‘रोमन’ हिन्दी खिल रही है, तो ‘देवनागरी’ मर रही है

‘रोमन’ हिन्दी खिल रही है, तो ‘देवनागरी’ मर रही है
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दिल्ली स्थित जामिया विश्वविद्यालय के दिवार पर लिखी एक घोषणा


मुंबई से फिल्म निर्देशक का फोन आया कि फिल्म के संवाद रोमन लिपि में लिखे जाएं। क्यों? इसलिए कि अभिनेताओं में से कुछ हिन्दी बोलते-समझते हैं लेकिन नागरी लिपि नहीं पढ़ सकते। कैमरामैन गुजरात का है। वह भी हिन्दी समझता-बोलता है लेकिन पढ़ नहीं सकता। इसी तरह फिल्म से जुड़े हुए तमाम लोग हैं।

फिल्मी दुनिया में गहरी पैठ रखने वालों ने बाद में बताया कि फिल्म उद्योग में तो हिन्दी आमतौर पर रोमन लिपि में लिखी और पढ़ी जाती है। एनडीटीवी के हिन्दी समाचार विभाग में बड़े ओहदे पर बरसों काम कर चुके एक दोस्त ने बताया कि टीवी चैनलों पर हिन्दी समाचार आदि रोमन लिपि में लिखे जाते हैं। वजह केवल यह नहीं है कि समाचार पढ़ने वाला नागरी लिपि नहीं जानता है बल्कि यह भी है कि समाचार की जांच-पड़ताल करने वाले नागरी लिपि के मुकाबले रोमन लिपि ज्यादा सरलता से पढ़ सकते हैं।

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हिन्दी पढ़ने मे कठिनाई

मोबाइल फोन इस्तेमाल करने वाले, जिनकी तादाद कुछ ही साल बाद करोडों से बढ़ कर अरबों तक पहुंच जाएगी, अच्छी तरह जानते हैं कि निजी और कारोबारी किस्म के (व्हॉट्सएप) एसएमएस हिन्दी में आते और जाते हैं। इसकी पहली वजह यह है कि कारोबारी एसएमएस भेजने वाले जानते हैं कि आमतौर पर लोग हिन्दी समझते हैं या अंग्रेजी के मुकाबले हिन्दी अच्छी तरह और जल्दी समझ लेते हैं लेकिन उनमें बहुत बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जो हिन्दी लिपि नहीं पढ़ सकते या पढ़ने में कठिनाई महसूस करते हैं।

विज्ञापन जगत बहुत जागरूक, चतुर और चालाक है जो संचार के नियमों से परिचित है और उसका पूरा उपयोग करता है। संचार का एक मोटा सिद्धान्त यह है कि बोलचाल (संप्रेषण) सीधा हो, उसमें जटिलता या प्रभावी वर्ग के लिए असुविधा न हो।

एसएमएस के बाद या पहले ई-मेल का नंबर आता है। हिन्दी जानने-बोलने और समझने वाले एक दूसरे को ई-मेल हिन्दी में भेजते हैं लेकिन प्राय: लिपि रोमन होती है। इसके कारण भी वही हैं जो रोमन लिपि में एसएमएस भेजने के हैं।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह सब किसी योजना या आंदोलन या समझी-बूझी राजनीति के बगैर हो रहा है। इसका सीधा मतलब यही है कि यह लोगों को सुविधाजनक लगता है और लोग स्वभाव से ही सुविधा-प्रेमी होते हैं। यही वजह है लैनटैज्न को लालटैन और लांग क्लाथ को लंगकिलाट बना दिया गया था।

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रोमन पढ़ना आसान

विज्ञापन जगत के गुरु मानते हैं और उसके लिए आंकड़े उपलब्ध हैं कि पिछले पचीस-तीस सालों में हिन्दी समझने वालों की संख्या में बहुत तेजी से बढ़ोतरी हुई है लेकिन नागरी लिपि का ज्ञान उतनी तेजी से नहीं बढ़ा है। मतलब यह कि हिन्दी जानने-समझने और बोलने वालों की बड़ी संख्या नागरी लिपि नहीं जानती।

ऐसा नहीं है कि नागरी लिपि जानने और समझने वालों की संख्या नहीं बढ़ रही है, लेकिन उन लोगों की तुलना में, जो हिन्दी समझते-बोलते हैं मगर नागरी लिपि नहीं जानते, यह संख्या बहुत नहीं बड़ी है। यही वजह है कि विज्ञापन जगत का हिन्दी प्रेम जाग रहा है। आज अंग्रेजी विज्ञापनों में जितने हिन्दी शब्द आ रहे हैं उतने पहले कभी नहीं आए। लेकिन विज्ञापन जगत में हिन्दी भाषा का आगमन नागरी लिपि में नहीं बल्कि रोमन लिपि में हो रहा है।

हिन्दी के माध्यम से हिन्दी के बाजार को मुट्ठीमें कर लेने की कोशिश लगातार बढ़ती रहेगी और हिन्दी के लिए रोमन लिपि का इस्तेमाल भी बढ़ता रहेगा। आज़ादी से पहले राष्ट्रीय आंदोलन के दौर में, भारतीय भाषाओं को करीब लाने और मुद्रण संबंधी परेशानीयों के संदर्भ में लिपि के सवाल पर बहुत चर्चा की गई थी।

कभी-कभी तमाम भारतीय भाषाओं के लिए नागरी के प्रचलन से लेकर रोमन लिपि तक को स्वीकार करने के आग्रह किए गए थे। यह वह जमाना था जब बुद्धिजीवी भाषा और लिपि के सवाल पर सोचते थे। भाषा की भूमिका को नए आयाम देने की कोशिश करते थे। राष्ट्रीय एकता के मद्देनजर भाषाओं को निकट लाने के प्रयास किए जाते थे।

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भाषाई स्वरूप

हिन्दी लिपि की चर्चा करने से पहले आज हिन्दी भाषा के स्वरूप और क्षेत्र पर बात करना जरूरी है। आज़ादी के बाद आधी शताब्दी से अधिक समय बीत गया है। हिन्दी को अकादमिक, प्रशासनिक, राजनयिक और विज्ञान-तकनीक के क्षेत्र में स्थान मिलने के दावे खोखले साबित हो चुके हैं।

आज ज्ञान-विज्ञान के किसी भी क्षेत्र या व्यावहारिक प्रशिक्षण पाठ्यक्रमों की उच्च शिक्षा में हिन्दी माध्यम नहीं बन सकी है। करोड़ों-अरबों रुपया खर्च कर दिए जाने के बाद भी हिन्दी विश्वस्तर की भाषा नहीं कही जा सकती। उदाहरण के लिए, हिन्दी में न तो अन्य विश्वस्तरीय भाषाओं जैसी ज्ञानविज्ञान के पठन-पाठन की सामर्थ्य है और न समुचित ज्ञान भंडार है।

विदेशी भाषाओं से हिन्दी में किए गए अनुवादों आदि को छोड़ भी दें और केवल भारतीय भाषाओं की रचनाओं के हिन्दी अनुवाद की बात करें तो निराशा ही हाथ लगती है। हर साल गिनती की पुस्तकें प्रकाशित होती हैं जो प्रकाशकों की रुचियों या व्यावसायिक समीकरणों से बंधी होती हैं।

हिन्दी प्रकाशन जगत की स्थिति लेखकों के दृष्टिकोण से बहुत उत्साहवर्धक नहीं है। सरकारी खरीद का लाभ कम और नुकसान अधिक हुआ है; आज बड़े-बड़े प्रकाशक खुल कर कहते हैं कि वे किताब का पहला संस्करण तीन सौ प्रतियों का छापते हैं।

स्कूली शिक्षा के माध्यम के रूप में हिन्दी की स्थिति बहुत चिंतनीय है। हिन्दी स्कूलों की स्थिति लगातार गिर रही है और अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों के प्रति जनता का उत्साह बढ़ रहा है। हिन्दी माध्यम स्कूल अब सिर्फ गरीबों के बच्चों के लिए रह गए हैं जो हिन्दी माध्यम में शिक्षा पाकर प्राय: (अपवादों को छोड़ दें) गरीब ही बने रहते हैं। हिन्दी में अंग्रेजी की तुलना में न तो अच्छी पाठ्यपुस्तकें उपलब्ध हैं और न पढ़ने-पढ़ाने की विकसित तकनीक ही है।

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय व्यापार और वाणिज्य की भाषा के रूप में भी हिन्दी की स्थिति अच्छी नहीं है। पचास करोड़ से अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली हिन्दी की आज जितनी दुर्दशा है उतनी दुर्दशा पांच और दस करोड़ लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं जैसे पोलिश, चेक, हंगेरियन, फिनिश आदि की भी नहीं है।

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कौन है जिम्मेदार?

हिन्दी भाषा की इस दुर्दशा की जिम्मेदारी हम दूसरों पर नहीं डाल सकते। इसके लिए हम ही जिम्मेदार हैं, हमारी सरकार जिम्मेदार है। लेकिन बोलने वाले लोगों की संख्या के आधार पर विश्व की दूसरी सबसे बड़ी भाषा हिन्दी ने मीडिया के क्षेत्र में जो कीर्तिमान स्थापित किए हैं वे संभवत: अतुलनीय हैं।

आज विश्व में हिन्दी फिल्मों के दर्शक सौ करोड़ से भी अधिक हैं। इन दर्शकों में वे भी सम्मिलित हैं जिनकी मातृभाषा हिन्दी नहीं है और वे भी शामिल हैं जो हिन्दी बोल और पढ़ नहीं, केवल समझ सकते हैं। हिन्दी के सीरियल पूरे भारत के हिन्दी और अहिन्दी क्षेत्रों और विदेशों में भी देखे जाते हैं। उसके माध्यम से हिन्दी समझने वालों की संख्या में बड़ी तेजी से गुणात्मक परिवर्तन आया है।

हिन्दी रेडियो और विशेष रूप से हिन्दी फिल्मों के गानों ने हिन्दी और गैर-हिन्दी भाषी लोगों के बीच जो लोकप्रियता अर्जित की है वह अद्वितीय है। हिन्दी फिल्मों के गानों ने भाषा, भूगोल और समझ की सीमाओं को तोड़ दिया है।

इसके साथ-साथ हिन्दी के समाचार पत्रों की प्रसार संख्या लगातार बढ़ रही है और पाठकों की संख्या के आधार पर अब भारत में ही नहीं, विश्व के अख़बारों में हिन्दी के समाचार पत्रों का स्थान बनता है।

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मीडिया कि स्थिति

मीडिया के संदर्भ में जब हम हिन्दी की बात करते हैं तो तीन बातें सामने आती हैं। पहली यह कि मीडिया के कारण हिन्दी समझने वालों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। दूसरी यह कि हिन्दी मीडिया क्षेत्र लगातार व्यापक होता जा रहा है और तीसरी बात यह कि हिन्दी की सामान्य स्वीकृति है और देश तथा विदेश में उसका प्रचलन बढ़ रहा है।

भारतीय विज्ञापन व्यवसाय तेरह हजार करोड़ रुपए का उद्योग है। यह व्यवसाय मुख्य रूप से अंग्रेजी भाषा केंद्रित रहा है। प्राय: अंग्रेजी में विज्ञापन बनते और प्रसारित होते थे। लेकिन अब विज्ञापन जगत के अंग्रेजी दुर्गमें हिन्दी की सुरंग लग गई है।

विज्ञापन जगत के मठाधीशों ने यह मान लिया है कि आज भारत का उपभोक्ता हिन्दी समझने लगा है। यही वजह है कि विज्ञापन की भाषा (कापी) तेजी से बदल रही है। आज विज्ञापनों की भाषा में जितने हिन्दी शब्दों का प्रयोग हो रहा है उतना पहले कभी नहीं हुआ। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि विज्ञापन की भाषा में हिन्दी तो आई है लेकिन नागरी लिपि नहीं आई। विज्ञापन की हिन्दी रोमन लिपि में ही सामने आती है।

इसी तरह हिन्दी फिल्मों के पोस्टर अब प्राय: हिन्दी में नहीं बनते। नाम के लिए ही नागरी लिपि में छोटा-सा कोने में फिल्म का नाम लिख दिया जाता है। बात कुछ यह है कि हिन्दी भाषा को समझने वाले तो बढ़ रहे हैं लेकिन उसकी तुलना में नागरी लिपि को समझने वाले नहीं बढ़ रहे हैं।

ऐसी स्थिति में हिन्दी की लिपि की तरफ हिन्दी जगत दो रवैए अपना सकता है। पहला तो यह कि वस्तुस्थिति पर कोई प्रतिक्रिया न की जाए और हिन्दी और रोमन लिपि के संबंध को जंगल की लताओं की तरह बढ़ने के लिए छोड़ दिया जाए।

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रवैया बदलना हैं

दूसरा दृष्टिकोण यह हो सकता है कि हिन्दी को रोमन लिपि में लिखने के फायदे-नुकसान को जांचा-परखा जाए और उसके प्रति एक वैज्ञानिक रवैया अपनाया जाए। इस बात से कौन इनकार कर सकता है कि मानव समाज में भाषा और लिपि को बदलने का काम बहुत कठिन, जटिल और बहुपक्षीय होता है। बहुत-से देश इसका प्रयास ही नहीं करते क्योंकि यह एक तरह से जन-भावनाओं से छेड़छाड़ करने वाला काम माना जाता है।

आधुनिक इतिहास में लिपि परिवर्तन का एक बड़ा काम तुर्की में हुआ; लोकप्रिय जननेता कमाल अतातुर्क (1881-1938) ने 1928 में यह निर्णय लिया था कि तुर्की भाषा की हजारों सालों से प्रचलित अरबी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि का प्रयोग किया जाना चाहिए।

उन्होंने विशेषज्ञों से पूछा था कि यह काम कितने समय में हो सकता है? विशेषज्ञों ने कहा था कि इस काम में कम से कम पांच साल लगेंगे। कमाल अतातुर्क ने जवाब दिया था कि हम इसे पांच महीने में करेंगे। और बीसवीं शताब्दी के तीसरे दशक के शुरू होते-होते तुर्की ने रोमन लिपि को अपना लिया। यह एक अत्यंत कठिन काम था लेकिन परिस्थितियों, जन-आकांक्षाओं और प्रभावशाली नेतृत्व ने इसे संभव कर दिया था।

लिपि परिवर्तन के साथ-साथ तुर्की भाषा में अरबी और फारसी भाषा की जटिल और मध्यकालीन अभिव्यक्तियों पर भी विचार किया गया था और कुछ खारिज कर दिया गया था। विदेशी भाषाओं और प्राचीन तुर्की के कुछ शब्दों को स्वीकृति दी गई, कुछ पुराने शब्दों का नवीनीकरण किया गया था।

इन प्रयासों का तुर्की भाषा पर बड़ा प्रभाव पड़ा था। पहले जहां तुर्की में अस्सी फीसद अरबी और फारसी भाषा के शब्द हुआ करते थे वहां अब ये केवल दस प्रतिशत बचे थे।

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डॉ. असग़र वजाहत

लेखक जामिया विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यापक और जाने-माने लेखक हैं। नाटककार, लघु कथाकार और उपन्यासकार के रूप में वे परिचित हैं। उनके कई पुस्‍तकें प्रकाशित है। हिन्दी साहित्‍य में विशेष योगदान के लिए उन्हें केंद्रीय साहित्‍य अकादमी और कथा यू.के. जैसी संस्‍थाओं ने पुरस्‍कृत किया है।