बत्तीस साल कि जिन्दगी में शंकराचार्य बने एक महान दार्शनिक

बत्तीस साल कि जिन्दगी में शंकराचार्य बने एक महान दार्शनिक
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1904 में राजा रवि वर्मा द्वारा बनाई गई शंकाराचार्य कि एक पेंटिग


जवाहरलाल नेहरु कि लेखमाला :

पण्डित नेहरू किसी परिचय के मोहताज नही हैं। राजनीति कि उनकी प्रतिभा विश्वविख्यात हैं। वह एक उच्च कोटि के विद्वान भी थें। उनके दार्शनिक विचारों ने आधुनिक भारत कि नींव को अब तक मजबूती से पकडे रखा हैं। उनके लिखे कई विचार आज भी सयुक्तिक नजर आते हैं। भारत का प्राचीन और विश्व के इतिहास को देखने कि उनकी दृष्टी एक संपन्न और सर्वकालिक दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। इस नजरिए में दृढता प्रदान करने के लिए हम जवाहरलाल नेहरू द्वारा महामानवों पर लिखे गए कुछ लेखों कि श्रृखंला यहां दे रहे हैं। जो उनकी बेहतरीन पुस्तक Glimpses of world history याने विश्व इतिहास कि झलक’ से लिए गए हैं। यह किताब 1934 में लिखी गई थी। जिसके कुछ लेख हम एक सूत्र में बांधकर आपके सामने पेश कर रहे हैं।  - संपादक

क्षिण भारत में एक बड़े अद्भुत आदमी ने जन्म लिया, जिसने भारत की जिन्दगी में सारे राजा-महाराजाओं से भी ज्यादा महत्व का हिस्सा लिया। यह नवयुवक शंकराचार्य के नाम से प्रसिद्ध है। शायद वह आठवीं सदी के अन्त में पैदा हुआ था। मालूम होता है कि वह एक अपूर्व प्रतिभा शाली व्यक्ति था। वह हिन्दू - धर्म के, या हिन्दू - धर्म के एक विशेष बौद्धिक रूप के, जिसे शैव मत कहते हैं, पुनरुद्धार में लग गया। वह अपनी बुद्धि और तर्क के बल पर बौद्धधर्म के विरुद्ध लडा।

बौद्ध संघ की तरह इसने भी संन्यासियों का संघ बनाया, जिसमें सब जाति के लोग शामिल हो सकते थे। उसने संन्यासियों के संघ के चार केन्द्र भारत के उत्तर, पश्चिम, दक्षिण और पूर्व के चारों कोनों में स्थापित किये। उसने सारे भारत की यात्रा की और जहां - कहीं भी वह गया, सफल हुआ।

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एक विजेता के रूप में वह बनारस आया, पर वह बुद्धि को जीतनेवाला और तर्क में जीतनेवाला विजेता था। अन्त में वह हिमालय पर केदारनाथ गया, जहां सदा जमी रहनेवाली बर्फ की शुरुआत होती है, और वहीं उसका देहावसान हुआ।

जब वह मरा, उसकी उम्र केवल 32 साल या शायद इससे कुछ ही ज्यादा थी। शंकराचार्य के कामों का लेखा-जोखा अद्भुत है। बौद्धधर्म जो उत्तर भारत से दक्षिण भगा दिया गया था, अब भारत से क़रीब-करीब गायब हो गया। हिन्दू धर्म और शैव मत के नाम से प्रसिद्ध उसका एक रूप सारे भारत में फैल गया। शंकर के ग्रंथों, भाष्यों और तर्को से सारे भारत में एक बौद्धिक हलचल मच गई। शंकर सिर्फ ब्राह्मणों का ही महान नेता नहीं बन गया, बल्कि उसने जन-साधारण के चित्त को भी प्राकर्षित कर लिया।

यह एक असाधारण बात मालूम होती है कि कोई आदमी सिर्फ अपनी बुद्धि के बल पर एक महान नेता बन जाये और फिर करोड़ों आदमियों पर और इतिहास पर अपनी छाप डाल दे। बड़े योद्धा और विजेता इतिहास में विशेष स्थान पा जाते हैं। वे या तो लोकप्रिय हो जाते हैं या घृणा के पात्र, और कभी कभी वे इतिहास पर भी प्रभाव डालते हैं।

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महान धार्मिक नेताओं ने करोड़ों के दिलों को हिला दिया है और उनमें जोश की आग भर दी है। लेकिन यह सबकुछ हमेशा श्रद्धा के आधार पर हुआ है। उन्होंने भावनाओं की अपील की है और उन्हें प्रभावित किया है। मन और बुद्धि को जो अपील की जाती है, उसका असर बहुत ज्यादा नहीं होता। बदकिस्मती से ज्यादातर लोग विचार नहीं करते। वे तो सिर्फ महसूस करते है और अपनी भावनाओं के अनुसार बर्ताव करते हैं, लेकिन शंकर की अपील मन और बुद्धि को और विवेक को ही होती थी।

वह किसी पुरानी किताब में लिखे रूढ मत को नहीं दुहराता था। उसका तर्क ठीक था या गलत, इसका विचार इस समय फिजूल है। दिलचस्पी की बात तो यह है कि उसने धार्मिक समस्याओं पर बौद्धिक दृष्टि से विचार किया। इससे भी ज्यादा दिलचस्प यह बात है कि इस तरीके को इख्तियार करने में उसने सफलता पाई। इससे हमें उस समय के शासक वर्ग की मनो दशा की एक झलक मिलती है।

हिन्दू दार्शनिकों में एक आदमी चार्वाक नाम का भी हुआ है, जिसने अनीश्वरवाद का प्रचार किया है। यानी वह कहा करता था कि ईश्वर नहीं है। आज बहुत से ऐसे आदमी हैं, खासकर रूस में, जो ईश्वर में विश्वास नहीं करते; लेकिन यहां हमें इस प्रश्न की गहराई में जाने की जरूरत नहीं है। मतलब की बात यह है कि पुराने जमाने में भारत में विचार और प्रचार की कितनी स्वतंत्रता थी। वह अन्तःकरण की स्वतन्त्रता का युग था। यह बात यूरोप में अभी तक नहीं थी और आज भी इस संबंध में कुछ बन्दिशें हैं। शंकर के छोटे से, किन्तु कठोर परिश्रम के, जीवन से दूसरी बात यह साबित होती है कि सारे भारत में सांस्कृतिक एकता थी। यह एकता प्राचीन इतिहास में लगातार स्वीकार की गई है।

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भूगोल की दृष्टि से, भारत करीब - करीब एक इकाई है। राजनैतिक दृष्टि से भारत में अक्सर विभेद रहा है, हालांकि कभी-कभी सारा देश एक ही केंद्रीय शासन में भी रहा। लेकिन संस्कृति के लिहाज से यह देश हमेशा से एक रहा, क्योंकि इसकी पृष्ठभूमि, इसकी परंपराएं, इसका धर्म, इसके वीर और वीरांगनाएं, इसकी पौराणिक गाथाएं, इसकी विद्वत्ता से भरी भाषा (संस्कृत), देशभर में फैले हुए इसके तीर्थ स्थान, इसकी ग्राम पंचायतें, इसकी विचारधारा और इसका राजनैतिक संगठन, शुरू से एक ही चले पा रहे हैं।

साधारण भारतवासी की नज़र में सारा भारत पूण्यभूमिथा और बाकी दुनिया अधिकतर म्लेच्छों का और बर्बरों का निवास स्थान थी! इस प्रकार भारत में भारतीयता की एक व्यापक भावना पैदा हई, जिसने देश के राजनैतिक विभाजन की परवा नहीं की, बल्कि उसपर विजय प्राप्त की।

शंकर का अपने संन्यासियों के मठों के लिए भारत के चारों कोनों को चुनना इस बात का सबूत है कि वह भारत को सांस्कृतिक इकाई समझता था और उसके आंदोलन की थोड़े ही समय में महान सफलता यह भी जाहिर करती है कि बौद्धिक और सांस्कृतिक धाराएं कितनी तेजी से देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पहुंच गई।

शंकर ने शैव मत का प्रचार किया। यह मत दक्षिण में खासतौर से फैला, जहां ज्यादातर शिव के पुराने मंदिर हैं। उत्तर में गुप्तों के जमाने में वैष्णव धर्म का और कृष्ण की पूजा का फिर से बहुत प्रचार हुआ। हिन्दू धर्म के इन दोनों संप्रदायों के मंदिर एक-दूसरे से बिल्कुल भिन्न हैं। 

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टीम डेक्कन

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