बिस्मिल्लाह खान देश के वह ‘मुनादी’ जो हर सुबह हमें जगाते हैं

बिस्मिल्लाह खान देश के वह ‘मुनादी’ जो हर सुबह हमें जगाते हैं
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स्वतंत्रता दिन परेड में प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने शहनाई बजाने के लिए कहांतो खान साहब नें इनकार कर दिया। दरअसल खान साहब को नेताओं के गाडीयों के आगे पैदल चलकर शहनाई बजानी थी। उनके लिए चलते हुए शहनाई बजाना नामुमकीन थातब उन्होंने मना किया। जवाब सुनकर नेहरू ने और जोर देकर कहां, “तुम्हे गाना ही होंगा।” तब उस्ताद नेहरू पर बिफर पडे और कहां, “क्या आजादी क्या सिर्फ तुम्हारे लिए आई हैंक्या हम आजाद नही हुए?”

ती साल पहले याने 5 दिसंबर 2016 कि वह अल सुबह, आकाशवाणी ने रोज कि तरह अपनी सिग्नेचर ट्यूनबजाई। जिसके बाद अपने पहले वार्तापत्र में एंकर ने उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के घर से उनकी शहनाईयां चोरीखबर पढी। कुछ देर के लिए लगा, अभी तो शहनाई सुनी हैं, इतने जल्दी कैसी चोरी हो गई! उस खबर से जैसे लगा देश का मुनादी हमेशा के लिए कही खो गया हैं। एक महिने के भितर चोर पकडे गए, शहनाईयां तो मिली पर उसके उपर कि चांदी चोर पिघला कर खा गए।

पिछले कई दशकों से हम भारतीयों के दिन कि शुरुआत बिस्मिल्लाह खान के इन्ही शहनाई के सुरों से होती हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन ने अपनी आधिकारिक सिग्नेचर ट्यूनके तौर पर उस्ताद के शहनाई को जगह दी हैं। हर रोज उसे दिन के शुरुआत में बजाया जाता हैं। यह केवल बिस्मिल्लाह खान के परिवार का सम्मान नही बल्कि पुरे भारतीय परंपरा और संस्कृति का आदर हैं।

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भारतीय सभ्यता के दूत

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान को शहनाई के अलावा भारत के महानतम प्राचीन सभ्यता के दूत के रूप में जाना जाता हैं। बिस्मिल्लाह खान ने शहनाई के माध्यम से भारतीय संस्कृति को पुरे विश्व कि सैर कराई। वे जहाँ भी जाते, भारतीय सभ्यता के बारे में वहां के लोगो को बताते नही थकते। अपने हर इंटरव्यू में वे भारतीय बहुविध संस्कृति तथा मिली-जुली सभ्यता के बारे में खुलकर बातें करते।

आज भी भारत में हर खुशी के मौके पर बिस्मिल्लाह खान को याद किया जाता हैं। देश में उनके शहनाई के बगैर कोई शुभकार्य या शादियाँ नही होती। खुशी के हर मौके पर बिस्मिल्लाह खान कि शहनाईयों के सूर बजाना भारत में आम बात हैं। खान साहब के सुरों में केवल बनारस कि नही बल्कि भारत के मिली-जुली रिवायत कि खुशबू झलकती हैं।

बिस्मिल्लाह खान को संगीत परिवारिक विरासत में मिला था। उनका जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ। दादा रसूल बख्श ने उनका नाम बिस्मिल्लाहरखा था, जिसका मतलब बेहतर शुरुआतहोता हैं। कहते है कि जब उनके जन्म की खबर उनके दादा जी ने सुनी तो अल्लाह का शुक्रिया अदा करते हुए बिस्मिल्लाहकहा और तबसे उनका नाम बिस्मिल्लाह हो गया। उनके बचपन का नाम कमरुद्दीन था। वे अपने माता-पिता की दूसरी संतान थें।

कहते हैं, बिस्मिल्लाह खान के परदादा हुसैन बख्श खान, दादा रसूल बख्श, चाचा गाजी बख्श खान और पिता शहनाई बजाते थें। यह सभी लोग बिहार के भोजपूर रियासतके दरबारी कलाकार थें। खान साहब के परिवार के सभी लोग शहनाई बजाने में महारत रखते। अपने संगीत का हुनर दिखाने के लिए सभी लोग अक्सर दरबार में जाया करते।

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मामू से सिखा संगीत

कहा जाता है कि, बिस्मिल्लाह खान के पिता डुमरांव रियासत के महाराजा केशव प्रसाद सिंह के दरबार में शहनाई बजाते थे। बिस्मिल्लाह खान छह साल की उम्र में अपने पिता के साथ बनारस आ गए और हमेशा के लिए वहां के होकर रह गए। बनारस से उन्होंने अपने मामू अलीबख्श विलायतीसे शहनाई बजाना सीखा।

इस बारे में वह कहते हैं, “हमारे घर में गायकी तो पहले से थी। पर गायकी की इस भीड़ से हम निकलना चाहते थे। तबला देखा, सितार देखी, मगर वहां भीड़भाड़ कम न थी। तो, एक कण्डम शहनाई दिखी जहां ज़्यादा भीड़भाड़ नहीं थी।

अलीबख्क्ष बनारस के प्रसिद्ध काशी मंदिर में स्थायी रूप से शहनाई बजाने का काम करते थे। बिस्मिल्लाह खान ने मामू से कम उम्र में ही संगीत को सिखा। मामू से उन्होंने छोटी से उम्र में ही ठुमरी, चैती, कजरी और स्वानी जैसी कई विधाओं सीख ली थीं।

एक दफा इलाहाबाद के संगीत परिषद में अलीबश्ख को शहनाई बजाने का निमंत्रण मिला। उनके साथ बिस्मिल्लाह खान भी गए। उस कार्यक्रम में छोटे बिस्मिल्लाह नें अपनी प्रस्तृति दी। इस बच्चे कि शहनाई कि धुने उपस्थित लोगों को अपनी भंवे खडे करने के लिए मजबूर कर दिया। उस समय खान साहब कि उम्र महज 14 साल थी। इस घटना के कुछ ही दिनों के भीतर खान साहब कि ख्याती देशभर में होने लगी।

बीस साल में मिली ख्याती

बिस्मिल्लाह खान उनके संगीत करिअर में सबसे बडा मोड तब आया जब उन्हे कलकत्ता की ऑल इण्डिया म्यूज़िक कॉन्फ्रेस में शहनाई बजाने का मौका मिला। इस महफील में अनेक रथी-महारथी मौजूद थें। मौजूद लोगों ने उनके कला कि खुलकर तारिफ की। उस समय उनकी उम्र महज 20 साल थी, और साल था 1937।

इस सम्मेलन में उन्होंने तीन पदक जीते। इसके बाद ही उन्हें 1938 में लखनऊ, ऑल इंडिया रेडियो में काम करने का मौका मिला। चंद दिनों मे उनकी गिनती पहली श्रेणी के शहनाई वादक के रूप में स्थापित हुई।

शायद बहुत कम लोगों को याद है कि ब्रिटिशों से भारत को आजादी मिलने के बाद लाल किले पर खुशी कि पहली धुन बजाने वाले बिस्मिल्लाह खान ही थें। यह किस्मा भी काफी मशहूर हैं।

उन्हे जब स्वतंत्रता दिन परेड में प्रधानमंत्री पंडित नेहरू ने शहनाई बजाने के लिए कहां, तो खान साहब नें इनकार कर दिया। दरअसल खान साहब को नेताओं के गाडीयों के आगे पैदल चलकर शहनाई बजानी थी। उनके लिए चलते हुए शहनाई बजाना नामुमकीन था, तब उन्होंने मना कर दिया। जवाब सुनकर नेहरू ने और जोर देकर कहां, “तुम्हे गाना ही होंगा।तब उस्ताद नेहरू पर बिफर पडे और कहां, “क्या आजादी क्या सिर्फ तुम्हारे लिए आई हैं, क्या हम आजाद नही हुए?”

इस तरह का जवाब सुनकर नेहरू संभल गए और उन्होंने बिस्मिल्लाह खान साहब की आजादी कि बात मान ली। नेहरूजी ने कहां, ठिक हैं, हम आपकी बात समझते हैं, पर देश के लिए कुछ देर क्यों न हो आप शहनाई बजाईयें, आप आगे चलेंगे और हम सारे नेता याने देश आपके पिछे चलेंगा। फिर क्या था खान साहब ने मस्तमौला होकर शहनाई बजाई

भारत के पहले गणतंत्र दिवस के मौके पर याने 26 जनवरी, 1950 को नेहरू नें बिस्मिल्लाह खान से शहनाई बजवाई। उस दिन उन्होंने सबके सामने राग कैफीका प्रस्तुतिकरण किया था। सन 1997 में भारत सरकार के आमंत्रण पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खान ने आजादी की 50वीं वर्षगांठ पर दूसरी बार लाल किले के दीवाने-आम से शहनाई बजाई थी।

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शहनाई को कहते बेगम

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान अपनी शहनाईयों से बहुत प्यार करते थें। वे प्यार से शहनाईयों को दूसरी बेगम कहते। महज सोलह साल की उम्र में उनकी शादी मुग्गन खानम के साथ हुई। उनसे उन्हें नौ संतानें हुई।

शहनाई और संगीत क वह इबादत मानते थें। अल् सुबह उठकर वे बनारस के गंगा नदी मे वुजू करते। फज्र के नमाज क बाद छह घंटो तक काशी के मंदिर के समीप बैठक रियाज करते। करीबन 60-70 सालों तक उनका रोजाना का यह मामूल रहा।

बनारस कि आबो-हवां उनके मन में बसी रहती। शहर के मिली-जुली संस्कृति के वे दूत थें। शहर के बारे में वह कहते, “उनकी शहनाई बनारस का हिस्सा है। वह जिंदगी भर मंगलागौरी और पक्का महल में रियाज करते हुए जवान हुए हैं तो कहीं न कहीं बनारस का रस उनकी शहनाई में टपकेगा ही।

खान साहब ने दुनियाभर में शहनाई को लेकर घुमाँ। उन्होंने शहनाई जैसे लोक वाद्य को शास्त्रीय वाद्य का मान दिलाया। विश्व भर में शहनाई को पहचान दिलाई। साथ ही उन्होंने कजरी, चैती, सावनी आदि लोक बंदिशों से अपने आप को हमेशा जोडे रखा। सितार, वायलिन और सरोद के साथ उनकी जुगलबन्दियों को खूब प्रसिद्ध हुई। कहते हैं, जिस दौर में सारंगी का दबदबा हुआ करता था उस समय खान साहब ने शहनाई को संगीत के मुख्य धारा में स्थापित किया।

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विश्व में मिली पहचान

एडिनबर्ग म्यूज़िक फेस्टिवलके बाद दुनिया भर में उनकी ख्याती हुई। दुनिया भर में उनके कला को भरपूर प्यार और सम्मान मिला। अफगानिस्तान, यूरोप, ईरान, इराक, कनाडा, पश्चिम अफ्रीका, अमेरिका, जापान, हांगकांग में उनकी शहनाई गूँजती रही। विश्व में उन्हें पुरस्कार भी खूब मिले।

उस्ताद बिस्मिल्लाह खान के संगीत करियर को सम्मानित करते हुए भारत सरकार ने उन्हे कई सम्मानों से नवाजा। 1956 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1961 में पद्म श्री, 1968 में पद्म भूषण, 1980 में पद्म विभूषण, 1994 में संगीत नाटक अकादेमी का फेलो और मध्य प्रदेश सरकार ने उन्हें तानसेन पुरस्कार से नवाजा।

2001 में प्रतिष्ठित भारत रत्नसे सम्मानित किया। एम.एस. सुब्बलक्ष्मी और रवि शंकर के बाद बिस्मिल्लाह खान, सर्वोच्च नागरिक सम्मान पाने वाले तीसरे शास्त्रीय संगीतकार हैं।

शहनाई के सुरों के जादूगर के रूप मे बिस्मिल्लाह खान ने अपनी जिंदगी को भरपूर जिया। 21 अगस्त 2006 को 90 साल कि उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा। निधन के बाद 2007 में संगीत नाटक अकादमीने उनके सम्मान में युवा पुरस्कारकी शुरुआत की। संगीत, रंगमंच और नृत्य के क्षेत्र में युवा कलाकारों को यह सम्मान दिया जाता हैं।

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कलीम अज़ीम

हिन्दी, उर्दू और मराठी भाषा में लिखते हैं। कई मेनस्ट्रीम वेबसाईट और पत्रिका मेंं राजनीति, राष्ट्रवाद, मुस्लिम समस्या और साहित्य पर नियमित लेखन। पत्र-पत्रिकाओ मेें मुस्लिम विषयों पर चिंतन प्रकाशित होते हैं।