मुज़तबा हुसैन : उर्दू तंज का पहला ‘पद्मश्री’ पाने वाले लेखक

मुज़तबा हुसैन : उर्दू तंज का पहला ‘पद्मश्री’ पाने वाले लेखक
The hindu / G. RAMAKRISHNA

मुज़तबा हुसैन उन लेखकों में शामिल थे, जिन्होंने उर्दू अदब को साहित्य जगत में अपनी अलग विशेषताओं को बनाए रखा। उन्होंने अपनी व्य़ंगात्मक लेखन शैली से कई सवाल खडे किए तथा मुश्कील सवालों का हल तलाशने कि कोशिश की। हुसैन साहब उन अदीबों में से थे, जो NRC और CAA के विरोधी आंदोलन में उतरे थे। सरकारी नीति के विरोध के चलते उन्होंने अपना पद्मश्री सम्मान लौटाया। उन्होंने कहा था, “कई लोगों की आवाज दबाई जा रही है, कई को मारा जा रहा है और गरीब लोग हंसने की स्थिति में नहीं हैं। ऐसे समय में खुदको मैं सरकार से जोडना नही चाहता।

र्दू के प्रसिद्ध व्यंगकार मुज़तबा हुसैन के बारे में मीडिया का रुहांसा होना लाज़मी हैं। क्योंकि उनके बारे में जितना लिखा और पढ़ा जाए वह कम ही हैं। ज़नाब मुज़तबा बीते दिनों नागरिकता कानून के विरोध को लेकर मेनस्ट्रीम के चर्चा में आए थे। भाजपाई सरकार के दमनशाही के ख़िलाफ उन्होंने अपना पद्म ऐजाज (सम्मान) लौटाया था। इस कानून के विरोध के चलते देश में जो संगीन सुरते हाल (अस्थिरता) बनी थी उससे वह खुश नहीं थे।

27 मई को अल सुबह मिली मुज़तबा हुसैन के वफात कि खबर मुल्कभर के तमाम अदबी हल्कों में इन्तेहाई मायुसी लेकर आयी। ख़बरो के मुताबिक उन्होंने हैदराबाद स्थित रेड हिल्स इलाके के अपनी रिहाईश गाह पर बरोज बुध सुबह तकरीबन  9 बजे आखरी साँस ली।

इस बुरी खबर पर मशहूर शायर ज़फर कमाल अपनी रुबाई में लिखते हैं -

हर आँख ज़फर अश्कों झील हुई

उस गम में सिय़ा दिल कि कंदील हुई

रहलत कि खबर जो मुज़तबा कि आई

ये ईद मुहर्रम में तब्दील हुई

यह भी पढ़े : बेशर्म समाज के गन्दी सोंच को कागज पर उतारते मंटो

यह भी पढ़े : साहिर के बरबादीयों का शोर मचाना फिजुल हैं

व्यक्तित्व

मुज़तबा हुसैन की पैदाइश 5 जुलाई 1936 को गुलबर्गा मे़ हुई थी। उनके वालीद वहां पर तहसिलदार के ओहदे पर फाइज थे। उनके वालीद का आबाई वतन महाराष्ट्र का उस्मानाबाद था। अपनी रिटारमेंट के बाद वह इसी शहर में आकर बस गए थे।

गुजर-बसर के लिए उनके वालिद ने शहरे उस्मानाबाद में कुछ जमीन खरीद ली थी। इसी शहर में उनका 60 के दशक में इन्तकाल हुआ और वे इसी मिट्टी का हिस्सा बने। मुज़तबा हुसेन ने बाद में अपने हिस्से की जमीन बेच दी थी। आज भी उनके छोटे भाई वहां किसानी करते है।

मुज़तबा हुसैन की इब्तेदाई तालीम घर पर हुई। घर के अदबी माहौल में वे पले-बढ़े। उनके बड़े भाई महबूब हुसैन एक प्रसिद्ध शायर, सहाफी (पत्रकार) और लेखक थे। दूसरे सबसे बडे भाई इब्राहिम जलीस प्रसिद्ध हास्य और तरक्कीपसंद (प्रगतिशील) अदीब (लेखक) थे जो पोलीस एक्शन के बाद पाकिस्तान चले गए।

हुसैन साहब ने 1956 में हैदराबाद के उस्मानिया यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। उन्हें स्कूल के जमाने से ही तन्ज़ो व मज़हा (व्यंग) की तहरिरो का जौक था। हैदराबाद आने के बाद उनका यह अदबी शौक परवान चढ़ा। हैदराबाद के लेखकों, शायर और सहाफी के सोहबतों रहकर बहुत कुछ सिखा। आगे चलकर वह रोजनामा सियासतसे वाबस्ता हो गए। क्योंकि उस अखबार के मुदीर (संपादक) उनके बडे भाई मशहूर शायर महेबूब हुसेन जिगर थे।

मुज़तबा हुसैन ने 1962 में महकमे इतलाआत (सूचना और प्रसारण) से मुलाजिमत का आगाज किया और कई दूसरे महकमे में काम करते रहे। 1972 में दिल्ली में गुजराल कमेटी के रिसर्च शोबे से वाबसता हो गए। दिल्ली में मुख्तलीफ मुलाजिमत के बाद 1992 मे सबकदोश (सेवा अवकाश) हो गए। रिटायरमेंट के दौरान वह एनसीईआरटी में संपादक थे।

रिटायर होने के बाद वह हमेशा के लिए हैदराबाद आकर बस गए और अदबी खिदमत में लग गए। उनका पहला सफरनामा उर्दू के बाद एक जापानी पत्रिका में किश्तों में प्रकाशित हुआ। लेकिन यह जब सारिका हिन्दी मैगझीन में तफसीर में छपा तो मुज़तबा हुसैन हिन्दी हल्को में मशहूर हुए। उसके बाद काराईन (पाठको) ने उनकी किताबें बाजार से खरीदनी और उन्हें अपनी निजी लाइब्रेरीयों मे इकट्ठा करना शुरू किया।

यह भी पढ़े : जब तक फिल्में हैं उर्दू जुबान जिन्दा रहेंगी

यह भी पढ़े : हिन्दू विरोधी क्या फैज कि नज्म या तानाशाही सोंच?

अदबी सफर

मुज़तबा हुसैन भारतीय बर्रे सगीर (उप महाद्वीप) में पढ़े और पढ़ाए जाने वाले एक ब़डे अदीब (लेखक) थे। भारत और पाकिस्तान के महान लेखकों के पिढी के वे आखरी जराफी (तंजो मजाहिय़ा) अदीब थे। कुछ वक्त के लिए, पाकिस्तान में मुश्ताक अहमद यूसुफी और भारत में मुज़तबा हुसैन उर्दू साहित्य के बडे नाम थे। मुश्ताक अहमद यूसुफी की वफात 3 मई 2017 को उनकी पांच अमर किताबों के साथ हुई।मुज़तबा हुसैन का जाना उर्दू जुबान के तन्ज़ो और मज़हा की महान परंपरा के अंत की तरह है।

आज के नये अदबी बाजारमें कुछ मज़ाहियां (हास्य) कवि और लेखक भी हैं। मगर वह महज शौहरत पाने के लिए सस्ती रचनाए करते हैं। लेकिन यह कहना गलत नही होगा कि उनमें से कोई भी मुश्ताक अहमद यूसुफी और मुज़तबा हुसैन की जगह ले सकता है और ना ले पाएगा। एक तरह से कहे तो इनकी रचनाए उर्दू अदब के महान परंपरा का मखौल उडाती हैं, खैर।

यह भी पढ़े : दकन के महाकवि थे सिराज औरंगाबादी

यह भी पढ़े : औरंगाबाद के वली दकनी उर्दू शायरी के बाबा आदम थें

लेखन शैली

1986 में उनकी पहली किताब तकल्लुफ बर तरफनिकली। जिसके बाद क़िस्सा-ए-मुख़्तसर, बिल आखीर, बहरहाल, आदमीनामा, चेहरा दर चेहरा, उर्दू के शहर, उर्दू के लोग और जापान चलो, जापान जैसी 24 मशहूर किताबे है। जिसके बारे में उनकी वेबसाईट पर हर तरह कि मालूमात मिलती हैं। उनकी अमरिका घास काट रहा हैयह उनका सफरनामा भी काफी मशहूर हुआ, जिसमें उन्होंने ख़ारजा पॉलिसी (परराष्ट्र नीति) पर अपने अंदाज में व्यंग के जरिए तीरों नश्तर चलाए थे।

जापान चलो, जापान और सफर ए लख खतउर्दू जुबान के बेहतरीन शैली का नमूना हैं। उनकी 50 साला अदबी सफर में दो दर्जन से अधिक किताबे प्रकाशित हो चुकी हैं। वह अखबार में संडे कॉलम भी लिखा करते थे। अपने रोजनामा सियासत के शीशा-वा-तीशा कॉलम में उन्होंने कई अफसानानिगार, शायर और राईटर पर करीबन डेढ़ सौ से ज्यादा ख़ाके (प्रोफाईल) लिखे हैं। इस अखबार से वह तीन दशक से जुडे रहे।

यह भी पढ़े :  गुरुमुखी लिपि हिन्दी अक्षरों का बिगड़ा हुआ रूप

यह भी पढ़े : क्या हिन्दुस्तानी जबान सचमूच लुप्त होने जा रही हैं ?

अदबी सम्मान

मुज़तबा हुसैन पहले तंज व मज़हा के अदीब है, जिनको हुकूमत ने बहैसियत पद्मश्रीजैसे बा वकार ऐजाज से नवाजा था। हास्य व्यंग शोबे (विभाग) में पद्मश्री पाने वाले मुज़तबा हुसेन पहले अदीब (लेखक) थे। उनके मजामिन पर मुश्तमील प्रकाशित हुई किताबे हिदीं के साथ उड़िया, कन्नड़ जैसी दिगर सुबाई जुबानों मे तर्जुमा (भाषान्तर) हो चुकी है।

उनकी कई किताबे अंग्रेजी, रूसी और जापानी भाषाओं में भी तर्जुमा हुई हैं। याद रहे कि उनका पहला अदबी ईनाम उडिया लेखको की जानिब से मिला था। उन्हें तकरीबन 10 से ज्यादा प्रतिष्ठित अवार्ड हासिल हुए। जिन में विभिन्न सुबाई (राज्य) अकादमियों में आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, हरयाणा, महाराष्ट्र, पंजाब, बिहार और दिल्ली ने उन्हें समय समय पर अदबी सम्मान प्रदान किए है।

जिसमें  गालिब, मखदूम, कुँवर महेंदर सिंग बेदी, जौहर कुरेशी, मीर तकी मीर अवार्ड, वगैराह शामिल है। 2012 में दिल्ली उर्दू अकादमी द्वारा उन्हें बहादुर शाह जफर राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

उनके अदबी तवील (दीर्घ) खिदमत के लिए में कर्नाटक की गुलबर्गा यूनिवर्सिटी ने 2010 में डाक्टरेट की डिग्री से नवाजा था। उनके साहित्य और दिगर किताबों पर अलग-अलग मुशाहिरीन (विद्वानों) द्वारा कम से कम 12 तहकिकी किताबे (शोध ग्रंथ) लिखी गयी हैं।

जाते जाते यह भी पढ़े :

परवीन शाकिर वह शायरा जो ‘खुशबू’ बनकर उर्दू अदब पर बिखर गई

जब ग़ालिब ने कार्ल मार्क्स को वेदान्त पढने कि दी सलाह

You can share this post!

author

अलीमुद्दीन अलीम

लेखक मुंबई स्थित सम्मानित उर्दू के नामी शायर हैं। उनकी उर्दू रचनाएं अलग-अलग अखबार तथा मैगझिन में छपती हैं। वह ‘तज्किरा ए शुराए मराठवाडा’ प्रसिद्ध शोध ग्रंथ के रचयिता हैं। उन्हें इस किताब के लिए प्रतिष्ठित साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका हैं।