वतन और कला से मक़बुलियत रखनेवाले एम. एफ. हुसैन

वतन और कला से मक़बुलियत रखनेवाले एम. एफ. हुसैन
Gulf News

अपनी पेंटिग्ज के साथ बैठे मकबूल फिदा हुसैन


पने वतन के मिट्टी को छुने कि आखरी तमन्ना लिए मकबूल हुसैन नौं साल पहले हमसे विदा हो गए। दुनिया का यह विख्यात कलाकार आखरी वक्त दर-दर कि ठोकरे खाने पर मजबूर था। इसकी वजह मुफलिसी नही बल्कि अपने ही वतन के कुछ नफरती तत्वो के शरारत थी।

एम. एफ. हुसैन के नाम से प्रसिद्ध यह फनकार भारत के प्राचीनतम सभ्यता और संस्कृति का दूत था। अपने कला के माध्यम से उन्होंने भारत के उस विरासत को सहेजने कि कोशिश की थी, जिससे दुनिया में उसकी पहचान हैं।

बहुत से लोग मानते हैं कि उन्होंने इंडियन मॉडर्न आर्टको खास अयाम दिये। कहते है, उनसे पहले आधुनिक कला के नाम पर पश्चिम की नकल थी। उस दौर में हुसैन ने अपनी पेंटिग्ज के माध्यम से आधुनिक कला को खास शैली में ढाला।

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मकबुलियत की कहानी

मकबूल फिदा हुसैन का जन्म 15 सितंबर 1915 को महाराष्ट्र के शहर पंढरपूर में हुआ। हुसैन का बचपन संतों औऱ वारकरी परम्परा के सान्निध्य में बिता।

यही वजह हैं की उनकी कला में महाराष्ट्र के भक्ती आंदोलन और दक्षिणी संस्कृति का प्रभाव मिलता हैं। माँ के इंतकाल के बाद उनके पिता ने दूसरी शादी कर ली और वह इंदोर आकर बस गए। यहीं के प्रसिद्ध कॉलेज में उनकी शिक्षा-दिक्षा हुई।

होलकर राजवंश के शहर इंदौर में सही मायनो में उनके कला का विकास हुआ। इंदौर गंगा जमुनी और सहिष्णुता के संस्कृति कि नगरी माना जाता हैं।

हिन्दी-मराठी और मध्य भारत कि प्रादेशिक तथा आदिवासी बोलीयाँ और जीवनपद्धती का प्रभाव उनपर पड़ा। उनके कलाशिक्षक देवलालीकर के कला पर भारतीय चित्रकला का प्रभाव था, जो आगे चलकर हुसैन में आ गया।

अपनी किस्मत आजमाने व उम्र के 20 साल में मुंबई आये। जे. जे. स्कूल और मुंबई के कॉस्मापॉलिटनकल्चर में उनकी कला और ज्यादा निखरती गई। दुर्भाग्यवश यहीं से उनको देश निकाला करने की साजिशे रची गई। मुंबई उनका प्रिय शहर था। जिससे उन्हे बहुत ज्यादा लगाव भी था।

सन 1941 में हुसैन ने शादी कर ली। परिवार चलाने के लिए वे सिनेमा की होर्डिंग्स बनाने लगे। बहुत मेहनत के बाद इससे कुछ रुपया मिल जाता, मगर वह काफी नही था। कई बार तो ऐसा भी समय आया जब काम के पैसे भी नहीं मिलते थे। पैसो की कमी से निपटने के लिए उन्होंने खिलौने की कारखाने में खिलौनों की डिजाइन भी तैय्यार किए।

इस जद्दोजहद में भी उनकी पेंटिग के प्रति मुहब्बत कम नही हुई। वे पेंटिग्स बनाते रहे। 1947 में पहली बार बॉम्बे प्रोग्रेसिव्ह आर्टिस्ट ग्रुपकी सालाना प्रदर्शनी में उनकी पेंटिग सुनहरा संसारजारी हुई। इसी दौरान मशहूर चित्रकार फ्रान्सीस सूजा ने जब प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप बनाया तो हुसेन उसमें शामिल हो गए।

बॉम्बे प्रोग्रेसिव्ह आर्टिस्ट ग्रुपमें उनकी मुलाकात के. एच. आरा, व्ही. एस. गायतोंडे, अकबर पदमसी, एस. एच. रझा आदी कलाकारों से हुई। इन सबका प्रभाव उनके पेंटिग्ज आते गया।

इसके बाद अलग-अलग कला प्रदर्शनों मे उनका काम सामने आया और इस तरह उनकी पहचान बनने लगी। 1951 उन्होंने चीन की यात्रा की। उनकी पहली एकल प्रदर्शनी 1952 में ज्यूरिख में हुई। इसके बाद से पूरे यूरोप और अमेरिका में उनका काम दिखने लगा।

2006 दिए इंडियन एक्सप्रेस के एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था, “तुम्हें समझने के पहले अगर तूम माँ के प्यार से महरूम रह जाते हैं तो, तूम उसे तलाशने के लिए दिन-रात भटकते रहते हो। यहीं वजह हैं मैं जगह-जगह भटकता रहा।

संतो तथा वारकरीयों क तरह अलग-अलग जगह घुमना, भटकना और ठिकाना हुसैन का स्थायीभाव बन गया था। दिल चाहे वहां वे घुमते रहे। दक्षिण के मंदिरशिल्प, बौद्ध मंदिर, बौद्ध शिल्प, मुग़ल वास्तू, प्राचीन और मध्यकालीन चित्रकार-शिल्पकार-मूर्तिकारों के प्रतिभा में खो जाते। उन शिल्पो ने इस तरह को जाते जैसे वह उसी का एक हिस्सा हो। यहीं बात रही कि उनके सारे चित्रों उनकी फकिरी झलकती हैं।

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कला में अनुठा प्रभाव

मकबूल हुसैन एक मुस्लिम जरूर थे, पर वे अरबों के वंशज नही थे। वे तो हिन्दुस्थानी संस्कृति में पले-बढे एक आम इन्सान थे। भारतीयता उनका मजहब था। इसलिए यहां के सांस्कृतिक मानदंडो को उन्होंने अपने कला का माध्यम बनाया।

प्रो. फकरुद्दीन बेन्नूर अपनी किताब मुस्लिम और सुफी समन्वयमें लिखते है, “धर्म या इस्लाम उनके कला की प्रेरणा नहीं थी। हुसैन जेनेटिकलीहिन्दू जीवनपद्धती का हिस्सा थे। मुसलमानों के पास कला कि परम्परा नही थी।

उसी तरह अरबी पोथिनिष्ठता उनके अनुवांशिकता में नही थी। इसलिए वह उनके कला में कहां से आ सकती हैं? वैसे देखा जाए तो इस्लामी परम्परा में धार्मिक देवता तथा उनकी कोई प्रतीमा नही हैं। सूफी संतो कि व्यक्तीचित्र तथा फोटो, शिल्प भी इस्लामी मायथॉलॉजी में नही हैं।

फिर कोई मुस्लीम चित्रकार उसके चित्र कैसे निकाल सकते हैं। यह परंपरा तो भारतीय हैं। इसलिए वह हर भारतीय कलाकारों मे जरूर आएगी।

मध्यकाल में मुग़ल राजवंश में चित्रकला थी। जिसमें राजे-रजवाडे, युद्धप्रसंग, रोमान्स, भारतीय उत्सव और व्यक्तीचित्र पाए जाते हैं। बडे पैमाने पर मुसलमान कलाकार ऐसे चित्र बनाते थे। क्रूसेड के बाद यूरोप में इस्लाम कि नाकारात्मक छवीं पेश करने कुछ धार्मिक व्यक्तिओं के विवादित चित्र बनाए गए जो आज तक जारी हैं। उनका मकसद महज इस्लाम को गलत ढंग से पेश करना था।

जैसे कि बेन्नूर कहते हैं, हुसैन भारतीय थे। यहां कि सभ्यता और संस्कृति उनके खून में बसी थी, इसलिए उन्होंने भारत कि प्राचीनतम परम्परा को कला का माध्यम बनाया।

भारतीय विरासत रही हिन्दू देवी देवताएं हुसैन के कला का प्रिय साधन बनी। श्रीविठ्ठल, लक्ष्मी, सरस्वति, रामायण-महाभारत, श्रीराम-श्रीकृष्ण के महात्म्य को उन्होंने अपने पेंटिग्ज के जरिए अनुठा मकाम दिया।

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बने षडयंत्र के शिकार

मकबूल हुसैन कि कला विरोधी शक्तीयों के राजनैतिक प्रचार का साधन बन गई। 1995 के बाद इस दुष्प्रचार में गती आती गई। उस समय महाराष्ट्र में शिवसेना-भाजपा कि सरकार थी। इस धर्मभिमानी और अभिव्यक्ती के तंगदस्त वातावरण में हुसैन पर हिन्दू देवी-देवताओ के अश्लिल चित्र बनाने का आरोप लगाया गया।

बहुत से जानकार मानते हैं, कि यह विरोध हुसैन के मुस्लिम होने के वजह से था। हुसैन एक मुस्लिम होकर हिन्दू दिवी-देवताओ के विवादास्पद चित्र कैसे निकाल सकते है, यही तर्क इसके पिछे था।

यह विरोध उसी तरह था, जब डॉ. अम्बेडकर के हिन्दू कोड बिल सदन में पेश करने का बाद हुआ था। क्योंकि अम्बेडकर एक दलित समाज से थे, जिसे कई हजारों सालों तक हिन्दू धर्म के मान्यताओं से बाहर गया था।

उस समय यह प्रचार किया गया के कथित रूप से एक शुद्र हिन्दुओं के धार्मिक भविष्य कैसे तय कर सकता हैं? जिसके परिणास्वरूप सत्तापक्ष के कई सदस्यों ने अम्बेडकर का और हिन्दू कोड बिल का विरोध किया। मकबूल हुसैन के बाबत भी यहीं बात पेश आई। यहां विश्वप्रसिद्ध कालाकार नही बल्कि केवल एक मुस्लिम थे।

सत्ता समर्थिकल गूटों ने उनके खिलाफ हिन्दू विरोधी कहकर दुष्प्रचार किया। असल बात तो यह हैं कि हुसैन ने प्राचीन कला के माध्यम से हिन्दू-मुस्लिम संघर्ष तथा धार्मिक विद्वेश की दूरी पाटने कि कोशिश जारी की थी। जो कुछ शक्तीयों का रास नही आया और उनके खिलाफ षडयंत्र रचा गया।

एक तरह से कहे तो भारतीयताके खिलाफ यह षडयंत्र था. गौरतलब हैं कि जब हुसैन पर नग्नता के इलजाम लगाकर उनके खिलाफ कोर्ट में मामला बनाया गया।

तब विद्वान तथा अकेडमिशनों ने दक्षिण के होयसाला मंदिर में सरस्वति के कई नग्न रेखाटन और शिल्प होने के सबूत पेश किये। मगर अफसोस फिर भी हुसैन के खिलाफ मामले चलता रहा।

शिवसेना नेताओं ने उनके खिलाफ धार्मिक भावना दुखाने का आरोप लगाया। जिसके बाद उनकी मौलिक पेटिंग्ज नष्ट करने कि और देश से बाहर निकलने कि मुहीम चल निकली।

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पहले भी बनी थी वैसी पेंटिग्ज

यह कहना गलत नही होगा कि हुसैन से पहले भी देवी-देवताओं कि नग्न पेंटिग बनती थी और बनवाई जाती थी। खजुराहो कि अजिमोशान विरासत हमारे देश कि पहचान हैं। नग्नता इस इन प्राचीन मुर्तीयों मे नही हैं, बेशक देखनेवालों कि नजरों मे हो सकती है। जैसी दीद वैसे नजारे। मतलब जिस तरह कि आपकी नजर होंगी वैसे ही सामने के नजारे होंगे।

बंगाल में काली माता को महान देवी बताया जाता हैं। देश के कई घर ऐसे हैं जहां काली कि तस्वीरें लगी हैं। कहते हैं, काली एक निर्वस्त्र देवी का मूर्त रूप है। विद्वान मानते हैं कि शिवलिंग तो काली के कल्पना से भी दो कदम आगे है।

नीरेंद्र नागर नवभारत टाइम्स में लिखे हुसैन श्रद्धांजली लेख में कहते हैं, “जब जीवन के रहस्य को ढूंढने की कोशिश हुई तो लिंग की जीवनदायिनी शक्ति को देखते हुए कई आदिम संप्रदायों ने उसे ईश्वर का दर्ज़ा दे दिया और मूर्ति बनाकर उसकी पूजा करने लगे।

यदि अश्लीलता की आंखों से देखा जाए तो ईश्वर का इससे अश्लील चित्रण भला क्या होगा! लेकिन क्या हम उसे अश्लील मानते हैं? क्या हिंदू महिलाएं शिवलिंग पर जल या दूध चढ़ाते समय उसका यह अश्लीलरूप दिमाग में लाती हैं?”

एक जमाने में राजा रविवर्मा ने भी कला के इसी विधा को अपनी श्रद्धा का माध्यम बनाया था। रविवर्मा ऐसे व्यक्ती थे, जिन्होंने देवी-देवताओ को मंदिर के विरान दिवारों से निकालकर आम लोगों के जिन्दगी का हिस्सा बनाकर भक्ती और श्रद्धा कि दूरी और कम की।

रविवर्मा ने आम इन्सान और देवताओं के बीच कि दूरी पाटने के लिए देवताओं को सामान्य लोगों कि दिवारें और घर, भक्ती से सजा दिये।

पुरातन विचारधारा के चलते इस वर्ग ने कभी कल्पना भी नही की थी कि हम इतने करीब से देवताओ के देख सकते हैं। उन्हें अपने घरों के दिवारों पर विराजमान कर सकते हैं। गरीबों कि भक्ती और श्रद्धा को द्विगुणीत करने का काम रविवर्मा ने किया था, जिसका उस दौर के पुरातनपंथीयों ने जमकर विरोध भी किया था।  

नागर कहते हैं, “पुराणों में शिव सहित हिन्दू देवी-देवताओं पर जाने क्या-क्या लिखा गया है, लेकिन आज तक किसी ने उस पुराणों को जलाने का आह्वान नहीं किया।

बिहारी और विद्यापति ने कृष्ण-राधा प्रसंगों का ऐसा श्रृंगारिक वर्णन किया है जिसे आसानी से अश्लील कहा जा सकता है लेकिन उनके साहित्य पर प्रतिबंध की आवाज़ कभी नहीं उठी। फिर हुसेन के चित्रों पर ही शोर क्यों मचा?”

भारत कि प्राचीन सभ्यता और संस्कृति इन्हीं मूर्तीयों से प्रतीत होती हैं। जिसे देश के अलग-अलग मंदिरों, संग्रहालय तथा विश्वविद्यालयों मे उसे सहेजकर रखा गया है।

असल माने तो एम. एफ. हुसैन ने अपनी पेंटिग्ज के माध्यम से कला को भारतीय संस्कृति का प्रतीक बनाकर दुनियाभर में पहुँचाया। पर अफसोस उनपर नग्नता के आरोप लगाकर बदनाम किया गया।

हुसैन भारत के संमिश्र संस्कृति, रामायण-महाभारत, होयसाला शैली, खजुराहो कला हे आधुनिक आयकॉनथे। जिसे उन्होंने विश्व भर में मॉडर्न आर्ट के रूप में पहचान दिलाई। उनकी कला का इनकार करने का मतलब हैं, भारत कि प्राचीनतम संस्कृति और सभ्यता को नकारना था।

यह कहना गलत नही होंगा कि हुसैन महज मुस्लिम होने के वजह से उनेक खिलाफ मुकदमे दायर किए गये। उन्हें बदनाम किया गया।

जबकि कई ऐसे हिंदू चित्रकार हैं जिन्होंने ऐसे ही चित्र बनाए हैं। लेकिन उनके खिलाफ कोई बवाल नहीं मचा। मुझे याद नही कि इसका किसीने विरोध भी किया हैं। और न ही उनके खिलाफ किसी नेता ने राजनैतिक इस्तेमाल के लिए कोई मुकदमा दायर किया। खैर।

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कला का सम्मान

एम. एफ. हुसैन को 1966 में पद्मश्री और बाद में पद्मभूषण से नवाजा गया। उन्होंने बेहतरीन पेटिग्ज के साथ फिल्मों का बी निर्माण किया माँ के प्यार कि वंचनाओ को उन्होंने फिल्मों से अभिव्यक्ती दी।

इनकी पहली फिल्म थू दि आइज ऑफ ए पेंटरबर्लिन फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गई जिसे गोल्डन बियर एवार्ड भी मिला। उसके बाद गजामिनी, मिनाक्षी जैसे बहुचर्चित फिल्मों का निर्माण उन्होंने किया।

हुसैन ने डेढ साल कि उम्र में अपनी माँ को खो दिया। वे उम्रभर माँ के प्यार को तरसते रहे। अभिनेत्री माधुरी के सुंदरता में उन्होंने अपनी माँ को तलाश किया। पर उनके इस ममताभरे प्यार को भी बदनाम किया गया।

कला के क्षेत्र में विशेष योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रपति द्वारा राज्यसभा के लिए मनोनीत किया। संसद का कार्यकाल खत्म होने के बाद उन्होंने संसद की स्मृतियों पर एक सिरीज ‘पार्लियामेंट प्रोफाइल’ बनाई थी। विवाद स बचने के लिए वे अरब मुल्क में जा बसे।

विवाद खत्म होते ही वे भारत आना चाहते थे। यहां के मिट्टी कि खुशबू को महसूस करना चाहते थे। पर अफसोस उनकी यह कामना ‘आखरी तमन्ना’ बनकर रह गई। 9 जून 2011 को उन्होंने लंदन में इस दुनिया को हमेशा  के लिए विदा कर दिया और अपनी आँखे मुँद ली। डेक्कन क्वेस्ट कि और से उन्हें खिराजे अकिदत...!   

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author

कलीम अज़ीम

हिन्दी, उर्दू और मराठी भाषा में लिखते हैं। कई मेनस्ट्रीम वेबसाईट और पत्रिका मेंं राजनीति, राष्ट्रवाद, मुस्लिम समस्या और साहित्य पर नियमित लेखन। पत्र-पत्रिकाओ मेें मुस्लिम विषयों पर चिंतन प्रकाशित होते हैं।