जब तक फिल्मे हैं उर्दू जुबान जिन्दा रहेंगी

जब तक फिल्मे हैं उर्दू जुबान जिन्दा रहेंगी
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बॉलीवूड और उर्दू का रिश्ता बहुत पुराना हैं। बडे बडे शायरों ने फिल्मों मे उर्दू को बढाने में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दिया हैं। आज तक कोई भी भारतीय फिल्में बगैर उर्दू जुबान के मुकम्मल नही हुई हैं। आमतौर पर कथा, पटकथा, गीत और संवाद में उर्दू का मिजाज देखा जा सकता हैं। इसके अलावा रोजमर्रा कि बोली में भी उर्दू का इस्तेमाल होता हैं, जिसे हम हिन्दुस्तानी कहते हैं। यह भाषा हमारे जिन्दगी से जुडी हैं। आज बॉलीवूड और उर्दू पर बॉलीवूड के मशहूर संवाद लेखक जावेद सिद्दिकी का यह आलेख हम आपके लिए दे रहे हैं, जो जश्न ए रेख्ता के कार्यक्रम से लिया गया हैं।

म फिल्मों में उर्दू की बात करते हैं तो उससे मुराद क्या होती है? क्योंकि मैं नहीं समझता के किसी भी फिल्म की कोई जुबान होती है, जुबान तो उन किरदारों की होती है जो फिल्मों में दिखाये जाते हैं। वह किरदार अगर हिन्दी बोलने वाले हैं तो हम उनके लिए हिन्दी लिखते हैं। अगर मान लो वह उर्दू बोलने वाला हैं तो हम उसके लिए उर्दू लिखते हैं। उसमें राइटर तो कही दिखाई ही नहीं देता। मुकालमों (डायलॉग लेखन) में राईटर दिखता है।

हाँ यह बात जरूर हैं कि गानों और गीतों में जुबान दिखाई देती हैं। और मैं नहीं समझता कि गीत उर्दू के बगैर मुकम्मल हो सकते हैं। क्योंकि आज तक जितने भी गीत लिखे गए हैं - वह इश्क, मोहब्बत, वफा और सनम जैसे लफ्जो के बगैर आज भी नहीं पूरे होते। जिन लोगों ने इस रबिश से हटने की कोशिश की वह इस लाइन में कामयाब नहीं हो सके।

फिल्मों में उर्दू क्यो हैं, इसपर मेरा खयाल यह कि उर्दू का जो चलन है यह उसकी वजह हैं। उर्दू आज भी तमाम प्रपोगंडे के बावजूद अवाम की जुबान है और सिनेमा अवाम का इंटरटेनमेंट हैं। इसलिए हमे जिस जबान मे लिखा जाने के लिए कहा जाता हैहम उसी में लिखते हैं।

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हमारे पास पहली फरमाइश यहीं होती है, सर, ऐसा लिखे कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हर आदमी के समझ में आ जाए। इसलिए हम उर्दू लिख देते हैं और इस तरह उर्दू अपना पैगाम हर जगह पहुंचा देती है। अगर इस हिसाब से हम देखे, तो पिछले 100 साल से उर्दू फिल्मों कि जुबान रही हैं। मेरा खयाल है जब तक फिल्में हैं शायद तब तक उर्दू उसकी जबान रहेगी।

इसलिए के

बनती नहीं है वादा ओ सागर कहे बगैर,

आप करेंगे तो क्या करे।

बदलती उर्दू जबान

आज उर्दू ज़ुबान बदल रही है। वह इसलिए बदल रही है कि हमारा समाज बदल रहा है। हमारा वक्त बदल गया है। धीरे-धीरे उसमें बहुत सारे नये अल्फाज शामिल हो रहे है। हिन्दी के अल्फाज़ तो पहले ही से थे, हिन्दी के बगैर तो फिल्म वाले चार कदम चल नही सकते। लेकिन जो नये अल्फाज शामिल हो रहे हैं, नये लुगात (शब्द सूचि-Vocabulary) आ रहे है। उर्दू इतनी ब्रॉड माईन्डेड हैं, उसका दामन इतना वसी हैं के उन सारे अल्फाजों को अपने अन्दर इस तरह समेट रही है कि जैसे वह उर्दू का ही एक हिस्सा हो।

उर्दू में कंप्यूटर की जबान भी आ गई हैं। आज कॉलेज में बच्चे जिस किसकी जबान बोलते हैं, जिसमें आधी अंग्रेजी होती है वह भी उर्दू में आ गई है। कुछ दिन पहले मैंने एक फिल्म लिखी, तब मुझे अपने पोते को साथ बिठाना पड़ा। मेरा पोता कॉलेज में जाता है, जो फस्ट इयर में है। मेने उससे पूछा कि भई तुम किस किस्म की बातें करते हो! किस किस्म की शब्द भण्डार (Vocabulary) हैं तुम्हारे! क्योंकि होक्यॅब्लरी बदल रही और जुबान बदल रही है, यह तमाम चिजे उर्दू जुबान अपना रही है।

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तलफ्फुज ठीक से हो

उर्दू किस रस्मूल खत (लिपी) में लिखी जा रही इससे मुझे प्रॉब्लम नही हैं। आज उर्दू अपने रस्मूल खत याने फारसी लिपी में नहीं लिखी जाती, इसमे तो बहुत कम लिखी जाती है। मैं जब भी कोई स्क्रिप्ट लिखता हूँ तो मुझसे कहा जाता है कि आप उसे या तो आप रोमन में भेजिए या देवनागरी में भेजिए। मुझे इससे कोई एतराज नहीं हैं कि, आप उसे देवनागरी में पढ़िए या रोमन में पढ़िए।

लेकिन प्रॉब्लम वहां होती है जब उर्दू सही से पढी नही जाती। अगर हम सब इस बात का एहतमाम करे कि वह लोग जो खास तौर से जिन्हे उर्दू से दिलचस्पी है और वह जो जिन्हे उर्दू से हमदर्दी है, जो लोग उर्दू जानना चाहते हैं और सही बोलना चाहते हैं, उनके लिए यह बहुत जरूरी है कि वह लोग उर्दू को उर्दू के तरीके से पढ़ा करे।

उर्दू का जो लफ्ज़ है, उसको उसी के तलफ्फुज के साथ पढना है। जैसे खुदा और खु़दा ना करे। गुलजार साहब ने इस बारे में बड़ी अच्छी मिसाल दी है, वह कहते हैं, अगर बिन्दी नहीं लगाओगे तो बड़ी गड़बड़ हो जाएगी। यह समझ में नहीं आएगा के दादाजी दवा ख़ाने जा रहे हैं या दादाजी दवा+खाने जा रहे। क्योंकि दोनों में भी जमीन आसमान का फर्क हैं कि दवा खाने और दवाखाने जा रहे है।

तो यह चीज हमको अपने लिए बहुत जरुरी मान लेनी चाहिए कि भले ही उर्दू किसी भी लिपी में लिखी जाये लेकिन वो सही लिखी जाये। जब वह सही से लिखी जाएगी तो सही बोली भी जायेंगी। जब सही बोली जायेंगी सही समझी भी जायेंगी। इससे बडा कान्ट्रब्यूशन उर्दू के लिए और क्या हो सकता है कि लोग उसे सहीं समझे और सहीं से बोले।

बढती उर्दू कि दिलचस्पी

उर्दू कि मकबूलीयत (प्रसिद्धी) कि एक बहुत बड़ी वजह और भी है उर्दू में जो मौसिकी है, जो म्यूजिक हैं, वह दूसरी जबानों के मुकाबले में कुछ ज्यादा ही है। जब हम यह म्यूजिक हमारे अन्दर उतरती है, तब तो हमको बहुत अच्छा लगता है। रूह को एक आसुदगी मिलती हैं।

एक जमाना था जब हमने नये-नये से उर्दू में दिलचस्पी दिखानी शुरू की थी, तब ऐसा लगता था के उर्दू वाकई में खत्म हो चुकी है। जादातर यह कहां जाता था कि हम उर्दू बोलने वालों की आखिरी नस्ल है। लेकिन मेरी आँखों के सामने एक इन्कलाब आया और वह कि मैंने देखा के मैं उर्दू बोलने वालों की आखिरी नस्ल बिल्कुल नहीं हूँ। बल्कि मेरे सामने पूरी दो नस्लें मौजूद है, जो उर्दू बोल रही है। यह मैं समझता हूं के यह इन्कलाब पिछले 20-25 सालों में आया है जिसे आप कह सकते हैं कि उर्दू नें पलट के मुँह मारा।

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फिल्मो कि उर्दू

कृष्ण चंद्र, राजेंद्र सिंह बेदी, इस्मत चुगताई, इंद्रराज आनंद, गुलजार, आनंद बख्शी, साहिर लुधियानवी, मजरुह सुलतानपुरी, राजेंद्र कृष्ण इन सारे लोगों का फिल्मों उर्दू को बढाने में बहुत ज्यादा कान्ट्रब्यूशन रहा हैं। उर्दू के बारे उन्होंने अपने-अपने नजरियात (दृष्टिकोण) भी पेश किए हैं। यह सारे लोग उर्दू लिखने-बोलने वाले थे।

लेकिन उर्दू और फिल्मों का एक ताल्लुक इसलिए भी है कि वह जो फिल्म हैं वह उर्दू नाटक के पेट से पैदा हुई है। जब पारसी थिएटर हुआ करता था, जो सारे के सारे नाटक और ड्रामे हुआ करते थे, वह उर्दू में होते थे। वहां से पारसी थिएटर की परंपरा लेकर के उर्दू फिल्मे बनना शुरु हो गई। आप शुरुआती फिल्में देख लीजिए उनका पूरा तेवर, पूरा अन्दाज जो है वह थियटरीकल है और उसी किस्म की उर्दू उसमें बोली जाती थी।

इसके बाद उर्दू जैसे जैसे फिल्म की जरुरते (Requirement) बदली, जिस तरह फिल्मों में दौर आते गये उसके हिसाब से जुबान बदली हैं। एक जमाना था जब सोशल फिल्में ज्यादा बना करती थी। उसके बाद जमाना आया कि अक्शन फिल्में बहुत बनने लगी, एक जमाना आया जब रोमाण्टिक फिल्मे बना करने लगी। उसके बाद सस्पेंस थ्रीलर फिल्में बहुत बनने लगी। जब कभी भी ऐसा बदलता दौर आया है जिस में रोमान्स, समाजी और इन रिक्वायरमेंट्स कि जरुरत पड़ी हैं, वहां उर्दू का जलवा बढता हुआ आपको दिखाई देंगा। उसमे उन लोगो का कान्ट्रब्यूशन है, जिन्होंने इस बदलते दौर में फिल्में लिखी है।

अख्तरुल इमान साहब ने 100 के करीब फिल्म लिखी हैं। वह उर्दू के बडे शायर थे और अच्छा लिखते थे। उन्होंने वक्त, कानून, इत्तेफाक, धर्मपूत्र जैसी फिल्म लिखी है। उनका फिल्मों में उर्दू को पॉपुलर करने में जो कान्ट्रब्यूशन रहा है, वह इतना बड़ा था की उनके बाद जो लौग फिल्मों मे आये वह सब उर्दू के बॅकग्राऊंड के थें।

जिसमें राही मासूम रजा भी एक थें। हालांकि राही साहब हिन्दी में ज्यादा जाने और माने जाते हैं। क्योंकि हिन्दी में उनको अवार्ड दिया गया। उर्दू के राइटर के हौसियत से उन्हें अवार्ड नहीं दिया गया था। साहिर साहब उर्दू के थे, जावेद अख्तर, गुलजार भी उर्दू से ही है, यह सब लोग यह बेसिकली वह लोग हे जो उर्दू में सोचते हैं और उर्दू में ही ख्वाब देखते हैं। और आपकी जबान वही है जिसमें आप ख्वाब देखते हैं।

 

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टीम डेक्कन

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