों, सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग जैसी सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल कर असहमति के स्वरों को दबाने के रूप में एक अलग तरह की अघोषित सेंसरशिपके संकेत साफ दिख रहे हैं। सालभर पहले मणिपुर के एक 39 वर्षीय पत्रकार किशोर चंद्र वांगखेम को इसलिए हिरासत में ले लिया गया था क्योंकि उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री एन. बिरेन सिंह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कठपुतली करार दिया था।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के विरुद्ध अभद्र ट्वीट के आरोप में दिल्ली के पत्रकार प्रशांत कनौजिया को पिछले साल जून महीने के दूसरे सप्ताह में रात के अंधेरे में उत्तर प्रदेश पुलिस के सादा वेशधारी जवान बिना किसी वारंट के उनके घर से गिरफ्तार कर ले गए।

इससे पहले आदित्यनाथ जी और आरएसएस के सर संघचालक मोहन भागवत के बारे में सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम एकाउंट) पर आपत्तिजनक टिप्पणी के लिए ब्रिटेन में रहनेवाली पंजाबी सिंगर, रैपर हाई कौर (तरन कौर ढिल्लन) के विरुद्ध वाराणसी में आइपीसी की धारा 124 ए (देशद्रोह), 153 (धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच दुश्मनी को बढ़ावा देना), 500 (मानहानि) और 505 (भड़काने की कोशिश) और आईटी ऐक्ट की धारा 66 के तहत मुकदमा कायम किया गया।

सोशल मीडिया पर इस तरह की टिप्पणियों के लिए देश द्रोह का मुकदमा कोई नई बात नहीं है। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने कई एक बार कहा है कि ऐसा करना इस कानून का दुरुपयोग है। इसके बावजूद इस तरह के उदाहरण आए दिन देखने को मिलते रहते हैं।

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author

टीम डेक्कन

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