मुस्लिम शासकों ने महामारी से प्रजा को कैसे बचाया?

मुस्लिम शासकों ने महामारी से प्रजा को कैसे बचाया?

नल्लाकुण्टा स्थित निजाम मीर उस्मान द्वारा बनवाया गया क्वारंटाईन हॉस्पिटल


कोरोना (Covid-19) कि वजह से भारत में मची तबाही के बाद महामारी और उसके इतिहास कि चर्चा फिर एक बार शुरु हुई है। इससे पहले भारत में महामारी फैलने के सेंकडों संदर्भ उपलब्ध हैं। अल्तमश से लेकर टिपू सुलतान तक कई मुस्लिम बादशाहों और सुलतानों के दौर में महामारी ने तबाही मचाई थी। इन सुलतानों ने महामारी का मुकाबला करने के लिए सराहनीय कदम उठाए थे। इन महामारीयों कि वजह से मध्यकालीन चिकित्सा के क्षेत्र में कई संशोधन भी किए गए। महामारी और मध्यकालीन वैद्यकीय विकास के इतिहास पर एक नजर...

भारत को कई बार महामारी (Pandemic) के संकट का सामना करना पडा। मध्यकालीन इतिहास (Medieval history) के कई स्त्रोत महामारी की दर्दभरी कहानी को बयान करते है। सुलतान अल्तमश के दौर में दिल्ली के करीबी इलाके में महामारी फैली थी, उस समय तकरीबन पाच हजार से ज्यादा लोग इस महामारी का शिकार हुए थे। करीब डेढ साल तक महामारी का कहर जारी था, बडी मुश्कील से इस को रोकने में कामयाबी मिली थी।

कई हकीम और युरोपियन डॉक्टर भी उस समय दिल्ली में अपनी सेवाएं दे रहे थे। अकबर और शहाजहां के समय भी कुछ बिमारीयों के फैलने का उल्लेख अबुल फज्ल और खाफीखान ने अपने ग्रंथो में किया है। मगर इन बिमारीयों कि वजह से अल्तमश के काल में फैली महामारी कि तुलना में ज्यादा नुकसान नहीं उठाना पडा, बिमारी कि तिव्रता कम होने कि वजह से सामान्य जनजीवन पर ज्यादा असर नहीं हो सका। मुस्लिम सत्ता के प्रारंभ से भारत के स्वास्थ्य (Health) क्षेत्र में कई तब्दिलीयां आयी। जिसकी वजह से महामारी का मुकाबला करने में आसानी हुई

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चिकित्सीय विकास

भारत में अरब, तुर्क और मुगलों के आगमन के बाद उनके चिकित्सा संबंधी (Medical) शोध भी भारत पहुंचे। कई न दवाईयां और जडीबुटीयों को खोजा गया तथा वैद्यकिय क्षेत्र के ग्रंथो का भारतीय भाषाओं में अनुवाद हुआ

भारत कि महानतम प्राचीन आयुर्वेद शैली के साथ हुए संमिश्रण से भी चिकित्सीय विकास चरम पर पहुंचा। खून में संक्रमण के बाद रोगी के शरीर में सुई के जरीए रसायन छोडे जाते थे। चोरी के गुनाह में हाथ काटने तथा बलात्कार और व्यभिचार के गुनाहों में नाक काटने जैसी शिक्षाएं दी जाती थी। जिस वक्त नाक काटी जाती तो शरीर के दूसरे हिस्से का चमडा नाक पर लगाकर टाके लगवाए जाते थे।

महामारी के वक्त अरब अक्युप्रेशर शैली और हिजामा जैसी तकनीक का भी इस्तेमाल किया होता था। शरीर से गंदे खून को निकालने के लिए हिजामा शैली भी महामारी में काफी लाभप्रद साबित हुई। महामारी के वक्त कई सामाजिक सावधानीयां बरती जाती थी। अरब वैद्यक शास्त्र कि संकल्पनाओं का प्रयोग भी महामारी के समय किया जाता था।

दिल्ली तथा देश के अन्य प्रदेशों कि तरह दकन में भी महामारी की घटनाएं हुई हैं। बहामनी शासनकाल में सेना में फैली एक बिमारी कि वजह से सैन्य भरती अभियान चलाना पडा था।

कुतुबशाही दौर में तेज बुखार के रूप में महामारी फैली थी, जिसकी वजह से सामान्य जनता में भय का माहौल था। उस समय सूफियों द्वारा स्थापित हकिमखानों ने अहम भूमिका निभा। खुलताबाद के सुफी केंद्र से दन में फैले कई सूफी संतो ने हकिमखाने (चिकित्सालय) शुरु किए थे।

इन हकिमखानों में महामारी के वक्त सेवाएं दी जाती थी। कुछ सूफी संत खुद युनानी शैली तथा अरब वैद्यकीय शैली का ज्ञान रखते थे, जिसके जरिए वह खुद मरिजों का इलाज करते थे।

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बिजापूर में महामारी

बहामनी कि राजधानी गुलबर्गा और कुतुबशाही सुलतानों के गोलकुण्डा कि तरह बिजापूर को भी महामारी का सामना करना पडा था। औरंगजेब कि बिजापूर के खिलाफ आखरी जंग के बाद 1100 हिजरी (ईसवीं 1688) में मुहर्रम महिने के आखरी दिनों में प्लेग कि बिमारी फैली थी।

इस बिमारी कि वजह से कई अहम शख्सीयतों की भी मौत हुई थी। जिसमें बहोत से मुगल उमरा का भी शुमार था। कई लोग अंधे, बहरे और गुंगे होकर इस महामारी से बच गए थे। खुद आलमगीर औरंगजेब कि बेगम जो औरंगाबादी महलके नाम से जानी जाती थी, प्लेग कि बिमारी के वजह से मर ग। बिजापूर में नौबाग के बेगमरोजे में इन्हें दफनाया गया है।

फाजील खाँ, मुहंद राज पसर, राजा जसवंत सिंग जैसे बडे लोगों कि भी इसी वजह से मौत हुई थी। यह महामारी इतनी खतरनाक थी की, ख्वॉस खां कि बीवी का जनाजा ले जाते वक्त 16 आदमी रास्ते में ही मर गए थे। मरनेवालों की तादाद इतनी थी की, लाशों को दफनाकर लोग बेजार हो गए थे। सिर्फ एक दिन में 777 लोगों की मौत हो ग थी।

मौतो के वजह से बिजापूर के कई मकान खाली हो गए थे। डर के मारे कई लोग शहर से भाग गए। हालत यह थी कि रात को सोए हुए घर के सारे लोग जागते नहीं थे। सुबह को दरवाजा खोलनेवाला कोई नहीं रहता था। जो लोग बिमार पडे थे इनकी देखभाल के लिए भी कोई बचा नहीं था।

जे. डी. बी. ग्रिबल बिजापूर में ब्रिटिशकाल में कलेक्टर थे, उनके मुताबिक उस समय 1 लाख से ज्यादा लोगों कि मौत इस बिमारी से हुई थी। इसी वजह से बिजापूर कि जनसंख्या काफी घट गयी थी।

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टिपू सुलतान का संशोधन

आदिलशाही के खात्मे के बाद दन में हैदरअली और टिपू सुलतान कि सल्तनत ए खुदादादही बलशाली मुस्लिम राजसत्ता थी। टिपू सुलतान को चिकित्सीय संशोधन और नए वैद्यकिय उपकरणों को खोजने में काफी रुची थी। टिपू सुलतान ने पाँडेचरी के गव्हर्नर मौसी कांसिगनी को लिखा एक खत इतिहास के शोधकर्ता सरफराज अहमद ने अपनी बहुचर्चित मराठी किताबसल्तनत ए खुदादादमें उद्धृत किया है।

जिसमें वह कहते हैं, टिपू सुलतान ने मौसी कांसिगनी को युरोप में बने एक उपकरण बैरोमीटर पर आधारित पुस्तक कि एक कॉपी उपलब्ध कराने कि गुजारीश की है। बैरोमीटर पर आधारित इस ग्रंथ का फारसी में अनुवाद करने की योजना भी टिपू सुलतान ने बना थी।

सरफराज अहमद आगे लिखते है, “टिपू का एक खत पुना में फैली महामारी और उसके इलाज के संदर्भ में है, जो उसने पुना के अपने वकील को लिखा था। जिसमें महामारी से बचने के लिए शरीर से गंदे खून को निकालने कि बात टिपू सुलतान लिखी है। टिपू सुलतान ने कोची में स्थित अपनी सैन्य टुकडी को महामारी से बचने के लिए कुछ हिदायतें भी दी थी।

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निजाम का क्वारंटाईन अस्पताल

भारत में आजादी के पहले भी वबाई बिमारीयां फैली थी। उस समय उसे रोकने के लिए भारत कि कई रियासतों ने अहम काम किया था। हैदराबाद के आखरी नवाब मीर उस्मानअली खान ने वबाई बिमारी के खिलाफ जो कदम उठाए थे, उसकी मिसाल आज भी दी जाती है।
हैदराबाद से प्रकाशित होनेवाले उर्दू अखबार डेली एतेमाद (E
temaad Daily) में इस संबंध मे मार्च 2020 के आखरी हफ्ते एक खबर छपी थी। जिसमें कहा गया है, “कोरोना व्हायरस दुनिया में फैलने के बाद कोरोंटाईन (Quarantine) का लफ्ज आम हो गया है। हैदराबाद के लिए यह कोरोंटाईन का लफ्ज नया नहीं है। क्योंकि हैदराबाद में इस नाम से 100 साल पहिले ही एक दवाखाना कायम कर लिया गया था। निजाम मीर उस्मानअली खान (Nizam Mir Osman Ali Khan)बहादूर के दौर में हैदराबाद में वबाई इलाज के लिए कोरंटाईन हॉस्पिटल’ 1915 में बनाया गया था। उस समय एर्नागुट्टा में 20 अगस्त 1915 को निजाम के आदेश से यह दवाखाना बनाया गया था।

अखबार कहता हैं, “जो सन 1923 में नल्लाकुण्टा (Nallakunta) में ले जाया गया। यह दवाखाना वहां इसलिए शिफ्ट किया गया था कि यह जगह शहर से दूर है। शहर से दूर मरिजों को साफ आबोहवा की जरुरत को देखते हुए यह फैसला लिया गया था। इस अस्पताल कि आज कि स्थिति बताते हुए अखबार कहता है, पिछले एक सदी से यह दवाखाना लाखों लोगों को इलाज की सहुलत दे रहा है। सन 1997 में इस दवाखाने का नाम बदल कर सर रोनॉल्ड रास इन्स्टिट्यूट ऑफ क्रिटीकल अँड कम्युनिकेबल डिसीसकर दिया गया। अब इस अस्पताल को फिवर हॉस्पिटल (Fever Hospital) के नाम से जाना जाता है।

भारत में महामारी का इतिहास काफी प्राचीन है। भारत महामारी के संकट का कई बार सामना कर चुका है। लाखों लोगों को महामारी कि वजह से जान गवांनी पडी। इसके बावजूद भारत काफी आत्मविश्वास के साथ भविष्य कि तरफ आगे बढा।  

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टीम डेक्कन

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