अनुवाद में मूल भाषा का मिज़ाज क्यों जरुरी हैं ?

अनुवाद में मूल भाषा का मिज़ाज क्यों जरुरी हैं ?

अलग-अलग भाषाओ से अनुवादित हुए किताबों के कवर


रसरी तौर पर देखने से लगता है की उर्दू टेक्स्ट का हिन्दी अनुवाद एक बहुत सरल काम है क्योंकि भाषा एक है। इसलिए केवल लिप्यंतरण से काम चल जाएगा। माना भी यही जाता है की उर्दू-हिन्दी और हिन्दी-उर्दू का अनुवाद लिप्यंतरण तक सीमित रहना चाहिए। अनुवाद करने की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन फिर भी कुछ ऐसे कठिन शब्द, विशेष रुप से उर्दू में फारसी, अरबी और हिन्दी में  संस्कृत के, सामने आ जाते हैं जो हिन्दी/उर्दू के पाठक की समझ में नहीं आते। इन शब्दों का अनुवाद करना आवश्यक हो जाता है।

वैसे इस संबंध में भी दो मत हैं। हिन्दी की एक पत्रिका में ए​​क लेख छपा जिसका शीर्षक था तरसील का अलमिया।, शुद्ध फारसी शब्द थे। तरसीलका अर्थ संचार है और अलमियाका अर्थ त्रासदी है। जब यह लेख छपा तो बहुत से लोगों ने कहा की शीर्षक समझ में नहीं आया। लेखक ने कहा कि आवश्यक नहीं है कि आप जो भी शब्द पढ़ें वह आपकी समझ में आ जाए। समझ में न आने वाले शब्दों के लिए के लिए शब्दकोश मौजूद है।

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लीपापोती नही चलती

शब्दकोश पर एक लतीफ़ा याद आ गया जो आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के अध्यक्ष प्रोफेसर हरबन्स लाल शर्मा को सुनाया था। सौभाग्य से एक छात्र के रूप में मैं भी वहां मौजूद था।

अंग्रेजी के एक प्रोफेसर  नाटक करने के बेहद शौकीन थे। विश्वविद्यालय में पढ़ाने के बाद घर आकर वे पूरी तरह नाटक में डूब जाते थे। नाटक पढ़ना, अभ्यास, अभिनय, मंचन आदि आदि। पूरा समय इसी में निकल जाता था।

एक दिन क्लास में अंग्रेजी की एक पोयम पढ़ा रहे थे। उन्होंने देखा कि अगले Estanza में एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ उन्हें नहीं मालूम। उन्होंने सोचा कि ठीक है आज यहीं तक पढ़ाते हैं, घर जाकर शब्दकोश में शब्द का अर्थ देख लेंगे। उन्होंने क्लास छोड़ दी। घर आकर प्रोफेसर साहब नाटक की दुनिया में खो गए और शब्द का अर्थ देखना भूल गए।

दो-तीन दिन तक यही होता रहा। क्लास टलती रही। तीसरे दिन उन्होंने सोचा एक शब्द के कारण दो दिन क्लास नहीं हो पाई, चलो आज आगे पढ़ा ही देते हैं कुछ लीपापोती हो जाएगी। वे आगे पढ़ाने लगे। एक लड़के ने हाथ उठाकर उसी शब्द का अर्थ पूछा जिसके कारण दो दिन क्लास नहीं हो पाई थी। प्रोफेसर साहब को गुस्सा आ गया बोले, ‘डू आई लुक लाइक अ डिक्शनरी?’ जाओ, शब्द का अर्थ डिक्शनरी में देख लेना।

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मूल भाषा का मज़ा

खैर यह तो लतीफा हो गया। अब अपने विषय पर आगे बढ़ते हैं। मैंने उर्दू से हिन्दी अनुवाद का काम कम ही किया है। कुर्रतुल ऐन हैदर के उपन्यास आखिरे शब के हमसफर’ (निशांत के सहयात्री) का अनुवाद किया था। इस अनुवाद के कुछ अंश सुनने के बाद कुर्रतुल ऐन हैदर ने कहा था कि मैंने अनुवाद ही नहीं किया है।

मैं उनसे अपने अनुवाद के बारे में यही सुनना चाहता था। मेरी पूरी कोशिश यही थी के उपन्यास की मूल भाषा का मज़ा पूरी तरह बचा रहे और वह हिन्दी पाठक की समझ में भी आती रहे। इस कोशिश में कहीं-कहीं एक बड़ी अड़चन का सामना करना पड़ जाता था।

उसका जिक्र करने से पहले यह रेखांकित कर देना जरूरी है उर्दू भाषी समाज के परिवेश से हिन्दी पाठक लगभग पूरी तरह परिचित होते हैं इसलिए यह नहीं लिखा जा सकता की ईद के दिन हमीद के घर केक बनता है।

आखिरे शब के हमसफरविभाजन से पहले पूर्वी बंगाल की पृष्ठभूमि में लिखा गया उपन्यास है जिसका मुख्य विषय वामपंथी आंदोलन का बिखर जाना है लेकिन उसके साथ साथ भद्रलोक और संभ्रांत मुस्लिम जागीरदार परिवारों का चित्रण भी हुआ है।

पूर्वी बंगाल का एक मुस्लिम जागीरदार कहता है कि हिन्दू जागीरदार मुस्लिम किसानों का इस्तेहसालकर रहे हैं। इस्तेहसालका अर्थ है शोषण। लेकिन मुस्लिम जागीरदार के वाक्य में इस्तेहसालकी जगह शोषण शब्द कैसे डाला जा सकता है जोकि विशुद्ध रूप से संस्कृत शब्द है और हिन्दी का पाठक अच्छी तरह जानता है कि मुस्लिम जागीरदार शोषण शब्द का प्रयोग नहीं कर सकता। और अगर इस्तेहसालका केवल लिप्यंतरण कर दिया जाता है तो हिन्दी का पाठक उसे नहीं समझ पाएगा। इसलिए क्या किया जाना चाहिए। यह एक बड़ा सवाल था।

आवश्यक यह था की हिन्दी का पाठक इस शब्द के स्थान पर लिए गए शब्द का अर्थ समझे और यह स्वीकार करें की उससे मुस्लिम जागीरदार बोल सकता है। ऐसे कठिन क्षण में मदद की अंग्रेजी ने। इस्तेहसालकी जगह देवनागरी में Exploitation डाल दिया। इस अंग्रेजी के शब्द ने दोनों जरूरतें पूरी कर दी। हो सकता है इस समाधान से बहुत से लोग सहमत न हो लेकिन बाहरहाल एक समाधान है।

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पारिभाषिक शब्दों से कठिनाई

उपन्यास की अंतिम पंक्ति है और हजारों साल से सूरज इसी तरह तुलु हो रहा है और ग़ुरूब  हो रहा है.... तुलु हो रहा है और ग़ुरूब...और तुलु....

तुलु क्या अर्थ है सूर्योदय और ग़ुरूब’ का अर्थ है सूर्यास्त।

इस वाक्य का सीधा अनुवाद इस तरह हो सकता था और हजारों साल से इसी प्रकार से सूर्योदय हो रहा है और सूर्यास्त... सूर्योदय हो रहा है और सूर्यास्त और सूर्योदय.....

यदि ऊपर दिया गया अनुवाद कर दिया गया होता तो उपन्यास की पूरी भाषा के साथ सूर्योदय और सूर्यास्त बड़े अटपटे शब्द लगते। तुलु और ग़ुरूब भी नहीं दिया जा सकते थे।

इसलिए बीच का रास्ता निकाला गया और अनुवाद इस प्रकार हुआ.. और हजारों साल से सूरज इसी इसी तरह निकल रहा है और डूब रहा है... निकल रहा है डूब रहा है और निकल रहा है.....

कठिन उर्दू और कठिन हिन्दी के बीच की एक भाषा है जिसे आप जो चाहे कहें लेकिन उसकी पहचान यह है कि उसे हिन्दी और उर्दू वाले आसानी से समझ लेते हैं। उर्दू से हिन्दी और हिन्दी से उर्दू के अनुवाद में यह भाषा बहुत काम आती है लेकिन कहीं-कहीं पारिभाषिक शब्द कठिनाई उत्पन्न कर देते हैं, चुनौती दे देते हैं।

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व्यापक संदर्भ  बने रहे

उपन्यास के नाम आखिरे शब के हमसफरके अनुवाद के संबंध में काफी दिक्कत थी। मेरा यह कहना था कि हिन्दी में उपन्यास का यही नाम रहना चाहिए। कुर्रतुल ऐन हैदर ने यह नाम फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के एक शेर से लिया है-

आख़िर-ए-शब के हम-सफ़र फ़ैज़न जाने क्या हुए 

रह गई किस जगह सबा सुब्ह किधर निकल गई

यह माना जाता है कि फ़ैज़ने यह शेर भारतीय उपमहाद्वीप मे सर्वहारा क्रांति के संबंध में लिखा था। क्रांति क्यों नहीं हुई? कहां और किधर निकल गई? क्रांति करने के लिए जो लोग साथ आए थे वे कहां गए ? उन्हीं को आखिरे शब के हमसफरकहा गया है।

ये सब सवाल उपन्यास में भी सामने आते हैं। इस तरह उपन्यास का नाम अपने आप में एक व्यापक और बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा करता है। मेरा मानना था अगर उपन्यास के नाम का अनुवाद कर दिया जाएगा तब शायद उपन्यास का नाम वे बड़े सवाल नहीं खड़े कर पाएगा जो मूल नाम में होते हैं। लेकिन प्रकाशक की राय थी कि नाम का अनुवाद किया जाना चाहिए और आखिरकार प्रकाशक ने इसका अनुवाद कर दिया निशांत के सहयात्री। निश्चित रूप से मूल उपन्यास के नाम में जो व्यापक संदर्भ थे वे कट गए।

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लिप्यंतरण का महत्त्व

उर्दू से हिंदी में एक और किताब जो मैंने की उसका नाम ‘ज़ेरे लब’ है। ये जावेद अख़्तर की वालिदा सफ़िया अख़्तर के उन खतों का कलेक्शन है जो उन्होंने अपने शौहर जां निसार अख़्तर को लिखे थे। ये एक तरह से पूरा लिप्यंतरण है। मुश्किल शब्दों के मतलब दे दिए गए है। इस काम में कोई ऐसा चैलेंज नहीं था जिसमें मज़ा आता। लेकिन यह किताब पाठकों को बहुत पसंद आती है क्योंकि इसमें उन्हें टेक्स्ट की मूल भावना का एहसास होता है।

उर्दू से हिंदी अनुवाद या लिप्यंतरण के बारे में मेरा मानना यह है की उर्दू टेक्स्ट का देवनागरी लिपि में एक ऐसा टेक्स्ट तैयार किया जाना चाहिए जो ओरिजिनल टेक्स्ट जैसा लगे लेकिन हिंदी के पाठक की समझ में भी आए। यह कोशिश चुनौती भरी हो सकती है। मैंने तो यह तक सोचा है कि उर्दू के क्लासिकी साहित्य जैसे ‘फ़सान-ए-आज़ाद’ (पंडित रतननाथ ‘सरशार’) का एक ऐसा हिंदी टेक्स्ट तैयार होना चाहिए जो ओरिजिनल /मूल टेक्स्ट का मज़ा भी दे और हिंदी के पाठक की समझ में भी आए। इस तरह का काम काफी मुश्किल होगा लेकिन हो गया तो दोनों भाषाओं के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगा।

अपने इस विचार के तहत मैंने मिर्ज़ा ग़ालिब के एक ख़त के एक हिस्से का ऐसा रूपांतरण किया है जो हिंदी पाठक की समझ में भी आएगा और  मूल भाषा का मज़ा भी देगा। 

“पिछले दिनों मुझ पर करम करने वाले और मेरे मेहरबान राजा नरेंद्र सिंह बहादुर पटियाला के महाराजा का कारिंदा जो यहां तैनात है, मेरे घर आ पहुंचा। तीन बोतलें ‘लिकर’ राजा साहब ने तोहफे के तौर पर भिजवाई थीं, दे गया। गोया इसको रसद समझो। मियां तुम न समझोगे। ये बहुत कीमती आला दर्जे की अंग्रेजी शराब है। किमाम की तरह इसका रंग गहरा लाल है, मज़ा बहुत अच्छा है और नशा देर तक रहता है। 

अल्लाह काम बनानेवाला है वरना इस माहौल में जब सबको अपनी अपनी ही पड़ी है मुझ जैसा कमजोर और लाचार, इस दिल और जान को तस्कीन देने वाले अर्क़ को कहाँ हासिल कर पाता। हुक़्के का पूरा बंदोबस्त और गुलाबी अर्क़ काफी तादाद में मौजूद है, चलो कुछ दिनों का ही सही ऐश का सामान तो है। 

-निजात चाहने वाला ग़ालिब

 

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डॉ. असग़र वजाहत

लेखक जामिया विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यापक और जाने-माने लेखक हैं। नाटककार, लघु कथाकार और उपन्यासकार के रूप में वे परिचित हैं। उनके कई पुस्‍तकें प्रकाशित है। हिन्दी साहित्‍य में विशेष योगदान के लिए उन्हें केंद्रीय साहित्‍य अकादमी और कथा यू.के. जैसी संस्‍थाओं ने पुरस्‍कृत किया है।