जब महात्मा गांधी अफ्रिका में हुए ‘क्वारण्टाईन’

जब महात्मा गांधी अफ्रिका में हुए ‘क्वारण्टाईन’
FB / Tushar gandhi

महात्मा गांधी 150:

आज दुनिया कोराना वायरस जैसे महामारी का प्रकोप झेल रही हैं। इस बिमारी के चलते विश्व भर में लाखों लोगों को एक दूसरे से अलग याने क्वारंटाईन में रखा गया हैं। गांधीजी कि जीवनी पढने पर इस तरह कि एक बात सामने आती हैं। रोचक बात हैं कि, 124 साल पहले राष्ट्रपिता को दक्षिण अफ्रिका में क्वारंटाईन में रखा गया था। गांधीजी समुद्री जहाज से मुंबई से नेटाल के लिए निकले तब मुंबई में प्लेग जैसी महामारी फैली थी। धारणा यह थी की इस बिमारी के कीटाणू 23 दिन तक रहते हैं, इसलिए 18 दिन बाद जब गांधीजी अफ्रिका पहुँचे तो, उन्हेंं क्वारंटाईन में रखा गया था। इस अनुभव को उन्होंने अपनी आत्मकथा में लिखा हैं

रिवार के साथ मेरी पहली समुद्र यात्रा थी इसी स्टीमर में मेरे कुछ रिश्तेदार थे स्टीमर दूसरे बंदरगाह पर ठहरे बिना सीधा नेटाल पहुँचनेवाला था इसके लिए केवल 18 दिन की की यात्रा थी ठारह दिसम्बर (1896) के आस-पास दोनों स्टीमरों ने लंगर (मकाम पर पहुँचना) डाले।

दक्षिण अफ्रीका के बंदरगाहों में यात्रियों के स्वास्थ्य की पूरी जाँच की जाती है। यदि रास्ते में किसीको कोई छुतवाली बीमारी हुई हो, तो स्टीमर को सूतक क्वारंण्टीन’ (Quarantine) में रखा जाता है। हमारे बम्बई छोडते समय वहाँ प्लेग शिकायत थी, इसलिए हमें इस बात का डर जरूर था कि सूतक की कुछ बाधा होगी। बंदर में लंगर डालने के बाद स्टीमर को सबसे पहल झण्डा फहराना होता है। डॉक्टरी जाँच के बाद डॉक्टर के मुक्ति देने पर पीला झण्डा उतरता है और फिर यात्रियों के रिश्तेदारों आदि को सामर पर आने की इजाजत मिलती है।

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तदनुसार हमारे स्टीमर पर भी पीला झण्डा फहरा रहा था। डॉक्टर आये। जाँच करके उन्होंने पाँच दिन का सूतक घोषित किया, क्योंकि यह धारणा थी कि प्लेग के कीटाणु 23 दिन तक जिन्दा रह सकते। इसलिए उन्होंने ऐसा आदेश दिया कि बम्बई छोड़ने के बाद तेईस दिन अवधि पूरी होने तक स्टीमरों को सूतक में रखा जाए।

पर इस सूतक की आज्ञा का हेतु केवल स्वास्थ्य-रक्षा न था। डरबन के गोरे नागरिक हमें उलटे पैरों लौटा देने का जो आन्दोलन कर रहे वह भी इस आज्ञा के मूल में एक कारण था।

दादा अब्दुल्ला की तरफ से हमें शहर में चल रहे इस आन्दोलन की खबरें मिलती रहती थीं। गोरे लोग एक के बाद दूसरी विराट सभाएँ कर रहे थे। दादा अब्दुल्ला के नाम धमकियाँ भेजते थे, उन्हें लालच भी देते थे। अगर दादा अब्दुल्ला दोनों स्टीमरों को वापस ले जाएँ, तो गोरे नुकसान को भरपाई करने को तैयार थे।

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दादा अब्दुल्ला किसीकी धमकी से डरनेवाले न थे। इस समय वहाँ सेठ अब्दुल करीम हाजी आदम दुकान पर थे। उन्होंने प्रतिज्ञा की थी कि कितना ही नुकसान क्यों न उठाना पड़े, वे स्टीमरों को बंदर पर लायेंगे और यात्रियों को उतारेंगे। मेरे नाम उनके विस्तृत पत्र बराबर आते रहते थे। सौभाग्य से इस समय स्व. मनसुखलाल हीरालाल नाजर मुझसे मिलने के लिए डरबन आ पहुँचे थे।

वे होशियार और बहादर आदमी थे। उन्होंने हिन्दुस्तानी। कौम को नेक सलाह दी। मि. लाटन वकील थे। वे भी वैसे ही बहादुर थे। उन्होंने गोरों की करतूतों की निन्दा की और इस अवसर पर काम को जो सलाह दी, वह सिर्फ वकील के नाते पैसे लेकर नहीं, बल्कि। एक सच्चे मित्र के नाते दी।

इस प्रकार डरबन में द्वंद्व युद्ध छिड़ गया। एक ओर मुट्ठीभर गरीब हिन्दुस्तानी और उनके इने-गिने अंग्रेज मित्र थे; दूसरी ओर धनबल। प्रतिपक्षियों को राज्य का बल भी प्राप्त हो गया था, क्योंकि नेटाल की सरकार खुल्लमखुल्ला उनकी मदद की थी। मि. हेरी एस्कम्ब ने, जो मंत्रि-मंडल में थे और उसके कर्ताधर्ता थे, इन गोरों की सभाओं में प्रकट रूप से हिस्सा लिया

मतलब यह कि हमारा सूतक केवल स्वास्थ्य-क्षा के नियमों के ही कारण था। उसका हेतु किसी भी तरह एजेंट को अथवा यात्रियों को हमें वापस भेजना था। एजेंट को तो धमकी मिल ही रही थी। पास भी धमकियाँ आने लगी,  अगर तुम वापस न गये, तो समंदर में डूबो दिया जाएगा। लौट जाओगे तो लौटने का भाडा भी बाहें मिल जाए।

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मैं यात्रियों के बीच खूब घूमा-फिरा। उन्हें धीरज बँधाया। नादरीके यात्रियों को भी धीरज से काम लेने के संदेश भेजे। यात्री शान्त रहे और उन्होंने हिम्मत का परिचय दिया।

यात्रियों के मनोरंजन के लिए स्टीमर पर खेलों का प्रबंध किया गया था। बड़े दिन का त्यौहार आया। कप्तान ने उस दिन पहले दर्जे के यात्रियों को भोज दिया। यात्रियों में मुख्यत: मैं और मेरे परिवार के लोग ही थे। भोजन के बाद भाषण करने की प्रथा तो थी ही। मैंने पश्चिमी सभ्यता पर भाषण किया। मैं जानता था कि यह अवसर गंभीर भाषण का नहीं होता, पर मैं दूसरा कोई भाषण दे ही नहीं सकता था।

मैं आनंद में सम्मिलित हुआ था, पर मेरा दिल तो डरबन में चल रही लड़ाई में ही लगा हुआ था, क्योंकि इस हमले में मध्यबिन्दु मैं था। मुझ पर दो आरोप थे :

(1)   मैंने हिन्दुस्तान में नेटाल-वासी गोरों की अनुचित निन्दा की थी।

(2)   मैं नेटाल को हिन्दुस्तानियों से भर देना चाहता था, और इसलिए खासकर नेटाल में बसाने के लिए हिन्दुस्तानियों को कुरलैण्ड और नादरीमें भर लाया था।

मुझ अपनी जिम्मेदारी का खयाल था। मेरे कारण दादा अब्दुल्ला भारी उक्सान में पड़ गये थे। यात्रियों के प्राण संकट में थे। और अपने परिवार का साथ लाकर मैंने उसे भी दु:ख में डाल दिया था।

पर मैं स्वयं बिलकुल निर्दोष था। मैंने किसीको नेटाल आने के लिए ललचाया नहीं था। नादरीके यात्रियों को मैं पहचानता भी न था। कुरलैण्ड में अपने दो-तीन रिश्तेदारों को छोडकर बाकी के सैकड़ों यात्रियों के नामधाम नता न था। मैंने हिन्दुस्तान में नेटाल के अंग्रेजों के विषय में ऐसा एक शब्द नहीं कहा, जो मैं नेटाल में कह न चुका था। और जो कुछ मैंने कहा था, उसके लिए मेरे पास काफी प्रमाण थे।

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अतएव नेटाल के अंग्रेज जिस सभ्यता की उपज थे, जिसके वे प्रति और हिमायती थे, उस सभ्यता के प्रति मेरे मन में खेद उत्पन्न हुआ। मैं उसीका विचार करता रहता था, इसलिए इस छोटी-सी सभा के सामने मैंने अपने वे ही विचार रखे, और श्रोतावर्ग ने उन्हें सहन कर लिया। जिस भा से मैंने उन्हें रखा, कप्तान आदि ने उसी भाव में उन्हें ग्रहण किया। उस विचारों से उनके जीवन में कोई फेरफार हुआ या नहीं, सो में नहीं जानता।

पर इस भाषण के बाद कप्तान और दूसरे अधिकारियों के साथ पश्चिमी सभ्यता के विषय में मेरी बहुत बातें हुई। मैंने पश्चिम की सभ्यता को मुख्य रुप से हिंसक बतलाया और पूर्व की सभ्यता को अहिंसक। प्रश्नकर्ताओं ने मेरे सिद्धान्त मुझी पर लागू किये। बहुत करके कप्तान ने ही पूछा,

गोरे जैसी धमकी दे रहे हैं उसीके अनुसार वे आपको चोट पहुँचायें, तो आप अहिंसा के अपने सिद्धान्त पर किस प्रकार अमल करेंगे?”

मैंने जवाब दिया, “मुझे आशा है कि उन्हें माफ कर देने की और उन पर मुकदमा न चलाने की हिम्मत और बुद्धि ईश्वर मुझे देगा। आज भी मुझे उन पर रोष नहीं है। उनके अज्ञान, उनकी संकुचित दृष्टि के लिए मुझे खेद होता है। मैं समझता हूँ कि वे जो कह रहे हैं और कर रहे हैं वह उचित है ऐसा वे शुद्ध भाव से मानते हैं। अतएव मेरे लिए रोष का कोई कारण नहीं।

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पूछनेवाला हँसा। शायद मेरी बात पर उसे विश्वास नहीं हुआ। इस प्रकार हमारे दिन बीतते और लम्बे होते गये। सूतक समाप्त करने की अवधि अन्त तक निश्चित नहीं हुई। इस विभाग के अधिकारी से पूछने पर वह कहता, “यह मेरी शक्ति से बाहर की बात है। सरकार मुझे आदेश दे, तो में आप लोगों को उतरने की इजाजत दे दूँ।

अन्त में यात्रियों को और मुझे अल्टिमेटम मिले। दोनों को धमकी दी ग कि तुम्हारी जान खतरे में है। दोनों ने नेटाल के बंदर पर उतरने के अपने अधिकार के विषय में लिखा और अपना यह निश्चय घोषित किया कि कैसा भी संकट क्यों न हो, हम अपने इस अधिकार पर डटे रहेंगे।

आखिर तेईसवें दिन, अर्थात् 13 जनवरी, 1897 के दिन, स्टीमरों का मुक्ति मिली और यात्रियों को उतरने का आदेश मिला। 

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author

टीम डेक्कन

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